नज़रिया: अल-क़ायदा और तालिबान के ख़िलाफ़ क्या अमरीका हार रहा है

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- Author, मोहम्मद मोहक़्क़िक़
- पदनाम, धार्मिक मामलों के विश्लेषक
सत्रह साल पहले 11 सितंबर के दिन अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर एक हमला हुआ था.
इसी घटना के कारण अमरीका और उसके सहयोगी देशों ने अल-क़ायदा और तालिबान के विरुद्ध संपूर्ण रूप से युद्ध की घोषणा कर दी थी और अमरीका अपने समस्त लाव-लश्कर के साथ अपने दुश्मन को समाप्त करने के लिए निकल पड़ा था.
20वीं सदी के आख़िरी सालों में साम्यवाद को पराजित करने का सेहरा अपने सिर पर बांधने के बाद अमरीका ने तीसरी सहस्त्राब्दि की शुरुआत में चरमपंथ को पराजित करने का सेहरा भी अपने सिर बांधने का फ़ैसला किया.
चरमपंथ के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर छेड़ी गई इस लड़ाई के जो परिणाम सबके सामने हैं वो कुछ इस तरह हैं.
- दस खरब से अधिक अमरीकी डॉलर ख़र्च हो चुके हैं.
- दो हज़ार से अधिक नेटो के सैनिकों की मौत हुई है.
- दस हज़ार से ज़्यादा निहत्थे और निर्दोश अफ़गान नागरिकों का क़त्ल और ज़ख़्मी होना.
- साथ ही सैनिक अधिकारियों और नेटो देशों के राजनेताओं की अत्यधिक माथापच्ची.
तो क्या इस व्यापक युद्ध की शुरुआत एक भयंकर अपराध था?
क्या विरोध में खड़ी ताकतों (अल-क़ायदा और तालिबान) का ये दावा सच्चा था कि इस युद्ध को अमरीका और उसके सहयोगी देशों ने आरंभ किया है, लेकिन इसको समाप्त करने का निर्णय हम लेंगे?
क्या अमरीका और उसके नेटो सहयोगी देश इस युद्ध में कूदने को तैयार नहीं थे या कहें कि वो अनमने तौर पर इस युद्ध में शामिल हुए थे?
अब यहाँ पर इस प्रकार के हज़ारों सवाल खड़े हो सकते हैं. मगर असली मुद्दा ये है कि इन सवालों का सही जवाब क्या होगा?

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क्या अमरीका हार रहा है?
इस समय जो कुछ ज़मीनी स्तर पर घटनाक्रम चल रहा है उससे तो ऐसा लगता है कि विश्व की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति और सबसे अधिक शक्तिशाली देश इस युद्ध में हार की कगार पर है.
ये उपयुक्त समय है कि इस युद्ध में 'अमरीका और उसके नेटो सहयोगी देशों' की हार के कारणों की निशानदेही की जाए क्योंकि हमारे लिये सबसे बड़ा दुख ये है कि इस युद्ध में सबसे अधिक जान गंवाने वाले अफ़गान नागरिक ही हैं.
अगर इस लड़ाई में अमरीका और उसके सहयोगी हार जाते हैं तो इसका सबसे बड़ा घाटा अफ़ग़ानिस्तान को ही होगा.
लेकिन ये केवल अफ़ग़ानिस्तान की ही हार नहीं होगी. अगर हम सरकारों की राजनीति को नज़र अंदाज़ कर भी दें, तो भी ये एक ऐसे पक्ष ही हार होगी जो मानवता की आधारभूत स्वतंत्रता का हिमायती है. जो अनेकता में एकता चाहता है. जो उदारवादी सोच रखता है. जो समग्र रूप से मानवाधिकार का पक्षधर है. जो जन-कल्याण और विश्व-शांति के लिये वचनबद्ध है.
वहीं जीतने वाले ऐसी मानसिकता के लोग हैं जो विचारों की अभिव्यक्ति के विरुद्ध हैं. जो सैन्यवाद में विश्वास रखते हैं. समाज में एकरूपता के पक्षधर हैं. जो धार्मिक भेदभाव के हामी और किसी भी प्रकार की आज़ादी के विरुद्ध हैं. जो अब भी आदिमानवों का जीवन जीते हैं.
अगर 'संपूर्ण पराजय' शब्द का इस्तेमाल न भी करें तो भी इस युद्ध में पराजय से संबंधित बहुत सारे तर्क विशेषज्ञों ने प्रस्तुत किए हैं.



