श्रीलंका: आर्थिक स्थिति इतनी ज़्यादा ख़राब कैसे हुई?

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    • Author, आयशा परेरा
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़

श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में अपने घर पर हुए हमले के बाद वहां के राष्ट्रपति ने कहा कि वो अपने पद से इस्तीफ़ा देने के लिए तैयार हैं.

श्रीलंका में महंगाई और खाने और तेल की किल्लत के कारण कई महीनों से चल रहे विरोध प्रदर्शन के बाद ये नौबत आई.

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श्रीलंका में क्या हो रहा है?

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रोज़मर्रा के सामानों के कीमतें बढ़ रही है. महंगाई दर पचास प्रतिशत को पार कर चुकी है, लोगों को बिजली की कमी का सामना भी करना पड़ रहा है. दवाइयों की कमी के कारण पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है.

देश में बस, ट्रेन और मेडिकल ज़रुरतों से जुड़े वाहनों के लिए ईंधन नहीं बचा है. अधिकारियों का कहना है कि आयात के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा अब नहीं बची है.

ईंधन की कमी से पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में बहुत बढ़ोतरी हो रही है. जून के आख़िरी हफ़्तों में सरकार ने ग़ैर -जरूरी वाहनों के लिए ईंधन की बिक्री पर रोक लगा दी थी.

माना जा रहा है कि 70 के दशक के बाद ऐसा पहली बार हुआ है. स्कूल बंद कर दिए गए हैं और लोगों को घरों के काम करने की सलाह दी गई है ताकि सप्लाई को बचाया जा सके.

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इमेज कैप्शन, श्रीलंका में खाद्य पदार्थों की कीमत 50 प्रतिशत तक बढ़ी है.
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श्रीलंका की अर्थव्यवस्था संकट में क्यों है?

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श्रीलंका की विदेशी मुद्रा लगभग ख़त्म हो चुकी है, यानी कि दूसरे देशों से सामान ख़रीदने के लिए अब उनके पास पैसे नहीं बचे हैं.

मई महीने में विदेशी कर्ज़ के बदले तय रकम चुकाने में श्रीलंका नाकाम रहा. इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. सरकार इसके लिए कोविड महामारी को दोष दे रही है क्योंकि इसका असर टूरिज़्म पर पड़ा और टूरिज़्म से श्रीलंका की कमाई का एक अहम हिस्सा आता रहा है.

सरकार का ये भी कहना है कि साल 2019 में चर्च पर हुए कई जानलेवा हमलों के कारण भी सैलानियों में डर बैठ गया.लेकिन कई जानकार ग़लत आर्थिक नीतियों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

2009 के गृह युद्ध के बाद श्रीलंका का ज़ोर घरेलू बाज़ार में सामानों की आपूर्ति पर रहा, उन्होंने विदेशी बाज़ार में पहुंचने की कोशिश नहीं की. इसलिए दूसरे देशों से आमदनी तो कम हुई ही, आयात का बिल भी बढ़ता गया.

राष्ट्रपति राजपक्षे को 2019 में टैक्स कटौती से जुड़े निर्णय के लिए भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा.

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इमेज कैप्शन, राष्ट्रपति राजपक्षे को 2019 में टैक्स कटौती से जुड़े निर्णय के लिए भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा.

श्रीलंका अब 3 बिलियन डॉलर का आयात करता है, ये निर्यात से बहुत ज़्यादा है, इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में कमी हो गई है. 2019 के अंत तक श्रीलंका के पास 7.6 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था. मार्च 2020 तक ये गिरकर 1.93 बिलियन डॉलर हो गया, और हाल ही में सरकार ने बताया है कि सिर्फ़ 50 मिलियन डॉलर बचे हैं.

सरकार ने चीन समेत दूसरे देशों से बहुत कर्ज़ भी ले रखा है, उन इन्फ़्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए जिसे कई लोग ग़ैरज़रूरी नहीं मानते. लोगों का ज़्यादातर गुस्सा राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे और उनके भाई महिंदा के प्रति है, जिन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था लेकिन मई में हटा दिया गया.

