पाकिस्तान के आर्मी चीफ़ जनरल बाजवा क्या आगे भी पद पर बने रहेंगे?

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- Author, ज़ुबैर आज़म
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद
पाकिस्तान में आर्मी चीफ़ की नियुक्ति का मामला पिछले साल से ही ख़बरों, विश्लेषणों और विवाद का केंद्र बना रहा, लेकिन सोमवार की रात पूर्व प्रधानमंत्री और तहरीक-ए-इंसाफ़ के चेयरमैन इमरान ख़ान की ओर से आम चुनाव के बाद नए सेनाध्यक्ष की नियुक्ति के प्रस्ताव ने एक राजनैतिक और क़ानूनी बहस समेत नए सवालों को जन्म दिया है.
इमरान ख़ान ने पाकिस्तान के निजी टीवी चैनल 'दुनिया न्यूज़' के एंकर कामरान ख़ान को दिए इंटरव्यू में कहा कि नए आर्मी चीफ़ की नियुक्ति आम चुनाव के बाद नई चुनी हुई सरकार को करनी चाहिए और तब तक के लिए क़ानून में कोई गुंजाइश निकाली जा सकती है.
इमरान ख़ान ने सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि वो वर्तमाान सेनाध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा के कार्यकाल में विस्तार के इच्छुक हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर उनके इस प्रस्ताव का यही मतलब निकाला जा रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आर्मी चीफ़ जनरल क़मर जावेद बाजवा को क़ानूनी तौर पर एक और सेवा विस्तार मिल सकता है या नहीं और इस मामले में सरकार का क्या रुख़ है?
रक्षा मंत्री का रुख़
रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने इस इंटरव्यू पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ''वर्तमान सरकार इस उत्तरदायित्व को निर्धारित समय पर संविधान और संस्था की श्रेष्ठ परंपराओं को ध्यान में रखते हुए निभाएगी और कोई निर्णय करेगी. महत्वपूर्ण निर्णय राजनैतिक स्वार्थों के हिसाब से नहीं लिए जाते.''
इस सरकारी राय के बाद अब यह सवाल भी सिर उठा रहा है कि क्या इमरान ख़ान का यह प्रस्ताव एक सोचा-समझा बयान है?
ये प्रश्न इस पृष्ठभूमि में भी महत्वपूर्ण है कि तहरीक-ए-इंसाफ़ के अध्यक्ष अपनी सरकार गिराए जाने के बाद से परोक्ष रूप में 'इस्टैबलिशमेंट' या सेना की आलोचना करते रहे हैं.
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इमरान ख़ान ने इंटरव्यू में क्या कहा?
इन सवालों के जवाब जानने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि इमरान ख़ान ने इस इंटरव्यू में वास्तव में कहा क्या है.
निजी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में जब एंकर ने सवाल किया, ''आपने पहले कहा कि वर्तमान सरकार ही आर्मी चीफ़ की नियुक्ति करेगी, फिर इसके बाद आपने एक विवादास्पद बयान दिया, लेकिन अब तो मामला साफ़ है कि सरकार ही नियुक्ति करेगी?''
इस सवाल पर इमरान ख़ान ने कहा, ''मैंने कहा था कि आर्मी चीफ़ की पोज़िशन बहुत महत्वपूर्ण है, मेरिट पर नियुक्ति होनी चाहिए. लेकिन मैंने साथ में यह भी कहा था कि आसिफ़ ज़रदारी मेरिट के लिए क्वालीफ़ाइड नहीं हैं और न नवाज़ शरीफ़ क्वालीफ़ाइड हैं. अगर यह स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव जीत कर सरकार में आते हैं तो फिर अपना चीफ़ नियुक्त कर लें.''
इस जवाब पर एंकर कामरान ख़ान ने सवाल किया, ''चुनाव तो 90 दिन बाद होंगे, फिर ऐसे में क्या किया जाए? जिस दिन जनरल बाजवा की रिटारयमेंट हो उस दिन क्या हो?''
इमरान ख़ान ने जवाब दिया,''इसकी गुंजाइश निकल सकती है. यह कोई बड़ी बात नहीं है. देश के भले के लिए इसका प्रावधान निकल सकता है, वकीलों ने मुझे बताया है कि इसका प्रावधान हो सकता है कि जब चुनी हुई सरकार आए तो वह फ़ैसला करे.''