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पाकिस्तानी सेना की भूमिका
इनमें सबसे ऊपर है पाकिस्तानी सेना का रोल और उनकी रणनीति. अगर इस लड़ाई में जीत के तमग़े का कोई असल हक़दार है तो वो है पाकिस्तान की फ़ौज.
इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा कारण है, अफ़ग़ानिस्तान में हर ओर फैला भ्रष्टाचार, जिनसे बीते 17 सालों में देश का बहुत नुक़सान किया है.
ये भ्रष्टाचार अफ़ग़ान समाज में हर तरफ फैला हुआ है. सरकार के मत्रालयों, विभागों से लेकर यहाँ पर काम कर रहीं ग़ैर-सरकारी संस्थाओं, सामाजिक संस्थानों और बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों में भी.
इस भ्रष्टाचार ने अफ़ग़ानिस्तान की जन-चेतना को मार दिया है. अगर इन दो स्पष्ट कारणों से आगे बढ़े तो वो कारण सामने आता है जो बहुत ही महत्वपूर्ण है.
ये एक राजनीतिक कारण है. ग़ौर करने वाली बात है कि 9/11 की घटना के बाद अफ़ग़ानिस्तान में धार्मिक कट्टरवाद के ख़िलाफ़ एक राजनीतिक निर्णय लिया गया.
इसके अनुसार, धार्मिक कट्टरवाद को बिना रोके इस क्षेत्र में शांति को बहाल करना तय किया गया.
अब सवाल ये पैदा होता है कि 'धार्मिक कट्टरवाद के संदर्भ में शांति की राजनीति' अनजाने मे उठाया गया क़दम था या ये एक सोचा समझा फ़ैसला था. या इसके पीछे कुछ और मक़सद छिपा हुआ था?
सवाल ये भी उठ रहा है कि धार्मिक कट्टरवाद के विरुद्ध ऐसी नीति अपनाने का दोष किसके सिर मढ़ा जाये? और इस नीति को अपनाने का गुनाहगार कौन है?
ख़ैर, इसका ज़िम्मेदार जो भी रहा हो, फ़िलहाल ज़रूरत इस बात की है कि धार्मिक कट्टरवाद के संदर्भ में लिये गए फ़ैसले की ग़लती को स्वीकार किया जाए, क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान की समस्या की असली जड़ यही है और इसकी पहचान करना बहुत ज़रूरी है.



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आंतकवाद की समस्या क्यों खड़ी होती है
ऐसा लगता है कि अफ़ग़ान समस्या की शुरुआत से ही दुनिया की नज़र केवल आतंकवाद पर रही है. लेकिन धार्मिक कट्टरवाद पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.
आतंकवाद एक मानसिकता और विचारधारा है जो किसी इंसान को हथियार उठाकर लड़ने के लिये तैयार कर देती है.
आतंकवाद को सही ढंग से समझने के लिए ऐसे विचार करें कि एक पहाड़ है जिसकी चोटी पर बर्फ़ जमी हुई है. ये बर्फ़ पिघलकर नीचे आती है और नदी का रूप ले लेती है.
मगर इसपर ज़रा भी विचार नहीं किया गया कि ये बर्फ़ जमती क्यों है, फिर पिघलती क्यों और कैसे है. और कैसे पानी नीचे आता है.
यानी ये हथियारबंद संगठित समूह जो युद्ध के मैदान में लड़ने के लिए खड़े हैं, उसके पीछे क्या कारण है.
इन हथियारबंद समूहों से पहले वे लोग हैं जो इनको ट्रेनिंग देते हैं. वो आतंकवाद की विचारधारा को फैलाते हैं और इसका प्रचार-प्रसार भी करते हैं.
इनको आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं. और इसके पीछे वे लोग हैं जो इन आतंकवादियों को अपना रणनीतिक अंग समझते हैं.
इन आतंकवादियों के बलबूते पर वो दूसरी सरकारों से फ़िरौती वसूल करते हैं. ये वही लोग हैं जो आतंकवाद को केवल कटुता फैलाने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
मगर अफ़सोस की बात यह है कि अफ़गान समस्या के संदर्भ ऐसे समूहों और लोगों को कभी संजीदगी से लिया ही नहीं गया, और इस ओर कोई ध्यान ही नही दिया गया.



