कोविड-19: तीन ख़तरनाक चरमपंथी संगठनों पर कितना असर?

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- Author, बीबीसी मॉनिटरिंग
- पदनाम, ख़बरों की रिपोर्टिंग और विश्लेषण
कोविड-19 महामारी से पूरी दुनिया थम गई है लेकिन इसका बहुत ज्यादा असर दुनिया के प्रमुख चरमपंथी संगठनों पर नहीं दिख रहा है. इनमें से कुछ संगठनों का तो मानना है कि इस वायरस को ऊपर वाले ने ही उनके दुश्मन, पश्चिमी दुनिया को खत्म करने के लिए भेजा है.
बीबीसी मॉनिटरिंग ने तीन सबसे ख़तरनाक चरमपंथी संगठनों की गतिविधियों को आकलन किया है. इनमें इस्लामिक स्टेट, अल कायदा का साहेल शाखा जमात नुसरत अल इस्लाम वाल मुस्लिमीन (जेएनआईएम) और सोमालिया के अल शबाब शामिल हैं.
इन तीनों चरमपंथी संगठनों के आधिकारिक या उनके सहयोगी मीडिया आउटलेट्स पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक मार्च में जब कोविड-19 ने दुनिया भर को अपनी चपेट में ले लिया था तब भी पिछले दो महीनों की तुलना में इन संगठनों के हमले कम नहीं हुए थे.
इससे यह पता चलता है कि चरमपंथी संगठनों ने कोविड-19 को लेकर अपनी गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगाया है. उल्टे इस्लामिक स्टेट ने अपने लड़ाकों से मौजूदा संकट के समय का फायदा उठाकर ज्यादा हमले करने की मांग की है.
हालांकि अभी तक इसका आकलन नहीं हुआ है कि जिन देशों में इन संगठनों का बहुत ज्यादा असर है वहां कोविड-19 संक्रमण फैलने के बाद उन संगठनों का रवैया कैसा रहा है. ये संगठन मिडिल ईस्ट, पश्चिमी और पूर्वी अफ्रीका में सक्रिय हैं. अब तक इन संगठनों ने कोविड-19 को चीन, अमरीका और यूरोपीय देशों के संकट के तौर पर ही देखा है.
इस आकलन की मैथडॉलॉजी क्या है?
इस आकलन के लिए इस्लामिक स्टेट, जेएनआईएम और अल शबाब का चयन इसलिए किया गया है क्योंकि ये दुनिया के सबसे ख़तरनाक और सक्रिय चरमपंथी संगठन हैं. इसके अलावा इन संगठनों के अपने ऑनलाइन मीडिया आउटलेट्स हैं जिसके चलते आंकड़ों को जुटाना सहज होता है.

