अफ़्रीका में इस्लामी चरमपंथियों से जंग अब तक कहां पहुंची है

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- Author, फ़्रैक गार्डनर
- पदनाम, बीबीसी रक्षा संवाददाता
अफ़्रीका का सहेल इलाक़ा इस्लामिक अतिवादियों की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है.
इन इलाक़ों के देशों में अतिवादी सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे हैं. इसे रोकने के लिए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रयास चल रहे हैं.
माली में 400 ब्रिटिश सैनिकों को भेजा गया है. यहाँ पिछले नौ महीनों में दूसरी बार तख़्तापलट की कोशिश हुई है. तख़्तापलट की इन कोशिशों की क्षेत्रीय नेताओं ने मुखर होकर निंदा की है.
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने धमकी दी है कि जिन इस्लामिक अतिवादियों से सेना लड़ रही है उनसे अगर तख़्तापलट करने वाले नेताओं का कोई समझौता होता है तो वे 5100 फ़्रांसीसी सैनिकों को वापस बुला लेंगे.
उधर उत्तरी अफ़्रीका में अमेरिका के नेतृत्व वाले बहुराष्ट्रीय वॉर गेम, जिसका नाम अफ़्रीकन लायन दिया गया है, उससे स्पेन ने मोरक्को से एक विवाद के कारण ख़ुद को अलग कर लिया है.
यह पश्चिमी अफ़्रीका और उस इलाक़े के लिए मायने रखता है लेकिन इसका अप्रत्यक्ष असर दुनिया के बाक़ी हिस्सों पर भी पड़ेगा.
अफ़्रीका के लिए सहेल का इलाक़ा उत्तर की ओर से यूरोप जाने के लिए बड़ी संख्या में प्रवासियों के लिए ट्रांज़िट रूट है. इसके साथ ही यह अवैध ड्रग्स, हथियार और जिहादियों का भी ट्रांज़िट रूट है.
मध्य-पूर्व में झटके के बाद इस्लामिक स्टेट समूह और उसके प्रतिद्वंद्वी अल-क़ायदा ने अफ़्रीका को अपनी नई प्राथमिकता बनाने का एक रणनीतिक फ़ैसला लिया है.

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सुरक्षाबलों के बुरे बर्ताव
अगर अराजकता, हिंसा और असुरक्षा सहेल के देशों, जैसे की माली में सामान्य बात हो जाती है तो हमें दो चीज़ें देखने को मिल सकती है: पहला यह कि जिहादी नए भौगोलिक ठिकाने से दुनिया के बाक़ी हिस्सों पर हमला कर सकते हैं.
और दूसरा यह कि इस इलाक़े के लोग अपना देश छोड़कर प्रवासी और शरणार्थी के तौर पर जोखिम उठाकर यूरोप जाएंगे और इनकी तदाद बढ़ती जाएगी.
अभी इसे रोकने के लिए एक प्रभावी रणनीति यही हो सकती है कि जिहादियों को रोका जाए और इस इलाक़े में उनकी पकड़ को कमज़ोर किया जाए.
सहेल क्षेत्र की समस्या है- सूखा, भ्रष्टाचार, ग़रीबी, बेरोज़गारी और जातीय टकराव. यह समस्याएं बहुत ही गहरी हैं.
द हेग स्थित आतंकवाद रोधी अंतरराष्ट्रीय केंद्र में वरिष्ठ शोधार्थी जूली कोलमैन कहती हैं कि सुरक्षा केंद्रित दृष्टिकोण असली समस्याओं को सुलझाने में नाकाम रहा है. वे कहती हैं कि केवल नाकाम ही नहीं बल्कि इससे माली में युवा अतिवादी समूहों की ओर रुख़ करने लगे हैं.
कोलमैन कहती हैं, ''माली में पिछले आठ सालों से अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप बढ़ा है और इससे हालात बदतर ही हुए हैं. अतिवादी समूहों से माली में लोगों का जुड़ाव बढ़ा है और कई हमले भी हुए हैं. सुरक्षा बल मानवाधिकारों का उल्लंघन करते हैं और साथ ही क़बीलों के आधार पर अदालती सुनवाई में दोषी ठहराए बिना ही मार देते हैं और गिरफ़्तार करते हैं.''
क्या है सहेल
जिहादियों और अतिवादियों पर लगाम लगाना अब बड़ी चुनौती बनती जा रही है. सहेल का इलाक़ा मॉरिटेनिया, माली, नीज़ेर, चाड और ब्रुकिना फासो तक क़रीब 30 लाख वर्गकिलोमीटर में फैला है.
नाइजीरिया तक जिहादी हमले पहुँच चुके हैं. इन देशों में आबादी बिखरी हुई है. भयावह ग़रीबी है और पुलिस व्यवस्था भी चरमराई हुई है. सरहदों पर कोई चौकसी नहीं है, इसलिए ड्रग्स, मानव तस्करी और आतंकवादी समूहों की आवाजाही बहुत आसान है.
कोई भी देश इस चुनौती का सामना ख़ुद से नहीं कर सकता है. फ़्रांस ने 2013 में माली की राजधानी बामको में अल-क़ायदा के बढ़ते प्रभाव को लेकर हस्तक्षेप किया था ताकि उसे रोका जा सके. फ़्रांस ने भी इस बात से सहमति जताई थी कि इसे लेकर साझी कोशिश और रणनीति की ज़रूरत है. अभी इस इलाक़े में दो सैन्य मिशन चल रहे हैं:

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कौन-कौन लगा है इस अभियान में
एक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन है, जिनमें 56 देश शामिल हैं और 14 हज़ार से ज़्यादा सैनिक हैं. इनमें से कुछ माली के सुरक्षा बलों के साथ काम कर रहे हैं. ये रेगिस्तान में गश्ती दलों में भी शामिल हैं. इसके साथ ही यह मिशन दूर-दराज़ इलाक़ों में भी जाने की कोशिश कर रहा है ताकि सरकारी सुरक्षा व्यवस्था की मौजूदगी का अहसास हो.
इसके अलावा फ़्रांस के नेतृत्व में एक आतंकवाद निरोधी मिशन काम कर रहा है. इसका नाम ऑपरेशन बरखाने रखा गया है. इस ऑपरेशन में हेलिकॉप्टर और ड्रोन्स का इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा इस मिशन का एक बेस नीज़ेर में भी है. फ़्रांस के इस मिशन को अमेरिकी इंटेलिजेंस का समर्थन हासिल है. इस मिशन के ज़रिए सरहद के इलाक़ों में जिहादियों के ठिकानों को नष्ट किया जाता है.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के अनुभव से साफ़ है कि मुस्तैद हथियारबंद सैनिक और लक्ष्य केंद्रित पश्चिमी हस्तक्षेप की भी एक हद है. अतिवादियों को हराने के लिए दो चीज़ें बहुत अहम हैं- सक्षम स्थानीय बल और वहाँ के लोगों का समर्थन. माली में सबसे बड़ी समस्या यही है.
देश के कई हिस्सों में स्थानीय सेना में लोगों का भरोसा बहुत कम है. एक तो इनकी तादाद बहुत कम है और एक साल के भीतर दो बार हुए तख़्तापलट से राजनीतिक हालात और नाज़ुक हो गए हैं.

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कई स्थानीय नेता अतीत में फ़्रांस और अन्य विदेशी सैनिकों को वापस जाने के लिए कह चुके हैं. 2013 के बाद से फ़्रांस के 50 से ज़्यादा फ़्रांसीसी सुरक्षा बलों की जान जा चुकी है. फ़्रांस का यह अभियान देश के भीतर लोकप्रिय नहीं है.
हाल के तख्तापलट के बाद फ़्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने इस हफ़्ते कहा था, ''फ़्रांस उस देश के साथ खड़ा नहीं रहेगा, जिसकी कोई लोकतांत्रिक वैधता नहीं है.''
पश्चिम के एक सुरक्षा विशेषज्ञ ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि हालात बहुत गंभीर हैं. उन्होंने कहा कि यहाँ भारी संसाधनों के लिए बड़े निवेश की ज़रूरत है ताकि कोई ठोस परिणाम दिखे. स्थानीय सुरक्षा बलों की स्थिति बहुत ख़राब है लेकिन समस्या बहुत गहरी है.''
सहेल में आतंकवादियों के ठिकानों को लेकर अमेरिका ने पहले ही चेताया था लेकिन यहाँ की राजनीति आतंकवाद विरोधी अभियान में लगे लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी करती है.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के आख़िरी फ़ैसलों में से एक पश्चिमी सहारा पर मोरक्को की संप्रभुता स्वीकार करना था. पश्चिमी सहारा स्पेन का उपनिवेश रहा था. मोरक्को ने 1975 में इस पर कब्ज़ा कर लिया था और इसे लेकर ही विवाद था.

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क्या है चुनौती
स्पेन ने ट्रंप के इस फ़ैसले का विरोध किया था और कहा था कि यह इलाक़ा सहारा वालों का है और उन्हें आत्मनिर्णय का अधिकार है. अप्रैल में सहारवी निवासी समूह पोलिसारिओ के नेता को स्पेन ने अपने अस्पताल में इलाज की अनुमति दी थी.
स्पेन के इस फ़ैसले के जवाब में मोरक्को ने 10 हज़ार प्रवासियों को स्पैनिश बॉर्डर सिउटा जाने की अनुमति दी थी. अब स्पेन अफ़्रीकन लायन से बाहर हो गया है. अफ़्रीकन लायन अमेरिका के नेतृत्व वाला बड़ा सैन्य अभियान है. इस महीने यह मिशन पश्चिमी सहारा में है. इस मिशन में नौ देशों के सात हज़ार सैनिक शामिल हैं.
सहयोगियों के बीच अतिक्रमण, भ्रष्टाचार और मतभेद अतिवादी समूहों के लिए उपहार हैं. आतंकवाद विरोधी दस्तों में बिखराव के कारण अतिवादियों को एकजुट होने, हाथियार जुटाने और हमले का मौक़ा मिल जाता है.
सहेल की स्थिति में भारी अनिश्चितता है लेकिन जो देश इन इलाक़ों के सैन्य अभियान में शामिल हैं उनके लिए भी कम अनिश्चितता नहीं है.
जब तक सैन्य सहयोग का दायरा नहीं बढ़ता है और अभियान को आपसी सहयोग से बड़ा नहीं बनाया जाता है तब तक इस बात का ख़तरा है कि मिशन बिना कोई नतीजे पर पहुँचे ही ख़त्म हो जाए.
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