अफ़ग़ानिस्तान: अमेरिका का नाकाम मिशन- ज़िम्मेदार कौन? बुश, ओबामा, ट्रंप या बाइडन?

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दो दशक पहले अमेरिका ने एक बड़े सैन्य अभियान में तालिबान को अफ़गानिस्ता की सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया. लेकिन अब जब यहां से अमेरिकी नेतृत्व वाली विदेशी सेनाएं वापस चली गई हैं, तालिबान एक बार फिर सत्ता में वापसी कर चुका है.
15 अगस्त को काबुल पर तालिबान का कब्ज़ा होने के बाद कई दिनों तक अफ़ग़ानिस्तान में अफरातफरी का माहौल देखा गया.
अब इस देश के भविष्य को लेकर अनिश्चितता जताई जा रही है और कइयों को चिंता है कि कहीं एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान 'आतंक की फै़क्ट्री' न बन जाए.
बीते दो दशकों में चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने अफ़ग़ानिस्तान में अभियान से जुड़े अहम फ़ैसले लिए थे.
'दुनिया जहान' में इस सप्ताह हमारा सवाल है कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियान की नाकामी के लिए कौन सा अमेरिकी राष्ट्रपति सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है?


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जॉर्ज बुश
11 सितम्बर 2001 को चरमपंथियों ने चार विमानों का अपहरण किया. इन विमानों का इस्तेमाल न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर, पेंटागन और पेनसिल्वेनिया में चरमपंथी हमलों के लिए किया गया.
माइकल मैकिनली अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पूर्व सलाहकार थे. वो अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के राजदूत भी रह चुके हैं.
वो बताते हैं, "जिस दिन हमला हुआ उस दिन मैं मंत्रालय में था. अलार्म सुनकर हमने खिड़की से बाहर झांका. बाहर धुंआ उठा रहा था. हम इमारत से बाहर निकल आए. उस वक्त हमें पता नहीं था कि हुआ क्या है."
9/11 को हुआ चरमपंथी हमला अमेरिका पर अब तक का सबसे बड़ा हमला था. इसे अंजाम दिया था अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े चरमपंथी समूह अल क़ायदा ने. हमले में 2,977 लोगों की मौत हुई और 6,000 से ज़्यादा लोग घायल हुए.

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अल-क़ायदा पर निशाना
हमले से कुछ साल पहले अल कायदा के उभरने और अफ़ग़ानिस्तान में पांच साल पहले सत्ता में आए तालिबान से उसके रिश्तों को लेकर अमेरिका ने चिंता जताई थी.
लेकिन अमेरिकी राजनीति के लिए यह हमला महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ.
माइकल मैकिनली कहते हैं, "उम्मीद की जा रही थी कि अमेरिका अपनी सुरक्षा के रास्ते निकालेगा. उसने 9/11 के हमलों का सख़्ती से जवाब दिया.''
''इस घटना ने अमेरिका को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वो अपने सहयोगियों के साथ विदेशी ज़मीन पर कैसे काम करे और ख़तरे की आशंका से कैसे निपटे. अमेरिकी विदेश नीति में बीते 20 सालों में जो बदलाव हुए वो कहीं न कहीं आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक युद्ध छेड़ने के बुश के फ़ैसले से जुड़े हुए हैं."
जॉर्ज बुश को देश का राष्ट्रपति बने कुछ ही महीने हुए थे. ऐसे में हमलों का जवाब देने की उनकी रणनीति क्या थी?
माइकल मैकिनली बताते हैं, "तालिबान सरकार को अल्टिमेटम देने का फ़ैसला किया गया. उसे कहा गया कि वो हमले के लिए ज़िम्मेदार लोगों को अमेरिका को सौंपे और ये तस्दीक करने दे कि देश में चरमपंथियों के अड्डे नहीं है.''
''तालिबान ने इससे इनकार कर दिया. जिसके बाद अमेरिका ने बिना देर किए अफ़गानिस्तान में सैन्य कार्रवाई शुरू की."
इस सैन्य अभियान के लिए अमेरिका में काफ़ी जनसमर्थन था. इस मामले में विपक्षी पार्टियां भी सत्ता पक्ष के साथ थीं. लगभग सभी हलकों में तुरंत और प्रभावी कार्रवाई की उम्मीद की जा रही थी.
दिसंबर 2001 में तालिबान सरकार गिर गई. अल क़ायदा के कई नेता पाकिस्तान भाग गए और संगठन कमज़ोर हो गया. माना गया कि अमेरिका का मिशन कामयाब हुआ.

