प्रवासी मज़दूरों की नौकरी छूटी, मानसिक स्वास्थ्य की किसको चिंता?

इमेज स्रोत, Burhaan Kinu/Hindustan Times via Getty Images
- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी के लिए
वह मैली पीली शर्ट में था. पिछले कई दिनों से उसने दाढ़ी नहीं बनाई थी और उसके बाल भी बिखरे हुए थे. ज़्यादा समय तक वह गुमसुम ही रहा लेकिन उसकी आंखों में डर था और वह बेचैन जैसा दिख रहा था. यह इसी साल जुलाई की बात है.
उसके पिता और चाचा उसे पटना के मनोचिकित्सक डॉ. विनय कुमार के क्लिनिक तक लेकर आए थे. 34 साल का शख़्स हर किसी को संदेह से देख रहा था और सोच रहा था कि सब लोग उसे मार डालेंगे.
इंडियन सायकेट्रिक सोसायटी (आईपीएस) के पूर्व महासचिव डॉ. विनय कुमार ने बताया, "यह मानसिक विकार से पीड़ित है, जिसकी शुरुआत इसकी नौकरी जाने के साथ हुई."
मनोविकार के संभावित लक्षणों में भ्रम, काल्पनिक चीज़ों के बारे में सोचना, अतार्किक बातें करना शामिल है. साथ ही यह वास्तविकता से दूर भी ले जाता है.
कुमार बताते हैं, "इंडियन सायकेट्रिक सोसायटी का एक शोध अध्ययन है जिसके मुताबिक़ क़रीब 75 प्रतिशत लोग तनाव का सामना करते हैं. शोध में हिस्सा लेने वाले लोगों में 12 प्रतिशत अवसाद का सामना कर रहे थे और 38 प्रतिशत लोग घबराहट की समस्या से पीड़ित थे. लॉकडाउन के दौरान इसी साल अप्रैल में क़रीब 2000 लोगों पर यह शोध अध्ययन हुआ था."

इमेज स्रोत, chinki sinha/bbc
अवसाद, मनोविकार की समस्याओं से जूझते प्रवासी मज़दूर
मई महीने का अंत आते-आते डॉक्टर विनय कुमार के पास ऐसे कई मरीज़ आने लगे जिन्हें नींद की कमी और मनोविकार की समस्याएं थीं. दरअसल ये मज़दूर अपनी नौकरी गंवाने के बाद घर लौटे थे और एक तरह के मानसिक आघात का सामना कर रहे थे, जिसमें शहरों को छोड़ने की मजबूरी की पीड़ा भी शामिल थी.
डॉ. विनय कुमार 1994 से लोगों का इलाज कर रहे हैं. अपने क्लिनिक में उन्होंने 20 सीटें ग़रीब तबके से आने वाले मरीज़ों के लिए आरक्षित रखी हुई हैं.
उनके मुताबिक़ पिछले कुछ महीनों में उन्हें अवसाद और मनोविकार की समस्याएं प्रवासी मज़दूरों में दिखी हैं. मई महीने में भविष्य को लेकर एक तरह से अनिश्चितता का माहौल था.
डॉ. कुमार बताते हैं, "बिहार में शराबबंदी लागू है ऐसे में शराब छोड़ने वाले लोगों के मामले आते थे. कई लोग शराब की जगह भांग पीने लगे, वहीं कुछ मनोविकार की चपेट में आ गए थे. मैंने कम से कम 100 ऐसे लोगों को देखा जो नौकरी चले जाने के चलते अवसाद में आ गए थे."
महानगरों में काम करने वाले उन मज़दूरों के मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कोई चर्चा नहीं होती जिनकी नौकरियां चली गई हैं. इनमें से कई मज़दूरों ने अपने घर लौटने के लिए बिना किसी साधन के हज़ारों किलोमीटर की दूरी पैदल तय की.

इमेज स्रोत, Himanshu Vyas/Hindustan Times via Getty Images
विशेषज्ञों ने कोरोना महामारी और उसके चलते लगाए गए लॉकडाउन को देखते हुए बड़े पैमाने पर मानसिक बीमारी के फ़ैलने की आशंका जताई थी लेकिन सारी चर्चाएं समाज में प्रभुत्व वाले लोगों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई हैं.
