तालिबान से संघर्ष के बाद अफ़ग़ानिस्तान के सैनिक जान बचाकर ताजिकिस्तान भागे

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अधिकारियों का कहना है कि तालिबान चरमपंथियों के साथ संघर्ष के बाद अफ़ग़ानिस्तान के एक हज़ार से अधिक अफ़ग़ान सैनिक पड़ोसी देश ताजिकिस्तान भाग गए हैं.
ताजिकिस्तान की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि अफ़ग़ान सैनिक "अपनी जान बचाने के लिए" सरहद पार भाग गए.
अफ़ग़ानिस्तान में हाल के दिनों में हिंसा अचानक से बढ़ गई है और तालिबान का ज़्यादा से ज़्यादा इलाक़ों पर नियंत्रण बढ़ाता जा रहा है.
तालिबान ने सीमावर्ती प्रांत बदाख्शान में कई क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया है.
दूसरी तरफ़ ताजिकिस्तान का प्रशासन अफ़ग़ान शरणार्थियों के आने की संभावना को ध्यान में रखते हुए तैयारी कर रहा है.
जिस रफ़्तार से तालिबान अपने कब्ज़े वाले इलाके का दायरा बढ़ा रहा है, उससे इस डर को हवा मिली है कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की पूर्ण वापसी के बाद अफ़ग़ान सुरक्षा बल उनके सामने टिक नहीं पाएंगे.
अफ़ग़ानिस्तान में पिछले 20 सालों से नेटो की अगुआई में सैन्य अभियान चल रहा है.

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सितंबर तक अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी होनी है जिनमें से ज़्यादातर पहले ही लौट चुके हैं.
नेटो और अमेरिका ने तालिबान के साथ एक समझौता किया था जिसके तहत ये तय हुआ था कि विदेशी सैनिक वहाँ से निकल जाएँगे और बदले में तालिबान वहाँ अल-क़ायदा या किसी अन्य चरमपंथी गुट को अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में गतिविधियाँ नहीं चलाने देगा.
पाकिस्तान में अफगानिस्तान के राजदूत रह चुके डॉक्टर उमर ज़खिलवाल ने बीबीसी के न्यूज़डे कार्यक्रम में दावा किया कि तालिबान एक के बाद एक ज़िलों पर नियंत्रण कर रहा है और ऐसा लग रहा है कि कोई योजना नहीं बनाई गई थी.
उन्होंने कहा कि तालिबान के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता, फिलहाल वे उन जिलों पर कब्जा कर रहे हैं, जहां वे पहले से ही बिना किसी प्रतिरोध के मजबूत हैं, इन सब के बीच सुरक्षा बल मायूस हैं.
उन्होंने कहा, "यह सिर्फ कुछ जिलों की बात नहीं है. तालिबान का डर शहरों तक पहुंच गया है. सुरक्षा बलों का मनोबल गिर गया है और वे बिना किसी प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर रहे हैं."
उन्होंने कहा कि अफ़ग़ान लोगों को उम्मीद थी कि अमेरिका पूरी तरह से वापसी से पहले उनके मुल्क में शांति सुनिश्चित करेगा, लेकिन यह संभव नहीं हो पाया.
तालिबान की विदेशी सैनिकों को चेतावनी

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तालिबान ने बीबीसी को बताया है कि नेटो की सितंबर में वापसी की मियाद ख़त्म होने के बाद, अफ़ग़ानिस्तान में एक भी विदेशी सैनिक की मौजूदगी को 'क़ब्ज़ा' माना जाएगा.
ये बयान राजनयिक मिशनों और काबुल के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की सुरक्षा के लिए, क़रीब 1,000 अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान में ही बने रहने की ख़बरों के बाद आया है.
अफ़ग़ानिस्तान में नेटो का 20 साल का सैन्य मिशन अब ख़त्म हो गया है. लेकिन देश में तालिबान के बढ़ते क़दमों के बीच हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है.
तालिबान के साथ एक समझौते के तहत, अमेरिका और उसके सहयोगी, अफ़ग़ानिस्तान छोड़ रहे हैं.
क्या समझौता हुआ है?
समझौता ये हुआ है कि विदेशी फ़ौजों के जाने के बाद तालिबान, अल-क़ायदा या किसी अन्य चरमपंथी समूह को अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में ऑपरेट करने की अनुमति नहीं देगा.
राष्ट्रपति जो बाइडन ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी के लिए 11 सितंबर की तारीख़ चुनी है.

