संकट से जूझ रहे श्रीलंका में क्या हैं मौजूदा हालात, शुरुआत से अब तक की बात

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दो करोड़ बीस लाख की आबादी वाला श्रीलंका लगातार वित्तीय और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है.
जुलाई, 2022 में दुनिया ने श्रीलंका से भीतर जारी अराजकता की तस्वीरें देखीं, जब प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के घरों पर कब्जा कर लिया था. मजबूरी में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को अपना पद छोड़ना पड़ा.
इसके बाद फिर से चुनाव कराए गए और रानिल विक्रमसिंघे श्रीलंका के राष्ट्रपति बने.
श्रीलंका का आर्थिक संकट इस अफरातफरी की सबसे बड़ी वजह है.
श्रीलंका में आर्थिक संकट की वजह
जानकारों का कहना है कि श्रीलंका में संकट कई सालों से पनप रहा था, जिसकी एक वजह सरकार का ग़लत प्रबंधन भी माना जाता है.
विशेषज्ञों के मुताबिक़, पिछले एक दशक के दौरान श्रीलंकाई सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं के लिए विदेशों से बड़ी रकम कर्ज़ के रूप में ली.
बढ़ते कर्ज़ के अलावा कई दूसरी चीज़ों ने भी देश की अर्थव्यवस्था पर चोट की. जिनमें भारी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं से लेकर मानव निर्मित तबाही तक शामिल है. इसमें रासायनिक उर्वरकों पर सरकार का प्रतिबंध शामिल है, जिसने किसानों की फसल को बर्बाद कर दिया.
स्थितियां 2018 में बदतर हो गई, जब तत्कालीन राष्ट्रपति के तत्कालीन प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने के बाद एक संवैधानिक संकट खड़ा हो गया. इसके एक साल बाद 2019 के ईस्टर धमाकों में चर्चों और बड़े होटलों में सैंकड़ों लोग मारे गए. और 2020 के बाद से कोविड-19 महामारी ने प्रकोप दिखाया.
अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए उस वक्त रहे राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने करों में कटौती की एक नाकाम कोशिश की.
लेकिन ये कदम उल्टा पड़ गया और सरकार के राजस्व पर बुरा असर पड़ा. इसके चलते रेटिंग एजेंसियों ने श्रीलंका को लगभग डिफ़ॉल्ट स्तर पर डाउनग्रेड कर दिया, जिसका मतलब कि देश ने विदेशी बाज़ारों तक पहुंच खो दी.

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सरकारी कर्ज़ का भुगतान करने के लिए फिर श्रीलंका को अपने विदेशी मुद्रा भंडार का रुख करना पड़ा, जिसके चलते इस साल भंडार घटकर 2.2 बिलियन डॉलर हो गया, जो 2018 में 6.9 बिलियन डॉलर था. इससे ईंधन और अन्य ज़रूरी चीज़ों के आयात पर असर पड़ा और कीमतें बढ़ गईं.
इन सबसे ऊपर, सरकार ने मार्च में श्रीलंकाई रुपया फ्लोट किया यानी इसकी क़ीमत विदेशी मुद्रा बाज़ारों की मांग और आपूर्ति के आधार पर निर्धारित की जाने लगी.
ये कदम मुद्रा का अवमूल्यन करने के मक़सद से उठाया गया, ताकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्ज़ मिल जाए. हालांकि अमेरिकी डॉलर के मुक़ाबले रुपये की गिरावट ने आम श्रीलंकाई लोगों के लिए हालात और ख़राब कर दिए.
2009 के गृह युद्ध के बाद श्रीलंका का ज़ोर घरेलू बाज़ार में सामानों की आपूर्ति पर रहा, उन्होंने विदेशी बाज़ार में पहुंचने की कोशिश नहीं की. इसलिए दूसरे देशों से आमदनी तो कम हुई ही, आयात का बिल भी बढ़ता गया.