एंकर ने फ़िर सवाल किया, ''उस वक़्त तक के लिए जनरल बाजवा को एक्सटेंशन दे दी जाए जब तक कि चुनाव न हो जाएं?''
इमरान ख़ान ने जवाब दिया, ''मैंने इस पर गहराई से नहीं सोचा. वकील क्या कहते हैं, संविधान के विशेषज्ञ क्या कहते हैं, मैं नहीं जानता, लेकिन मैं सिर्फ़ यह कह रहा हूं कि देश असामान्य स्थितियों से गुज़र रहा है.''
इमरान ख़ान की ओर से दिया गया यह बयान उनके उस हाल के बयान से जुड़ा है, जब फ़ैसलाबाद में आमसभा को संबोधित करते हुए नवंबर में आर्मी चीफ़ की नियुक्ति के संबंध में उन्होंने कहा था, ''आसिफ़ ज़रदारी और नवाज़ शरीफ़ नवंबर में अपना फे़वरिट आर्मी चीफ़ लेकर आना चाहते हैं.''
उन्होंने कहा था, ''ये डरते हैं कि यहां कोई तगड़ा आर्मी चीफ़ आ गया, एक देशप्रेमी आर्मी चीफ़ आ गया तो पूछेगा उनसे, तो इस डर से ये दोनों मिलकर अपना आर्मी चीफ़ नियुक्त करेंगे.''

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अगले दिन इस बयान की प्रतिक्रिया में आईएसपीआर (इंटर सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस) की ओर से बयान जारी किया गया कि पाकिस्तान आर्मी में फ़ैसलाबाद में एक सियासी सभा के दौरान इमरान ख़ान के बयान के बारे में गुस्सा है. इसमें कहा गया कि चेयरमैन, पीटीआई की ओर से ''पाक फ़ौज के सीनियर अफ़सरों के बारे में दिए मानहानि वाले और अनावश्यक बयान को लेकर सेना में बहुत दुख और क्षोभ है.''
ध्यान रहे कि डी.जी. आईएसपीआर मेजर जनरल बाबर इफ़्तिख़ार ने 14 अप्रैल 2022 को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में एक सवाल के जवाब में यह बयान दिया था, ''चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ न तो एक्सटेंशन के इच्छुक हैं और न ही वो इसे स्वीकार करेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए. वो नवंबर 2022 को रिटायर हो जाएंगे.''
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'इस मामले को विवादास्पद न बनाया जाए'
रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने सोमवार की रात निजी टीवी चैनल के होस्ट शाहज़ेब ख़ानज़ादा से बात करते हुए इमरान ख़ान के बयान और आर्मी चीफ़ के सेवाकाल में विस्तार के मामले पर कहा,''यह समय से पहले की बात है. अभी ढाई महीने बाक़ी हैं. इस समय इस मुद्दे को खोलना न तो पाकिस्तान के लिए और न ही हमारी संस्था के लिए बेहतर है.''
ख़्वाजा आसिफ़ ने कहा, ''मेरी अपील होगी कि इमरान ख़ान सहित सभी राजनैतिक दल इस मामले को विवादास्पद न बनाएं.''
उन्होंने कहा, ''इमरान ख़ान वास्तव में हमारी सरकारी की वैधता को चुनौती दे रहे हैं.'' ख़्वाजा आसिफ़ ने आरोप लगाया, ''उस इंटरव्यू में सवाल और जवाब पहले तय हो चुके थे.''
ख़्वाजा आसिफ़ ने कहा, ''यह हमारी सरकार का अधिकार है और हम समय आने पर इस अधिकार का इस्तेमाल करेंगे.''
एक सवाल के जवाब में ख़्वाजा आसिफ़ ने कहा कि इस मामले पर किसी तरह की बातचीत अभी तक नहीं हुई है.
रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ ने इस साल 11 मई को बीबीसी को दिये एक इंटरव्यू में कहा था, ''अगले सेनाध्यक्ष की नियुक्ति के मामले पर इमरान ख़ान अपनी व्यक्तिगत राय थोपना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि ऐसा हो कि उनके राजनैतिक हित और शासन काल को सुनिश्चित किया जा सके.''