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इराक़ युद्ध
सेना की मदद से तालिबान को हराना आसान था लेकिन अफ़गानिस्तान को एक सुरक्षित गणतंत्र बनाना मुश्किल.
बुश प्रशासन इस चुनौती से निपटता उससे पहले मार्च 2003 में उसके सामने नई मुसीबत आ खड़ी हुई. बुश ने ईराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध का फ़ैसला किया. प्राथमिकताएं बदल गईं.
बुश प्रशासन इस बात का अंदाज़ा लगाने में नाक़ाम रहा कि किसी देश को फिर से खड़ा करना कितना मुश्किल काम हो सकता है. नतीजा यह हुआ कि अफ़ग़ानिस्तान में विकास की गति लड़खड़ाने लगी और भ्रष्टाचार बढ़ने लगा.
माइकल मैकिनली कहते हैं, "तालिबान के कुछ नेता आत्मसमर्पण करना चाहते थे, कुछ नेता नई सरकार का हिस्सा बनना चाहते थे. लेकिन इस मौक़े का फायदा उठाने की संभावना को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया गया."
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान ने एक बार फिर सिर उठाना शुरू कर दिया. राष्ट्रपति बुश के दूसरे कार्यकाल के दौरान उसने कई हमलों को अंजाम दिया.

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अहमद राशिद की किताब तालिबान: द पावर ऑफ़ मिलिटेन्ट इस्लाम इन अफ़ग़ानिस्तान एंड बियॉन्ड के अनुसार साल 2004 में तालिबान ने छह हमले किए. 2005 में हमलों की संख्या 21 हो गई और 2006 में ये कई गुना बढ़ कर 141 के आंकड़े तक पहुंच गए.
जवाब में अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ाने और अफ़ग़ान सेना को मज़बूत करने का फ़ैसला किया लेकिन मूल समस्या अब भी बनी हुई थी.
अमेरिका ने जंग तो जीत ली थी लेकिन वहाँ से बाहर निकलने की उसके पास कोई स्पष्ट योजना नहीं थी.
मैकिनली कहते हैं, "वहां ज़मीनी स्तर पर काम करना था. मुझे लगता है कि वहां की राजनीतिक और सामाजिक हक़ीक़त अलग थी. बाहर से आने वाले इसे बेहतर नहीं समझ सकते थे. सिर्फ़ ये नहीं देखा जाना चाहिए कि विदेशियों ने क्या किया. ये भी देखा जाना चाहिए कि वहां के नेताओं ने क्या किया."


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बराक ओबामा
प्रोफ़ेसर पॉल डी मिलर राष्ट्रपति बुश के कार्यकाल में अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान मामलों पर राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल स्टाफ़ के निदेशक रह चुके हैं. राष्ट्रपति ओबामा के कार्यकाल के दौरान वह एक साल इस पद पर थे.
इससे पहले वो अमेरिकी सेना और खुफ़िया एजेंसी सीआईए के साथ काम कर चुके हैं.
मिलर कहते हैं कि अपने चुनाव अभियान में ओबामा ने अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया था.
वो कहते हैं, "जुलाई 2008 के अपने भाषण में ओबामा ने विदेश नीति और अफ़ग़ानिस्तान पर ध्यान देने के बार में बात की और कहा कि यह महत्वपूर्ण युद्ध है जिसे हर हाल में जीतना है."
मगर जनवरी 2009 में राष्ट्रपति बनने के बाद ओबामा ने बुश के काम को आगे बढ़ाया. अब तक अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों की संख्या 37 हज़ार पहुंच चुकी थी.