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले पेशवरों और सामुदायिक स्तर पर काम करने वाले लोगों के मुताबिक़ अंग्रेज़ी में दक्षता रखने वाले समाज के लोग मानसिक विकार की चपेट में कम आते हैं लेकिन मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े हिस्से का उपयोग उनपर ही होता है.
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में इतिहासकार श्रुति कपिला के मुताबिक़, 'हर किसी की बीमारी की भाषा अलग होती है.'
उन्होंने फ़ोन पर बताया, "सरकार ने लोगों को छोड़ दिया है. यह छोड़ना पूरी बेदर्दी के साथ किया गया है. कोरोना महामारी की क़ीमत ये मज़दूर चुका रहे हैं. ठीक बात है कि अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही हैं लेकिन जब महामारी की क़ीमत चुकाने की बात आएगी तो इन्हीं लोगों को चुकानी होगी. इन लोगों के मानसिक सेहत के सवाल को भी इसी बेदर्दी के साथ छोड़ दिया गया है."
जो मज़दूर घर लौट रहे हैं उन्हें भी संदेह के साथ देखा जा रहा है. हालांकि कई मज़दूरों का कहना है कि वे अजनबियों के बीच उस जगह पर मरना नहीं चाहते हैं जहां उनका कोई अपना नहीं है.
अविश्वास के चलते भी इन मज़दूरों को निराशा हुई है. कई तो सरकारी मानसिक स्वास्थ्य इंस्टीट्यूट को भी संदेह की नज़र से देखते हैं.
इन इंस्टीयूट में सरकार की ओर से प्रवासी मज़दूरों के लिए व्यक्तिगत स्तर पर टेलीफ़ोन पर काउंसलिंग की सेवा मुहैया कराई जा रही है. ये वही लोग हैं जो सरकार और सरकारी एजेंसियों की उदासीनता के शिकार हैं.
- ये भी पढ़ें: 'मां को लगा मैं उनके ऊपर काला जादू कर रही हूं'

इमेज स्रोत, Ajay Aggarwal/Hindustan Times via Getty Images
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाख़िल की गई जिसमें कहा गया, "प्रशिक्षित काउंसलर या सभी धर्मों के सामुदायिक समूह के नेताओं को राहत शिविरों और आश्रय घरों का दौरा करना चाहिए और प्रवासी मज़दूर जिस तकलीफ़ से गुज़र रहे हैं उसका हल निकालना चाहिए."
प्रवासी मज़दूर आजीविका खोने के चलते चिंता में तो हैं ही, साथ में उन्हें अपने परिवार के सदस्यों और अनिश्चित भविष्य की चिंताएं भी सता रही है. दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज (आईएचबीएस) के मुताबिक़ उनकी विशेषज्ञों की टीमों ने दो अप्रैल से 18 जून के बीच कई आश्रय घरों का दौरा कर 53,548 प्रवासी मज़दूरों का हाल जाना है. इनमें से 10 से 15 प्रतिशत मज़दूरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलें देखी गई हैं.
इस अध्ययन में यह भी मालूम हुआ कि कम से कम 849 प्रवासी मज़दूरों को घबराहट, अवसाद, मनोविकार के लक्षण, स्कित्जोफ्रेनिया या फिर कोरोना महामारी और लॉकडाउन से तनाव बढ़ने के चलते दवाईयां लेनी पड़ रही हैं.

इमेज स्रोत, SAM PANTHAKY / AFP
बिहार में केवल 60 मनोचिकित्सक
विनय कुमार के मुताबिक़ मानसिक विकार की चपेट में आए ग़रीब लोग जिस शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं, उसमें 'नींद नहीं आना', 'खाना नहीं खाया है' शामिल है. कुमार के मुताबिक़, 'वे इस तरह मानसिक विकार की पहचान करते हैं.'
बिहार वह राज्य है जहां से बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूर दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाते हैं. 1994 से मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले डॉक्टर विनय कुमार बताते हैं कि उनके पास मोतिहारी, पूर्णिया, खगड़िया. छपरा, गया जैसे ज़िलों के गांव से मरीज़ आते हैं.