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क्या आर्मी चीफ़ को एक और एक्सटेंशन मिल सकती है?
पाकिस्तान में आर्मी चीफ़ के कार्यकाल में विस्तार कोई नई बात नहीं है. पहले कमांडर इन चीफ़ जनरल अयूब ख़ान से लेकर वर्तमान आर्मी चीफ़ जनरल क़मर जावद बाजवा तक एक्सटेंशन के कई उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन वर्तमान सेनाध्यक्ष का सेवा विस्तार सबसे विवादित रहा है.
लेकिन फिर भी सवाल यह है कि वर्तमान सेनाध्यक्ष को संवैधानिक और क़ानूनी तौर पर एक और एक्सटेंशन या कार्यकाल में विस्तार मिल सकता है?
एक सीनियर सरकारी पदाधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी को बताया कि संवैधानिक और क़ानूनी तौर पर सेनाध्यक्ष को कार्यकाल में विस्तार देने का रास्ता तो है, लेकिन उनके अनुसार यह सरकार का निर्णय होगा.
उन्होंने बताया कि जनरल क़मर जावेद बाजवा को जब पहली बार एक्सटेंशन मिली और यह मामला अदालत में गया तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तहरीक-ए-इंसाफ़ की सरकार ने एक क़ानून बनाया था जिसके तहत पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पास यह विकल्प है कि वे प्रधानमंत्री की राय पर आर्मी चीफ़ के सेवाकाल को विस्तार दे सकते हैं.
उनके अनुसार, इस क़ानून के बनाने में एक अहम बिंदु सेनाध्यक्ष की उम्र के बारे में भी था. ''अगर वह न होता तो नया विस्तार संभव न होता.''

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पाकिस्तान आर्मी ऐक्ट संशोधन 2020
जनरल क़मर बाजवा (जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने तैनात किया था) को 29 नवंबर 2019 को रिटायर हो जाना था, लेकिन उस समय के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने उनके रिटायरमेंट से तीन महीने पहले ही उन्हें तीन साल के लिए सेवा-विस्तार देने की घोषणा की थी जिसके ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया गया था.
अदालत ने टिप्पणी की कि संविधान के आर्टिकल 243, आर्मी ऐक्ट 1952 और आर्मी रेगुलेशंस रूल्स 1998 में कहीं भी कार्यकाल में विस्तार या दोबारा नियुक्ति का उल्लेख नहीं है.
28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने आर्मी चीफ़ जनरल क़मर बाजवा के सेवाकाल में छह महीने की सशर्त विस्तार की स्वीकृति देते हुए सरकार को आदेश दिया था कि वह आर्मी चीफ़ के सेवाकाल विस्तार या दोबारा नियुक्ति के संबंध में संसद से औपचारिक क़ानून पास कराए.
तहरीक-ए-इंसाफ़ ने आश्चर्यजनक तौर पर विपक्षी दलों, मुस्लिम लीग नून या नवाज़ और पीपुल्स पार्टी के समर्थन से आर्मी ऐक्ट 1952 में संशोधन किया जिसमें सेनाध्यक्ष की दोबारा नियुक्ति या सेवाकाल में विस्तार का अंश शामिल किया गया. इसके तहत पाकिस्तान के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के प्रस्ताव पर आर्मी चीफ़ के सेवाकाल में तीन साल का विस्तार कर सकते हैं या दोबारा तैनाती कर सकते हैं.
क़ानून के तहत सेवाकाल पूरा हो जाने पर विस्तार या दोबारा नियुक्ति प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार होगा जिसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी.
क़ानून के अनुसार, 64 साल की उम्र तक पहुंचने पर ऐसे जनरल रिटायर माने जाएंगे. उस समय जनरल बाजवा की उम्र 59 साल थी.
उस समय के क़ानून मंत्री फ़रोग़ नसीम ने जनवरी 2020 को 'हम न्यूज़' के होस्ट नदीम मलिक से इंटरव्यू में यह तर्क दिया था, ''यह क़ानून जनरल बाजवा के लिए नहीं बना और क़ानून के अनुसार लेफ़्टिनेंट जनरल के सेवाकाल की अवधि चार साल या 58 साल की उम्र तक होती है. इनमें से जो पहले आये, इसका मतलब है कि अगर कोई लेफ्टिनेंट जनरल 58 साल की उम्र में तीन वर्ष के लिए जनरल बनता है और उसको एक बार के लिए विस्तार देना है तो तीन साल और दरकार हैं.''

