अमेरिका 9/11 हमलों के बाद चरमपंथ को ख़त्म करने में कितना कामयाब रहा - दुनिया जहान

अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंड प्रांत में तालिबान से युद्ध के दौरान अमेरिकी मरीन कॉर्पोरल स्पेन्सर कुक

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इमेज कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान के हेलमंड प्रांत में तालिबान से युद्ध के दौरान अमेरिकी मरीन कॉर्पोरल स्पेन्सर कुक

11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर अब तक का सबसे बड़ा चरमपंथी हमला हुआ. इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कई कदम उठाए.

अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को सत्ता से बेदखल किया और इराक़ में सद्दाम हुसैन के शासन को ख़त्म किया. लेकिन बीस साल बाद अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान एक बार फिर सत्ता पर काबिज़ है और इराक़ हिंसा के दौर से गुज़र रहा है.

दुनिया जहान में इस बार पड़ताल इस बात की कि 9/11 के हमलों के बाद अमेरिका की जवाबी प्रतिक्रिया का नतीजा क्या निकला? क्या वो चरमपंथ को पूरी तरह ख़त्म कर सका?

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वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ान महिलाएं कभी अपने मुल्क में ऐसे खुलकर जीती थीं

सुरक्षातंत्र को मज़बूत करना

ब्रूस हॉफ़मैन अमेरिका की काउंसिल ऑफ़ फ़ॉरेन रिलेशन्स में काउंटरटेररिज़्म एंड होमलैंड सिक्योरिटी में सीनियर फेलो हैं. साथ ही वो जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं.

11 सितंबर 2001 को जिस वक्त चरमपंथी हमला हुआ उस वक्त ब्रूस हॉफ़मैन वॉशिंगटन में अपने दफ्तर में थे. वो कहते हैं, "जब अमेरिकी एयरलाइन का विमान पेंटागन से आकर टकराया, उस वक्त मैं उसके सामने वाली इमारत में था. पूरी इमारत कांपने लगी थी, ऐसा लगा जैसे भूकंप आया हो."

वो कहते हैं कि हमले के बाद भविष्य में चरमपंथ की घटनाओं को रोकने के लिए बुश ने सबसे पहले जो कदम उठाए उनमें से एक था होमलैंड सिक्योरिटी विभाग का गठन.

वो कहते हैं, "9/11 हमला इस विभाग के गठन का कारण था. सुरक्षा मामलों से जुड़ी कई सरकारी एजेंसियां और विभाग तो पहले भी थे, लेकिन कोई एक ऐसी एजेंसी नहीं थी जिससे वक्त पड़ने पर संपर्क किया जा सके."

ब्रूस कहते हैं कि इस विभाग को बनाना एक तरह ये समझने की कोशिश थी कि 9/11 के हमले को वक्त रहते नाकाम क्यों नहीं किया जा सका.

वो कहते हैं, "ये माना गया कि ये ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी थी. लेकिन ऐसा नहीं था. हमले से पहले अगस्त 2001 में जब बुश को सीआईए ने उन्हें जानकारी दी थी कि अल-क़ायदा बड़े हमले की साजिश रच रहा है. रिपोर्ट में अमेरिका पर हमले की बात स्पष्ट लिखी गई थी. ये ख़ुफ़िया तंत्र की नाकामी नहीं थी बल्कि परेशानी नौकरशाही में थी जहां काम करने की गति धीमी होती है."

सीआईए ने अगस्त 2001 में बुश को बताया था कि अल-क़ायदा हमले की साजिश रच रहा है.

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इमेज कैप्शन, सीआईए ने अगस्त 2001 में बुश को बताया था कि अल-क़ायदा हमले की साजिश रच रहा है.

साल 2004 में जॉर्ज बुश ने माना कि सीआईए ने उन्हें वक्त रहते संभावित हमले की जानकारी दी थी.

लेकिन फिर हमला रोका क्यों नहीं जा सका? ब्रूस कहते हैं कि मामला नौकरशाही का ही नहीं था, बल्कि देश के भीतर से चरमपंथ के ख़तरे को लेकर अंदाज़ा लगाने में भी बुश प्रशासन धीमा रहा था.

ब्रूस कहते हैं, "मुझे लगता है कि कई देश ये मान रहे थे कि वो चरमपंथियों से पहले ही लड़ रहे थे इसलिए देश के भीतर उनसे ख़तरा नहीं था. लेकिन 9/11 के हमले ने ये साबित कर दिया कि अल-क़ायदा दूसरे देशों में चरमपंथी तैयार कर रहा था."

