इमरान ख़ान के 'इस्लामाबाद लॉन्ग मार्च' के कामयाब होने की कितनी उम्मीद

इमरान खान

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    • Author, शुमाइला जाफ़री
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद से
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सत्ता को चुनौती

  • इमरान ख़ान का हक़ीक़ी आज़ादी मार्च शुक्रवार को लाहौर से रवाना हुआ
  • चार नवंबर को इस्लामाबाद में पहुंचने की है योजना
  • वो देश में तुरंत चुनाव की मांग करने के लिए ये मार्च निकाल रहे हैं.
  • इमरान ख़ान कह रहे हैं देश में विदेशी साज़िश से सरकार थोपी गई है.
  • पीटीआई प्रमुख का दावा है कि सत्ता पर उनका हक़ बनता है.
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कई सप्ताह के राजनीतिक ड्रामा, विचार-विमर्श और चेतावनियों के बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अंतत: अपने समर्थकों के साथ पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के लिए लॉन्ग मार्च का एलान कर दिया है.

इस लॉन्ग मार्च को लेकर उनकी एक ही मांग है - देश में तुरंत चुनाव कराने की.

अपने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच पाकिस्तान के तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी के चेयरमैन और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने 90, माल रोड में खचाखच भरे प्रेस कॉन्फ्ऱेंस में इसका एलान किया.

इस इमारत को ऐतिहासिक तौर पर फ़्रीमसेन लॉज के नाम से जाना जाता रहा है. जादू घर के नाम पर मशहूर इस इमारत में अब पंजाब के मुख्यमंत्री का कार्यालय भी है.

इमरान ख़ान ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, "मैं ग़ैर ज़िम्मेदार कहा गया, कहा गया कि देश में संकट की स्थिति है और उस स्थिति में हमलोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

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लॉन्ग मार्च केवल राजनीति के लिए नहीं है, हमलोग पाकिस्तान के भविष्य के लिए लड़ रहे हैं. यह उन ठगों और चोरों के ख़िलाफ़ जिहाद है जो विदेशी षड्यंत्र की मदद से हम पर थोपे गए हैं. यह असली आज़ादी के लिए मार्च है."

इस साल यह दूसरा मौका है जब इमरान ख़ान ने अपने समर्थकों से सड़क पर उतर कर इस्लामाबाद की ओर मार्च करने का आह्वान किया है. इससे पहले मई में भी उन्होंने ऐसी कोशिश की थी, लेकिन तब पाकिस्तान की मुस्लिम लीग (नवाज़) की सरकार ने प्रदर्शन कर रहे लोगों के सामने सुरक्षा बलों को तैनात कर इसे नाकाम कर दिया था.

सबसे बड़े सूबे पंजाब में इमरान समर्थकों पर पुलिस ने कार्रवाई की और इस्लामाबाद के सभी प्रमुख मार्गों को बंद कर दिया था.

बाद में इमरान ख़ान ने कहा था कि सिविल वॉर की स्थिति से बचने के लिए वे मार्च वापस ले रहे हैं.

ऐसे में सवाल यही है कि इस बार क्या होगा? मार्च कितनी दूरी तक हो पाएगा? सरकार की प्रतिक्रिया क्या रहेगी?

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इमरान की ये यात्रा क्यों?

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क्या इमरान ख़ान के इस मार्च में लोग एकत्रित होंगे. मौजूदा परिस्थितियों में किसी के पास इसका कोई जवाब नहीं है.

पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेट सितारे इमरान ख़ान इस साल अप्रैल में देश के ऐसे पहले प्रधानमंत्री बने जिन्हें संसद में अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए हटाया गया.

इमरान ख़ान 2018 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने थे, उन्हें बहुमत तो हासिल नहीं हुआ था, लेकिन वे गठबंधन सरकार के प्रमुख बने थे.

इमरान ख़ान के आलोचकों का कहना है कि वे पाकिस्तान की सेना की मदद से सरकार बना पाए थे. सेना, इमरान ख़ान की दूसरी पार्टियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार निरोधी गतिविधियों का साथ दे रही थी.

वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद के मुताबिक़, जब यह समझौता टूट गया तो इमरान ख़ान सत्ता से बाहर हो गए.

वे कहते हैं, मज़बूत धारणा ये है कि सेना ने इमरान ख़ान की सरकार बनवाने में हर संभव मदद की और जब समर्थन खींच लिया तो वे विश्वास प्रस्ताव हार गए और उनकी सरकार गिर गई."

कई विश्लेषकों का मानना है कि इमरान ख़ान और सेना के बीच आपसी संबंध तब ख़राब होने शुरू हुए, जब पिछले साल नवंबर में आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति को लेकर दोनों के बीच मतभेद उभर आए, इसने विपक्ष को इमरान ख़ान को सत्ता बाहर करने का मौका दिया.

हालांकि कुछ दूसरे विश्लेषकों का मानना है कि अर्थव्यवस्था को संभालने में नाकामी और भ्रष्टाचार के मामलों में किसी तरह की प्रगति नहीं होने के चलते दोनों के संबंध ख़राब हुए.

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पाकिस्तान की सियासत और सेना

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इन विश्लेषकों के दावे के मुताबिक़, पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान का मानना है कि मज़बूत अर्थव्यवस्था से ही देश सुरक्षित रह सकता है.

वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि सेना का साथ नहीं मिलने की वजह से इमरान ख़ान सत्ता से बाहर हुए.

इमरान ख़ान के सत्ता से बाहर होने के बाद राजनीति में सेना की भूमिका को लेकर कई विरोध प्रदर्शन हुए. इसको लेकर पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा की काफ़ी आलोचना भी हुई.

उन पर आरोप है कि विदेशी ताक़त की मदद से उन्होंने पाकिस्तान की जनता पर एक भ्रष्ट सरकार थोप दी.

उनके राजनीतिक विरोधी भी उन पर निशाना साध रहे हैं कि पाकिस्तान के आम लोगों के पैसे और जनमत दोनों की चोरी हुई है.

इमरान ख़ान का कहना है कि मौजूदा गठबंधन, पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) को सरकार चलाने का नैतिक अधिकार नहीं है.

इस गठबंधन में मुस्लिम लीग नवाज़ और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी सहित क़रीब एक दर्जन दल शामिल हैं. इमरान के मुताबिक़, जनमत उनके साथ था और उसे ख़रीद-फ़रोख्त के साथ चुराया गया है.

यही वजह है कि सत्ता से बाहर होने के बाद इमरान ख़ान लगातार मौजूदा संसद को भंग कराके नए चुनाव करने की मांग कर रहे हैं, और इसी मांग के साथ उन्होंने मार्च की कॉल दी है.

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इमरान की दावेदारी

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सत्ता से बाहर होने से कुछ दिनों पहले इमरान ख़ान ने कहा था, "अगर सरकार से बाहर हुआ तो मैं ज़्यादा ख़तरनाक साबित होऊंगा."

पिछले सात महीने को देखने से ज़ाहिर होता है कि वे अपने शब्दों पर खरे उतरे हैं. अप्रैल के बाद से वे दर्जनों सार्वजनिक रैलियों को संबोधित कर चुके हैं, अनगिनत मीडिया चर्चा में शामिल हो चुके हैं. युवाओं में उनकी लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ी है.

वे एक तरह का नैरेटिव गढ़ने में कामयाब रहे हैं जिसमें वे ना केवल अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बना रहे हैं बल्कि सैन्य प्रतिष्ठान को भी राजनीति में दखल और भूमिका को लेकर सवालों के घेरे में ला चुके हैं.

वहीं सैन्य प्रतिष्ठान का दावा है कि इमरान ख़ान चाहते थे कि सेना उनका साथ दे, लेकिन सेना ने राजनीतिक तौर पर तटस्थ रहने का फ़ैसला किया है. इमरान ख़ान ने सेना के इस बयान पर जवाब दिया है. उन्होंने अपनी एक सार्वजनिक रैली में कहा, "केवल जानवर ही तटस्थ रह सकते हैं."

