श्रीलंका संकट: नौ सवालों के जवाब से जानिए क्या हो सकता है आगे

गोटाबाया राजपक्षे

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    • Author, एम. मणिकंदन
    • पदनाम, बीबीसी तमिल

श्रीलंका के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे लोग राष्ट्रपति भवन और पीएम के निजी आवास के भीतर घुस गए और दोनों ही इमारतों को अपने नियंत्रण में ले लिया.

राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने शनिवार दोपहर को, प्रदर्शनकारियों के राष्ट्रपति भवन में दाख़िल होने से पहले ही राजभवन छोड़ दिया था. वह फिलहाल कहां हैं, इसकी कोई पुष्ट जानकारी अभी तक नहीं है.

जब प्रदर्शनकारी पीएम के निजी आवास में दाखिल हुए, तो वहां भी कोई नहीं था.

बीबीसी संवाददाताओं के मुताबिक़, राष्ट्रपति भवन में अभी भी प्रदर्शनकारी मौजूद हैं.

इस कारण राष्ट्रपति कार्यालय में कोई आधिकारिक काम नहीं हो सकता है. इसके अलावा प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे ने भी शनिवार को ही ये घोषणा कर दी थी कि वो इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हैं.

ऐसे में सवाल अब देश के नेतृत्व को लेकर भी पैदा हो गया है. इस बात को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं कि देश का नेतृत्व किसके पास होगा?

श्रीलंका का आगे राजनीतिक भविष्य क्या होगा, यह एक बड़ा सवाल है.

ख़ासतौर पर तब जबकि देश ऐतिहासिक आर्थिक संकट के दौर से गुज़र रहा है. लोगों को खाने-पीने की किल्लत है, ईंधन नहीं मिल रहा है और तो और दवाइयां भी सुलभ नहीं हैं.

श्रीलंका

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1. गोटाबाया राजपक्षे अब क्या करेंगे?

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गोटाबाया राजपक्षे फिलहाल अपने सरकारी आवास में नहीं है.

उनका कार्यालय भी प्रदर्शनकारियों के कब्ज़े में है. इस वजह से राष्ट्रपति कोई भी आधिकारिक काम करने में असमर्थ हैं. श्रीलंका की राजनीति को क़रीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषक निक्सन कहते हैं, ''अब उनके पास एक मात्र विकल्प बच गया है और वह है इस्तीफा देना. '

2. लेकिन गोटाबाया के इस्तीफ़ा देने से क्या होगा ?

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श्रीलंका के संविधान के अनुसार, अगर राष्ट्रपति इस्तीफ़ा देते हैं तो प्रधानमंत्री अंतरिम राष्ट्रपति के रूप में कार्यभार संभालेगा. लेकिन उनकी नियुक्ति को मंज़ूरी देने के लिए संसद को एक महीने के अंदर बैठक करना अनिवार्य है. वरना वह पद पर बने नहीं रह सकते हैं.

3. क्या रनिल विक्रमसिंघे को संसद में समर्थन मिल पाएगा?

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निक्सन मानते हैं कि ऐसा हो सके, इस बात की कोई गुंजाइश नज़र नहीं आती है.

वह कहते हैं, "संसद में वह अपनी पार्टी के एकमात्र सदस्य हैं. वहीं विपक्षी पार्टियां उनके ख़िलाफ़ है. विपक्षी दल का नेतृत्व सजिथ प्रेमदासा कर रहे हैं. उनका दावा है कि संसद के 225 सांसदों में से उन्हें 113 का समर्थन प्राप्त है."

4. अगर रनिल विक्रमसिंघे राष्ट्रपति नहीं बन पाते हैं तो क्या होगा?

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संविधान के अनुसार, पीएम के बाद स्पीकर को राष्ट्रपति बनाए जाने की घोषणा की जा सकती है.

मौजूदा समय में महिंदा यप्पा अभयवर्द्धना स्पीकर पद पर हैं. वह गोटाबाया के दल से ही हैं. ऐसे में इस बात की उम्मीद बहुत धूमिल हो जाती है कि विपक्षी दल के नेता उनके समर्थन में जाएंगे.

हालांकि संविधान के मुताबिक़, स्पीकर के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस भी राष्ट्रपति बन सकते हैं. लेकिन इसके लिए भी संसद को प्रस्ताव पारित करना होगा. ऐसे में विपक्षी दलों का सहयोग मिलना ज़रूरी हो जाएगा.

साजिथ

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5. विपक्ष की क्या योजना है?

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सजिथ प्रेमदासा की एसजेपी और जेवीपी ने संयुक्त रूप से बयान जारी करके घोषणा की है कि वे सरकार बना सकते हैं.

उनका दावा है कि उनके पास 113 लोगों का समर्थन है. उनकी यह भी मांग है कि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपने-अपने पदों से इस्तीफ़ा दें.

6. क्या होगा अगर गोटाबाया इस्तीफ़ा देने से इनक़ार कर दें?

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निक्सन कहते है, "ऐसी स्थिति में राजनीतिक संकट बढ़ेगा. लेकिन अगर वह पद छोड़ देने से इनक़ार कर देते हैं तो कुछ नहीं किया जा सकता है. समस्या ये भी है कि वो राष्ट्रपति पद पर रहते हुए कोई काम भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनका ऑफ़िस तो प्रदर्शनकारियों के कब्ज़े में है."

निक्सन सत्ता में बने रहने के लिए सेना की मदद लेने की संभावना से भी इनक़ार नहीं करते हैं.

7. क्या सर्वदलीय सरकार बनने की संभावना है?

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यह भी पूरी तरह से विपक्षी दलों के हाथ में है. क्योंकि विपक्षी दलों ने पहले बुलाई गईं सभी सर्वदलीय बैठकों में हिस्सा नहीं लिया. हालांकि वे इस बात को लेकर बहुत गंभीर हैं कि उनके नेतृत्व में सरकार का गठन होना चाहिए.

8. क्या चुनावों की घोषणा की कोई संभावना है?

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फ़िलहाल ऐसी किसी भी संभावना बनती नहीं दिखती.

दरअसल, श्रीलंका पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा है. सरकार के पास चुनाव कराने के लिए पैसे नहीं हैं. ऐसे में चुनाव की संभावना बिल्कुल नहीं है.

प्रदर्शन

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9. राष्ट्रपति बदलने से क्या आर्थिक संकट का हल निकल सकेगा?

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फिलहाल तो सरकार के पास ज़रूरी सेवाओं और सुविधाओं के लिए भी पैसे नहीं हैं. अस्पतालों में दवाएं नहीं हैं. ईंधन की कमी है. खाद्यान्न की कमी है. हालात इतने बुरे हैं कि सरकारी कार्यालय, स्कूल बंद करने पड़े हैं.

ऐसे में क्या ही फ़र्क पड़ता है कि श्रीलंका का राष्ट्रपति कौन बनता है.

निक्सन कहते हैं, श्रीलंका की आर्थिक स्थिति "तुरंत बदलने की संभावना नहीं है."

वह कहते हैं, "अगर राजनीतिक संकट बना रहता है, तो आईएमएफ़ सहित वित्तीय संस्थानों से वित्तीय सहायता मिलना भी मुश्किल होगा."

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