सऊदी अरब और अमेरिका के बीच क्या तेल के मुद्दे पर टकराव गहरा रहा है

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संयुक्त अरब अमीरात के ऊर्जा मंत्री सुहैल अल-मज़रौई ने मंगलवार को कहा है कि तेल उत्पादन में कटौती का फ़ैसला ओपेक प्लस देशों का है और ये सोच समझकर उठाया गया क़दम है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यूएई के ऊर्जा मंत्री ने ये भी कहा कि इस फ़ैसले का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है.

यूएई से पहले बहरीन, इराक़ और कुवैत जैसे देश तेल उत्पादन में कटौती के फ़ैसले का बचाव कर चुके हैं.

इन बयानों से पहले अमेरिका ने ये आरोप लगाया था कि सऊदी अरब दूसरे देशों पर इसके लिए दबाव डाल रहा है. हालांकि सऊदी अरब ने इन आरोपों से इनकार किया था.

सुहैल अल-मज़रौई ने कहा कि तेल उत्पादन में कटौती का फ़ैसला क़ीमतों को स्थिर बनाए रखने के लिए किया गया है न कि उन्हें बढ़ाने के लिए. उनका कहना है कि क़ीमतों में अस्थिरता के कारण निवेशक दूर हो रहे थे.

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बदलते रिश्तों की क्रोनोलॉजी

15 जुलाई 2022: जो बाइडन ने अपनी सऊदी यात्रा के दौरान कहा- "सऊदी ने हमारी ज़रूरतों को समझा है और उम्मीद है कि आने वाले हफ़्तों में बेहतर संबंधों की ओर क़दम उठाए जाएंगे."

3 अक्तूबर 2022: यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने यूक्रेन के 215 लोगों को रिहा करने के लिए सऊदी अरब का आभार जताया.

5 अक्तूबर 2022: ओपेक प्लस की बैठक ने फ़ैसला लिया गया कि तेल का उत्पादन दो मिलियन बैरल प्रतिदन कम किया जाएगा.

5 अक्तूबर 2022: इस पर अमेरिका की प्रतिक्रिया कुछ ऐसे आई, "ये साफ़ नज़र आ रहा है कि ओपेक प्लस रूस के साथ हैं."

6 अक्तूबर 2022: बाइडन ने सऊदी अरब के फ़ैसले को निराशाजक बताया.

9 अक्तूबर 2022: रूस ने ओपेक प्लस को सप्लाई कम करने के लिए राज़ी होने और अमेरिका की "ख़राब" नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए शुक्रिया कहा.

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अमेरिका के आरोप

अमेरिका ने ओपेक प्लस देशों के फ़ैसले का विरोध करते हुए पिछले दिनों ये कहा था कि इससे रूस की विदेश से आमदनी बढ़ेगी. उसने ये भी कहा है कि सऊदी अरब ने राजनीतिक वजहों से ऐसा किया है.

सऊदी अरब ने इन आरोपों से भी इनकार किया है कि वो यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के हमले में मॉस्को का समर्थन कर रहा है.

राष्ट्रपति जो बाइ़डन ने सऊदी अरब को अंजाम भुगतने की चेतावनी दी है. बाइडन प्रशासन कांग्रेस में सऊदी अरब के ख़िलाफ़ क़दम उठाए जाने के विकल्पों के पक्ष में दिख रहा है.

यूएस नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने पिछले हफ़्ते कहा था कि ओपेक के एक से अधिक सदस्य देश को ऐसा लगता है कि सऊदी अरब ने तेल उत्पादन में कटौती के फ़ैसले के पक्ष में वोट देने के लिए उस पर दबाव डाला था.

उन्होंने कहा कि सऊदी अरब को ये मालूम था कि ऐसा करने से रूस की कमाई बढ़ेगी और यूक्रेन के ख़िलाफ़ हमले की वजह से लगाए गए प्रतिबंधों का असर कम करने में उसे मदद मिलेगी.

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क्रिस मर्फी

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सऊदी अरब के पुराने आलोचक रहे डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस मर्फ़ी ने कहा है कि अमेरिका को मध्यम दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइलें सऊदी अरब की बजाय यूक्रेन को देनी चाहिए.

साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि अमेरिका को अपनी पैट्रियट मिसाइलों की सुरक्षा सऊदी अरब से हटाकर यूक्रेन या नेटो सहयोगियों को देनी चाहिए.

उनका कहना था कि ऐसा करने से अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध वाजिब स्तर पर आ सकेंगे.

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सऊदी अरब का जवाब

सऊदी अरब ने अमेरिका के तमाम आरोपों को ख़ारिज किया है. उसका कहना है कि ओपेक प्लस देशों का फ़ैसला एक विशुद्ध कारोबारी निर्णय है.

सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालेद बिन सलमान ने रविवार को ट्वीट किया, "यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस की लड़ाई में सऊदी अरब मॉस्को के साथ खड़ा है, हम इन आरोपों से हैरत में हैं."

ओपेक प्लस देशों ने ये तय किया है कि नवंबर से वे रोज़ाना 20 लाख बैरल तेल का उत्पादन कम करेंगे. ओपेक प्लस देशों की अगुवाई सऊदी अरब के हाथों में है और रूस भी इसका हिस्सा है.

