सुप्रीम कोर्ट ने टू-फिंगर टेस्ट पर लगाई रोक, जांच करने वाले होंगे दोषी

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    • Author, सुचित्रा मोहंती
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

सुप्रीम कोर्ट ने रेप के मामलों की जांच के लिए इस्तेमाल होने वाले ''टू-फिंगर टेस्ट'' के बारे में एक अहम फ़ैसला सुनाया है. कोर्ट ने जांच के इस तरीक़े को मेडिकल की पढ़ाई से हटाने का आदेश दिया है और इसे ''पितृसत्तामक और अवैज्ञानिक'' बताया है.

कोर्ट ने सोमवार को अपने आदेश में कहा कि टू-फिंगर टेस्ट को मेडिकल कॉलेज की अध्ययन सामग्री से हटाया जाए. कोर्ट ने कहा कि रेप पीड़िता की जांच के लिए अपनाया जाने वाला ये तरीक़ा अवैज्ञानिक है जो पीड़िता को फिर से प्रताड़ित करता है.

एक रेप मामले में सज़ा बरकरार रखते हुए न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायाधीश हिमा कोहली की बेंच ने ये फ़ैसला सुनाया है. कोर्ट ने अफ़सोस जताया कि आज भी टू-फिंगर टेस्ट किया जाता है जो महिलाओं के लिए भेदभावपूर्ण तरीका है. कोर्ट ने चेतावनी दी है कि टू-फिंगर टेस्ट करने वालों को दोषी ठहराया जाएगा.

न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, ''ये पितृसत्तात्मक और लैंगिक रूप से भेदभावपूर्ण है कि एक महिला के यौन संबंधों में सक्रिय होने के कारण ये ना माना जाए कि उसके साथ रेप हुआ है.''

''कोर्ट ने बार-बार टू-फिंगर टेस्ट के इस्तेमाल के लिए हतोत्साहित किया है. इस टेस्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है बल्कि यह पीड़ित को दोबारा प्रताड़ित करना है. टू-फिंगर टेस्ट नहीं किया जाना चाहिए. ये टेस्ट इस गलत धारणा पर आधारित है कि यौन संबंधों में सक्रिय महिलाओं का रेप नहीं हो सकता.''

सुप्रीम कोर्ट में रेप के जिस मामले पर ये फ़ैसला सुनाया गया है उस मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए अभियुक्तों को रिहा कर दिया था. ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्तों को दोषी ठहराया था.

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलटते हुए अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है.

क्या है टू-फिंगर टेस्ट?

कोर्ट

टू-फ़िंगर टेस्ट का इस्तेमाल रेप के आरोपों की जांच के लिए होता रहा है.

टू-फ़िंगर टेस्ट पीड़िता के गुप्तांग में दो अंगुलियां डालकर किया जाता है. इसमें डॉक्टर यह जानने की कोशिश करते हैं कि क्या पीड़िता शारीरिक संबंधों की आदी रही है.

इसका आधिकारिक मकसद सिर्फ़ ये साबित करना है कि बलात्कार की कथित घटना में 'पेनिट्रेशन' हुआ या नहीं.

इसमें गुप्तांग की मांसपेशियों के लचीलेपन और हाइमन की जांच होती है. अगर हाइमन मौजूद होता है तो किसी भी तरह के शारीरिक संबंध ना होने का पता चलता है. अगर हाइमन को नुक़सान पहुंचा होता है तो उससे महिला के सेक्सुअली एक्टिव होने की पुष्टि होती है.

लेकिन इस तरीक़े के आलोचकों का कहना है कि हाइमन टूटने की कोई और भी वजह हो सकती है.

डॉक्टरों के मुताबिक लड़कियों के वेजाइना में एक मेंबरेन(झिल्ली) होती है जिसे हाइमन कहा जाता है. सेक्स के बाद या कई बार जो लड़कियां खेलकूद में होती है, उनके मेंबरेन को नुक़सान हो जाता है.

डॉक्टर

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निर्भया मामले के बाद लगी थी रोक

साल 2013 में, जब निर्भया (ज्योति पांडे) के बलात्कार के बाद ऐसी हिंसा के लिए बने कानूनों पर बहस छिड़ी, तब टू-फिंगर टेस्ट पर रोक लगा दी गई.

स्वास्थ्य मंत्रालय के 'डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ रिसर्च' ने यौन हिंसा के पीड़ितों की फोरेंसिक जांच के लिए दिशा-निर्देश जारी किए.

इनमें कहा गया, "टू-फिंगर टेस्ट अब से गैर-क़ानूनी होगा क्योंकि ये वैज्ञानिक तरीका नहीं है और इसे इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. ये तरीका मेडिकल लिहाज़ से बेकार है और औरतों के लिए अपमानजनक है."

यौन हिंसा के कानूनों की समीक्षा करने के लिए बनाई गई वर्मा कमेटी ने भी साफ किया, "बलात्कार हुआ है या नहीं, ये एक कानूनी पड़ताल है, मेडिकल आकलन नहीं".

इसी साल 2013 में 'सेंटर फॉर लॉ एंड पॉलिसी रिसर्च' ने कर्नाटक में यौन हिंसा के मामलों की सुनवाई के लिए बनाए गए फास्ट ट्रैक कोर्ट्‌स के फैसलों का अध्ययन किया.

20 प्रतिशत से ज़्यादा फैसलों में उन्होंने टू-फिंगर टेस्ट का स्पष्ट उल्लेख और पीड़िता के पहले के यौन आचरण पर टिप्पणियां पाई थीं.

कॉपी - कमलेश

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