राष्ट्रपति राजपक्षे को 2019 में टैक्स कटौती से जुड़े निर्णय के लिए भी भारी विरोध का सामना करना पड़ा. वित्त मंत्री अली साब्री के मुताबिक इस निर्णय के कारण सरकार को सालाना 1.4 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ.

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जब 2021 की शुरुआत में श्रीलंका की विदेशी मुद्रा की कमी एक गंभीर समस्या बन गई, तो सरकार ने रासायनिक उर्वरकों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया. किसानों को लोकल जैविक उर्वरकों का उपयोग करने के लिए कहा गया.

इससे व्यापक पैमाने पर फसल बर्बाद हो गई. श्रीलंका को विदेशों से अपने खाद्य भंडार की पूर्ति करनी पड़ी और विदेशी मुद्रा में और कमी होने लगी.

इस साल मार्च में आईएमएफ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि उर्वरक प्रतिबंध (जिसे नवंबर 2021 में वापस लिया गया) ने चाय और रबर के निर्यात को भी प्रभावित किया.

कोलंबो में राष्ट्रपति के दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, कोलंबो में राष्ट्रपति के दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन
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क्या सरकार के पास संकट से निपटने की कोई योजना है?

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बताया जा रहा है कि राष्ट्रपति राजपक्षे पद छोड़ने के लिए राज़ी हो गए हैं. प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भी संकेत दिया है कि वह सभी के साथ सरकार के लिए रास्ता बनाने के लिए इस्तीफा दे देंगे. लेकिन कब, ये अभी नहीं बताया गया है.

देश का नेतृत्व कौन कर रहा है, और व्यवस्था बहाल करने के लिए क्या किया जा सकता है, इस सवाल का भी जवाब नहीं मिल रहा है.

श्रीलंका के संसद के स्पीकर ने बीबीसी को बताया कि राष्ट्रपति ने आधिकारिक रूप से पद छोड़ने के एक सप्ताह के भीतर एक नई क्रॉस-पार्टी गठबंधन सरकार बनानी पड़ेगी.

थाली बजा कर विरोध दर्ज करते लोग.

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सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से 3 बिलियन डॉलर की राहत राशि के लिए बातचीत कर रही है.

आईएमएफ विश्व की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए अपने 190 सदस्य देशों के साथ काम करता है. उसने कहा है कि सरकार को किसी भी ऋण के लिए ब्याज़ दरों और करों को बढ़ाना होगा.

प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने कहा है कि सरकार के पास अब धन की इतनी कमी है कि वह कर्मचारियों के वेतन का भुगतान करने के लिए पैसे छाप रही है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी है कि इससे कीमतों में और बढ़ोतरी होगी.

उन्होंने यह भी कहा कि राज्य के स्वामित्व वाली श्रीलंकाई एयरलाइंस का निजीकरण किया जा सकता है, और देश रूस और कतर से कम लागत में पेट्रोल आपूर्ति के लिए बात कर रही है.

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श्रीलंका को कितना विदेशी कर्ज़ चुकाना होगा?

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श्रीलंका की सरकार पर विदेशी कर्ज़ बढ़कर 51 बिलियन डॉलर हो गया है. इसमें से 6.5 बिलियन डॉलर चीन का है और दोनों देश इसे लेकर फिर से विचार कर रहे हैं.

इस साल श्रीलंका को अपने कर्ज़ के लिए 7 बिलियन डॉलर का भुगतान करना होगा. विश्व बैंक श्रीलंका को 600 मिलियन डॉलर का उधार देने के लिए सहमत हो गया है.

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भारत ने 1.9 बिलियन डॉलर का वादा किया है और वो आयात के लिए अतिरिक्त 1.5 बिलियन डॉलर उधार दे सकता है.

प्रमुख औद्योगिक देशों के समूह G7 जिसमें कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका शामिल हैं, उन्होंने कहा है कि वे ऋण से राहत में श्रीलंका की मदद करेगा.

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