यूक्रेन के उन लोगों की आपबीती जिन्हें अग़वा कर रूस ले जाया गया

- Author, जोएल गुंटर
- पदनाम, कीएव, यूक्रेन

निकिता होर्बान अस्पताल के एक पुराने स्टील बेड पर दीवार से टिककर बैठे हैं. वो बैंडेज के उस सपाट हिस्से पर उंगलियां फिरा रहे हैं जहां पहले कभी उनका अंगूठा हुआ करता था.
वो अभी भी वही कपड़े पहने हुए हैं जिनमें रूस ने उन्हें घर भेजा था. हरे रंग की सैन्य टीशर्ट और ट्रैकसूट. उनका चेहरा पीला पड़ गया है और उम्र 31 साल से कहीं अधिक लग रही है.
नज़रें नीची करते हुए वो कहते हैं, "मेरा वज़न बहुत कम हो गया है. अब मैं पहले जैसा नहीं दिखता."
दो सप्ताह से वो अपने पैरों पर खड़े हो पा रहे हैं.उन्हें बार-बार अपनी टांगों को हिलाना पड़ता है ताकि उनमें दर्द ना हो.
ये दक्षिणी यूक्रेन के ज़ैपोरिज़िया में बसंत का एक चमकदार दिन था. लेकिन रूस यहां हवाई बमबारी कर रहा था और अस्पताल की खिड़की के बाहर काला धुआं उठता दिख रहा था. अस्पताल के वार्ड की हवा गर्म और ठहरी हुई थी.
निकिता को तीन दिन पहले ही क़ैदियों की अदला-बदली में यूक्रेन को सौंपा गया था. उन्हें एक और व्यक्ति के साथ इस अस्पताल में लाया गया था. उन्होंने रूस की जेल में तीन कठोर सप्ताह गुज़ारे. दूसरे व्यक्ति, 28 वर्षीय सेरही वासिलहा को जब यूक्रेन को सौंपा गया तो उनके दोनों पैर काटे जा चुके थे. निकिता कहते हैं, "वो मेरे जितने भाग्यशाली नहीं हैं."
यूक्रेन की डिप्टी प्रधानमंत्री इराइना वेरेशचुक क़ैदियों की अदला-बदली का काम देख रही हैं. उन्होंने निकिता के रूस की जेल से यूक्रेन पहुंचने की पुष्टि की है.
वेरेशचुक बताती हैं, "इस अदला बदली में कई गंभीर रूप से घायल लोग शामिल थे, कुछ के हाथ-पैर काटे जा चुके थे, कुछ को संक्रमण हो चुका था और कुछ गंभीर हालत में थे."
वो कहती हैं, "शारीरिक यातना के स्पष्ट सबूत थे. उन्होंने डरावनी कहानियां सुनाईं."



निकिता का बुरा वक़्त मार्च के शुरुआती दिनों में शुरू हुआ जब रूस की सेना राजधानी किएव के पश्चिम में स्थित छोटे से गांव एंड्रीवका पहुंची.
राजधानी कीएव के एक अस्पताल में लैब असिस्टेंट का काम करने वाले निकिता अपने पिता शाशा के साथ बग़ीचे के नीचे एक अंधेरे और सीलन भरे तहख़ाने में छुपे थे. उनकी पत्नियां और निकिता का पांच साल का बेटा भी साथ था.
शाशा निकिता के सौतेले पिता हैं लेकिन उनका रिश्ता सगे बाप बेटे जैसा ही है.
रूसी सैनिक घरों की तलाशी ले रहे थे. उन्होंने निकिता और शाशा को तहख़ाने के बाहर खींच लिया. निकिता कहते हैं, "गोलीबारी भी हो रही थी, गांव के कई लोगों को मार दिया गया था."
निकिता और शाशा को आंखबंद करके एक ऐसी जगह ले जाया गया जो खेत जैसी लग रही थी. यहां उन्हें यातनाएं दी गईं. निकितां की उंगलियों के जोड़ पर जख़्म के ताज़ा निशान हैं.
वो कहते हैं कि रूसी सैनिकों ने तब तक पाना कसा जब तक कि उनकी खाल ना उघड़ गई. वो अपने आसपास लोगों को चीखते हुए सुन सकते थे लेकिन वो नहीं जानते कि कितने लोग थे और वो कौन थे.
"मैं सिर्फ़ ये सोच रहा था कि मेरे पिता कहां हैं, क्या होगा अगर वो मेरे साथ नहीं हैं?"
रूसी सैनिकों ने उनके बूट निकाल दिए, उनमें पानी भरा और फिर से पहना दिए. फिर उन्हें बर्फ़ीले खेत में चेहरे के बल लेटने के लिए मजबूर किया गया. निकिता कहते हैं, "हम तीन चार रातों तक ऐसे ही वहां लेटे रहे. बारिश हो रही थी और ठंड बढ़ती ही जा रही थी."



