अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के कदमों की धमक, 1700 भारतीयों का क्या होगा?

अफ़ग़ानिस्तान

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"मैं हर रोज़ जब सोने जाता हूँ तो अपना बैग खिड़की के पास रखता हूँ. इस बैग में एक जोड़ी जूते, कपड़े, पासपोर्ट, ज़रूरी कागज़ात और नकदी रहती है. ये किसी जासूसी फिल्म के सीन जैसा लग सकता है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में हम ऐसे ही रहते हैं. यहां कभी भी कुछ भी हो सकता है और आपको अपना बैग लेकर यहां से भागना पड़ सकता है."

ये शब्द उस भारतीय शख़्स के हैं जो एक लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान में रहकर काम कर रहे हैं.

पिछले कुछ हफ़्तों से अफ़ग़ानिस्तान में ज़मीनी हालात तेजी से बदले हैं. तालिबान लड़ाकों ने एक के बाद एक लगातार दो दर्जन से ज़्यादा ज़िलों पर कब्जा कर लिया है. अफ़ग़ान सेना कई ज़िलों को वापस अपने कब्जे में लेने का दावा कर रही है.

लेकिन इस सबके बीच ज़मीन पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं. पिछले कुछ घंटों में जर्मनी और पोलैंड समेत कई मुल्कों की सेनाएं शांति के साथ अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जा चुकी हैं.

पहले ऐसा माना जा रहा था कि अमेरिकी सेना 11 सितंबर तक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ सकती है लेकिन ताजा रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी सेना भी अगले 'कुछ दिनों' में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ सकती है.

अफ़ग़ानिस्तान की एक तस्वीर

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'गृह युद्ध छिड़ने की आशंका'

इस सबके बीच सूनसान पड़े अमेरिकी-नाटो सेनाओं के काबुल स्थित मुख्यालय से अमेरिकी जनरल ऑस्टिन एस. मिलर ने अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध छिड़ने की आशंका जताई है.

उन्होंने कहा है, "अभी जिस तरह के हालात चल रहे हैं, अगर वे इसी तरह जारी रहे तो गृह युद्ध होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता." उन्होंने ये भी कहा है कि दुनिया के लिए ये चिंता का विषय होना चाहिए.

अफ़ग़ानिस्तान हाई काउंसिल फॉर नेशनल रिकंसलिएशन के अध्यक्ष डॉ. अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने कहा है कि वे शांति चाहते हैं लेकिन युद्ध धीरे- धीरे दरवाज़े पर पहुंच रहा है और अफ़ग़ान नेताओं को लोगों की रक्षा करने के लिए एकजुट होना चाहिए.

हालात कुछ ऐसे हैं कि आम लोग हथियार अपने घरों में हथियार जमा कर रहे हैं ताकि कोई हमला होने पर अपने परिवार की रक्षा की जा सके.

और इस सबके बीच अफ़ग़ानिस्तान में अरसे से काम कर रहे विदेशी नागरिकों का अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जाना जारी है. काबुल स्थित भारतीय दूतावास ने अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे भारतीयों को सुरक्षा से जुड़े ख़ास दिशानिर्देश जारी किए हैं.

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किन हालात में रह रहे हैं भारतीय नागरिक?

पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण से जुड़ी परियोजनाओं में लगभग तीन अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है. संसद से लेकर सड़क और बाँध बनाने तक कई परियोजनाओं में सैकड़ों भारतीय पेशेवर काम कर रहे हैं.

भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक़, अफ़ग़ानिस्तान में लगभग 1700 भारतीय रहते हैं.

भारतीय दूतावास ने अपनी 13 सूत्री सलाह में कहा है कि -

· अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद सभी भारतीय ग़ैर-ज़रूरी आवाजाही से बचें

· मुख्य शहरों से बाहर जाने से बचें, अगर जाना ज़रूरी हो तो हवाई यात्रा करें क्योंकि हाइवे सुरक्षित नहीं हैं.