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बदली रणनीति
हालांकि कुछ वक्त बाद ओबामान ने अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध की रणनीति बदल दी.
प्रोफ़ेसर मिलर कहते हैं, "ओबामा ने कहा कि हिंसा की बढ़ती घटनाओं से निपटने के लिए वो और सेना भेजेंगे. उन्होंने इसे आतंकवाद विरोधी अभियान (काउंटर इंसर्जेन्सी स्ट्रैटेजी यानी सीओआईएन) और आम लोगों में अफ़ग़ान सरकार के प्रति भरोसा जगाने का अभियान कहा.''
''मुझे लगता है कि यह सही रणनीति थी. इसके ज़रिए वहां स्थायी सरकार बन सकती थी. लेकिन उनके प्रशासन के सामने कुछ अलग ही चुनौतियां थीं."
इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान चुनावों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की ख़बरें आईं और हिंसा के मामले बढ़े.
वहां मौजूद अमेरिकी सेना के कमांडर जनरल स्टैन्ले मैक्क्रिस्टल ने राष्ट्रपति से और सैनिक भेजने की गुज़ारिश की और कहा कि ऐसा न किया तो "आतंकवाद को ख़त्म करने की कोशिश नाकाम हो सकती है."
साल 2009 में ओबामा ने फरवरी में 17 हज़ार और फिर दिसंबर में और 30 हज़ार सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान भेजने की मंज़ूरी दी.
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ओसामा ख़त्म, उद्देश्य ख़त्म
9/11 के हमले के 11 साल बाद अमेरिकी नेवी सील्स ने एक ख़ुफ़िया मिशन में ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में मार दिया. इसके साथ ही तालिबान और अल-क़ायदा के ख़िलाफ़ अमेरिका का बड़ा अभियान ख़त्म हो गया था.
ओबामा ने अमेरिकी सेना को वापस बुलाने की घोषणा कर दी. इस वक्त बाइडन उप-राष्ट्रपति थे. प्रोफ़ेसर मिलर इसे बड़ी ग़लती करार देते हैं.
वो कहते हैं, "अब तक तालिबान काफ़ी दवाब में आ चुका था. संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों का कहना था कि तालिबान बैकफ़ुट पर है लेकिन तालिबान इंतज़ार कर रहा था.''
''अमेरिका ने सेना वापसी की घोषणा की तो तालिबान को बैठे-बिठाए मौक़ा मिल गया. इस घोषणा के साथ लंबे चले इस युद्ध की भाषा बदल चुकी थी.''
''सेना ने अब तक जो हासिल किया ये उसे कमज़ोर करने जैसा था. मुझे लगता है कि मौजूदा हालात की शुरुआत असल में ओबामा प्रशासन के दौरान हो गई थी."
मगर इस वक्त तक यह हकीकत सामने आ चुकी थी कि अफ़ग़ानिस्तान में पैदा हुई समस्या को सुलझाया नहीं जा सका है.
प्रोफ़ेसर मिलर कहते हैं, "उन्हें इसका आभास नहीं था कि ये लंबा, मुश्किल और महंगा सौदा साबित होने वाला था.''
''शायद उन्हें लगा कि 9/11 के बाद की कार्रवाई काफ़ी होगी पर चीज़ें उम्मीद के मुताबिक़ नहीं हुईं. अब प्रशासन ने युद्ध की बजाय अफ़ग़ानिस्तान में विकास पर अधिक ध्यान देना शुरू किया."