एक मरीज़ के बारे में उन्होंने कहा, "इस मरीज़ में मानसिक बीमारी की शुरुआत चेन्नई में तब हुई जब उसकी फैक्ट्री में नौकरी चली गई थी. तब पहला एपिसोड था. उसको यह भ्रम भी हो गया कि लोग उसकी हत्या कर देंगे. जब वह मेरे पास आया तब तक मानसिक बीमारी को शुरू हुए तीन सप्ताह बीत चुके थे. उसे नींद नहीं आ रही थी और वह काफ़ी डरा हुआ भी था. लेकिन वह ठीक हो जाएगा. मैंने उसे गांव में छह महीने रुकने के लिए कहा है."
विनय कुमार के मुताबिक़ बिहार में केवल 60 मनोचिकित्सक हैं.
उन्होंने कहा, "देश भर में हमें 45,000 मनोचिकित्सकों की ज़रूरत है लेकिन हमारे यहां केवल नौ हज़ार मनोचिकित्सक हैं. कुल मनोचिकित्सकों की जितनी संख्या है उसका एक प्रतिशत भी बिहार में नहीं है. कोरोना महामारी के दौर में, मनोचिकित्सकों की मांग भी बढ़ी है."
ये भी पढ़ें: मानसिक स्वास्थ्य: मॉडल की इस तस्वीर पर विवाद क्यों?

इमेज स्रोत, SAM PANTHAKY / AFP
शोषण आधारित श्रम व्यवस्था में तनावपूर्ण जीवन
भारत के विशाल असंगठित कार्यक्षेत्र में सबसे बड़ी हिस्सेदारी इन्हीं प्रवासी मज़दूरों की है.
लेकिन इनके पास जानकारी और महत्वपूर्ण कौशल का अभाव है जिसके चलते यह अपने काम की उचित क़ीमत वसूलने का सौदा नहीं कर सकते.
इसलिए ये शोषण आधारित श्रम व्यवस्था में काम करते हुए तनावपूर्ण जीवन जीते हैं. लॉकडाउन ने इन मज़दूरों की दुर्दशा को बढ़ा दिया है.
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज की मानसिक स्वास्थ्य प्रोफेशनल और समाज के दबे कुचले समुदायों के बीच काम कर चुकीं हिमानी कुलकर्णी के मुताबिक़ सबसे बड़ी बात यह है कि कोरोना महामारी और लॉकडाउन का पूरा अनुभव ही दर्दनाक है, इसे समझे जाने की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, "मानसिक काउंसलिंग हेल्पलाइन के अनुभवों पर आधारित ये सभी रिपोर्टें हैं. कई पेशेवर तो इससे निपटने में सक्षम नहीं हैं और शहरी क्षेत्रों की ट्रेनिंग से सामुदायिक स्थिति में मदद नहीं मिलती."

इमेज स्रोत, SAJJAD HUSSAIN/AFP via Getty Images
स्वास्थ्य मंत्रालय ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज और सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइक्रेटी-रांची के अलावा राज्य सरकारों से अप्रैल महीने में देश भर के विभिन्न राहत शिविरों और आश्रय घरों में रह रहे हज़ारों प्रवासी मज़दूरों को मानसिक स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने को कहा.
नेशनल हेल्थ मिशन की निदेशक और अतिरिक्त सचिव वंदना गुरनानी ने तीन अप्रैल को लिखे अपने पत्र में राज्यों से कहा कि प्रवासी मज़दूरों को मानसिक स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए वे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत चलने वाले बेहतरीन संस्थानों के अलावा राज्य सरकारों के मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों का इस्तेमाल कर सकते हैं.
बिहार सहित कई राज्यों में प्रवासी मज़दूरों की काउंसलिंग के लिए मेंटल हेल्थ हेल्पलाइन शुरू हुए और रिपोर्टों के मुताबिक़ बिहार में हेल्पलाइन नंबर पर चौदह हज़ार लोगों ने फ़ोन कॉल्स किए हैं.
बिहार में नवंबर महीने में चुनाव होने की संभावना है. मज़दूरों के पलायन को विपक्षी दल चुनावी मुद्दे के तौर पर उठा रहे हैं. बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने नौकरियां सृजित करने में नाकाम रहने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आलोचना की है. तेजस्वी यादव ने कहा है कि ये मज़दूर फिर से काम की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर लौटने लगे हैं.