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आंतकवादी मानसिकता किस तरह तैयार की जाती है
ऐसा भी नहीं है कि केवल एक विशेषज्ञ ही यह पता लगा सकता है कि चरमपंथी किसी चरमपंथी मां के गर्भ से जन्म नहीं लेता है, बल्कि वास्तविकता ये है कि इसके लिए सब से पहले दिमाग़ और ज़ेहन में संशय और अविश्वास का भावना भरा जाता है, फिर यही सोच एक संस्था का रूप लेता है जहां पर इन आतंकवादियों का ब्रेनवॉश होता है.
और इस प्रकार के अनेकों चरणों से गुजर कर एक मनुष्य खुदकुश हमलावर के रूप में बाहर निकलता है, जो मरने मारने के लिये हमेशा तैयार रहता है.
एक साधारण मनुष्य भी ये जान सकता है कि इन खुदकुश हमलावरों के विरुद्ध लड़ने और धन-बल खर्च करने के बजाए उचित क़दम ये होगा कि इन लोगों को इस अवस्था तक आने से पहले इन पर ध्यान दिया जाये और इन का रोकथाम किया जाये.
इसलिए पहले चरमपंथ के उद्गम स्थल और इसके स्रोत का पता लगाया जाए, जहां से इनको ट्रेनिंग मिलती है.
इन विचारधाराओं का पता लगाया जाए जो इन लोगों को आत्मघाती बनाते हैं. और उन स्रोतों तक पहुंचा जाए जहां से इन लोगों को आर्थिक और अन्य सुविधाएं मिलती हैं.
ऐसे नेटवर्क पर शिकंज़ा कसा जाए जो इन को बरगलाते हैं और इस काम के लिए बहाल करते हैं और उन लोगों को भी घेरा जाए जो चरमपंथ की व्यख्या इस्लामी शरिअत के अनुरूप करते हैं और साथ उन समूहों और व्यक्तियों को सामने लाया जाए जो चरमपंथियों को असहाय और मजबूर मानते हैं.
जो आदमी धर्म के नाम पर बेगुनाह का क़त्ल और ख़ून करता है. ऐसा आदमी ट्रेनिंग के दौरान ही अपना विवेक खो चुका होता है और स्वयं इस चरमपंथी विचारधारा का शिकार बन चुका होता है.
मैदान में आने के पहले ही इन लोगों का दिल और दिमाग ज़ेहन और मस्तिष्क चरमपंथ के विचारधारा के विष से विषाक्त हो चुका होता है और उन्हें इस अवस्था तक लाने के लिये बहुत ही अधिक धन खर्च किया जाता है.
जब किसी आदमी की ट्रेनिंग इस हद तक पूरी हो जाती है तो फिर ऐसे लोगों का कोई इलाज नहीं बचता है, केवल यह के इनके विरुद्ध सुरक्षा का सख्त प्रबंध किया जाए और सामने आने पर इनसे लड़ा जाए.
आजकल अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथ के विरुद्ध केवल यही एक काम किया जा रहा है और इसी एक काम पर समस्त धन-बल खर्च किया जा रहा है.

