कृषि क़ानून: कांग्रेस शासित राज्य क्या इन्हें ख़ारिज कर पाएँगे?

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों से कहा है कि वे संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के तहत स्थानीय स्तर पर क़ानून बनाएँ, जिससे कृषि क़ानून को निष्प्रभावी बनाया जा सके.
कांग्रेस नेताओं ने संविधान के इस अनुच्छेद का उल्लेख करते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का भी हवाला दिया क्योंकि जेटली ने साल 2013 में अपने एक ब्लॉग में संविधान के इस अनुच्छेद का ज़िक्र किया था.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्विटर पर लिखा, "वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यों से संविधान के अनुच्छेद 254 (2) का इस्तेमाल करके भूमि अधिग्रहण क़ानून,2013 के प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाने के लिए कहा था. राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने इसका पूर्ण समर्थन भी किया था. अब राज्य उसी सलाह का पालन करके कृषि अधिनियमों (जो अब क़ानून बन गए हैं) से हुए नुकसान की भरपाई कर सकते हैं."
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राज्य सरकारें इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाने का फ़ैसला कर रही हैं. इसके साथ ही इन क़ानूनों की संवैधानिकता को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.
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ऐसे में तीन सवाल खड़े होते हैं:
पहला- संविधान का अनुच्छेद 254 (2) क्या है? और क्या संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के तहत पास किया गया क़ानून कृषि क़ानूनों को निष्प्रभावी बना सकता है?
दूसरा- क्या राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट जाकर संसद में पास क़ानूनों को रद्द करवा सकती हैं?
तीसरा- कृषि क़ानूनों की संवैधानिकता पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
बीबीसी ने इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए संविधान के विशेषज्ञ फ़ैज़ान मुस्तफ़ा से बात की.

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क्या राज्य सरकारें कृषि क़ानून से बच सकती हैं?
कृषि क़ानून को लेकर पंजाब और हरियाणा में विरोध प्रदर्शन थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. हरियाणा में बीजेपी और पंजाब में कांग्रेस की सरकार है.
नए कृषि क़ानूनों से दोनों ही राज्यों की आमदनी पर संकट खड़े होने के संकेत मिल रहे हैं. वर्तमान व्यवस्था के तहत पंजाब को 3,500 करोड़ रुपये और हरियाणा को 1,600 करोड़ रुपये का फ़ायदा होता है. ऐसे में कोरोना महामारी की वजह से त्रस्त राज्य सरकारों के लिए ये एक बड़ा झटका साबित हो सकता है.
लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 254 (2) राज्यों को वो शक्तियां देता है जिनकी मदद से वे ऐसे क़ानून बना सकें जिससे उनके राज्य में ये कृषि क़ानून निष्प्रभावी हो जाएं?
इसका जवाब है कि हां, ये संभव है.
भारतीय संविधान में ये स्पष्ट किया गया है कि संघ और राज्यों को किन किन विषयों पर क़ानून बनाने का अधिकार है.
संविधान में इसीलिए तीन सूचियां बनाई गई हैं जिनमें एक संघ सूची (वे विषय जिन पर केंद्र सरकार को क़ानून बनाने का एकाधिकार है), राज्य सूची (वे विषय जिन पर राज्य सरकारें क़ानून बना सकती हैं) और समवर्ती सूची (वह सूची जिन पर राज्य और केंद्र सरकारें क़ानून बना सकती हैं)
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने जिस अनुच्छेद 254 (2) का इस्तेमाल करने की बात कही है, वो समवर्ती सूची में शामिल विषयों से जुड़ा है.
संविधान के अनुच्छेद 254 (2) में स्पष्ट रूप से लिखा है:
- अगर राज्य विधानसभा की ओर से समवर्ती सूची में शामिल विषयों के संबंध में क़ानून बनाया जाता है जो कि संसद द्वारा बनाए गए पहले के क़ानून के प्रावधानों, या उस विषय के संबंध में मौजूदा क़ानून के ख़िलाफ़ है.
- राज्य विधानसभा द्वारा बनाया गया क़ानून राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित किया गया हो और उस पर राष्ट्रपति अपनी सहमति दे दे, ऐसी स्थिति में केंद्रीय क़ानूनी अप्रभावी होगा और राज्य का क़ानून प्रभावी होगा."
लेकिन इस अनुच्छेद के साथ शर्त ये है कि राज्य सरकारों को इन अधिनियमों के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति चाहिए होती है. इसके साथ ही अगर राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति दे देते हैं तो भी केंद्रीय क़ानून सिर्फ़ उसी राज्य में प्रभावी नहीं होगा. ऐसे में प्रत्येक राज्य को अपना क़ानून बनाकर राष्ट्रपति की स्वीकृति लेनी होगी.