इमेज स्रोत, MONEY SHARMA/AFP via Getty Images
'राजनीतिक संदर्भ से भी देखने की ज़रूरत'
छपरा के जयप्रकाश यूनिवर्सिटी में हिंदी के अस्सिटेंट प्रोफ़ेसर चंदन श्रीवास्तव के मुताबिक़ प्रवासी मज़दूरों के मानसिक स्वास्थ्य को राजनीतिक संदर्भ से भी देखे जाने की ज़रूरत है.
प्रवासी मज़दूरों के अपने घरों की ओर पैदल लौटने के विजुअल और तस्वीरें मास मीडिया में आतीं उससे पहले ही चंदन को एक दोस्त का संदेश मिला. प्रवासी श्रमिकों के बीच काम करने वाली राजस्थान की संस्था आजीविका ब्यूरो में काम करने वाले दोस्त ने उन्हें दो पत्रों का स्क्रीनशॉट्स भेजा था.
इन पत्रों को प्रवासी मज़दूरों ने लिखा था जो मुंबई में कहीं फंसे हुए थे. पत्र टूटी फूटी हिंदी में लिखे गए थे और उनमें उन लोगों ने अपना मोबाइल नंबर लिखा हुआ था. पत्र में मज़दूरों ने बिहार के अपने गांवों तक पहुंचाने के लिए मदद मांगी थी.
चंदन श्रीवास्तव ने बताया, "ऐसी स्थिति थी कि कुछ सूझ ही नहीं रहा था. मैंने कुछ पत्रकारों को बताया जो मेरे छात्र रहे हैं. ये ख़बर दैनिक जागरण में प्रकाशित हुई. मैं नहीं जानता कि वे लोग अपने-अपने गांव पहुंचे या नहीं. मैं उन्हें तलाश भी नहीं पाया. मैं यह भी नहीं जानता कि सरकार ने कुछ किया या नहीं किया. मेरी हिम्मत नहीं हुई."
"लेकिन मेरे दिमाग़ में ख्याल आया कि यह आदमी किसके पास जाएगा. उसके लिए तो पूरी दुनिया ही एक शून्य हो गई थी. एक फ़ोन नंबर था जिसे वह सबको बांट रहा था, ठीक उस शख़्स की तरह जो किसी द्वीप पर फंस गया है और झंडा लहरा रहा है, इस उम्मीद के साथ कि कोई उसे देख लेगा. लेकिन हम लोग तो जहाज़ हैं जो उसे बचा सकें. थोपी गई लॉकडाउन की व्यवस्था ने उस आदमी के अस्तित्व को नकार दिया था."
ठीक उसी वक़्त राजस्थान के कोटा में फंसे हुए छात्रों को घर लाया जा रहा था, लेकिन ये मज़दूर फंसे हुए थे. चंदन के मुताबिक़ प्रवासी मज़दूर किसी की प्राथमिकता में नहीं थे.
अलग-थलग होने का बोध
चंदन श्रीवास्तव इस स्थिति को लेकर कई तर्क देते हुए कहते हैं, "इस तरह छोड़ दिए जाने से भी इन मज़दूरों को मानसिक आघात हुआ होगा, उन्हें पूरी तरह से अलग-थलग होने का बोध हुआ होगा, इन मज़दूरों को निर्माण स्थलों पर केवल शरीर के तौर पर देखा जाता है. ऐसे में समाज कैसे यह स्वीकार करेगा कि उनके पास भी दिमाग़ होगा या दिल होगा जो महामारी और लॉकडाउन से प्रभावित हो सकता है."
वे कहते हैं, "दिल और आत्मा से दर्द निकलता है. जब आप उनके अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो फिर उनके दिमाग़ और दिल की स्थिति को आप कैसे देख पाएंगे?"
टेलीविजन पर सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य और मानसिक बीमारी को लेकर कई घंटों की बहस देखने को मिली है लेकिन लाखों मज़दूरों बिना आमदनी के अनिश्चित हाल में छोड़ दिए जाने पर जिस मानसिक आघात का सामना कर रहे हैं उस पर कोई बहस देखने को नहीं मिली है.
