मध्यपूर्व में अमेरिका की घटती साख के बीच बाइडन के दौरे से कितना फायदा?

अमेरिका

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    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन बुधवार से मध्यपूर्व एशिया के दौरे पर हैं. बाइडन के दौरे का पहला पड़ाव इसराइल की राजधानी यरुशलम है, जहां वो गुरुवार तक रुकेंगे और इसराइली नेताओं से बातचीत करेंगे. वहीं शुक्रवार को खाड़ी सहयोगियों के एक शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए वो सऊदी अरब पहुंचेंगे.

लेकिन बाइडन का ये दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब उनके सामने चुनौतियों का अंबार है.

एक तरफ़ राष्ट्रपति की डेमोक्रेटिक पार्टी नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव में अपने प्रदर्शन और परिणामों को लेकर चिंतित हैं. तो वहीं दूसरी तरफ़ है रूस-यूक्रेन युद्ध, जिसने शीत युद्ध के बाद दुनिया की सबसे बड़ी दो परमाणु-सशस्त्र शक्तियों को दोबारा आमने-सामने कर दिया है.

तीसरी परेशानी है चीन, जिसे अमेरिका अपने लिए फ़िलहाल सबसे बड़ा ख़तरा मानता है. हाल ही अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी एफ़बीआई के निदेशक ने ये दावा किया था कि चीन किसी भी तरह दुनिया का अकेला सुपरपावर बनने की कोशिश कर रहा है.

ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए न केवल इस हफ्ते, बल्कि आगे आने वाले हफ़्तों में भी मध्य पूर्व एशिया के दौरे के विषय में नहीं सोच सकते थे.

वैसे भी राष्ट्रपति बाइडन की मध्य पूर्व की पिछली यात्राओं ने अमेरिकी शक्ति की सीमाओं को ही दर्शाया है. जैसे मार्च 2010 में उपराष्ट्रपति के रूप में बाइडन तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ इसराइल दौरे पर थे.

दौरे के बीच बाइडन ने इसराइल के कब्जे वाले क्षेत्रों में यहूदियों के लिए चलाई जाने वाली एक योजना पर रोक लगाने की घोषणा की थी.

इस योजना के तहत इन क्षेत्रों में यहूदियों के लिए खास बस्तियां बसाई जानी थी.

ये अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध था. इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बाइडन को तब काफ़ी अपमानित किया था.

अमेरिकी राष्ट्रपति अपनी इसराइली यात्रा में इस बार इसराइली कब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्रों का भी दौरा करेंगे.

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इधर, रूस-यूक्रेन के बीच जारी जंग ने शांतिपूर्ण भविष्य की आखिरी उम्मीदों को लगभग ख़त्म कर दिया है. दुनिया भर में अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ी हुई है.

अमेरिका भी इससे अछूता नहीं है. बढ़ती महंगाई और चरमराई अर्थव्यवस्था आने वाले उपचुनाव के मुख्य मुद्दे हो सकते हैं, जिसका असर उपचुनाव नतीजों पर भी पड़ सकता है. जो बाइडेन और उनकी पार्टी के लिए चिंताजनक है.

दूसरी ओर मध्यपूर्व के दो विभाजित गुट ( वो देश जो अमेरिका के नज़दीकी हैं और वो जो ईरान के क़रीब हैं) के बीच भी टकराव बढ़ रहा है. अगर दोनों ही पक्षों की ये तनातनी बढ़ती है, तो यूक्रेन में जारी युद्ध जितना ही ये ख़तरनाक और अस्थिर होगा.

अमेरिका की घटती साख

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राजनीतिक रूप से बाइडन का ये दौरा मध्यपूर्व में अमेरिका की घटती साख़ की याद दिलाएगा.

बाइडन, एक बार फिर, तथाकथित दो राज्य समाधान की नीति के तहत एक स्वतंत्र फ़लस्तीन राज्य की वकालत कर सकते हैं.

जबकि बाइडन ये जानते हैं कि ऐसा नहीं होगा. हालांकि बाइडन ने फलिस्तीनियों के लिए की जा रही अमेरिकी फंडिंग में कटौती को बहाल कर दिया है.

सबसे अजीब बात ये कि बाइडन सऊदी अरब से तेल उत्पादन को बढ़ाने और कम कीमतों पर बेचने की गुज़ारिश करने वाले हैं.

सऊदी अरब अगर तेल उत्पादन बढ़ाता है तो रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण बढ़ी तेल की कीमतें घट सकती हैं और बाइडन को इसका फ़ायदा नवंबर में होने वाले मध्यावधि उप-चुनावों में मिल सकता है.

जो बाइडन

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लेकिन ये उतना भी आसान नहीं क्योंकि सऊदी औऱ अमेरिका के बीच भरोसे की डोर पिछले कुछ सालों में काफ़ी कमज़ोर हुई है.

सऊदी अरब ने अमेरिका पर तब भरोसा करना बंद कर दिया जब राष्ट्रपति ओबामा ने 2011 में कुछ हफ़्तों के सड़क विरोध के बाद मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक़ को बेदख़ल कर दिया था. तब सऊदी का तर्क था कि अमेरिका जब अपने वफ़ादार दोस्त के साथ ऐसा कर सकता है, तो किसी और के साथ भी कर सकता है.