जॉर्ज डब्ल्यू बुश

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इमेज कैप्शन, जिस वक्त व्हाइट हाउस चीफ़ स्टाफ़ एंड्रयू कार्ड ने तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टावर से दूसरे विमान के टकराने की जानकारी दी उस वक्त वो प्लोरिडा में एमा इ. बूकर एलिमेन्टरी स्कूल में कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे. [फ़ाइल फोटो]

चरमपंथियों की नई पौध

अल-क़ायदा ने 'साइबर प्लैनिंग' की थी यानी इंटरनेट पर सदस्यों की नियुक्ति और हमलों की योजना बनाई थी

ब्रूस कहते हैं कि अल-क़ायदा शायद पहला संगठन था जिसने पश्चिमी देशों से लड़ने के लिए 21वीं सदी की तकनीक का इस्तेमाल किया.

वो कहते हैं, "अपनी योजनाओं को अंजाम देने के लिए तकनीक के इस्तेमाल के मामले में आतंकवादी आगे थे. आप कह सकते हैं कि सदस्यों की नियुक्ति, उनसे संपर्क बनाए रखने और हमलों की योजना बनाने में अल-क़ायदा शायद पहला था. वैसे तो संगठन सातवीं सदी के विचार रखता था लेकिन पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए वो 21वीं सदी की तकनीक का इस्तेमाल कर रहा था."

वो कहते हैं कि तकनीक का इस्तेमाल करने वाले ऐसे चरमपंथियों का ख़तरा अभी भी बना हुआ है. वो कहते हैं, "हमें आज ख़तरा ऐसे दुश्मन से है जो वक्त के साथ चलते हैं और तकनीक को समझते हैं. हम ये नहीं कह सकते कि 9/11 जैसी घटना दोबारा नहीं होगी. हम ये कह सकते हैं कि सुरक्षातंत्र विकसित हो रहा है और चरमपंथियों के लिए हमला करना मुश्किल है, लेकिन ये असंभव नहीं."

वीडियो कैप्शन, तालिबान के सामने हिम्मत दिखाती अफ़ग़ान महिला

9/11 के बाद अमेरिका में केवल एक हमला हुआ है जिसकी ज़िम्मेदारी अल-क़ायदा ने ली है. साल 2019 में हुए इस हमले में तीन लोगों की जान गई थी.

कहा जा सकता है कि होमलैंड सिक्योरिटी विभाग अपने काम में सफल रहा. लेकिन अमेरिका की सैन्य कार्रवाई का क्या असर रहा.

तालिबान के ओसामा बिन लादेन को सौंपने से इनकार करने के बाद अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर अल-क़ायदा के ठिकानों पर हवाई हमले शुरू किए.

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अलग देश, अलग मुश्किलें

तमीम अंसारी अफ़ग़ान मूल के हैं. वो कहते हैं कि 9/11 के हमलों की जवाबी कार्रवाई होना तय था. उस वक्त बदला लेने की जनता के मांग को अनसुना करना किसी भी राष्ट्रपति के लिए संभव नहीं होता.

वो कहते हैं "उस वक्त अमेरिकियों के मन में गुस्सा और नफरत था, हर अमेरिकी अफ़ग़ानों से नफरत कर रहा था."

अफ़ग़ानिस्तान में बुश प्रशासन के सैन्य अभियान को जल्द सफलता मिली और वहां तालिबान सत्ता से बेदखल हो गया.

तमीम कहते हैं, "अफ़ग़ान नागरिक पहले ही दो दशक लंबा संघर्ष झेल चुके थे. अमेरिका की जीत पर वो खुशी से पागल थे. उन्हें लगा कि तालिबान ख़त्म हो गया है और वो एक बार फिर अपनी ज़िंदगी जी सकेंगे. बीस साल के बाद उन्हें खुद अपनी सरकार बनाने का मौक़ा मिला था. ये अमेरिका के लिए कुछ कर दिखाने का सही वक्त था."

अमेरिका ने बेहद कम वक्त में अफ़ग़ानिस्तान में अपना उद्देश्य हासिल कर लिया लेकिन उसके बाद वो वहां पुनर्निमाण के एक लंबे अभियान में उलझ गया. अफ़ग़ानिस्तान में विकास परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया गया. लेकिन अफ़ग़ान समाज उस वक्त इसके लिए तैयार नहीं था, वहां भ्रष्टाचार बढ़ने के आरोप लगने लगे.