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तो क्या आर्मी एक्ट के तहत उनके सेवाकाल में एक और विस्तार हो सकता है?
पूर्व केन्द्रीय क़ानून मंत्री बैरिस्टर अली ज़फ़र (अब तहरीक-ए-इंसाफ़ में हैं) ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि संवैधानिक तौर पर निश्चित रूप में आर्मी चीफ़ के सेवाकाल में विस्तार किया जा सकता है, लेकिन इसकी प्रक्रिया वही होगी जो निर्धारित कर दी गई है.
जब उनसे सवाल किया गया कि क्या आर्मी ऐक्ट के तहत तीन साल से कम अवधि के लिए भी सेवाकाल में विस्तार दिया जा सकता है तो उन्होंने कहा कि तीन साल से कम की अवधि के लिए विस्तार दिया जा सकता है, लेकिन यह फ़ैसला प्रधानमंत्री का ही होगा ओर उनकी ओर से ही सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति आदेश दे सकते हैं.
इमरान ख़ान का प्रस्ताव और राजनैतिक बहस
तहरीक-ए-इंसाफ़ के अध्यक्ष इमरान ख़ान का यह प्रस्ताव क़ानूनी और संवैधानिक तौर पर लागू होने योग्य होने के बावजूद इसे व्यवहार में लाना कई अन्य प्रश्नों से जुड़ा है. इनमें सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि क्या प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और सरकार की ऐसा करने में दिलचस्पी है या नहीं.
पत्रकार अज़हर अब्बास ने लिखा, ''इमरान ख़ान चाहते हैं कि नए आर्मी चीफ़ की नियुक्ति के बजाय जनरल बाजवा काम करते रहें, लेकिन सवाल यह है कि क्या जनरल बाजवा इसे स्वीकार करेंगे क्योंकि आईएसपीआर कह चुका है कि जनरल बाजवा 29 नवबंर को रिटायर हो जाएंगे.''

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एक पत्रकार ने ध्यान दिलाया कि इमरान ख़ान ने तो जनरल बाजवा का नाम ही नहीं लिया.
पत्रकार सीरल अलमायडा ने ट्विटर पर लिखा, ''इमरान ख़ान का जो भी मतलब था, अब कोई और एक्सटेंशन नहीं होनी चाहिए.''
पत्रकार तलत हुसैन लिखा, ''जनरल क़मर जावेद बाजवा एक और एक्सटेंशन लेकर अपने करियर की दूसरी बड़ी ग़लती करेंगे चाहे वह कितनी ही छोटी अवधि की क्यों न हो. पहली बड़ी ग़लती पहला एक्टेंशन थी.''
तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेता फ़व्वाद चैधरी ने कहा, ''इमरान ख़ान ने देश के राजनैतिक भविष्य और लोकतंत्र की बहाली का एक व्यावहारिक फ़ॉर्मूला पेश किया है, इस फ़ॉर्मूले पर आगे बढ़ने की ज़रूरत है. देश की आर्थिक स्थिति अब और राजनैतिक अस्थिरता का बोझ नहीं उठा सकेगी. चुनाव कराने के लिए इस्टैबलिशमेंट की वर्तमान स्थिति बरक़रार रखी जा सकती है.''
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लेकिन तहरीक-ए-इंसाफ़ के एक नेता ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से बात करते हुए कहा, ''पार्टी में इस प्रस्ताव पर दो विचार हैं. एक वर्ग समझता है कि अगर वर्तमान सरकार ने आर्मी चीफ़ बनाया तो संभवतः पार्टी को नुक़सान होगा.''
उन्होंने कहा, ''एक दूसरा वर्ग ऐसा भी है जो इसे एक यू-टर्न समझता है जिनके अनुसार, एक और एक्सटेंशन देना ग़लत परंपरा भी होगी और उन जनरलों को नुक़सान भी होगा जो आर्मी चीफ़ बन सकते हैं और विस्तार की स्थिति में रिटायर हो जाएंगे.''
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