चीनी मीडिया- सैन्य क्षमता बढ़ाने से पहले भारत को किसानों के लिए सोचना चाहिए

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- Author, मॉनिटरिंग टीम
- पदनाम, बीबीसी
भारत में किसानों का मुद्दा बीते एक साल से सुर्ख़ियों में बना हुआ है. देश के किसान अपनी विभिन्न मांगों को लेकर बीते एक साल से राजधानी दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर बैठे हुए हैं.
हालांकि बीते दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की सबसे अहम मांग को स्वीकार करते हुए तीन कृषि क़ानून वापस लेने की घोषणा तो कर दी लेकिन किसानों का प्रदर्शन अब भी जारी है.
इस बीच चीन की मीडिया में भी भारत में हो रहे किसान-प्रदर्शन और पीएम मोदी की घोषणा को लेकर चर्चा की जा रही है.
भारत के प्रधानमंत्री की तीन कृषि क़ानूनों को निरस्त करने की घोषणा का ज़िक्र चीन की मीडिया में भी हुआ है. चीन की मीडिया ने इस बात को प्रमुखता से प्रकाशित किया है कि आख़िर कैसे भारत में बीजेपी के शासन वाली केंद्र सरकार किसानों से समझौता करने के लिए मजबूर हो गई.

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भारत में बीते एक साल से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं. जिसमें पंजाब और हरियाणा के किसान ख़ासतौर पर शामिल हैं. किसान बीते एक साल से राजधानी दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर डटे हुए हैं और किसान नेता पूरे देश में घूम-घूमकर महापंचायतों का आयोजन कर रहे हैं.
लेकिन किसानों की सबसे प्रमुख मांग को मानते हुए केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का फ़ैसला किया है. जिसकी घोषणा खुद प्रधानमंत्री मोदी ने की. जबकि इससे पहले तक सरकार का दावा था कि इन तीन कृषि क़ानूनों से किसानों की आय बढ़ेगी.
हालांकि प्रदर्शन कर रहे किसानों का आरोप था कि ऐसा सिर्फ़ उद्योगपतियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है. उनका कहना था कि इन क़ानूनों से केवल बड़े कॉर्पोरेट घरानों को ही फ़ायदा पहुंचेगा.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने पीएम मोदी की इस घोषणा को आश्चर्य में डालने वाला बताया है.
ग्लोबल टाइम्स ने विशलेषकों के हवाले से लिखा है कि भारत को पहले अपने किसानों के साथ समान व्यवहार करने पर ध्यान देना चाहिए. जानकारों के हवाले से अख़बार ने लिखा है कि भारत को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने से पहले अपने किसानों के लिए सोचना चाहिए.

तीन कृषि क़ानून वापस लेने के फ़ैसले को बताया 'समझौता'
ऑल-चाइना फ़ेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस के एक आउटलेट वर्करसीएन डॉट सीएन ने 22 नवंबर प्रकाशित एक लेख में इस संबंध में टिप्पणी की है.
इस लेख के मुताबिक़, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के मन में सबसे पहले और सबसे बड़ा सवाल यही कौंधा कि आख़िर भारत के प्रधानमंत्री ने तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा कर कैसे दी. आख़िर वह अचानक से तीन कृषि क़ानूनों पर नरम कैसे पड़ गए. विश्लेषकों के हवाले से लेख में कहा गया है कि आगामी समय में उत्तर प्रदेश और पंजाब प्रांत में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं और प्रधानमंत्री के इस क़दम का सीधा उद्देश्य विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करना है.
इसमें कहा गया है कि मोदी सरकार के इस फ़ैसले से भारतीय किसानों के लिए चीज़ें पहले की तरह हो गई हैं. भारतीय कृषि उद्योग और भारतीय किसानों की कई समस्याएं अभी भी जस की तस बनी हुई हैं और उनका समाधान किया जाना ज़रूरी है.
इसमें सवाल किया गया है कि इस झटके के बाद क्या आने वाले समय में पीएम मोदी में इस तरह के किसी सुधार योजना को लाने का साहस होगा.