तमीम कहते हैं, "उस वक्त ये कुछ ऐसा था जैसे किसी ने चौराहे पर नोटों की गड्डियां फेंक दी हों. ज़्यादा पैसा संभालने के लिए वहां की संस्कृति और सामाजिक ढांचा तैयार नहीं थे. इसने वहां एक नए वर्ग के बढ़ने का रास्ता साफ कर दिया जो अमेरिका के बनाए नियमों के दायरे में काम के लिए तैयार था."

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना

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अफ़ग़ानिस्तान में विकास की धारा तय करने के अमेरिका के मिशन में एकमात्र रुकावट अधिक धन के कारण पैदा नहीं हुई, बल्कि इसका एक कारण अलग तरह के एक मुल्क में अगल तौर तरीकों से काम करना भी था.

वो कहते हैं, "अफ़ग़ान नागरिकों के लिए ये अनजाना तरीका था. मुझे लगता है कि अफ़ग़ानी बदलाव के भी तैयार भी थे लेकिन मुश्किल वहां के सांस्कृतिक ढांचे में थी जो वहां राजनीति को प्रभावित करता है. वहां परिवार, समुदाय, वंश और कबीला बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. उनकी दुनिया काफी हद तक अपने में सिमटी थी और मुझे लगता है कि आज भी वहां इसमें कोई अधिक बदलाव नहीं हुआ है."

एक तरफ आम लोग नए तौर तरीकों से कदम मिलाने की कोशिश कर रहे थे तो दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर कबायली इलाकों में ऐसे नेता उभर रहे थे जिनका आरोप था कि विदेशी इस्लाम के मूल्यों और परंपराओं को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं.

तमीम कहते हैं, "2006 तक ग्रामीण इलाकों में राजधानी काबुल के बारे में ऐसी अफवाहें पहुंचने लगी कि वहां भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है, महिलाएं कम कपड़े पहनकर सड़कों पर निकलती है और लोग शराब के नशे में धुत रहते हैं."

ग्रामीण इलाक़ों में पैदा हुए इस माहौल ने तालिबान को फिर से पैर जमाने का मौक़ा दे दिया.

स्पष्ट तौर पर कहा नहीं जा सकता कि अमेरिका को इसकी कितनी जानकारी थी क्योंकि उसका ध्यान अब इराक़ में 'आतंकवाद के ख़िलाफ़' लड़ाई की तरफ था.

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चूक कहां पर हुई

मार्च 2003 में जनसंहार के लिए हथियारों को नष्ट करने और सद्दाम हुसैन की तानाशाही को ख़त्म करने के इरादे से अमेरिकी सेना ने इराक़ में प्रवेश किया.

कैरीन वॉन हिप्पल लंदन में मौजूद डिफेन्स एंड सिक्योरिटी थिंकटैंक, रॉयल युनाइटेड सर्विसेस इंस्टीट्यूट की प्रबंध निदेशक हैं.

वो कहती हैं कि अमेरिका के पास अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य कार्रवाई की स्पष्ट वजह थी. तालिबान ने अल-क़ायदा प्रमुख को अमेरिका को सौंपने से मना कर दिया था. लेकिन इराक़ पर हमले की कोई ठोस वजह नहीं थी.

वो कहती हैं, "इस पूरे इलाक़े में अधिकांश जगहों पर लोकतंत्र नहीं है, ऐसे में अपने अभियान को सही ठहराने के लिए आप दलील खोजते हैं. लेकिन चुनौती देख पाना अलग बात है जबकि उसे हल कर सकने का घमंड करना अलग."

जल्द ही ये साबित हो गया कि जनसंहार के लिए हथियारों के बारे में मिली ख़ुफ़िया जानकारी में दम नहीं था. इसके बाद इराक़ युद्ध जारी रखने को लेकर सवाल उठने लगे.

कैरीन कहती हैं, "अमेरिकी सरकार ने पहले कहा कि इराक़ के लोग उनका स्वागत करेंगे और इस अभियान की कीमत इराक़ को चुकानी होगी. लेकिन जल्दी ही सरकार की भाषा बदल गई और कहा गया कि हम वहां लोकतंत्र लाएंगे. इराक़ को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होने लगी."