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डोनाल्ड ट्रंप
पोजेशा डीजेनेरा अमेरिकी सरकार और सेना के लिए वरिष्ठ भू-राजनीतिक सलाहकार के तौर पर काम कर चुकी हैं.
वो कहती हैं, "ट्र्ंप को इस बात की चिंता नहीं थी कि वहां क्या हो रहा है. दूसरे मुल्कों के साथ कैसे संबंध रखने हैं ये फ़ैसले वो खुद लेते थे. अफ़ग़ानिस्तान में युद्ध जारी रखने के पक्ष में वो नहीं थे. उनका कहना था कि अब घर लौटने वक्त आ गया है."
अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर बुश प्रशासन को मिला भारी समर्थन अब कम हो चुका था. आम नागरिक अब वहाँ अमेरिका की कोई भूमिका नहीं चाहते थे.
राष्ट्रपति ट्रंप ने वो किया जो उनसे पहले किसी राष्ट्रपति ने नहीं किया था.
पोजेशा कहती हैं, "उन्होंने एकतरफ़ा फ़ैसला लिया और अपने सहयोगियों से राय लिए बिना तालिबान से बातचीत शुरू की. उन्होंने सैनिकों को बाहर निकालने की तारीख भी चुन ली. सहयोगी भी इसके लिए तैयार हो गए.''
''तालिबान के साथ समझौता हुआ और शर्त रखी गई कि वो विदेशी सैनिकों पर हमले नहीं करेगा. लेकिन इस समझौते में कई खामियां थीं. एक तो विदेशी सैनिकों और आम नागरिकों पर हमले नहीं रुके और दूसरा ये कि अफ़ग़ान सरकार बातचीत में शामिल नहीं थी.''

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तालिबान को दी हिम्मत
ट्रंप का कहना था कि उनका मानना है कि लगातार संघर्ष से थक चुका तालिबान समझौते की शर्तों का पालन करेगा.
पोजेशा कहती हैं, "मुझे लगता है कि ट्रंप स्थिति को खु़द समझ नहीं सके. वो ज़मीनी स्तर पर परिस्थिति को समझने वाले जानकारों को चुनने में भी नाकाम रहे.''
''अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या अब राज़ नहीं थी. तालिबान सत्ता संभालने की तैयारी में था और पड़ोस में होने वाले बदलावों के मद्देनज़र पाकिस्तान भी खुद को तैयार कर रहा था. ट्रंप ने तालिबान के नेताओं के साथ समझौता किया लेकिन पाकिस्तान की भूमिका को उन्होंने नज़रअंदाज़ कर दिया."
अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते की घोषणा फरवरी 2020 को हुई. यह समझौता अफ़ग़ान सुरक्षाबलों को ट्रेनिंग दे रही नेटो सेना पर भी लागू था, जिन्हें अमेरिकी सेना के साथ 1 मई 2021 तक अफ़ग़ानिस्तान से निकलना था.
समझौते के अनुसार अमेरिका ने क़रीब 5,000 कैदियों को आज़ाद किया जिनमें से कई तालिबान में शामिल हो गए. तालिबान ने 1,000 कैदियों को छोड़ा.

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जब ट्रंप राष्ट्रपति बने उस वक्त अफ़ग़ानिस्तान में 8,500 अमेरिकी सैनिक थे. बाद में इनकी संख्या बढ़ा कर 13,000 कर दी गई. ट्रंप का कार्यकाल ख़त्म होने तक ये आंकड़ा 2500 हो गया.
पोजेशा डीजेनेरा कहती हैं कि सैनिकों को घर लाने का फ़ैसला ग़लत नहीं था, लेकिन ये बेहतर तरीके से हो सकता था.
वो कहती हैं, "अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाने का उनका फ़ैसला एकदम सही था. परेशानी फ़ैसले को लागू करने और इससे जुड़े मुश्किलों की ज़िम्मेदारी लेने की थी और फिर उन्हें अगले प्रशासन को सही तरीके से ज़िम्मेदारी भी सौंपनी थी."