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ये अमेरिका पर 9/11 के हमलों की 20वीं सालगिरह होगी. लेकिन ऐसी ख़बरें हैं कि ये 'वापसी' कुछ दिनों के अंदर पूरी हो सकती है.
जैसे-जैसे देश की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान सेनाओं को सौंपने की तैयारी हो रही है, वैसे-वैसे अफ़ग़ानिस्तान के भविष्य को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं.
'हर विदेशी सैनिक छोड़ें अफ़ग़ानिस्तान'
तालिबान के प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने कहा कि काबुल पर सैन्य रूप से क़ब्ज़ा करना 'तालिबान की नीति नहीं' है.
लेकिन क़तर में तालिबान के कार्यालय से बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि 'वापसी पूरी होने के बाद कोई भी विदेशी सेना, विदेशी फ़ौज के ठेकेदारों सहित शहर में नहीं रहनी चाहिए.'
शाहीन ने बीबीसी को बताया, "अगर वे दोहा समझौते के ख़िलाफ़ अपनी सेना को पीछे छोड़ देते हैं तो उस स्थिति में यह हमारे नेतृत्व का निर्णय होगा कि हम कैसे आगे बढ़ते हैं."

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उन्होंने कहा, "हम ऐसी स्थिति में जवाब देंगे और इस पर अंतिम फ़ैसला हमारे नेताओं का होगा."
साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि तालिबान राजनयिक, एनजीओ और दूसरे विदेश नागरिकों को निशाना नहीं बनाएगा और उनकी सुरक्षा में लगे सैनिकों की ज़रूरत नहीं होगी.
उन्होंने कहा, "हम विदेशी सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ हैं न कि राजनयिकों, एनजीओ और उनके कर्मचारियों के. एनजीओ, दूतावास चलते रहें- यह वो हैं, जिन्हें हमारे लोग चाहते हैं. हम उनके लिए कोई ख़तरा नहीं बनेंगे."
ऐतिहासिक लम्हा बताया
शाहीन ने अफ़ग़ानिस्तान के बगराम एयरफ़ील्ड को अमेरिकी फ़ौज द्वारा ख़ाली करने को 'ऐतिहासिक लम्हा' बताया है. यह अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य अड्डा था.
लेकिन एक महिला सांसद फ़रज़ाना कोचाई कहती हैं कि अमेरिकी सेना ने इसे बेहद ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तरीक़े से ख़ाली किया है.
अफ़ग़ान सरकार के प्रवक्ता रज़वान मुराद ने बीबीसी से कहा कि सरकार तालिबान से बातचीत और संघर्ष विराम करने के लिए तैयार है लेकिन उन्हें दिखाना चाहिए कि वो भी शांति के लिए प्रतिबद्ध हैं.
हालाँकि, शाहीन ने इस बात को ख़ारिज किया है कि लड़ाके समूह हिंसा में हुई हालिया बढ़ोतरी के लिए ज़िम्मेदार हैं.

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उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा कि अधिकतर ज़िले तालिबान के नियंत्रण में मध्यस्थता के ज़रिए आए हैं, जब अफ़ग़ान जवानों ने वहाँ लड़ने से मना कर दिया था.
रविवार को तालिबान ने दक्षिणी कंधार प्रांत के एक और इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया. चरमपंथियों का कहना है कि देश के 400 ज़िलों में से अब उनके नियंत्रण में एक चौथाई हैं.
तालिबान प्रवक्ता ने वर्तमान सरकार को 'मरणासन्न' बताते हुए देश को 'इस्लामी अमीरात' कहा है. इसको इस चरमपंथी संगठन का एक संकेत माना जा रहा है कि वो देश पर शासन करने के लिए धार्मिक आधार की परिकल्पना पर चलेगा और शायद ही अफ़ग़ान सरकार की चुनावों की मांग पर सहमत हो.
तालिबान के क़ब्ज़े का डर

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शाहीन ने कहा है कि तालिबान और अफ़ग़ान सरकार के बीच बातचीत में अब तक चुनावों पर कोई चर्चा नहीं हुई है.
अक्तूबर 2001 में अमेरिकी नेतृत्व वाली फ़ौजों ने तालिबान को अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता से बेदख़ल कर दिया था क्योंकि संगठन ने अमेरिका में 9/11 हमलों के दोषी ओसामा बिन लादेन और अल-क़ायदा के दूसरे नेताओं को शरण दे रखी थी.
राष्ट्रपति बाइडन कह चुके हैं कि अमेरिका अपनी फ़ौजों को अफ़ग़ानिस्तान से इसलिए निकाल रहा है क्योंकि अब वो जगह पश्चिम के ख़िलाफ़ दोबारा योजना बनाने का विदेशी जिहादियों का अड्डा नहीं बन सकती है.
हालांकि, अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी ज़ोर देकर कह चुके हैं कि देश के सुरक्षाबल विद्रोहियों को एक कोने में समेटे रखने में सक्षम हैं लेकिन कइयों का मानना है कि अमेरिकी फ़ौजों के जाने से देश वापस तालिबान के नियंत्रण में चला जाएगा.
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