'दुख भी एक समुदाय बनाता है'
मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं तक अमीर और ग़रीब की पहुंच में बहुत बड़ा अंतर बना हुआ है. संसद के मानसून सत्र के पहले दिन श्रम मंत्रालय ने कहा कि सरकार की केंद्रीकृत डाटाबेस के मुताबिक़ एक करोड़ चार हज़ार प्रवासी मज़दूर अपने-अपने राज्यों में लौटे हैं.
इनमें सबसे ज़्यादा लोग उत्तर प्रदेश में लौटे, इसके बाद बिहार और राजस्थान का स्थान रहा. मंत्रालय की ओर से यह भी कहा गया कि कोविड-19 लॉकडाइन के चलते नौकरी गंवाने या जान गंवाने वाले प्रवासी मज़दूरों को लेकर कोई आंकड़ा नहीं है. केंद्रीय श्रम मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संतोष गंगवार ने कहा, "ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है."
चंदन श्रीवास्तव कहते हैं, "मज़दूरों के इस समाज की अपनी शैली है, अगर कोई मानसिक आघात से गुज़र रहा है तो मज़दूर उसके दुख को आपस में बांटते हैं. दुख भी एक समुदाय बनाता है, एक समूह बनाता है."

इमेज स्रोत, INDRANIL MUKHERJEE/AFP via Getty Images
दरभंगा ज़िले के सिरहुल्ली के 30 साल के गणेश राम सड़क से सटे मंदिर के गलियारे में लेटे लोगों की तरफ़ इशारा करते हैं. लॉकडाउन लागू किए जाने से पहले ही मार्च महीने में राम मुंबई से अपने गांव लौट आए थे. वे वहां एक फैक्ट्री में मज़दूरी करते थे जहां उन्हें 14 हज़ार रुपये महीने मिलते थे.
उन्होंने बताया, "काफ़ी तनाव हैं, लेकिन हम लोग क्या कर सकते हैं. हमारे पास यहां कुछ नहीं है. हमें खाना जुटाने के लिए साहूकारों से कर्ज़ लेना पड़ा है. जिनके यहां काम करते थे वे हमारा फ़ोन नहीं उठाते हैं. क्या करें, कुछ समझ नहीं आता. कोई मदद के लिए नहीं आया है."
मंदिर के परिसर में लोग उम्मीद और डर दोनों को आपस में बांटते नज़र आए. वे हालात बदलने का इंतज़ार कर रहे हैं.
26 साल के जीतेंद्र कुमार प्रसाद गुरुग्राम के एक्सपोर्ट हाउस में काम करते थे. 16 साल की उम्र में वे अपने गांव से कमाने निकले थे. उन्होंने कहा, "इस गांव से हर कोई जा चुका है. यहां तक कि महिलाएं भी. केवल बुज़ुर्ग लोग रहते हैं. यहां कुछ नहीं है. जब पैसे ख़त्म हो जाएंगे तो किसी तरह से हम लौट जाएंगे. हम यहां अपने दिन गिन रहे हैं. कौन हमारी सुन रहा है, किसको चिंता है?"
लोगों में मुश्किल दौर से वापसी करने का भरोसा दिखता है. लेकिन ग़ुस्सा और हताशा भी है.
जीतेंद्र कुमार ने कहा, "जब तक हम लोग कर सकते हैं तब तक संघर्ष करेंगे. लेकिन हमने समझ लिया है कि उन्हें हमारी परवाह नहीं है. हमलोग काफ़ी तनाव में हैं कि कैसे जीएंगे?"

इमेज स्रोत, chinki sinha
मुज़फ़्फ़रपुर के मझौलिया में 36 साल के सुरेश राय काम की तलाश के लिए अगले महीने हैदराबाद लौटने की योजना बना रहे हैं. वह अपने मित्र सुरेश कुमार और उसके छोटे बेटे के साथ कपड़े बनाने की फैक्ट्री में काम करते थे. उन्होंने वापसी के लिए सात अक्टूबर को ट्रेन टिकट बुक कराया है.