इस फ़ैसले से क्रूड ऑयल की क़ीमतों पर दबाव बढ़ गया है. प्रिंस खालेद बिन सलमान ने ये भी कहा है कि ये आरोप यूक्रेन की सरकार की ओर से नहीं लगाए गए हैं.

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उन्होंने कहा, "ओपेक प्लस देशों ने आम सहमति से और विशुद्ध आर्थिक वजहों से ये फ़ैसला लिया है. सऊदी अरब पर रूस का साथ देने का आरोप लगा है. ईरान भी ओपेक का सदस्य है, क्या इसका मतलब ये है कि सऊदी अरब ईरान के साथ भी खड़ा है?"

रविवार रात को सऊदी अरब के सुल्तान सलमान बिन अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद ने शुरा काउंसिल को दिए अपने भाषण में कहा कि उनका देश वैश्विक तेल बाज़ार में स्थिरता और संतुलन बनाए रखने के लिए अपनी ऊर्जा रणनीति पर कड़ी मेहनत कर रहा है.

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सऊदी अरब और अमेरिका के संबंध

अमेरिका ने ये भी कहा है कि वो सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों की समीक्षा करेंगे. लेकिन इससे राष्ट्रपति बाइडन के लिए घरेलू मोर्चे पर मुश्किलें पैदा हो गई हैं.

अमेरिका में कांग्रेस के चुनाव होने हैं और ऐसे वक़्त में तेल की क़ीमतें बढ़ना राष्ट्रपति बाइडन के लिए कूटनीतिक झटके की तरह है.

अक्टूबर, 2018 में पत्रकार जमाल ख़ाशोगी की हत्या के बाद सऊदी अरब की पश्चिमी दुनिया में ख़ासी किरकिरी हुई थी.

इसके बावजूद जो बाइडन ने जुलाई में सऊदी अरब का दौरा किया. वे और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान तस्वीरों में एक-दूसरे का अभिवादन करते हुए भी दिखे.

लेकिन अब तस्वीर बदल गई है.

अमेरिका के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र जेक सुलिवन ने रविवार को ये साफ़ कर दिया कि इंडोनेशिया में होने वाले आगामी जी-20 समिट में राष्ट्रपति बाइडन की क्राउन प्रिंस से मुलाकात की कोई योजना नहीं है.

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क्या तेल के मुद्दे पर टकराव गहरा रहा है?

राष्ट्रपति बाइडन भले ही सऊदी अरब को अंजाम भुगतने की चेतावनी दे चुके हैं, लेकिन ये उतना भी आसान नहीं है.

समाचार एजेंसी एएफ़पी की रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब के समर्थक इस बात को लेकर आगाह करते हैं कि अमेरिका के साथ बढ़ता तनाव रियाद को रूस और चीन के और क़रीब ला सकता है.

लेकिन दूसरी तरफ़, कुछ विशेषज्ञों को इस बात पर संदेह है कि अमेरिका के साथ आठ दशकों की साझेदारी के बाद सऊदी अरब के लिए ऐसा करना आसान होगा.

जैक सुलिवन ने रविवार को सीएनएन पर कहा है कि बाइडन अमेरिका-सऊदी संबंधों की समीक्षा करते वक़्त सोच-समझ कर कूटनीतिक क़दम उठाएंगे.

मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में मध्य पूर्व मामलों के जानकार रसेल लुकास कहते हैं कि बाइडन प्रशासन कम से कम सऊदी अरब को हथियारों की आपूर्ति धीमी कर सकता है और कोई दूसरा सप्लायर इसकी जल्दी से भरपाई नहीं कर सकेगा.

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तेल पर अमेरिकी निर्भरता

ऐसा नहीं है कि अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों में पहली बार दूरियां दिख रही हैं. इससे पहले भी 11 सितंबर, 2001 के हमले के बाद दोनों मुल्कों के बीच दूरियां बढ़ाने की कोशिशें हुई थीं.

लेकिन इन कोशिशों की राह में तेल का रोड़ा आ गया. जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया भर में कई क़दम उठाए जा रहे हैं, लेकिन तेल के मोर्चे पर अमेरिका आलोचनाओं के केंद्र में बना हुआ है.

अमेरिकी अधिकारी ये बार-बार कहते रहे हैं कि वे सऊदी अरब से ज़्यादा तेल का उत्पादन करते हैं.

लेकिन अमेरिका में तेल का कारोबार प्राइवेट कंपनियों के हाथ में है और उनके उत्पादन पर नियंत्रण करना ज़्यादा मुश्किल काम है.

क्विंसी इंस्टीट्यूट फ़ॉर रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ़्ट की रिसर्च फ़ेलो एन्नेली शेलिन कहती हैं, "ये कहना पूरी तरह से ग़लत है कि ओपेक प्लस देशों द्वारा उत्पादन में कमी के फ़ैसले का असर अमेरिका अपना उत्पादन बढ़ा करके कम कर सकता है. हम इन देशों पर तब तक निर्भर बने रहेंगे जब तक हमें तेल की ज़रूरत रहेगी."

हालांकि एन्नेली शेलिन ये भी कहती हैं कि सऊदी अरब तेल के मामले में अमेरिका के भरोसेमंद स्रोत से पीछे हटकर ख़ुद अपना नुक़सान कर रहा है.

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