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जो बाइडन
प्रोफ़ेसर क्रिस्टीन फेयर जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के एडमंड ए वॉल्श स्कूल ऑफ़ फॉरेन स्टडीज़ के सिक्योरिटी स्टडीज़ प्रोग्राम में प्रोफ़ेसर हैं. संयुक्त राष्ट्र के मिशन में पॉलिटिकल ऑफ़िसर के तौर पर वो पहली बार साल 2007 में अफ़ग़ानिस्तान गई थीं.
उनका मानना है कि ओबामा प्रशासन में उप-राष्ट्रपति के तौर पर बाइडन के कार्यकाल का ज़िक्र किए बग़ैर मौजूदा वक्त में उनकी भूमिका पर बात नहीं की जा सकती.
क्रिस्टीन कहती हैं कि तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान पर बाइडन की सोच ओबामा के रवैये से अलग नहीं है. वो मानते हैं कि तालिबान पर ध्यान देना बेमानी है.
वो कहती हैं, "बाइडन का मानना है कि तालिबान, अमेरिका के लिए अल-क़ायदा जितना बड़ा ख़तरा नहीं है. वो तालिबान को दुश्मन नहीं बनाना चाहते. वो केवल अल-क़ायदा के सदस्यों को ख़त्म करने का मिशन चाहते हैं."
"लेकिन अभी स्थिति ऐसी है कि ज़मीन पर अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के बिना ये मिशन पूरा नहीं हो सकता. साथ ही वहां से ख़ुफ़िया जानकारी मिलना भी मुश्किल होगा. जो ये कहते हैं कि बाइडन केवल ट्रंप के किए समझौते का पालन कर रहे हैं, वो ग़लत हैं. सालों पहले उप-राष्ट्रपति के तौर पर वो यही करना चाहते थे."

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'ट्रंप के फ़ैसले बदल सकते थे बाइडन'
क्रिस्टीन मानती हैं कि ट्रंप के समझौते में कई ख़ामियां थीं लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि अफ़ग़ानिस्तान में हाल के दिनों में जो हुआ उसके लिए बाइडन ज़िम्मेदार नहीं हैं.
बाइडन ट्रंप के लिए फ़ैसले बदल सकते थे, लेकिन वो ऐसा करना नहीं चाहते थे.
वो कहती हैं, "तालिबान बार-बार अपने वादे तोड़ता रहा है. इसे आधार बना कर बाइडन समझौते से बाहर जा सकते थे. ट्रंप के बड़ी संख्या में सैनिकों को वापस लाने की बाइडन ने कभी आलोचना नहीं की. एक तरह से ट्रंप ने जो किया उससे उन्हें मदद मिली."
बाइडन ने अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों को पूरी तरह निकालने की तारीख़ एक मई से आगे बढ़ा कर 11 सितंबर कर दी. बाद में उन्होंने इसे 31 अगस्त कर दिया.
इससे कुछ दिन पहले बाइडन ने कहा कि तालिबान जल्द अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा नहीं कर पाएगा. लेकिन चंद दिनों में तालिबान ने लगभग पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया.

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चुनावों के कारण दबाव
क्रिस्टीन कहती हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में और वक्त रहना बाइडन प्रशासन के उद्देश्य के ख़िलाफ़ था और वो किसी अंतहीन युद्ध में नहीं उलझना चाहते थे.
वो कहती हैं, "डेमोक्रेटिक पार्टी में चर्चा है कि मध्यावधि चुनावों से पहले बाइडन को विकास के काम करने हैं और बेरोज़गारी दर कम करनी है.''
''सीनेट और हाउस ऑफ़ रीप्रेज़ेन्टेटिव्स में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स के बीच आंकड़ों का फ़र्क कम है. ऐसे में बाइडन को चुनाव पर ध्यान देना है. कुछ जानकार मानते हैं कि ये अफ़ग़ानिस्तान में दिख रही अफरातफरी के पीछे एक बड़ी वजह ये है."