जब लॉकडाउन शुरू हुआ तब सुरेश अपने दोस्त के कमरे पर जाकर अक्सर रोया करते थे. उनके पास कोई आमदनी नहीं थी और वे देखते पुलिस उन लोगों को पीट रही है जो बाहर निकलते. सुरेश अपने गांव लौटना चाहते थे. वह मानसिक आघात में थे इसलिए पैदल ही निकल लिए और बाद में उन्हें गांव जाने के लिए साधन मिला और वे पांच दिन में अपने गांव पहुंच पाए.
उनके दोस्त सुशील राय ने कहा, ''वह काफ़ी डरा हुआ था.''
गांव में उनके घर से आप खेतों के ज़्यादातर हिस्से को अब भी पानी में डूबा हुआ देख सकते हैं. बाढ़ राहत के लिए जिस मदद की घोषणा की गयी, उनमें से उन्हें कोई राशि नहीं मिली. राय ने कहा कि उन्होंने जो पैसा बचाकर रखा था, वह भी काफ़ी समय पहले ही ख़त्म हो गया.

इमेज स्रोत, SAM PANTHAKY/AFP via Getty Images
मानसिक स्वास्थ्य 'लग्ज़री'
वह पूछते हैं, ''हमारी सरकार ने हमें छोड़ दिया है. वैसे भी कौन हमारी परवाह करता है? हम रोते हैं, हम सो नहीं पाते, बस सोचते और सोचते रहते हैं. हम यह सब किसे बताएं?''
लेकिन वास्तविकता यही है कि इनमें से कई लोगों की पहुंच बुनियादी ज़रूरतों तक नहीं हैं, कई ने तर्क दिया कि मानसिक स्वास्थ्य 'लग्ज़री' है.
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ाने वाले एसएस जोधका के अनुसार मज़दूरों को सबसे पहले पुनर्वास की ज़रूरत है.
जोधका का कहना है, ''वे भूखे मर रहे हैं और खाना देने के बजाय, आप उन्हें मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग दे रहे हैं. उन्हें रोज़गार चाहिए. ये वो लोग हैं जो झुग्गी झोपड़ियों में रहते हैं. समाज में हाशिए पर रहने वाले लोग हैं."
"वे काफ़ी ग़रीबी में रहते हैं और वे शहरों में कमाई करने आए हैं. उनके लिए अस्तित्व बचाए रखना ही मुख्य मुद्दा है. हम नहीं जानते कि इन प्रवासी मज़दूरों के मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कोई आंकड़ा है या नहीं इसलिए हम इसे संदर्भ में नहीं देख सकते. एक हद तक मानसिक स्वास्थ्य मध्य स्तर की विलासिता है."
"मानसिक स्वास्थ्य का नैरेटिव मध्यम वर्ग का रचा हुआ है. लेकिन हां, प्रवासी मज़दूरों को अपना जीवन बद से बदतर होता दिख रहा है और यह तनावपूर्ण है. उनके सामने जीवन का संकट है. परिवारों और व्यक्तियों का पूरी तरह से सामाजिक विघटन हो रहा होगा.''
सिद्धांत खुराना मानसिक स्वास्थ्य संगठन 'माइंड पाइपर' के सह-संस्थापक हैं. संगठन सरकार के साथ मिलकर प्रवासी मज़दूरों तक पहुंच कर मानसिक समस्या के मुद्दे पर उनकी मदद करती है.
सिद्धांत खुराना ने बताया कि उन लोगों ने दिल्ली में मानसिक काउंसलिंग के लिए सात अप्रैल से हेल्पलाइन शुरू की और 22 जून तक उन्हें विभिन्न मुद्दों पर 21,000 कॉल आ चुकी थीं जैसे किसी को ई-पास नहीं मिल पा रहा है तो कोई गर्भवती है.
उन्होंने कहा, ''आख़िरकार, अगर आप इस तरह की महामारी के समय में तनाव को देखें, तो यह भोजन और जीवित रहने की बुनियादी ज़रूरतों के बारे में होती है जिसमें स्वास्थ्य की देखभाल दांव पर होती है.''
इन लोगों ने इस दौरान देखा कि लोगों में अविश्वास था, वे फंसे हुए और अलग थलग महसूस कर रहे थे. उदाहरण के लिए, एक बच्ची थी जो यहां अकेली थी और उसका परिवार बिहार में एक शादी में शरीक होने गया था और जब लॉकडाउन लगा तो वो वहां फंस गए.