आयात पर आश्रित
श्रीलंका दुनिया के उन देशों में शामिल है जो अपनी ज़रूरत की ज्यादातर चीजें आयात करता है.
ऑर्गेनाइज़ेशन फॉर इकोनॉमिक कॉरपोरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) के मुताबिक श्रीलंका ने 2020 में 1.2 अरब डॉलर मूल्य का पेट्रोलियम आयात किया था.
श्रीलंका कपड़ों, दवाइयों के लिए कच्चा सामान और गेहूं से लेकर चीनी तक- सबकुछ आयात करता है.
2020 में श्रीलंका ने 21.4 करोड़ डॉलर की कारों का आयात किया था. जबकि 30.5 करोड़ डॉलर के टेट्रा पैक दूध का आयात किया गया था.
श्रीलंका ज़्यादातर सामान चीन और भारत से मंगाता है.
श्रीलंका में प्रदर्शनों का दौर
मार्च, 2022 में बढ़ते आर्थिक संकट के बीच सरकार की नीतियों के ख़िलाफ़ लोगों ने भी सड़क पर निकला शुरू कर दिया. प्रदर्शनकारियों ने मार्च के अंत में राजधानी कोलंबो की सड़कों पर उतरकर सरकार से कार्रवाई और जवाबदेही की मांग की. जनता की निराशा और गुस्सा 31 मार्च को उस समय फूट पड़ा, जब प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति के निजी आवास के बाहर ईंटें फेंकी और आग लगा दी.
पुलिस ने विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया और उसके बाद 36 घंटे का कर्फ्यू लगा दिया. राष्ट्रपति राजपक्षे ने 1 अप्रैल को राष्ट्रव्यापी आपातकाल की घोषणा की, जिससे अधिकारियों को बिना वारंट के लोगों को हिरासत में लेने और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ब्लॉक करने का अधिकार मिल गया.
लेकिन कर्फ्यू की परवाह किए बिना प्रदर्शन अगले दिन और बढ़ गए, जिसके बाद पुलिस ने सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार कर लिया.
तब से विरोध प्रदर्शन जारी हैं, हालांकि वे काफ़ी हद तक शांतिपूर्ण रहे हैं. मंगलवार की रात, छात्र प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने राजपक्षे के आवास को फिर से घेर लिया था और उनके इस्तीफ़े की मांग की.
आपातकाल के अध्यादेश को 5 अप्रैल को रद्द कर दिया गया था. लेकिन इसके बाद पूरी दुनिया में श्रीलंका को लेकर चिंता जताई जाने लगी. यहां के हालातों पर संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई.

जुलाई में दुनिया ने देखी श्रीलंका में अराजकता की तस्वीरें
9 जुलाई 2022 को श्रीलंका में जो कुछ हुआ, उसे बरसों तक याद रखा जाएगा.
प्रदर्शनकारी तत्कालीन राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और तत्कालीन पीएम रनिल विक्रमसिंघे से इस्तीफ़ा मांग रहे प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री के निजी आवास में घुस गए.
प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन के चप्पे-चप्पे में देखे जा सकते थे. इसी के साथ प्रधानमंत्री के निजी आवास को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया.
पीएम का ये निजी आवास कोलंबो 7 इलाक़े में है. ये शहर के सबसे हाई प्रोफ़ाइल रिहाइशी इलाक़ों में से एक है. राजपक्षे ने 12 जुलाई को रात को ही देश छोड़ दिया.

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श्रीलंका के राष्ट्रपति ने आईएमएफ से शुरू की बातचीत
अब राष्ट्रपति विक्रमसिंघे ने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) की टीम के साथ फिर से बातचीत शुरू की है. न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, आईएमएफ की ये टीम श्रीलंका के हालात का आकलन करने पहुंची है. तीन महीनों में ये दूसरा मौका है जब आईएमएफ की टीम श्रीलंका पहुंची है. न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, आईएमएफ की टीम श्रीलंका के लिए बेलआउट पैकेज देने को लेकर बातचीत कर रही है, इसमें 29 बिलियन डॉलर के कर्ज का पुनर्निधारण भी शामिल है.
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