जब उन्हें आसपास रूसी लोगों की आवाज़ आनी बंद हुई तो निकिता ने अपने पिता को आवाज़ दी. शाशा ने भी तुरंत जवाब दिया. वो दोनों साथ थे. इसके बाद से जब भी उन्हें सुरक्षित लगता वो एक दूसरे से बात कर लेते. वो एक दूसरे को भरोसा देते कि वो आसपास ही हैं.
जब वो मैदान में पड़े थे, निकिता के पैर में ठंड घुस गई. बाद में वो अपने पैरों को महसूस ही नहीं कर पा रहे थे. फिर उनके आसपास बमबारी होने लगी. ज़मीन धमाकों से हिल रही थी.
निकिता बताते हैं, "हम लंबे समय तक वहीं पड़े रहे. हमने कई बार अपनी ज़िंदगी को अलविदा कहा."
आख़िरकार उन्हें मैदान से उठाकर ट्रक में भर दिया गया. उनकी आंखों पर पट्टियां बंधी थीं. निकिता बीत रहे समय का भी अंदाज़ा नहीं लगा पा रहे थे.
एक समय उन्हें क़ैदियों के दूसरे समूह के साथ मिला दिया गया और हेलीकॉप्टर में भर दिया गया. निकिता बताते हैं कि भूख हावी हो रही थी. पकड़े जाने के बाद से उन्हें सिर्फ़ एक कटोरी दलिया, ब्रेड का एक टुकड़ा और बिस्कुट खाने के लिए दिए गए थे.
हेलीकॉप्टर से उतारकर उन्हें कार्गो प्लेन में बिठा दिया गया. निकिता ने इंजन को चालू होते और विमान को हवा में उड़ते महसूस किया. वो अनुमान लगाते हैं कि दस-बारह लोग और साथ रहे होंगे.
विमान के इंजन की भारी आवाज़ के बीच निकिता ने ज़ोर से पूछा, "आप ठीक हो"
शाशा ने जवाब दिया, "हां मैं ठीक हूं."



उधर गांव में निकिता और शाशा की पत्नी नादिया और स्वितलाना और निकिता के बेटे आर्टम तहख़ाने से बाहर आए और पड़ोसी के घर में रहने की जगह ली. उन्हें पता नहीं था कि उनके पति कहां हैं.
यहां से कुछ ही दूर शाशा के माता-पिता नादिया और वोलोदिमीर का घर है, उन्हें भी चिंता सताए जा रही थी. शाशा ने उनके फ़ोन उठाने बंद कर दिए थे लेकिन घर से बाहर निकल कर उनके बारे में पता करना असंभव था. पूरे गांव में बमबारी हो रही थी. जब बमबारी रुकती तो रूस के सैनिक घरों पर छापे मारते. यहां एक महीने तक रूस के सैनिकों का क़ब्ज़ा रहा और इस दौरान लोगों को ये पता नहीं था कि उनके परिजन और रिश्तेदार किस हाल में हैं.
आँख से पट्टी खुलने के बाद निकिता आख़िरकार अपना पैर देख सकते थे. उनके अंगूठे काले पड़ गए थे. वो जानते थे कि उनके पैर को बर्फ़ ने काट लिया है और उन्होंने चिकित्सीय मदद मांगी.
फ़ील्ड अस्पताल में उनके पैर को सुखाया गया और उस पर पट्टी बांध दी गई. यहां उन्हें इतनी ही मदद मिली. उन्हें फिर से जूते पहना दिए गए. कैंप में पांच दिन रहने के बाद उन्हें रूस के कुर्स्क शहर स्थित जेल में भेजा गया. इसे प्री-ट्रायल डिटेंशन सेंटर नंबर एक भी कहा जाता है.