अमेरिका और सऊदी अरब के बीच विश्वास की कमी

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बाइडन ने राष्ट्रपति पद संभालते ही एक यूएस इंटेलिजेंस रिपोर्ट पेश की थी. इसमें ये दावा किया गया था कि सऊदी अरब के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या सऊदी अरब के ही क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने करवाई थी.

सऊदी ने तब इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया था, लेकिन इस घटना ने अमेरिका के प्रति उनके अविश्वास की भावना को और गहरा दिया.

जब बाइडन राष्ट्रपति उम्मीदवार थे तो उन्होंने सऊदी अरब को एक ऐसा अछूत देश बताया था, जो अपने आलोचकों की हत्या करवाता है और विरोध के स्वरों को दबाता है.

ऐसे में सऊदी अमेरिका को किसी भी तरह की मदद पहुंचाने के मूड में नहीं है. वहीं बाइडन कुछ कड़वे घूंट पीने को तैयार हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति आमतौर पर ऐसे देशों का दौरा नहीं करते, जिसे वो अछूत बताते हैं.

लेकिन अमेरिका का उद्देश्य साफ़ है, वो किसी भी तरह सऊदी को कम कीमतों पर अपना तेल बेचने के लिए मजबूर करना चाहता है.

पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस के तेल और गैस राजस्व पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ा है. अमेरिका जानता है कि सऊदी के समर्थन के बिना रूस की अर्थव्यवस्था पर चोट करना मुश्किल है.

सऊदी अरब

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चिंता का सबब बना ईरान

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बाइडन की यात्रा की दूसरी प्रमुख वजह मध्यपूर्व एशिया के दो गुटों में बढ़ रहा तनाव है.

पिछले काफ़ी समय से मध्यपूर्व में ईरान और अमेरिकी खेमे वाले देशों के बीच तनातनी जारी है. गुटों का ये विभाजन खतरनाक है, और यह फिर से गंभीर होने के संकेत दे रहा है.

जब से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिका को JCPOA से बाहर निकाला( वो समझौता जिसने ईरान की परमाणु क्षमता को सीमित कर दिया) संकट गहराता जा रहा है.

ईरान अपनी परमाणु योजनाओं पर लगे प्रतिबंधों का पालन तो कर रहा है, लेकिन वो हमेशा इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि इनमें हथियार शामिल नहीं हैं.

लेकिन जब ट्रंप ने नए अमेरिकी प्रतिबंध लगाए तो ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज़ कर दिया. अब ईरान ने इतना यूरेनियम जमा कर लिया है कि आगे आने वाले दिनों में वो ख़ुद परमाणु उपकरण बनाने में सक्षम होगा.

ईरान

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ईरान की बढ़ती परमाणु ताक़त से इसराइल और अरब देशों की सतर्कता बढ़ी है. ईरान के प्रति इन मुल्कों के साझा विरोध के कारण ही अब्राहम एकॉर्ड जैसा शांति समझौता प्रासंगिक बना हुआ है.

अब्राहम एकॉर्ड ट्रंप प्रशासन की मुख्य उपलब्धियों में से एक था. 2020 में हुए इस शांति समझौते के तहत यूएई और बहरीन ने इसराइल में अपने दूतावास स्थापित करने के साथ ही साथ पर्यटन, व्यापार, स्वास्थ्य और सुरक्षा सहित कई क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ाने का संकल्प लिया था.

मध्य पूर्व में नेटो की तर्ज़ पर एक संगठन बनाने की भी चर्चा हो रही है. इसमें इसराइल और अरब राज्य शामिल होंगे और ये अमेरिका के अनुकूल होगा. लेकिन अरब राज्यों और इसराइल के बीच एक औपचारिक सैन्य गठबंधन, वास्तविकता से काफ़ी दूर नज़र आता है.

अमेरिका, ईरान और इसराइल का समीकरण

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इसराइल ने ईरान के विरूद्ध अपना गुप्त अभियान तेज़ कर दिया है. इनमें हत्या, रहस्यमयी आग की घटनाएं और परमाणु सुविधाएं और साइबर युद्ध जैसी चीज़ें शामिल हैं. ऐसे में बाइडन इसराइल से संयम बरतने की अपील कर सकते हैं.

बाइडन ये बिल्कुल नहीं चाहते कि इसराइल और ईरान के बीच स्थिति तनावपूर्ण हो और अमेरिका को इसमें घसीटा जाए. इस यात्रा के बीच उनके सामने कई चुनौतियां खड़ी हैं -

उपचुनावों की चिंता, यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण खड़ा वैश्विक संकट और अब ईरान.

अमेरिका ने दशकों से जिन सहयोगियों को पोषित किया है, विशेष रूप से इसराइल और सऊदी अरब को, उनके मन में अमेरिका के प्रति कृतज्ञता की कोई भावना नहीं है. ऐसे में मुमकिन है कि एक बार फिर अमेरिका को निराशा हाथ लगे और मध्य पूर्व में अपनी घटती साख़ की हक़ीकत को स्वीकारना पड़े.

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