सऊदी अरब और प्रिंस सलमान पर बाइडन की नीति कितनी स्पष्ट?

सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में मौजूद विदेश मामलों के जानकारों को लगता है कि विदेश नीति को लेकर अमेरिका जो बोल रहा है और जो वो कर रहा है उसमें काफ़ी विरोधाभास देखने को मिल रहा है.

जानकारों का कहना है कि जो बाइडन ने राष्ट्रपति पद की कमान संभालते ही संकेत देने शुरू किए कि उनके कार्यकाल में या यूं कहा जाए कि 'डेमोक्रट्स' के एजेंडे में मानवाधिकारों पर अब ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है.

इसलिए बताया जा रहा है कि बाइडन के कई निर्णय, मध्य पूर्व को लेकर चले आ रहे, पिछली सरकार के रुख़ से बिलकुल विपरीत नज़र आ रहे हैं. इन्हीं निर्णयों में से एक है सऊदी अरब के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या से जुड़ी अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी के रिपोर्ट का जारी होना.

हालाँकि विश्लेषक, अमेरिका के इस निर्णय की व्याख्या अपने अपने ढंग से कर रहे हैं. कुछ को लगता है कि रिपोर्ट के जारी होने से सऊदी अरब के 'क्राउन प्रिंस' मोहम्मद बिन सलमान को बड़ा झटका लगा है. जबकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि रिपोर्ट में सीधे तौर पर मोहम्मद बिन सलमान की संलिप्तता की बात नहीं कही गई है.

क्राउन प्रिंस के साथ जमाल ख़ाशोज्जी

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भारत के राजनयिक हलकों में भी इसको लेकर बहस हो रही है कि क्या अमेरिका के बाद दूसरे पश्चिमी देश भी मोहम्मद बिन सलमान से दूरी बनाना शुरू कर देंगे?

रिपोर्ट के जारी होने के बाद 'व्हाइट हाउस' ने स्पष्ट करने की कोशिश की है कि अमेरिका, सऊदी अरब से संबंधों का आकलन करना कहता है.

हालाँकि, व्हाइट हाउस की प्रवक्ता जेन साकी का कहना था कि मोहम्मद बिन सलमान पर सीधी कार्रवाई कर अमेरिका, सऊदी अरब के साथ अपने संबंधों को बिगाड़ना नहीं चाहता है. उनका ये भी कहना था कि अमेरिका ये सुनिश्चित करना चाहता है कि पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या जिस तरह से की गयी थी, वैसी घटनाएं भविष्य में न हों और साझा सरोकार वाले मुद्दों पर दोनों देश मिलकर काम करें.

रिपोर्ट के आने से ठीक पहले अमेरिकी विदेश मंत्री ने सऊदी अरब के कुल 76 अधिकारियों के अमेरिका की यात्रा करने पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की जिनपर आरोप है कि उन्होंने विदेश में रह रहे असंतोष व्यक्त करने वाले सऊदी नागरिकों को धमकाने का काम किया है.

अमेरिकी 'हाउस ऑफ़ रिप्रेसेंटेटिव्स' की अध्यक्ष नैंसी पेलोसी ने भी एक बयान जारी कर कहा कि मानवाधिकारों के परचम को बुलंद करने और अपने सिद्धांतों की रक्षा करने के राष्ट्रपति जो बाइडन के निर्णय का अमेरिकी कांग्रेस पूरा समर्थन करती है.

उनका कहना था कि वो सरकार के उन क़दमों का भी समर्थन करतीं हैं जिसमे पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या के सिलसिले में सऊदी अरब को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.

सऊदी अरब

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सऊदी अरब को लेकर क्या हो सकती है अमेरिका की नीति?

कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके पूर्व राजनयिक जी पार्थसारथी ने बीबीसी से कहा कि उन्हें नहीं लगता कि अमेरिका सऊदी अरब को लेकर कोई कड़ा क़दम उठाएगा या अपनी विदेश नीति में कोई बदलाव करेगा. उनका कहना था कि कुछ दिनों में सऊदी अरब के प्रति अमेरिका का तेवर नरम पड़ जाएगा.

वो कहते हैं, "वैसे भी, अमेरिका ने सीधे तौर पर न तो 'क्राउन प्रिंस' मोहम्मद बिन सलमान पर कोई प्रतिबंध ही लगाया और न ही उन्हें सीधे तौर पर जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या में शामिल होने का आरोप लगाया है."

सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने भी अमेरिकी गुप्तचर की रिपोर्ट को ख़ारिज करते हुए कहा, "रिपोर्ट, सऊदी अरब की सल्तनत के ख़िलाफ़ नकारात्मक और झूठा आकलन है. इस मामले में जिनकी संलिप्तता सामने आई है उन अधिकारियों के ख़िलाफ़ सऊदी अरब की अदालतों ने पहले ही सज़ा सुना दी है."

मंत्रालय के बयान में कहा गया कि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच आठ दशकों के मज़बूत रिश्ते हैं जो एक दूसरे के सम्मान पर ही टिके हुए हैं.

पार्थसारथी कहते हैं कि जो लोग ये समझते हैं कि सऊदी अरब के 'क्राउन प्रिंस' मोहम्मद बिन सलमान परिपक्व नहीं हैं, उन्हें ये पता है कि बीमार चल रहे सऊदी अरब के मौजूदा शासक सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ कभी भी उन्हें अपनी कुर्सी सौंप सकते हैं.

उनका कहना है कि "वैसे भी सऊदी अरब के शासक अपने कई अधिकार 'क्राउन प्रिंस' को पहले ही सौंप चुके हैं. मोहम्मद बिन सलमान के बारे में कहा जाता है कि परदे के पीछे से सऊदी अरब के शासन की बागडोर वे ही संभाले हुए हैं."

वे कहते हैं कि सऊदी अरब के रिश्ते मध्य पूर्व में कई देशों से ठीक नहीं चल रहे थे. लेकिन इसराइल सहित क़तर और खाड़ी के देशों से सऊदी अरब ने अपने रिश्ते सुधारे हैं. विदेश नीति का जहाँ तक सवाल है तो अमेरिका और सऊदी अरब के लिए ईरान एक बड़ा मुद्दा बन गया है.

जो बाइडन

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क्या यह बाइडन का दबाव में अपनाया गया रुख है?

लंदन के किंग्स कॉलेज में विदेश मामलों के प्रोफे़सर हर्ष वी पंत कहते हैं कि ये बात सही है कि मोहम्मद बिन सलमान अपने देश में काफ़ी लोकप्रिय हैं जिनके पास लोगों का समर्थन भी है और उनके पास सत्ता भी.

पंत को लगता है कि जो बाइडन बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति अपने शुरुआती दौर में हैं और यही वजह है कि उनकी विदेश नीति अभी तक कुछ स्पष्ट भी नहीं हो पा रही है.

वे कहते हैं, "अभी तक विदेश नीति को लेकर बाइडन जो कर रहे हैं उसमें काफ़ी विरोधाभास देखने को मिल रहा है. चाहे ईरान के साथ संबंध हों या सऊदी अरब के साथ. अभी कुछ साफ़ नहीं है. हो सकता है कि अंदरूनी राजनीतिक दबाव में वो ऐसा कर रहे हों क्योंकि 'डेमोक्रट्स' ने हमेशा से मानवाधिकारों पर ज़ोर दिया है."

सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान

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अमेरिकी रिपोर्ट पर सऊदी अख़बारों ने क्या लिखा?

दूसरी तरफ़ अमेरिकी रिपोर्ट को लेकर सऊदी अरब की मीडिया में भी काफी तीखी प्रतिक्रया देखने को मिली है. देश से प्रकाशित लगभग सभी अख़बारों ने मोहम्मद बिन सलमान को खाड़ी देशों और मध्य पूर्व के देशों से मिल रहे क्षेत्रीय समर्थन की बात कही है.

प्रमुख दैनिक 'अल रियाध' ने लिखा कि अमेरिकी रिपोर्ट में सऊदी अरब की न्याय व्यवस्था को हल्का कर पेश करने की कोशिश की गई है.

अख़बार ने मुख्य पृष्ठ की सुर्ख़ियों में लिखा, "पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या को लेकर सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय के बयान का खाड़ी और अरब देश समर्थन करते हैं."

इसमें लिखा गया कि अमेरिका के गुप्तचर एजेंसी की रिपोर्ट में तथ्यों की बजाय सिर्फ़ क़यास ही लगाए गए हैं जिसे सऊदी अरब ख़ारिज करता है. अख़बार का ये भी कहना है कि "पूरी रिपोर्ट में- हमें लगता है, हम सोचते हैं और हो सकता है जैसे शब्दों का ही इस्तेमाल किया गया है."

'अल जज़ीरा' ने मोहम्मद बिन सलमान की वह तस्वीर लगाई जब वे अस्पताल से निकलकर फ़ॉर्मूला वन रेस का उद्घाटन करने पहुँचे थे.

इस तस्वीर के साथ उसने अमरीका के लिए लिखा- 'नन ऑफ़ योर बिज़नेस.'

BBC ISWOTY

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