इस बीच शंघाई स्थित न्यूज़ एंड कमेंट्री वेबसाइट गुआंचा ने एक लेख प्रकाशित किया जिसमें ब्रिटेन के अख़बार द गार्जियन में 19 नवंबर की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि पीएम मोदी ने जैसे ही क़ानून वापस लेने की घोषणा की दूसरी ओर किसानों ने नारे लगाए कि "क्रांति अमर रहे". इसके साथ ही "हमने मोदी को झुका दिया", ऐसे भी नारे लगे.
इस लेख में आगे यह भी लिखा गया है कि भले ही पीएम मोदी ने कृषि क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी हो लेकिन किसानों ने अपना प्रदर्शन जारी रखा है. उनका कहना है कि वे आश्वस्त नहीं हैं और संसद में जब औपचारिक रूप से कानून रद्द हो जाएगा तभी वे प्रदर्शन समाप्त करेंगे.
लेख में आगे कहा गया है कि किसानों ने "पीएम मोदी की बात पर भरोसा नहीं किया".
इस लेख में पीएम मोदी के 19 नवंबर के दिन के संबोधन का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि भले ही पीएम मोदी ने कहा हो कि उन्हें बहुत खेद है कि वे कुछ किसानों को इस क़ानून और अपनी नीयत के बारे में समझा नहीं पाए लेकिन अधिकांश प्रदर्शनकारियों का मानना है कि यह फ़ैसला पूरी तरह राजनीति कारणों के तहत उठाया गया है, ना कि किसानों के बारे में सोचते हुए.

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सैन्य क्षमता को ना बढ़ाने का आग्रह
चीन की मीडिया ने भारत सरकार पर किसानों की समस्याओं के समाधान की अनदेखी करके उसके स्थान पर राष्ट्रीय सुरक्षा को तरजीह देने का आरोप भी लगाया है.
ग्लोबल टाइम्स में 22 नवंबर को प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि, "भारत एक महान ताकत बनने का सपना देखता है लेकिन भारत में अभी घरेलू स्तर पर ही ऐसे कई मद हैं जहां आर्थिक तौर पर ध्यान दिये जाने, खर्च किये जाने की ज़रूरत है. लोगों की आजीविका में सुधार हो और उनका जीवन बेहतर बने, यह जरूरत किसी भी लिहाज़ से हथियार ख़रीदने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. लेख में कहा गया है, दुर्भाग्य से भारत सरकार 'राष्ट्रीय सुरक्षा' पर अपने भ्रम से उबर नहीं पा रही है.
इस लेख में आगे ये भी कहा गया है कि भारत को अपनी सीमाओं पर सशस्त्र बलों को जमा करने की बजाय अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने और अपने लोगों के जीवन स्तर को उन्नत बनाने के लिए ज़रूरी और कारगर प्रयास करने के लिए प्रयास करना चाहिए क्योंकि यह ज़्यादा अच्छा होगा.
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तीन कृषि क़ानूनों को रद्द करने की घोषणा को "अचानक किया गया समझौता" बताते हुए चीनी मीडिया ने लिखा है कि यह साल 2022 में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया फ़ैसला है. भारत पर तंज़ करते हुए चीन की मीडिया ने कहा है कि सीमा पर सैन्य ताक़त बढ़ाने से पहले, भारत अपने किसानों के साथ बराबरी का व्यवहार करने पर भी चीन के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है.
उसी दिन प्रकाशित एक अन्य ग्लोबल टाइम्स कमेंट्री में भारत की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था को मौजूदा हालातों में सुधार की सबसे बड़ी रुकावट के रूप में रेखांकित किया गया है.
ठीक ऐसे ही सेना की एक वेबसाइट - नेशनल डिफ़ेंस न्यूज़, ने sohu.com पर एक लेख छापा है. इसमें लिखा है कि भारत में कृषि के अलावा अन्य सेक्टर भी क़ीमतों पर सरकारी गारंटी के आर्थिक सिस्टम के आदी हो गए हैं और उन्हें मार्केट को खुली प्रतिस्पर्द्धा के लिए खोलने से डर सकता है.
इस लेख में भारत के एक पूर्व मंत्री के पिछले साल दिसंबर में दिए एक बयान पर भी नाराज़गी ज़ाहिर की गई है, जिसमें कहा गया था कि भारत में किसानों के प्रदर्शन के पीछे चीन और पाकिस्तान का हाथ है.
लेख में भारतीय मीडिया के एक विशेषज्ञ के हवाले से कहा कि "जब भी भारत में कुछ बुरा या ग़लत होता है तो भारतीय सोचेंगे कि कहीं इसके पीछे पाकिस्तान तो नहीं."
लेख में कहा गया है कि पिछले साल से जब से भारत और चीन के बीच गतिरोध बढ़ा है तब से चीन भी भारत की साज़िश वाले सिद्धांत का टारगेट बन गया है.
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