इराक़ के राष्ट्रपति नूर अल-मलिकी

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इमेज कैप्शन, साल 2006 में नूर अल-मलिकी इराक़ के राष्ट्रपति बने. इराक़ से अमेरिका सेना के जाने के दौरान वही राष्ट्रपति थे

खुद पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा

इराक़ में अमेरिका का सैन्य अभियान कामयाब रहा और सद्दाम हुसैन का शासन ख़त्म हुआ. इसके बाद इराक़ी सेना को विघटित कर दिया. कैरीन के अनुसार ये पहली बड़ी ग़लती थी.

कैरी के अनुसार, "इराक़ी सेना के विघटन से कई लोग नाराज़ थे. ये लोग अब बेरोज़गार हो चुके थे लेकिन इनके पास हथियार थे. जब आप एक ऐसे देश को आज़ाद करते हैं जहां लोग डर के साये में जीते रहे हों, तो लोगों में ताकत का एक नया स्वरूप देखने को मिलता है. इराक़ में यही हुआ. देश में हिंसा का माहौल बनने लगा, समुदायों के बीच संघर्ष शुरू हो गया और लोग विदेशी सेना पर हमले करने लगे. पश्चिमी देशों की सेनाएं इसके लिए तैयार नहीं थीं."

माना जाता है कि इराक़ी सेना के कई पूर्व सैनिक इस्लामिक चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट में शामिल हो गए.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: महिला पत्रकारों पर बढ़ते हमले

कैरीन कहती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका मुश्किलों का सामना तो कर ही रहा था, इराक़ में भी उसके लिए मुसीबतें बढ़ रही थी.

वो कहती हैं, "दोनों ही मामलों में ज़रूरत से ज़्यादा घमंड था. हमें मान लेना चाहिए कि हर देश की अपनी संस्कृति, अपनी समस्याएं हैं, हम सभी समस्याओं को हल नहीं कर सकते. हमें उन्हें समाधान तलाशने देना चाहिए. जब हम सोचते हैं कि हम सबकुछ दुरुस्त कर देंगे, तो वहीं पर हम ग़लती कर देते हैं."

2009 में बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने इराक़ में अपना अभियान समेटना शुरू कर दिया. दो साल के भीतर उसने अपनी सेना वहां से वापस बुला ली.

वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का राज, सैकड़ों नागरिक देश छोड़कर भारत पहुंचे

इराक़ के सुन्नी मुसलमान वहां के शिया नेतृत्व वाली सरकार से नाराज़ थे. इराक़ की सीमा के पास के इलाक़ों में ऐसे नाराज़ लोगों को इस्लामिक स्टेट ने ऐसे लोगों को अपना सदस्य बनाया.

2013 में इस संगठन ने खुद को इस्लामिक स्टेट इन इराक़ एंड सीरिया कह दिया. 2014 में इस्लामिक स्टेट के प्रमुख अबू बकर अल-बग़दादी ने इराक़ के दूसरे सबसे बड़े शहर को मोसूल पर कब्ज़ा कर लिया.

लंबे संघर्ष के बाद 2018 में इस्लामिक स्टेट का ख़ात्मा हुआ.

29 जून 2014 की इस तस्वीर में अबू बकर अल-बग़दादी.
इमेज कैप्शन, 29 जून 2014 की इस तस्वीर में अबू बकर अल-बग़दादी.
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क्या ख़त्म हुआ ख़तरा

इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान अभियान में अमेरिका के साढ़े छह हज़ार से अधिक सैनिकों की जान गई और अरबों डॉलर खर्च हुए. लेकिन क्या इसके बाद क्या 2001 के मुक़ाबले अमेरिका अधिक सुरक्षित हुआ? क्या इस इलाक़े से उठा आतंक के ख़तरा अब पूरी तरह ख़त्म हो गया है?

पॉलिसी इंस्टीट्यूट चैटम हाउस में मध्यपूर्व और उत्तर अफ़्रीका कार्यक्रम की निदेशक लीना ख़तीब कहती हैं, "आतंकवाद के ख़तरे को लेकर चिंता वाजिब है. मध्यपूर्व के सीरिया में युद्ध की स्थिति बनी हुई है, अलग स्तर पर सही लेकिन इराक़ में अभी भी संघर्ष जारी है. जिहादी पूरे मध्यपूर्व में मौजूद हैं. कई देशों में स्थिरता दिख सकती है लेकिन वो सतही है क्योंकि वहां भी संघर्ष का ख़तरा बना हुआ है."