· भारतीय नागरिकों पर विशेष रूप से अगवा कर लिए जाने का ख़तरा मंडरा रहा है

अफ़ग़ानिस्तान में एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के साथ काम कर रहे एक भारतीय नागरिक ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बताया है कि पिछले कुछ दिनों में सैन्य गतिविधियां कम हुई हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के दूरस्थ इलाके की तस्वीर

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सुमित (बदला हुआ नाम) कहते हैं, "इस समय काबुल में हालात बहुत ख़राब हैं. हम एक-एक दिन करके अपना समय काट रहे हैं. मैं हमेशा अपने साथ एक बैग रखता हूं जिसमें मेरा पासपोर्ट, कुछ ज़रूरी कागज़ात, नकद रुपये, टॉर्च, स्विस नाइफ़, एक जोड़ी जूते, और आराम-दायक कपड़े होते हैं.

जब भी सोने जाता हूं तो मैं अपना बैग खिड़की के पास रखता हूं. ये किसी जासूसी फिल्म का सीन जैसा लगता है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में हम ऐसे ही रहते हैं. कभी भी कुछ भी हो सकता है और आपको अपना बैग लेकर यहां से भागना पड़ सकता है.

अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे भारतीय कोई बेहद चाक-चौबंद सुरक्षा वाले आवासीय परिसरों में नहीं रहते हैं लेकिन भारतीय दूतावास भारतीय लोगों की सुरक्षा का ध्यान रख रहे हैं. वे समय-समय पर दिशानिर्देश जारी करते रहते हैं."

चरमपंथ के खिलाफ जंग

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अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा हालातों पर हमारी बातचीत नितिन सोनावने से हुई जो कि दुनिया भर में महात्मा गाँधी के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए कई देशों की यात्रा करते हुए अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे हैं.

नितिन बताते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में हालात दिनों-दिन ख़राब होते जा रहे हैं. मैंने कुछ तीन दिनों में 80 किलोमीटर की यात्रा की होगी. और कई लोगों ने मुझसे कहा कि 'यहां मत चलिए, यहां पर बहुत ख़तरा है. तालिबान रेगिस्तान से आ सकता है, हमला कर सकता है और किडनैपिंग कर सकते हैं. अभी तालिबान बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा है. काबुल में भी हालात ख़राब हैं, मैं जब यहां था तभी एक वैन को निशाना बनाया गया जिसमें मेरे एक दोस्त की सहयोगी की मौत हो गई. ऐसे में लोग यहां से किसी न किसी तरह निकलने की कोशिश में लगे हुए हैं."

नितिन सोनावने काबुल स्थित भारतीय दूतावास में काम कर रहे भारतीय अधिकारियों से मिलकर आए हैं.

नितिन बताते हैं, "मैं हाल ही में इंडियन एंबेसी गया था. वो बिलकुल जेल में बदल गया है. कोई अधिकारी बाहर नहीं निकल रहा है. असुरक्षा का भाव बहुत ज़्यादा है. मुझे भी बाज़ार जाने से मना किया गया है.

अफ़ग़ानिस्तान में भारत से भेजी गयी मदद सामग्री उठाता हुआ एक अफ़ग़ानी युवक

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भारतीयों में पाकिस्तानी समझे जाने का डर

सोनावने बताते हैं कि अभी कुछ दिनों पहले एक भारतीय प्रोफेसर को अगवा कर लिया गया था.

अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे भारतीय जहां एक ओर तालिबान की ओर से ख़तरा महसूस कर रहे हैं. वहीं, दूसरी ओर अफ़ग़ान लोगों की ओर से पाकिस्तानी समझे जाने के डर में जी रहे हैं.