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इमरान बेचैन क्यों?

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वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद के मुताबिक़ इमरान बेचैन हैं. उन्होंने कहा, "उनके पास कोई विकल्प नहीं है, उन्हें लग रहा है कि उन्हें किनारे किया गया है." हारून के मुताबिक़ इमरान ख़ान के पास अंतिम विकल्प लॉन्ग मार्च है.

हारून रशीद इसकी तीन वजहें बताते हैं. वे कहते हैं, "उपचुनाव में जीत, सरकारी कोष मामले में इमरान ख़ान को अयोग्य ठहराया जाना और कीनिया में पत्रकार अरशद शरीफ़ की हत्या, ये तीन वजहें हैं."

"अरशद इमरान ख़ान के नैरेटिव के बड़े समर्थक थे. उनकी हत्या पर लोगों में बहुत नाराजगी है, लोगों में उनके प्रति सहानुभूति का भाव है और इमरान ख़ान उसको राजनीतिक तौर पर भुनाना चाहते हैं."

दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषक कामरान शाहिद का मानना है कि इमरान ख़ान अपने राजनीतिक विरोधियों के ख़िलाफ़ मार्च नहीं निकाल रहे हैं बल्कि वे सेना के ख़िलाफ़ निकाल रहे हैं और यह सत्ता में लौटने की आख़िरी कोशिश है.

कामरान शाहिद कहते हैं, "इमरान ने बहुत बड़ा जोख़िम लिया है. उनके करियर को नुक़सान हो सकता है या फिर देश में संघर्ष और अराजकता का नया दौर शुरू हो सकता है. उन्होंने अपना नैरेटिव झूठे विदेशी षड्यंत्र के आधार पर गढ़ा है, वे बुरी तरह एक्सपोज़ हो चुके हैं."

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ताक़त नापने की कोशिश

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अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ये मार्च किस तरह आगे बढ़ेगा. इमरान की पार्टी के कई नेताओं ने जो जानकारी दी है, उसके मुताबिक़ पहले दिन यह लाहौर के अंदर ही रहेगा. शनिवार को ग्रैंड ट्रंक रोड के रास्ते यह इस्लामाबाद की ओर बढ़ेगा.

ऐतिहासिक ग्रैंड ट्रंक रोड को राजनीतिक यात्राओं को लिए रणनीतिक तौर पर चुनने का इतिहास रहा है. यह पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण और व्यस्तम सड़क मार्ग है.

यह मार्च धीरे-धीरे इस्लामाबाद की ओर बढ़ेगा और दिन में इमरान ख़ान अपने समर्थकों को संबोधित करेंगे. यात्रा में भाग लेने वाले समर्थक रात में विश्राम करेंगे. एक सप्ताह के बाद इसके चार नवंबर को इस्लामाबाद पहुंचने की योजना है.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या योजना के मुताबिक़ मार्च का आयोजन हो पाएगा?

पाकिस्तान के विश्लेषकों को इसमें संदेह है. हारून रशीद के मुताबिक़, इमरान ख़ान लाहौर में अपनी ताक़त को तौलेंगे और लाहौर की भीड़ के बाद ही वे भविष्य का फ़ैसला लेंगे.

वे कहते हैं, "इमरान ख़ान देखेंगे कि पंजाब की जनता उनके साथ है या नहीं, उसके बाद ही वे भविष्य का फ़ैसला लेंगे."

एक अहम सवाल यह भी उठ रहा है कि बीते मई की तुलना में इस बार क्या अलग है? दरअसल इस बार इमरान ख़ान की पार्टी और गठबंधन की पंजाब प्रांत में सरकार है. इसका मतलब यह हुआ कि नौकरशाही और पुलिस प्रशासन उनके नियंत्रण में है.

ज़ाहिर है कि मई महीने में जिस तरह उनके समर्थकों को पुलिस प्रशासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा था, इस बार वैसी स्थिति नहीं होगी.

