भारत-पाकिस्तान: क्या रिश्तों में सुधार की संभावना ख़त्म हो गई है?

इमेज स्रोत, REUTERS/GETTY IMAGES
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों में सुधार होने की संभावनाओं पर अब एक बार फिर सवालिया निशान लगता दिख रहा है.
बीते रविवार को पाकिस्तान ने 23 जून को हुए लाहौर बम धमाके के लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहरा दिया.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 1
पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोइद यूसुफ़ ने कहा कि वह धमाका जिसमें 3 लोगों की मौत हुई है और 24 लोग घायल हुए हैं, उसका “मास्टर माइंड एक भारतीय नागरिक है जो रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (भारतीय ख़ुफिया एजेंसी रॉ) से जुड़ा है.”
यही नहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने सीधे-सीधे इसे 'भारत प्रायोजित आतंकवादी हमला' क़रार दिया है.
उन्होंने ट्वीट किया, "मैंने अपनी टीम को निर्देश दिया कि वो आज जौहर टाउन लाहौर धमाके की जाँच की जानकारी राष्ट्र को दें. मैं पंजाब पुलिस के आतंकवादी निरोधक विभाग की तेज़ रफ़्तार से की गई जाँच की तारीफ़ करूंगा कि उन्होंने हमारी नागरिक और ख़ुफ़िया एजेंसियों की शानदार मदद से सबूत निकाले."
"इस समन्वय ने आतंकवादियों और उनकी अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की पहचान की है. दोबारा, इस जघन्य आतंकवादी घटना की योजना और वित्तीय मदद के संबंध पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत प्रायोजित आतंकवाद से मिले हैं. विश्व समुदाय को इस दुष्ट व्यवहार के ख़िलाफ़ एकजुट करना चाहिए."
भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से अब तक इस मामले पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी गयी है. इस घटनाक्रम ने दोनों देशों के बीच संबंधों में बेहतरी लाने की कोशिशों पर बड़े सवाल खड़े किए हैं.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 2
पहला सवाल ये है कि पाकिस्तान ने एक बार फिर पुराने अंदाज़ में भारत पर खुल्लम-खुल्ला आरोप क्यों लगाए?
दूसरा सवाल ये है कि क्या इस घटना के बाद सीमावर्ती इलाक़ों में घुसपैठ और गोलीबारी एक बार फिर शुरू हो सकती है?
लेकिन सवालों की इस फेहरस्ति में सबसे मुख्य सवाल ये है कि क्या प्रधानमंत्री की ओर से से भारत पर आरोप लगाए जाने के बाद द्विपक्षीय संबंधों में मधुरता आने की रही-सही भी संभावनाएँ ख़त्म हो गई हैं.
बीबीसी ने इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए पूर्व राजदूत राकेश सूद और पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद से बात की है.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 3
सुधार की संभावनाओं पर आघात
भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों में पिछले कुछ समय से सुधार होने के संकेत मिल रहे थे. कुछ महीने पहले ही पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल क़मर जावेद बाजवा ने कहा था कि अब वो वक़्त आ गया है जब हम अतीत को भुलाकर आगे बढ़ें.
उन्होंने कहा था, "ये समझना महत्वपूर्ण है कि शांतिपूर्ण तरीक़ों से कश्मीर विवाद के समाधान के बिना मैत्रीपूर्ण संबंध हमेशा ख़तरे में रहेंगे. जो राजनीति से प्रेरित आक्रामकता की वजह से पटरी से उतर सकते हैं. बहरहाल हमारा मानना है कि यह समय अतीत को भुलाकर आगे बढ़ने का है."
इसके साथ ही उन्होंने कश्मीर को लेकर पाकिस्तान का पुराना स्टैंड दोहराने की जगह एक नई बात कही.
उन्होंने कहा, "शांति प्रक्रिया की बहाली या शांतिपूर्ण संवाद के लिए हमारे पड़ोसी को उसके लिए माहौल बनाना होगा, ख़ासतौर पर कश्मीर में वैसा माहौल होना चाहिए."