अब लौटते हैं अपने सवाल पर. अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी अभियान की नाकामी के लिए कौन ज़िम्मेदार हैं?
बुश प्रशासन के लिए अफ़ग़ानिस्तान के पुननिर्माण की बजाय इराक़ युद्ध प्राथमिकता बन गया, ओबामा के सेना वापस बुलाने के फ़ैसले ने तालिबान को हिम्मत दी, ट्रंप के दौरान हुए समझौते में तालिबान को उम्मीद से अधिक मिला और फिर हाल के दिनों में जो हुआ, बाइडन उसे भांपने में नाकाम रहे.
चारों राष्ट्रपतियों ने अफ़ग़ानिस्तान में राजनीतिक नेतृत्व पर अधिक भरोसा किया और तालिबान को कम कर आँका.
ऐसे में हम कह सकते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में हाल के दिनों में पैदा हुए हालात के लिए कुछ हद तक चारों ही ज़िम्मेदार हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अभियान में कब-कब क्या-क्या हुआ?
11 सितंबर 2001 - अमेरिका के अलग-अलग शहरों में चार विमान इमारतों से आकर टकराए. इनमें न्यूयॉक का ट्विन टावर और वॉशिंगटन में मौजूद पेंटागन शामिल थे.
अक्तूबर 2001 - पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्ऱीडम शुरू किया. अमेरिकी और ब्रितानी सेनाओं के अल-क़ायदा के ठिकानों पर हमलों की घोषणा की.
नवंबर 2001 - अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों का पहुंचना शुरू हुआ. यहां सबसे पहले 1,300 अमेरिकी सैनिक पहुंचे.
दिसंबर 2001 - अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन के ठिकाने की तलाश में अमेरिकी सैनिक तोरा-बोरा की पहाड़ियों को घेर लिया. कुछ ख़बरों के अनुसार लादेन 16 दिसंबर को भागकर पाकिस्तान के कबायली इलाक़े में छिप गए. हालांकि कुछ ख़बरों के अनुसार लादेन दिसंबर 11 को भागे. अब तक अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 2,500 हो चुकी थी.
दिसंबर 2001 - तालिबान की सत्ता गिर गई और अफ़ग़ानिस्तान में हामिद करज़ई के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई.
मार्च 2002 - चरमपंथ की घटनाओं को पूरी तरह रोकने के उद्देश्य से अमेरिकी सेना ने अफ़ग़ान सुरक्षाबलों के साथ हाथ मिला तक ज़मीनी कार्रवाई शुरू की.
दिसंबर 2002 - अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या बढ़ कर 9,700 हुई.

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मई 2003 - अमेरिकी विदेश मंत्री डोनल्ड रम्सफेल्ड ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में बड़ा अभियान ख़त्म हो चुका है और यह देश अब स्थायित्व की तरफ बढ़ेगा. दूसरी तरफ अमेरिका ने इराक़ के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा की.
जनवरी 2004 - अफ़ग़ानिस्तान को अपना नया संविधान मिला.
अप्रैल 2004 - अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में चल रही विकास परियोजनाओं की सुरक्षा देने और अफ़ग़ान पाकिस्तान सीमा पर चौकी बढ़ाने के लिए और सैन्य टुकड़ियां भेजी. साल के आख़िर तक यहां अमेरिकी सैनिकों की संख्या 20,300 हो गई.
अक्तूबर 2004 - चुनावों में हामिद करज़ई गणतांत्रिक रूप से चुने गए देश के पहले राष्ट्रपति बने. इसी दौरान ओसामा बिन लादेन का एक वीडियो संदेश सामने आया.
दिसंबर 2006 - इराक़ के साथ युद्ध अमेरिका की प्राथमिकता बन गया. ऐसे में अफ़ग़ानिस्तान में सैनिकों की संख्या कम कर 20,000 तक कर दी गई.
दिसंबर 2007 -इराक़ अमेरिका की प्रथमिकता था लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ते हमलों के चलते यहां सैनिकों की संख्या एक बार फिर बढ़ा कर 25,000 कर दी गई.
जनवरी 2009 - बराक ओबामा ने राष्ट्रपति पद संभाला. इस वक्त तक अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी सैनिकों की संख्या 37,000 पहुंच चुकी थी. ओबामा ने इसी साल फरवरी में 17,000, फिर दिसंबर में और 30,000 सैनिक अफ़ग़ानिस्तान भेजने को मंज़ूरी दी.
दिसंबर 2009 - ओसामा बिन लादेन की तलाश में तेज़ी लाई गई. अफ़ग़ानिस्तान में अब तक अमेरिकी सैनिकों की संख्या 67,000 तक पहुंच चुकी थी.
अगस्त 2010 - अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या एक लाख का आंकड़ा पार कर गई.
- ये भी पढ़ें- ओसामा बिन लादेन के वो आख़िरी घंटे

