जो बदल रहे हैं रेप केस की जांच का तरीका

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- Author, संजीव चंदन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत में बलात्कार मामलों की जांच को लेकर अक्सर ये कहा जाता है कि ये प्रक्रिया दोबारा बलात्कार से गुज़रने जितनी मुश्किल और दर्दनाक होती है.
लेकिन महाराष्ट्र के एक डॉक्टर पिछले कई सालों से भारत में बलात्कार मामलों की जांच का तरीका बदलने में जुटे हुए हैं.
वर्धा के महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ (एमजीआईएमएस) के फ़ॉरेंसिक विभाग में काम करने वाले डॉक्टर इंद्रजीत खांडेकर वो शख्स हैं जिनकी पहल पर भारत के कई राज्यों में 'टू-फिंगर टेस्ट' का अंत हुआ.
फिंगर टेस्ट

एमए की अपनी पढ़ाई के दौरान डॉक्टर खांडेकर ने देखा कि यौन हिंसा के 90 फीसदी मामलों में अभियुक्त छूट जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट तक में इसके लिए डॉक्टरों को दोषी ठहराया गया है जबकि खामी ऐसे मामलों की जांच की प्रक्रिया में होती है.
डॉक्टर खांडेकर ने इस मुद्दे की जड़ में जाने का फैसला किया और आखिरकार एक अध्ययन के ज़रिए यह स्थापित किया कि यौन हमलों की शिकार महिलाओं को जांच के नाम पर कई तरह की अमानवीय प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है.
उन्होंने ये साबित किया कि किस तरह भारत में बिना किसी फ़ॉरेंसिक फॉरमेट के रेप मामलों की जांच होती है. 2010 में डॉक्टर खांडेकर के अध्ययन के आधार पर बॉम्बे हाई कोर्ट में बलात्कार मामलों की जांच को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई.
तीन सवाल

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डॉक्टर खांडेकर की सबसे बड़ी आपत्ति यौन हमलों की शिकार महिलाओं पर किए जाने वाले टू-फिंगर टेस्ट को लेकर थी जो एक यातना से गुज़रने जैसा था.
फिंगर टेस्ट पीड़िता के गुप्तांग में दो अंगुलियां डालकर किया जाता है. साल 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने डॉक्टर खांडेकर की सहमति से जांच का नया फॉरमेट लेकर आई, जिसमें फिंगर टेस्ट को ख़त्म किया गया.
बलात्कार के बाद सबसे कठिन लड़ाई होती है, दोषियों को सजा दिलवाने की. पुलिस डॉक्टरों से पीड़िता की जांच के लिए तीन सवाल पूछती है.
पहला क्या पीड़िता को यौन संबंध की आदत है? दूसरा, बलात्कार हुआ या नहीं? और तीसरा, पीड़िता यौन संबंध में सक्षम है या नहीं?
नए सवाल

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डॉक्टर खांडेकर ने 2011 में पुलिस की यह पद्धति हटाने के लिए महाराष्ट्र और केंद्र, दोनों सरकारों को लिखा.
डॉक्टर खांडेकर की दलीलों और उनके काम को देखते हुए सितम्बर 2013 में महाराष्ट्र सरकार ने बलात्कार की जांच के लिए नए सवाल बनाने का आदेश जारी किया.
नये नियम के अनुसार पुलिस अब संबंधित डॉक्टर से चार सवाल पूछती है. पहला, क्या पीड़िता के साथ हाल में कोई बलपूर्वक यौन संबंध बनाया गया है?
दूसरा, पीड़िता के शरीर पर कितने, कैसे और कहाँ जख्म हुए हैं? तीसरा, क्या कोई बाहरी वस्तु जैसे बाल, खून या वीर्य पीड़िता के शरीर पर पाए गए हैं?
और चौथा, पीड़िता से जांच के लिए जरूरी सैम्पल जैसे कपड़े, खून आदि लिए गए हैं या नहीं.
खून की जांच

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हालांकि केंद्रिय स्तर पर ये नियम लागू होना अब भी बाक़ी है. डॉक्टर खांडेकर की ही पहल पर महाराष्ट्र सरकार ने यौन हिंसा के अभियुक्तों को पॉर्न दिखाने की प्रक्रिया को खत्म किया. ये तरीका उनके वीर्य और खून का सैंपल लेने के लिए अपनाया जाता था.
खांडेकर के मुताबिक, "यह एक गैरजरूरी तरीका है. खून की जांच के ज़रिए वीर्य, ब्लड ग्रुप, यहां तक कि डीएनए की जानकारी तक पाई जा सकती है. ऐसे में पॉर्न दिखाने का तरीका बेमानी है."
साल 2011 में डॉक्टर खांडेकर ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर मांग की कि देश भर में डॉक्टरों को यौन हिंसा की जांच की बारीकियां सिखाने के लिए एक क्लिनिकल फ़ॉरेंसिक मेडिसिन यूनिट बनाया जाए.
न्यायिक प्रक्रिया

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दरअसल अभी तक यौन हिंसा की शिकार महिलाओं की जांच स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल यौन हिंसा के पीड़ितों की जांच बाल रोग विशेषज्ञ ही करते हैं.
इन डॉक्टरों को फ़ॉरेंसिक जानकारी नहीं होती और यही वजह है कि उनकी रिपोर्ट न्यायिक प्रक्रिया के लिए प्रभावी नहीं होती.
खांडेकर की पहल पर वर्धा में देश का पहला क्लिनिकल फ़ॉरेंसिक मेडिसिन यूनिट बनाया गया. इस यूनिट में सर्जरी, ओर्थोपेडिक, स्त्रीरोग, बालरोग विशेषज्ञों को फ़ॉरेंसिक जांच से जुड़ी जानकारियां दी जाती हैं.
इसके अलावा डॉक्टर खांडेकर ने गैरज़रूरी पोस्टमार्टम, पढ़ने में न आने वाली डॉक्टरों की लिखाई और उससे जांच पर होनेवाले असर जैसी चीज़ों को लेकर भी काम किया.
खांडेकर के अध्ययन के अनुसार 60 फीसदी से ज़्यादा पोस्टमार्टम खत्म किए जा सकते हैं और इन पर जाया होने वाले समय और पैसा बचाया जा सकता है.
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