बाजवा के इस बयान को बेहद सकारात्मक ढंग से देखा गया. क्योंकि उनके इस बयान में दो बातें अहम थीं. पहली बात अतीत को भुलाकर आगे बढ़ने और दूसरी बात कश्मीर पर थी.
उनके इस बयान को देखकर कयास लगाए गए कि ज़रूर भारत और पाकिस्तान के बीच पर्दे के पीछे कुछ बातचीत चल रही है. इसके बाद से लगातार बैक-चैनल डिप्लोमेसी की ख़बरों के बीच कश्मीर में चुनाव नज़दीक आने के संकेत मिल रहे हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
क्या बैक चैनल डिप्लोमेसी नाकाम हुई?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जम्मू-कश्मीर के 14 नेताओं के साथ बैठक को भी इसी दिशा में देखा गया.
लेकिन पिछले 15 दिनों में जो कुछ हुआ है, उससे ये गाड़ी पटरी से उतरती दिख रही है.
इसमें लाहौर में जमात-उद-दावा प्रमुख हाफ़िज़ सईद के घर के पास बम धमाका, पाकिस्तान स्थित भारतीय दूतावास में ड्रोन नज़र आना और जम्मू एयरफोर्स स्टेशन में ड्रोन हमला शामिल हैं.
इन तीन घटनाओं ने शांति की संभावनाओं पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाया है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन घटनाओं से बैक चैनल डिप्लोमेसी पर फर्क पड़ेगा?
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकार और कई देशों में भारत के राजदूत रहे राकेश सूद आने वाले वक़्त को बैक चैनल डिप्लोमेसी के लिए लिटमस टेस्ट मानते हैं.
वे कहते हैं, "अगर इस बयानबाज़ी के बाद भी सीमा पर शांति बनी रहती है तो मैं ये कहूंगा कि भारत और पाकिस्तान ने इन मुद्दों का बैक चैनल डिप्लोमेसी पर असर नहीं पड़ने दिया है. इसका मतलब ये है कि कश्मीर को लेकर सरकार राजनीतिक रूप से जो कुछ भी कर रही है, जैसे प्रधानमंत्री मोदी की नेताओं से मुलाक़ात आदि, वो सब कुछ पहले की तरह पुरानी गति से चलता रहेगा. इस स्थिति में पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान में उपजती स्थिति पर अपना ध्यान केंद्रित कर पाएगा."
"लेकिन अगर एलओसी पर फ़ायरिंग शुरू होती है या सीमा-पार घुसपैठ होती है, पहले की तरह पठानकोट, उरी या पुलवामा जैसी वारदातें होती हैं तो इसका मतलब ये होगा कि बैक चैनल ने काम करना बंद कर दिया है. और स्थिति ख़राब हो रही है."
"ऐसे में हमें सबसे पहले ये देखना है कि क्रॉस-बॉर्डर घुसपैठ और एलओसी पर क्या स्थिति रहती है."

इमेज स्रोत, Reuters
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की बढ़ती धमक
बीते कुछ दिनों में पाकिस्तान सरकार के सामने तालिबान के रूप में एक नई समस्या खड़ी हुई है. अमेरिकी सैन्य अधिकारी अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध होने की संभावनाएँ जता चुके हैं.
तालिबान के प्रसार के साथ ही अफ़ग़ानिस्तान में एक बार फिर चरमपंथी संगठनों के फलने-फूलने के लिए अनुकूल वातावरण पैदा होने की आशंकाएँ जताई गई हैं.
और पाकिस्तान पहले से ही ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह क्षेत्र में तनाव का सामना कर रहा है.
ऐसे में माना जा रहा है कि शायद पाकिस्तान सरकार और सेना का एक धड़ा भारत के साथ संबंध सुधारने के लिए जारी बैक-चैनल डिप्लोमेसी को कुछ समय के लिए विराम देकर अफ़ग़ानिस्तान पर ध्यान देना चाहता है.
हालांकि, राकेश सूद इस तर्क से सहमत नज़र नहीं आते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति संवेदनशील होने की वजह से भारत के साथ बैक-चैनल डिप्लोमेसी को विराम दिया गया है.