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क्या राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं?
संविधान विशेषज्ञ फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मानते हैं कि राज्य सरकारें इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जा सकती हैं.
उन्होंने अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख में लिखा, "यूनियन ऑफ़ इंडिया वर्सेज़ एचएस ढिल्लन (1972) केस में सामने आ चुका है कि संसदीय क़ानूनों की संवैधानिकता को सिर्फ़ दो आधारों पर चुनौती दी जा सकती है- पहली ये है कि क़ानून का विषय राज्य सूची का है या ये मूल अधिकारों का उल्लंघन करता हो."
सुप्रीम कोर्ट जाने की व्यवहारिकता समझाते हुए वो कहते हैं, "एक बार जब कोई क़ानून संसद में पास हो गया हो तो जब उस क़ानून की संवैधानिकता को चुनौती दी जाती है तो आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट उस पर स्टे नहीं लगाता है. यूएपीए और सीएए क़ानून में ये बात सामने आ चुकी है.''
''कोर्ट ने इन दोनों क़ानूनों पर स्टे ऑर्डर नहीं दिया. ऐसे में ये भी स्टे नहीं होगा. और ये एक संवैधानिक मसला है, पाँच जजों की बेंच के पास जाएगा, ऐसे में कई साल लगेंगे इस केस को फ़ाइनल होने में. तब तक केंद्र का क़ानून लागू हो जाएगा.''
''जैसा कि केंद्र सरकार कह रही है कि इससे क़िसानों को फ़ायदा होगा, और अगर किसानों को फ़ायदा हो भी गया तो फिर जब सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार का केस सुनेगी तब केंद्र का पलड़ा बहुत मजबूत हो जाएगा. सामान्य रूप से पाँच जजों की बेंच पर कोई भी केस चार पाँच साल से पहले सुनवाई तक नहीं पहुंचता है."

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असंवैधानिकता?
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "एग्रीकल्चर मार्केट राज्य सूची का विषय है जो कि एंट्री नंबर 28 में मार्केट्स एंड फेयर्स के रूप में दर्ज है. सुप्रीम कोर्ट इससे पहले इंडियन टोबैको लिमिटेड केस में ये कह चुकी है कि स्टेट को मार्केट में सेस (उपकर) और ड्यूटी (शुल्क) लगाने का अधिकार है.''
''अगर स्टेट का अधिकार एक बार मान लिया जाता है तो ज़ाहिर है कि सेंटर को अधिकार नहीं है. और अगर केंद्र को अधिकार नहीं है तो एक केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक संकट खड़ा होगा."
वो इस मुद्दे के बारीक़ क़ानूनी पक्ष को समझाते हुए कहते हैं, "यहां पर मसला ये है कि समवर्ती सूची की 33वीं एंट्री, ट्रेड एंड कॉमर्स और खाद्य सामग्री के बारे में है. इस एंट्री के होते हुए सरकार की तीन समितियां ये कह चुकी हैं कि कृषि बाज़ार समवर्ती सूची में आना चाहिए. इसका मतलब उन्हें मालूम था कि खाद्य सामग्री और ट्रेड -कॉमर्स के प्रावधानों से काम चलने वाला नहीं है. और उनसे केंद्र के क़ानून को क़ानूनी आधार नहीं मिलेगा.''
''दूसरी बात ये है कि कृषि एक पेशा है, वो ट्रेड या बिज़नेस नहीं है. और अगर कृषि को ट्रेड या बिज़नेस मान लिया तो फिर इंटर स्टेट ट्रेड एंड कॉमर्स का प्रावधान 301 आ जाएगा और स्टेट के कृषि से जुड़े सारे अधिकार समाप्त हो जाएंगे. और इससे हमारी संघीय व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान लग जाएगा."