नितिन बताते हैं, "यहां पर अफ़ग़ान, भारतीय लोगों से बहुत अच्छा बर्ताव करते हैं. लेकिन मैं अगर सड़क पर जाऊं और किसी से कहूं कि मैं भारतीय हूं तो लोग यकीन नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें लगता है कि ये शख़्स पाकिस्तान से है. क्योंकि जब मैं हिंदी में बात करूंगा तो उन्हें पता लगेगा कि मैं या तो पाकिस्तान से हूं या इंडिया से हूं. लोग ज़्यादातर आपको पाकिस्तानी ही मानेंगे. क्योंकि कई पाकिस्तानी लोग अपनी पहचान छिपाते हैं क्योंकि यहां पाकिस्तान के प्रति बहुत नफ़रत है."

नितिन ने जलालाबाद से लेकर मज़ार-ए-शरीफ़ जैसे इलाकों की यात्रा की जहां इस समय कई चरमपंथी संगठन सक्रिय हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में हिंदु

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इमेज कैप्शन, काबुल के एक हिंदु मंदिर की ये तस्वीर जून 2008 की है.

वे बताते हैं, "जलालाबाद में कई आतंकी गुट सक्रिय हैं. यहां एक 501 साल पुराना गुरुद्वारा है जहां गुरु नानक जी आए थे. मैं वहां गया था. लेकिन यहां मौजूद लोगों ने मुझसे बात भी नहीं की. उन्हें लगा कि मैं एक पाकिस्तानी हूं. ऐसे में मुझसे बिलकुल बात नहीं की."

अफ़ग़ानिस्तान के दूरस्थ इलाकों में काम कर चुके सुमित (बदला हुआ नाम) भी मानते हैं कि भारतीय लोग एक अजीब स्थिति सामना करते हैं.

चरमपंथ के खिलाफ जंग

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वे कहते हैं, "मैंने अफ़ग़ानिस्तान के दूरस्थ इलाकों में काम किया है. अफ़ग़ानिस्तान के सीमावर्ती गाँवों, तालिबान कब्जे वाले क्षेत्रों के नजदीकी इलाकों और पहाड़ी क्षेत्रों में जाकर भी काम किया है. मेरा अनुभव ये है कि भारतीय लोग कहीं पाकिस्तानी समझे जाने से डरते हैं और कहीं भारतीय समझे जाने से डरते हैं.एक बार मुझसे कुछ लोगों ने पूछताछ की. जब मैंने उन्हें बताया कि मैं एक भारतीय हूं और विकास से जुड़े काम कर रहा हूं तो वे काफ़ी ख़ुश हुए. उन्होंने मेरा बेहद ज़िंदादिली के साथ स्वागत किया."

भारत ने अब तक अफ़ग़ानिस्तान में आधारभूत ढांचा खड़ा करने से जुड़ी कई परियोजनाओं को पूरा किया है. इन परियोजनाओं में कई भारतीय इंजीनियर, टेक्नीशियन और अन्य क्षेत्रों से जुड़े पेशेवर काम कर रहे हैं. कई परियोजनाएं ऐसी हैं जो कि आने वाले कुछ सालों में पूरी होने वाली हैं.

इसके साथ ही मानवाधिकारों से जुड़ी कई संस्थाएं अफ़ग़ानिस्तान के दूरस्थ इलाकों में काम कर रही हैं. इसके साथ ही कई भारतीय संयुक्त राष्ट्र समेत कई अन्य अंतरराष्ट्रीय चैरिटी संस्थाओं के साथ काम कर रहे हैं.

चरमपंथ के खिलाफ जंग

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ऐसी ही एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के साथ काम करने वाले एक भारतीय नागरिक ने नाम न बताने की शर्त पर ज़मीनी हालातों का खाका खींचा है.

राहुल (बदला हुआ नाम) बताते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले भारतीय मुख्यत: विकास कार्यों से जुड़ी संस्थाओं, व्यापारिक संस्थाओं और तकनीकी क्षेत्रों में काम करते हैं. तीनों क्षेत्रों में काम करने वाले भारतीयों के लिए सुरक्षा से जुड़े इंतजाम अलग-अलग हैं.