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मई 2011 - अमेरिका को ख़ुफ़िया सूत्रों से जानकारी मिली कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में है. इसके बाद एक ख़ुफ़िया अभियान के तहत एक मई को लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिकी नेवी सील्स ने मारा.
जून 2011 - ओबामा ने कहा, 'अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का मिशन पूरा हुआ'. उन्होंने कहा कि 2011 के आख़िर तक अमेरिकी सेना यहां से वापिस चली जाएगी.
सितंबर 2012 से दिसंबर 2014 - अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों का वापस जाना शुरू हुआ. जहां सितंबर 2012 में वहां 77,000 सैनिक थे वहीं दिसंबर 2013 में 46,000, मार्च 2014 में 34,000 और दिसंबर 2014 में 16,100 ही अफ़ग़ानिस्तान में थे.
दिसंबर 2014 - ओबामा ने कहा सेना अफ़ग़ान सैनिकों को ट्रेनिंग दे कर उन्हें सशक्त बनाएगी.
अक्तूबर 2015 - बराक ओबामा ने कहा अफ़ग़ानिस्तान से पूरी तरह निकलने के लिए स्थिति पूरी तरह सही नहीं है. उन्होंने कहा कि 2016 तक चरमपंथरोधी अभियानों के लिए वहां 9,800 सैनिक रहेंगे जिसके बाद दिसंबर 2016 तक सैनिकों की संख्या कम कर 5,500 की जाएगी.
जुलाई 2016 - ओबामा ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है. उन्होंने कहा कि सैनिकों की संख्या 5,500 तक करने की बजाय वहां पर 8,400 अमेरिकी सैनिक मौजूद रहेंगे.
अगस्त 2017 - ट्रंप ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति देखते हुए वहां और सैनिक भेजे जाएंगे. उन्होंने सैनिकों की संख्या 14,000 तक करने का फ़ैसला किया.
- ये भी पढ़ें- तालिबान ने काबुल की दीवारों पर लिखवाया क़तर समझौता
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सितंबर 2019 - अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत शुरू हुई जिसके बाद तालिबान ने कहा दोनों पक्षों के बीच सहमति बन गई है.
फरवरी 2020 - अमेरिका और तालिबान के बीच अहम समझौता हुआ जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी कम करने पर सहमति बनी.
नवंबर 2020 - अमेरिका ने कहा कि अगले साल जनवरी के मध्य तक अफ़ग़ानिस्तान में सैनिकों की संख्या 2,500 तक की जाएगी और फिर एक मई 2021 तक अमेरिकी सेना पूरी तरह अफ़ग़ानिस्तान से बाहर चली जाएगी.
14 अप्रैल 2021 -राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि अमेरिका और तालिबान के बीच हुए समझौते के अनुसार अमेरिकी सेना एक मई 2021 तक नहीं बल्कि 11 सितंबर 2021 तक अफ़ग़ानिस्तान से बाहर जाएगी.
8 जुलाई 2021 - राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि 31 अगस्त 2021 तक अमेरिकी सेना को पूरी तरह अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकाल लिया जाएगा.
15 अगस्त 2021 - अफ़ग़ानिस्तान के कई प्रांतों पर कब्ज़ा करने के बाद तालिबान ने राजधानी काबुल पर कब्ज़ा कर लिया. देश के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी देश छोड़ कर संयुक्त अरब अमीरात चले गए.
31 अगस्त 2021 - अमेरिकी सेना पूरी तरह अफ़ग़ानिस्तान से वापस निकली. अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड के जनरल कैनेथ मैकिन्ज़ी ने पेंटागन में इसकी घोषणा की.
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(प्रोड्यूसर: मानसी दाश)
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