सिद्धांत खुराना ने बताया, ''वह काउंसलर को फ़ोन करती और अपनी कविताओं के बारे में बताती जो उसेने लिखी थी या फिर अपने होमवर्क के बारे में बताती. वह क़रीब 11 से 13 साल की थी. कुछ मौकों पर आपको कोई चाहिए होता है जो आपकी बात सुने.''
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने संकट के लिए दिशानिर्देशों में एक 'रैपिड मॉडल' शामिल है जिसमें सुझाव दिया गया है कि जिन लोगों को मुश्किल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है, उनकी बातें सुनें.
सिद्धांत ने कहा, ''वे अपनी भावनाओं और अहसास को मौखिक रूप से बताने में सक्षम नहीं हैं क्योंकि इसके लिए उन लोगों को समझने की ज़रूरत भी होती है. इसलिए हमें अपनी कांउसलिंग में पश्चिमी मॉडल से अलग स्थानीयता का भाव शामिल करना पड़ा. इसे भारतीय अंदाज़ में होना चाहिए और उनकी भाषा और जुबान में होना चाहिए. यह बेहद अहम है."
मोटे तौर पर ये मज़दूर यही कहते हैं, ''हमारा कोई नहीं है, हमारी कौन सुनेगा.''
एक देश के तौर पर भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्या को लेकर मदद देने के लिए सिस्टमैटिक रिस्पांस वाली व्यवस्था नहीं है. हेल्पलाइंस पर भी प्रवासी मज़दूरों को छिटपुट मदद ही मिल पाती है, जो बहुत कारगर साबित नहीं होतीं.

इमेज स्रोत, NurPhoto/Getty Images
गुवाहाटी में कॉटन विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की संस्थापक और प्रमुख डा. डिम्पी महंता ने कहा, ''चिंता, हताशा, बेचैनी, गुस्सा, भावनात्मक भड़ास और यहां तक आत्महत्याएं संकट की स्थिति में पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव हैं. व्यवहार में आक्रामकता और हिंसा, मादक पदार्थों का सेवन भी इन प्रभावों का असर हैं. अमीर और ग़रीब के मानसिक स्वास्थ्य के बीच में काफ़ी अंतर भी देखा गया है. राज्यों में रोज़गार के अवसर पैदा करने की काफ़ी ज़रूरत है और सरकारों को कौशल विकास अभियान और कार्यक्रमों में निवेश करना चाहिए."
वे कहती हैं, "अर्ध-कुशल, अकुशल लोगों के साथ साथ और मनरेगा में रोज़गार के अवसर पैदा करना निहायत ज़रूरी हैं जहां मज़दूरी की दर प्रति दिन 300 रुपये से कम नहीं होनी चाहिए.''
डॉ. डिम्पी महंता के मुताबिक, 'कम्युनिटी रेडियो सेवाएं ज़ागरूकता पैदा करने और कुछ अनजाने डर को ख़त्म करने में काफी बड़ी भूमिका अदा कर सकती हैं और साथ ही मूल भाषा में सूचना का उचित प्रसार कर सकती हैं.'
क्या कोई उम्मीद है?
पीली शर्ट वाला व्यक्ति मनोविकार समस्या से उबर रहा है, बेहतर हो रहा है. लेकिन लाखों प्रवासी मज़दूर अनिश्चित भविष्य के बारे में सोचकर तनाव और मानसिक आघात का सामना कर रहे हैं.
दरभंगा के गांव में मंदिर परिसर में बैठे लोगों ने कहा कि उनका इंतज़ार ख़त्म होने वाला नहीं है. उन्हें कोई राहत भी नहीं है. उन्हें मीडिया पर भी भरोसा नहीं है.
गणेश राम कहते हैं, ''वे आते हैं और हमसे पूछते हैं और फिर कुछ नहीं होता. हम टेलीविजन पर कहां हैं?''
उन्होंने कहा, ''अगर मैं अपने अंधकार भरे दिन-रात के बारे में बात करूं तो क्या वे सुनेंगे. क्या वे मुझे प्राइम टाइम में दिखाएंगे?''
इसके बाद वह फिर पीछे मुड़कर पूछते हैं, "क्या कोई उम्मीद है?''
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)





