वो कहती हैं कि आतंक का ख़तरा पैदा होने की एक बड़ी वजह अस्थिरता और ग़रीबी है. वो कहती हैं, "सरकार मज़बूत नहीं और लोगों में सरकार के प्रति भारी नाराज़गी हो तो कट्टरपंथी संगठनों को पनपने का उचित माहौल मिलता है. ऐसे में सेना भी राष्ट्र हित में काम नहीं करती और इस तरह के ख़तरे से लड़ने को तैयार नहीं होती."

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: कैसी होगी तालिबान की सरकार?

लेकिन ये भी सच है कि अगर लोगों की थोड़ी बहुत सहानुभूति कट्टरपंथी विचारधारा वाले अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों के साथ नहीं होती तो ये कभी कामयाब नहीं हो पाते.

लीना कहती हैं, "कुछ सहानुभूति होती ज़रूर है लेकिन ये वैचारिक स्तर पर हो ये ज़रूरी नहीं. अक्सर मान लिया जाता है कि इन संगठनों के समर्थक वैचारिक स्तर पर उससे सहानुभूति रखते हैं. लेकिन असल में सरकार से नाराज़ और समाज में अलगथलग पड़े लोग ऐसे संगठनों का समर्थन करते हैं. इसलिए अगर आतंकवाद की समस्या का समाधान करना है तो सभी तबके के लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के साथ-साथ भ्रष्टाचार रोकने और शासन व्यवस्था दुरुस्त करने का काम भी होना चाहिए."

अमेरिकी सेना

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सेना लौटी और फिर सिर उठाने लगे चरमपंथी संगठन

लीना सवाल करती हैं, अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती रही. अगर ज़मीन पर सेना मौजूद होने के बावजूद आप भ्रष्टाचार नहीं रोक पाए और शासन व्यवस्था दुरुस्त नहीं कर पाए तो सेना वापिस बुला लेने के बाद आप क्या करेंगे?

वो कहती हैं, "रणनीतिक तौर पर सही योजना न होने से अमेरिका को ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को नाकामी हाथ लगी. आपको मालूम होना चाहिए कि अगर गणतंत्र बहाल करने और उसे मज़बूत करने के लिए ठोस योजना नहीं है तो ये नाकामी की तरफ जाने जैसा है."

"ऐसा नहीं है कि मध्यपूर्व में गणतंत्र का विरोध है. सही मायनों में यहां के अधिकांश लोग गणतंत्रिक व्यवस्था चाहते हैं लेकिन जब सरकार मज़बूत नहीं है और छोटे से छोटे बदलाव के लिए संघर्ष ही एकमात्र रास्ता है तो समस्या तो होगी."

वीडियो कैप्शन, काबुल को नए रंग दे रहा है ये शख़्स

अमेरिकी सेना की वापसी के साथ तालिबान का फिर से सत्ता में आना ये साबित करता है कि चरमपंथी संगठन कुछ वक्त के लिए शांत ज़रूर हुए पर ख़त्म नहीं.

लीना कहती हैं, "अल-क़ायदा ने हाल में एक बयान जारी तक तालिबान को बधाई दी. इस्लामिक स्टेट ने कहा कि वो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की जीत असल मायनों में मुसलमानों की जीत नहीं मानता क्योंकि अमेरिका ने खुद उनके हाथों में सत्ता दे दी है. हम कह सकते हैं कि ये तीन ऐसे चरमपंथी संगठन हैं जो या तो एक दूसरे के साथ हैं या फिर एक दूसरे के आगे बढ़ने की होड़ में हैं."

मोटे तौर पर कहा जाए तो बीस सालों के अभियान के बाद अभी भी चरमपंथ के पनपने का ख़तरा बना हुआ है.

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लौटते हैं अपने सवाल पर कि 9/11 हमलों के बाद चरमपंथ को ख़त्म करने के अपने अभियान में अमेरिका कितना कामयाब रहा?

देश के भीतर सुरक्षा के मद्देनज़र उठाए गए कदम कारगर रहे, अल-क़ायदा को ख़त्म करने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य कार्रवाई भी अहम रही. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ के पुनर्गठन में खामियां रह गईं जिन्होंने चरमपंथी गुटों को फिर से पैदा होने का मौक़ा दिया.

ऐसे में आने वाले वक्त में अमेरिका की सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि दूसरे देशों की सरकारें अपने लोगों को कितनी उम्मीद दे पाती हैं.

प्रोड्यूसर: मानसी दाश

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