वे कहते हैं, “किसी भी मुल्क के पास सीमित संसाधन होते हैं. ऐसे में जब अफ़ग़ान सीमा पर स्थितियाँ संवेदनशील हो रही हैं, तो तार्किकता ये कहती है कि वे अपना ध्यान संवेदनशील सीमा पर लगाएँगे. और भारत के साथ जारी शांतिपूर्ण माहौल को ख़राब नहीं करना चाहेंगे क्योंकि ये उनके लिए काउंटर-प्रोडक्टिव होगा. यानी दोनों मोर्चों पर संसाधन झोंकने से उन्हें कोई फ़ायदा होता नहीं दिखता.”
लेकिन ये गुत्थी तब तक सुलझती नहीं दिखती है जब तक इसे पाकिस्तान के हितों के संदर्भ में न देखा जाए.
क्योंकि ये सवाल लाज़मी है कि इस्लामाबाद के बेहद सुरक्षित इलाक़े में स्थित भारतीय दूतावास क्षेत्र में कथित रूप से ड्रोन पहुँचने से लेकर लाहौर धमाके में भारत पर आरोप लगाया जाना क्या संकेत देता है.
पाकिस्तान सरकार ने जिस अंदाज़ में भारत पर आरोप लगाया है, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. पहले पंजाब पुलिस के प्रमुख इनाम ग़नी, पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मोइद यूसुफ़ और सूचना मंत्री फ़वाद चौधरी ने बाक़ायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सबूत होने की बात को जोर-शोर से रखा.
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 4
इसके बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने ट्विटर के माध्यम से भारत को निशाने पर लिया.
पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद कहते हैं, “मुझे लगता है पाकिस्तान, भारत पर दबाव इसलिए बना रहा है ताकि वह समय हाथ से निकलने से पहले बातचीत के लिए राज़ी हो जाए."
"वह पहले की तरह शांत रह सकते थे लेकिन इस बार उन्होंने इसी वजह से इतना हो-हल्ला मचाया है. क्योंकि शायद भारत उस तरह बातचीत करने का रुख नहीं दिखा रहा है, जैसा कि वे चाहते हैं. वे एक नियमित ढंग से लगातार बातचीत चाहते हैं, न कि रह रहकर बातचीत होना, जैसा कि अभी हो रहा है.”
वहीं, अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर हारून रशीद कहते हैं, “इस बात की संभावना भी है कि वे भारत को पाकिस्तान में इस तरह के हमले करने से रोकना चाहते हों, उन्होंने ये दिखाया है कि अगर आप (भारत) टीटीपी या किसी अन्य चरमपंथी गुट के माध्यम से हमला करने की कोशिश करें तो वे (पाकिस्तान) खुल्लम-खुल्ला सर्वोच्च स्तर से आप पर आरोप लगाएँ.”
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त, 5
क्या अभी भी कुछ संभावनाएँ हैं?
लेकिन इस सबके बीच एक सवाल का जवाब मिलना अभी भी बाक़ी है कि क्या आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला एक बार फिर शुरू होने के बाद सुधार की संभावनाएँ हैं?
इस सवाल के जवाब में राकेश सूद कहते हैं, “अगर हमें ये दिखे कि इस बयानबाज़ी के बाद भी सीमा पर शांति रहती है तो ये मानना चाहिए कि हमने कुछ तरक्की की है.”
वहीं, हारून रशीद मानते हैं, “अगर ऐसे प्रयास हो रहे हैं तो ऐसा लगता है कि वह बैक-चैनल डिप्लोमेसी के प्रति समर्पण और तेज़ी से संतुष्ट नहीं हैं. क्योंकि मोइद ने ऐसी किसी मुलाक़ात से इनकार किया है."
"द्विपक्षीय रिश्तों को लेकर मुझे बहुत उम्मीद नहीं है. हमारे क्षेत्र में जब स्थितियाँ संवेदनशील होती हैं तो आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला और तेज़ हो जाता है. दो वयस्क लोगों की तरह आपस में बैठकर बातचीत करने की जगह वे किशोरों की तरह एक दूसरे पर आरोप लगाने लगते हैं.”
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