नए बंदियों को पोशाक़ पहनाई गई, उनके बाल काटे गए और बताया गया कि उन्हें टीका भी लगाया जाएगा. बाद में उन्हें पता चला की टीके का मतलब पिटाई से था. निकिता और शाशा को दस और लोगों के साथ एक कोठरी में रखा गया था. निकिता ये समझ गए थे कि अब उनके पैर नहीं बचेंगे.
निकिता याद करते हैं, "पहली रात ही मुझे ये अहसास हो गया था कि मैं अपने पैरों को महसूस नहीं कर पा रहा हूं. उनसे बदबू भी आ रही थी."
दूसरे लोगों के सामने भी ऐसी ही मुश्किल परिस्थिति थी. बाद में कुछ को अपने अंग कटवाने पड़े. जेल में उन्हें न्यूनतम चिकित्सीय मदद मिल पा रही थी. उन्हें एंटीबॉयोटिक दिए गए थे और हर तीन दिन में पट्टी की जा रही थी. निकिता के मुताबिक जेल के डॉक्टर ने उनसे कहा कि यहां अच्छी चिकित्सा और दवाइयां मौजूद हैं लेकिन वो उनके लिए नहीं हैं.
जेल के भीतर क़ैदी एक दूसरे के परिजनों के बारे में बात करते और चुटकुले सुनाकर मनोरंजन करते. निकिता बताते हैं कि उन्हें देशभक्ति रूसी गीत याद करने और जेल के सुरक्षाकर्मियों को सुनाने के लिए मजबूर किया जाता था. निकिता के मुताबिक उन्हें रूस का राष्ट्रगान और पुतिन की तारीफ़ में लिखे गए गीत याद करवाए गए.
वो बताते हैं कि दिन में तीन चार बार उनसे पूछताछ की जाती और उनकी पिटाई की जाती. बाद में उनसे दस्तावेज़ों पर दस्तखत करवाए जाते जिन पर लिखा होता था कि उनका यहां अच्छे से ख्याल रखा जा रहा है. उन्हें इन्हीं दस्तावेज़ों से पता चला कि उन्हें कहां रखा जा रहा है. उन पर लिखा होता था कुर्स्क प्री ट्रायल डिटेंशन सेंटर नंबर वन.
जेल में तीन सप्ताह रहने के बाद निकिता के पैरों की हालत ख़राब हो गई थी. उन्हें दो और लोगों के साथ अस्पताल भेजा गया. एक सर्जन ने उन्हें बताया कि उनके पैर की सभी उंगलियों को काटना पड़ेगा.
निकिता बताते हैं कि जांच के दौरान उनका एक अंगूठा अपने आप गिर गया था.
सर्जरी के बाद उन्होंने एक सप्ताह अस्पताल में बिताया. फिर उन्हें बताया गया कि उन्हें और कुछ अन्य बंदियों को घर वापस भेजा जा रहा है.
वेरेशचुक बताती हैं कि रूस ने अपने सैनिकों के बदले नागरिकों की अदला-बदली की कोशिश की. जिनेवा कन्वेंशन इस तरह के क़दम को रोकती है. वो कहती हैं, "उन्होंने इसी वजह से इन सभी लोगों को क़ब्ज़े में लिया था. इनमें स्थानीय काउंसिल के कर्मचारी, महिलाएं और आम नागरिक शामिल थे."
वो कहती हैं, "हम जानते हैं कि वहां एक हज़ार से अधिक बंदी हैं जिनमें पांच सौ से अधिक महिलाएं हैं. हम जानते थे कि ये कुर्स्क, ब्रायंस्क और रोस्तोव जैसी जगहों पर प्री ट्रायल डिटेंशन सेंटरों में हैं."
निकिता को वापस कुर्स्क की जेल नहीं ले जाया गया. यहीं उन्होंने अंतिम बार शाशा को देखा था. अस्पताल से उन्हें एक कार्गो विमान में बिठाया गया जो उन्हें क्राइमिया के सिम्फेरोपोल लेकर गया. रूस के अधिकारियों ने वारेशचुक को बताया कि उनके पास एंबुलेंस नहीं हैं, ऐसे में गंभीर रूस घायल बंदियों को ट्रकों में लादकर पांच घंटे की यात्रा के बाद अदला बदली की जगह ले जाया गया.