इसके अलावा तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी की सरकार ख़ैबर पख़्तून ख़्वा, गिलगित बाल्टिस्तान और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भी है. ऐसे में इन प्रांतों से भी समर्थकों के इस्लामाबाद पहुंचने की उम्मीद की जा रही है. इन सबसे इमरान ख़ान को मदद ही मिलेगी.

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लॉन्ग मार्च की कामयाबी पर सवाल

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हालांकि कामरान शाहिद इसे संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं. इमरान ख़ान इससे पहले दो लॉन्ग मार्च का आह्वान कर चुके हैं और दोनों बार उन्हें नाकामी देखने को मिली थी.

2014 में उन्होंने 126 दिनों तक चले सबसे लंबे विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया था, वे नवाज़ शरीफ़ सरकार को हटाना चाहते थे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने मई महीने में लॉन्ग मार्च की कॉल दी थी, उस वक्त लोगों में आक्रोश भी था, लेकिन उनके समर्थन में बहुत लोग सड़कों पर नहीं उतरे.

कामरान शाहिद कहते हैं, "2014 में उन्हें पाकिस्तानी-कनाडाई इस्लामिक विद्वान अल्लामा ताहिर उल क़ादरी का समर्थन हासिल था. क़ादरी के समर्थक उनके साथ अंत तक जुड़े रहे.

इमरान ख़ान की पार्टी के मुट्ठी भर समर्थक शाम में जुटते थे और कुछ ही घंटों में चले जाते थे. इसलिए पीटीआई के समर्थक इस बार विरोध प्रदर्शन में डटे रहेंगे, यह संभव नहीं दिखता."

हालांकि इमरान ख़ान का मानना है कि इस मार्च के ज़रिए देश में एक सॉफ़्ट क्रांति की शुरुआत होगी जो मतपत्रों के ज़रिए मुकाम तक पहुंचेगी.

उन्होंने इस मार्च के शांतिपूर्ण होने की घोषणा की है, लेकिन अधिकारियों को चेताते हुए कहा कि अगर उनके समर्थकों पर कोई कार्रवाई हुई तो अव्यवस्था फैल सकती है.

पाकिस्तान की मौजूदा पीडीएम गठबंधन सरकार ने किसी भी तरह की हिंसा करने पर कार्रवाई की चेतावनी दी है. इस्लामाबाद और उसके आस-पास किसी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए हज़ारों पुलिस बल को तैनात किया गया है.

गृह मंत्री राणा सनाउल्लाह ने कई बार चेतावनी जारी की है और सेना को भी बुला लिया है. इस्लामाबाद में प्रवेश करने के सभी रास्तों को सील करने की तैयारी भी कर ली गई है और राजधानी के रेड ज़ोन स्थित महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है.

इमरान ख़ान ने कहा है कि मार्च में शामिल लोग क़ानून को अपने हाथ में नहीं लेंगे. उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान की अदालत के निर्देशों के मुताबिक़ मार्च में शामिल लोग रेड ज़ोन इलाके में नहीं जाएंगे. हालांकि इमरान ख़ान को रोके जाने पर क्या स्थिति उत्पन्न होगी, यह कोई नहीं जानता है.

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पाकिस्तान की सेना का क्या कहना है?

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इमरान ख़ान को खुले तौर पर और परदे के पीछे से समर्थन देकर सत्ता में लाने का आरोप सेना पर है.

तीन साल तक इमरान ख़ान के सेना के साथ शानदार संबंध रहे. कई मौकों पर सेना ने उनका खुलकर साथ दिया. लेकिन पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई महानिदेशक की नियुक्ति के समय नवंबर, 2021 में दोनों के रिश्ते ख़राब हुए. इसके बाद ही इमरान ख़ान सत्ता से बाहर हुए.

इमरान ख़ान के लॉन्ग मार्च से पहले पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग के डीजी और आईएसआई के डीजी जनरल नदीम अंजुम ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस करके इमरान ख़ान के तर्कों का विरोध किया.

पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार यह देखने को मिला है कि ख़ुफ़िया एजेंसी का प्रमुख प्रेस कांफ्रेंस कर रहा है. इस प्रेस कांफ्रेंस में पहले तो पीटीआई समर्थक पत्रकार अरशद शरीफ़ की हत्या के मुद्दे पर दोनों महानिदेशकों ने अपनी बात रखी. लेकिन उसके बाद दोनों मौजूदा राजनीतिक हालात पर भी बोले.

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क्या गहरा रहा है पाकिस्तान का सियासी संकट?

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इन दोनों ने कहा कि इमरान ख़ान विदेशी षड्यंत्र का आरोप लगा रहे हैं जो सच्चाई से कोसों दूर है.

इन दोनों ने यह भी दावा किया कि इमरान ख़ान सरकार ने मार्च महीने में पाकिस्तान सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा को अनिश्चित काल के सेवा विस्तार देने का आकर्षक ऑफ़र दिया था जिसे बाजवा ने अस्वीकार कर दिया था.

पाकिस्तान सेना के दोनों महानिदेशकों ने कहा कि वे लॉन्ग मार्च के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन हर हालत में देश की सुरक्षा के लिए संकल्पित हैं. इन दोनों ने भरोसा दिया कि पाकिस्तान की सेना अराजनीतिक है और वैसी ही रहेगी.

इनकी प्रेस कांफ्रेंस पर बोलते हुए विल्सन सेंटर के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कुगेलमन ने ट्वीट किया है, "पहले तो पाकिस्तान की सरकार ने इमरान ख़ान को साइडलाइन करने की कोशिश की.

अब उन्हें शर्मसार करने की कोशिश की जा रही है, वह देश के दो प्रमुख संस्थाओं के अहम अधिकारी कैमरे के सामने आकर उनके नैरेटिव का खंडन कर रहे हैं. लेकिन इसका लाभ इमरान ख़ान को मिलेगा. लंबा और भद्दा राजनीतिक संकट जल्दी ही अपने चरम पर पहुंच सकता है."

इसके कुछ ही घंटों बाद इमरान ख़ान ने एक इंटरव्यू में कहा, "अगर संस्थान अराजनीतिक हैं तो इस राजनीतिक दबाव के क्या उद्देश्य हैं?"

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क्या इमरान ख़ान के मंसूबे पूरे होंगे?

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पाकिस्तान के प्रमुख दैनिक 'डॉन' अख़बार ने अपने संपादकीय में एक सवाल पूछा है. "पीटीआई से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि इस लॉन्ग मार्च से उसे क्या हासिल करने की उम्मीदें हैं?"

इस संपादकीय में कहा गया है कि सरकार ने समय से पहले चुनाव कराए जाने स्पष्टता से इनकार किया है, ऐसे में कितनी भी संख्या में लोग जमा हो जाएं, उससे क्या बदलाव होगा, इसको लेकर संपादकीय में आश्चर्य जताया गया है.

अख़बार ने संपादकीय में लिखा है कि इससे घरेलू बाज़ार-दुकानों को नुक़सान हो सकता है.

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वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद का मानना है कि इमरान ख़ान के दावे के मुताबिक़ अगर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा तो सरकार पर कोई असर नहीं होगा, लेकिन अगर क़ानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी तो सरकार पर दबाव बढ़ेगा.

वो कहते हैं, "सरकार डरी हुई है, इसलिए वे चेतावनी और धमकी जारी कर रहे हैं और इस्लामाबाद के आस पास भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं."

हारून का मानना है कि ऐसी अराजक स्थिति में कोई तीसरा पक्ष भी फ़ायदा उठा सकता है, पाकिस्तान के तहरीक-ए-तालिबान को लेकर ख़तरा पहले से ही मौजूद है. लेकिन सैन्य प्रतिष्ठान ने प्रेस कांफ्रेंस में स्पष्टता से कहा कि देश की सुरक्षा को हर हाल में कायम रखा जाएगा.

राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद मलिक कहते हैं, "यह एक ख़तरनाक संकट बनता जा रहा है. ख़तरे की स्थिति नियंत्रण से बाहर भी हो सकती है. ऐसी स्थिति में मेरे ख़्याल से किसी को कोई फ़ायदा नहीं होगा."

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