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क्या संघीय व्यवस्था पर प्रहार हैं ये कृषि क़ानून?
केंद्र सरकार की ओर से पास किए गए इन कृषि क़ानूनों को भारत की संघीय व्यवस्था के ख़िलाफ़ बताया जा रहा है.
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा बताते हैं, "हमारे संविधान के बनाए जाने से पहले से कहा जाता रहा है कि ये एक संघीय व्यवस्था वाला संविधान होगा. अगर हम संघीय व्यवस्था को स्वीकार कर लेते तो हमारा विभाजन नहीं होता. जो देश संघीय व्यवस्था स्वीकार नहीं करते हैं, उनका ही विभाजन होता है. ख़ैर अब विभाजन हो गया है''
''इसके बाद भी ये होता रहा कि हमारे यहां दो तरह की सरकारें होंगी. एक राज्य सरकार और एक केंद्र सरकार. जो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे होंगे, उसमें केंद्र सरकार को क़ानून बनाने की शक्ति होगी. जो स्थानीय महत्व के मुद्दे होंगे, उन पर राज्य सरकारें क़ानून बना सकेंगी. कुछ ऐसे मुद्दे होंगे जिन पर दोनों क़ानून बना सकते हैं. लेकिन अगर दोनों के क़ानूनों में टकराव होगा तो केंद्रीय क़ानून लागू होगा."

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"अब ये देखिए कि संघ सूची की चीज़ें जिन पर संसद को क़ानून बनाने का अधिकार है, उनमें साफ़ बताया गया है कि कृषि पर क़ानून बनाने का अधिकार संसद के पास नहीं होगा. संघ सूची में भी कहा गया है कि इनकम टैक्स पर केंद्र सरकार क़ानून बना सकती है लेकिन इसमें कृषि से अर्जित आय शामिल नहीं है."
"ऐसे में जहां जहां संघ सूची में कृषि की बात आई तो संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि संसद को इस पर क़ानून बनाने का हक़ नहीं है. क्योंकि कृषि को एक स्थानीय विषय माना गया. ऐसे में देखा जा सकता है कि राज्य सूची में कृषि से जुड़े जितने विषय शामिल किए गए हैं, उन्हें केंद्र के अधीन नहीं किया गया है. या समवर्ती सूची के अधीन नहीं किया गया है.''
''राज्य सूची में 14वां विषय कृषि से जुड़ी शिक्षा एवं शोध, कीटों से सुरक्षा और पौधों में लगने वाली बीमारियां है. इसके बाद 18वें विषय में कृषि भूमि के ऊपर अधिकार से जुड़ी बातें हैं. अब यहां कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग और राइट ओवर लैंड की बात हो रही है लेकिन भूमि पर अधिकार से जुड़ा विषय राज्य सूची में है तो इस पर क़ानून बनाने की शक्ति राज्य सरकार के पास है. इसमें केंद्र सरकार कैसे क़ानून बना सकती है?"
इन क़ानूनों को लेकर विवाद का एक बड़ा विषय ट्रेड एरिया से जुड़ा हुआ है जिसके अनुसार किसान एपीएमसी के परे जाकर भी अपनी फ़सल बेच सकते हैं.
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मानते हैं कि ऐसी व्यवस्था करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं है.
वो कहते हैं, "इस मामले में राज्य सूची का 28वां विषय बेहद ज़रूरी है जो बाज़ार और मेलों की बात करता है. (अब नए क़ानूनों में) कृषि से पैदा हुई फ़सल को ख़रीदे और बेचे जाने की बात हो रही है. अब ये फ़सल कहां बेची जाएगी, कृषि बाज़ारों में. और कृषि बाज़ारों पर किसका अधिकार है संविधान के मुताबिक़, राज्य का. क्या ये अधिकार समवर्ती सूची या संघ सूची के सबऑर्डिनेट किया गया है?...नहीं किया गया है."
फ़ैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं कि ऐसे में संविधान बनाने वालों की मंशा ये थी कि कृषि के मामलों को लेकर राज्य को अधिकार मिले. और ये क़ानून उन अधिकारों पर एक प्रश्न चिह्न लगाते हैं.
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