मुलाक़ात की जगह रूसियों ने घायल लोगों को स्ट्रेचरों पर लादकर हाइवे पर लिटा दिया. यूक्रेन के सैनिक आकर उन्हें उठाकर लेकर गए. निकिता को यक़ीन नहीं हो पा रहा था कि वो यूक्रेन पहुंच गए हैं. जब एक सैनिक ने यूक्रेनी भाषा में उनसे कहा स्वागत है तब जाकर उन्हें विश्वास हुआ कि वो यूक्रेन में ही हैं.
"मैं टूट चुका था लेकिन मैं जानता था कि मैं अपने देश में हूं."
लेकिन वो नहीं जानते थे कि उनके परिजन जिंदा हैं या नहीं. वो नहीं जानते थे कि बीते एक महीने में यूक्रेन में क्या हुआ है. निकिता ने एक यूक्रेनी अधिकारी को अपनी पत्नी का नंबर दिया. उनका दिल ज़ोर से धड़क रहा था.
वो कहते हैं, "मैं बस घंटी बजने का इंतज़ार कर रहा था, कम से कम में ये जानना चाहता था कि उनका फ़ोन ज़िंदा हैं. फिर उन्होंने नंबर मिलाया और उधर से फोन काट दिया गया, मैं समझ गया था कि वो ज़िंदा है."
दूसरी बार नादिया ने फ़ोन उठा लिया. नादिया ने उन्हें बताया कि वो बेटे आर्टम के साथ बेल्जियम पहुंच गई हैं और सुरक्षित हैं. निकिता कहते हैं, "हम पांच मिनट तक फ़ोन पर बस रोते ही रहे. हम एक दूसरे से बात करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कर नहीं पा रहे थे. मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे. जब उसने पहली बार हैलो बोला तो मैं सांस तक नहीं ले पाया था."
नादिया ने शाशा के भाई और उनके परिजनों को फ़ोन करके निकिता के बारे में जानकारी दी. लेकिन शाशा ग़ायब थे. शाशा की मां नादिया ने बताया, "हम ये जानते हैं कि जब निकिता और शाशा दो सप्ताह पहले अलग हुए तब वो ज़िंदा थे. इसलिए हम अब भी उनका इंतज़ार कर रहे हैं और हम उम्मीद करते हैं कि वो ठीक होंगे. लेकिन अभी हमारे लिए सबकुछ ठीक नहीं हुआ है."



यूक्रेन पहुंचने के बाद से ही निकिता राजधानी कीएव के उस अस्पताल में पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जहां वो काम करते ते. ऐसा लग रहा था कि सबकुछ रुक गया है. फिर मंगलवार को एक नर्स उनके पास आई और बताया कि वो वहां जा रहे हैं.
लंबी एंबुलेंस यात्रा के बाद जब वो राजधानी कीएव के अस्पताल पहुंचे तब वहां उनके सहकर्मी स्वागत के लिए खड़े थे. उनका हीरो की तरह स्वागत किया गया. उन्हें एक निजी कमरे में ले जाया गया जिसकी बड़ी खिड़की के बाहर देवदार के पेड़ लगे हैं.
बुधवार सुबह अस्पताल के चीफ़ सर्जिन और चीफ़ ऑफ़ मेडिसिन उनके पास आए. वो निकिता के बारे में ख़बर का इंतेज़ार कर रहे थे. जब उन्होंने उसे देखा तो आंखों से आंसू बहने लगे. उनके दो सहकर्मियों की हाल ही में रूस की बमबारी में मौत हो गई थी. उनके बच्चे भी हमले में साथ ही मारे गए थे.
सर्जन यूरी शाइलिंको कहते हैं, "वो वापस लौट आया है, यही हमारे लिए सबकुछ है. उसे फिर से चलना सीखना पड़ेगा लेकिन हम उसके लिए सबकुछ करेंगे."
निकिता अस्पताल से मिली चप्पल पहनते हैं और कुछ कदम चलने की कोशिश करते हैं. डॉक्टर उन्हें समझा रहे थे कि कैसे और कब तक वो ठीक हो जाएंगे. लेकिन वास्तव में वो शायद सुन नहीं रहे थे. डॉक्टरों के जाने के बाद वो कहते हैं, "मेरे दिमाग़ में बस एक ही बात है. मैं अपनी पत्नी और बेटे के पास जाना चाहता हूं."



इस रिपोर्ट में एना पांत्यूख़ोवा ने सहयोग किया है.
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