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अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति
यहां पर फ़ारसी भाषा के विद्धान शेख़ साअदी ये कथन उपयुक्त लगता है...
पानी के झरने को शुरू ही में पाट देना चाहिए,अगर यूं ही छोड़ दोगे तो फिर बाद में हाथी से भी उसको पार नहीं कर पाओगे...
अब 17 साल बाद वास्तव में ये झरना भर गया है और बड़ी नदी बन कर ठाठें मार रहा है और नेटो के महावत और उन के हाथी इस को पार करने में सक्षम नहीं हैं और मैदान से भागने की तैयारी में लगे हैं.
अब अगर नेटो का महावत और हाथी मैदान से भागा खड़ा हुआ तो फिर अफ़ग़ानिस्तान में किस प्रकार का राजनैतिक और स्ट्रेटिजिक शून्यतता पैदा होगी और इसका क्या परिणाम सामने आएगा, अभी कुछ कहना मुश्किल है.
अफ़ग़ानिस्तान को इस हालत तक पहुंचाने में जिसकी भी भूल हो और जो भी इसका दोषी हो, अगर इस समय उसको भी कटघरे में खड़ा किया जाये तो इस से कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है.
इन 17 सालों में अगर एक चरमपंथी को मारा गया तो फिर इस के बाद सैकड़ों अतिवादी जन्म ले लिए.
अगर एक हथियारबंद समूह को पराजित किया गया तो इस की जगह में सेकड़ों निहथ्ते लोगों ने हथियार उठा लिया. यह क्रम अभी भी चल रहा है, यानी पानी सर के ऊपर आ गया है और नदी में अब भंवर पैदा हो रहा है.
आज अफ़गानिस्तान की स्थिति यह है कि उन क्षेत्रों में भी धार्मिक अतिवाद की विचारधारा तेजी से फैल रही है जहां के लोग कल तक तालिबान और अलकायदा के खिलाफ़ सख्त जंग लड़ रहे थे. इन इलाकों में ऐसे केन्द्र रोज खुल रहे हैं जो धार्मिक अतिवाद का जमकर प्रचार और प्रसार में लगे हैं, और ऐसे कामों भाड़ी संख्या में नौजवान लोग शरीक हो रहे हैं.

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तो क्या करना चाहिए
इस के साथ साथ जिस चीज़ ने अफ़गान समस्या को और भी पेचीदा बनाया है वह है इस समस्या का ठीक से पहचान और इसका आकलन.
एक तो यह कि अफ़ग़ानिस्तान की बदली हूई स्थिती में जिन लोगों के कांधों पर नयी हुकूमत की ज़िम्मेदारी थी वे सही डेमोक्रेटिक शक्ल में एक मजबूत हुकूमत नहीं बना सके. समाज में शांति का कोई ढांचा सामने लाने में असफल रहे. जनता का विश्वास जीत नहीं सके.
इसके विपरीत उस और वे धार्मिक अतिवादी समूह जिनकी तालिबान और दाइश से नहीं बनती थी उन्होंने अपने भविष्य को ध्यान में रख कर समाज, व्यक्ति, धर्म, औरत मर्द का संबंध, मानव अधिकार वगैरह की कुछ इस प्रकार व्यख्या की जो तालिबान के रास्ते को हमलावर बनाया है.
ये लोग जानते ही नहीं कि तालिबान, अलक़ाएदा और दाइश के विचारधारा के विरुद्ध लड़े बगैर इन को पराजित करना असंभव है. इसी के साथ साथ अफ़ग़ानिस्तान में जातीय और क्षेत्रीय पहचान ने यहां की समस्या को और भी पेचीदा बना दिया है.
ऊपर गिनाए तमाम हालत के बावजूद इसका मतलब कतई यह नहीं है कि तालिबान और दूसरे चरमपंथियों के विरुद्ध जंग हार गयी है. अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय समस्त ताक़तों के सामने अब भी मौका है कि वे अपनी रणनीति और स्ट्रेटिजी पुनर्विचार करें और अतिवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के नियम-क़ानून पर दोबार गौर करें.
चरमपंथ और धार्मिक अतिवाद के लिए समान क़ानून बनाएं और दोनों को एक ही स्तर का अपराध समझें, और साथ साथ नरम रवैया रखने वाले धार्मिक समूह की हिमायत और सहायता करें, डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेस और नरम रवैया रखने वाले समूह के बीच ताल-मेल बढाने में सहयोग दें, और चरमपंथ और अतिवाद के विरुद्ध लड़ रहे वैचारिक समूहों एक साथ जोड़ें और ठोस और दीर्घकालिक परिणाम को सामने रख कर आगे बढें, और इस त्रासदी से निकलने का रास्ता निकालें.



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