उदाहरण के लिए, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ काम करने वालों की सुरक्षा व्यवस्था अपेक्षाकृत रूप से बेहतर है क्योंकि उनके यहां परिसर सुरक्षित हैं, सुरक्षा संबंधी नियम काफ़ी सख़्त हैं और सुरक्षा से जुड़े इंतज़ाम देखने वाली एक विशेष टीम है जो कि समय-समय पर ज़रूरी इनपुट देती रहती है.

लेकिन सर्विस सेक्टर में काम करने वालों की स्थितियां थोड़ी गंभीर है क्योंकि उन्हें अपने रहने की व्यवस्था खुद से करनी होती है. और ऐसे में उन्हें ये समझ नहीं आ रहा है कि किसी भी व्यक्ति पर कितना भरोसा किया जा सकता है. उन्हें डर है कि कहीं उनके आने-जाने से जुड़ी जानकारी लीक न हो जाए.

वीडियो कैप्शन, बर्मा की विरासतअफ़गान महिलाएं पुलिस मे

इसके बात तीसरा तबका आता है जो कि भारत सरकार की परियोजनाओं जैसे कि हाइवे और बांध के निर्माण पर काम कर रहे हैं, उनकी स्थिति ख़राब है. लेकिन मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को पिछले कुछ समय में निकाल लिया गया है.

कई लोग ऐसी परियोजनाओं पर काम करते हैं जहां पर वह दूर-दराज़ इलाकों में खुले आसमान के नीचे टैंट लगाकर सोते हैं. उन्हें उस इलाके में पता नहीं होता है और वह पूरी तरह अपने अफ़ग़ान कॉन्ट्रेक्टर के भरोसे होते हैं."

भरतीयों के लिए भविष्य में वहां रहना संभव होगा?

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या आने वाले दिनों में भारतीयों के लिए अफ़ग़ानिस्तान में काम करना संभव होगा.

सुमित बताते हैं, "फिलहाल इस सवाल का जवाब नज़र नहीं आता है. तालिबान ने अपनी ओर से बयान जारी करके कहा है कि वह विदेशी नागरिकों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. लेकिन ज़मीनी हक़ीकत ये है कि तालिबान किसी एक सेना का नाम नहीं है. ये उन तमाम हथियारबंद चरमपंथी गुटों का साझा नाम है जो अपने हितों, संवेदनशीलताओं और संबंधों के आधार पर रणनीति तय करते हैं."

विशेषज्ञ मानते हैं कि कई गुट पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर काम करते हैं. कई गुट खुद को पाकिस्तान से जोड़कर देखे जाने पर ऐतराज़ करते हैं. ये गुट अलग-अलग स्तरों पर हिंसा में शामिल होते हैं.

वीडियो कैप्शन, अफगानिस्तान: नशे में डूबता बचपन

सुमित कहते हैं, "इसके अलावा कई गुट ऐसे हैं जो किसी विदेशी ताक़त के इशारे पर हिंसक घटनाओं को अंजाम देते हैं और तालिबान पर इसकी तोहमत मढ़ देते हैं. कई छिटपुट गुट ऐसे हैं जो तालिबान से संबंधित नहीं हैं. किसी अन्य एजेंसी के इशारे पर भी घटनाओं को अंजाम नहीं देते हैं. लेकिन क्षेत्रीय ताकतों की नज़र में आने के लिए बड़ी घटनाओं को अंजाम देते हैं. ऐसे में कम शब्दों में ये कहा जा सकता है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी से एक नई तरह की जटिलताएं पैदा हो गई हैं."

लेकिन क्या भारत समेत तमाम एजेंसियां अफ़ग़ानिस्तान से वापसी कर सकती हैं.

इस सवाल पर राहुल कहते हैं, "ये सही है कि वहां काम करना चुनौती भरा होगा लेकिन ऐसा नहीं है कि लोग वापस नहीं लौटेंगे. और आगे क्या होगा, ये अगस्त तक स्पष्ट हो जाएगा. क्योंकि 9/11 एक प्रतीकात्मक दिन है जब अमेरिकी सेना पूरी तरह लौट जाएगी. तब तक हमें पता लग जाएगा कि वहां पर क्या होने वाला है."

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