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इन आंकड़ों में उन हमलों को शामिल किया गया है जिसको करने का दावा इन संगठनों ने अपने मीडिया आउटलेट्स पर किया है. हालांकि यह संभव है कि अपनी ताकत को बढ़ा चढ़ाकर बताने की कोशिश में संगठनों ने हमलों की संख्या ज्यादा बताई हो.
इस्लामिक स्टेट के आंकड़ों के लिए आईएस के आधिकारिक नाशिर न्यूज एजेंसी मीडिया पर दर्ज आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है. इसमें अल-नबा समाचार पत्र में शामिल दावों को शामिल नहीं किया गया है, दावों में हमलों की संख्या अधिक है.
इस अध्ययन में दूसरे चरमपंथी संगठनों को इस वजह से शामिल नहीं किया गया है-
29 फरवरी को अमरीका के साथ हुए शांति समझौते के बाद मार्च महीने में अफगान तालिबान के हमलों में कमी आई है. इस समझौते के मुताबिक अफगान सरकार तालिबान लड़ाकों को जेल से रिहा करना है, अफगानी तालिबान हमलों की संख्या बढ़ाकर अपने साथियों की रिहाई को संकट में नहीं डालना चाहता. हालांकि माना जा रहा है कि गर्मी के महीने में तालिबान के हमलों की संख्या बढ़ सकती है, हालांकि इसकी कोई घोषणा नहीं हुई है.
बोको हराम ऐतिहासिक तौर पर स्थिर और आसानी से जानकारी देने वाला ऑनलाइन मीडिया आउटलेट्स विकसित नहीं कर पाया है. इसलिए इस समूह की गतिविधियों को व्यवस्थित ढंग से ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है.
उत्तरी सीरिया के चरमपंथी समूह हयात तहरीर अल शाम (एचटीएस) का नियंत्रण इदलिब प्रांत के अधिकांश हिस्सों पर हैं. इस समूह की गतिविधियों को भी ट्रैक नहीं किया गया क्योंकि संगठन की गतिविधियों में छह मार्च को किए शांति समझौते के बाद कमी आई है. हालांकि इस समझौते का विभिन्न पार्टियों की तरफ से उल्लंघन भी होता रहा है बावजूद इसके समझौते के बाद इदलिब और उसके निकटवर्ती हिस्सों में चरमपंथी हमलों में कमी देखने को मिली है. हालांकि अलल कायकदा के सीरियाई शाखा के तौर पर करने वाले संगठन हुर्रास अल दीन ने मार्च महीने में कुछ वारदातों को अंजाम जरूर दिया है लेकिन वे लो प्रोफाइल की घटनाएं थीं.
मार्च के आखिरी दिनों में सीरिया पर फोकस करने वाली जेहादी पत्रिका ने दावा किया था कि कोविड-19 के बाद उत्तर सीरिया संघर्ष में कमी जरूर हुई है लेकिन यह चरमपंथियों के पक्ष में है. बालाह पत्रिका ने विस्तार से बताया है कि महामारी के चलते सीरिया और रूस के सशस्त्र बल की प्राथमिकताएं बदल गई हैं और अब उनका ध्यान महामारी पर अंकुश लगाने पर ज्यादा है.
इसके अलावा अन्य संगठनों को इस अध्ययन में शामिल नहीं किया गया क्योंकि उनका असर बेहद सीमित है और वे छिटपुट चरमपंथी घटनाओं में संलिप्त रहे हैं. जैसे कि यमन में सक्रिय अल कायदा की शाखा (एक्यूएपी) ने तीन महीने में ऐसी कई घटनाओं को अंजाम दिया है.

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इस्लामिक स्टेट के मार्च में किए हमलों से जाहिर होता है कि संगठन की गतिविधियों में जनवरी-फरवरी की तुलना में कोई फर्क नहीं आया है. वास्तविकता यह है कि मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में, इस्लामिक स्टेट ने कई खतरनाक हमले किए हैं, इसमें अफगानिस्तान में सिखों पर हुए हमले से लेकर मोजाम्बिक और पश्चिम अफ्रीकी देशों में सुरक्ष बल पर हुए हमले शामिल हैं.
इस्लामिक स्टेट कोविड-19 के समय दुनिया भर के संकट को अवसर में बदलने की कोशिशों में जुटा है.
मार्च में इस्लामिक स्टेट ने अपने चरमपंथी हमलावरों और समर्थकों से अपील की कि इस महामारी के समय में दुनिया भर में चरमपंथी हमले ज्यादा किए जाएं. संगठन की ओर से कहा गया कि सरकार और उनकी सेनाएं इस वक्त कोविड-19 पर अंकश में जुटी है लिहाजा इस वक्त का फायदा उठाना चाहिए.
चरमपंथी संगठन ने अपने समर्थकों से कोविड-19 से बचाव की अपील भी की है. संक्रमण से बचने के लिए स्वास्थ्य पर ध्यान देने के अलावा साफ सफाई बरतने की अपील भी की गई है. इसके अलावा संक्रमित इलाकों में आने जाने से भी मना किया गया है. हालांकि कुछ पश्चिमी मीडिया आउटलेट्स के मुताबिक इस्लामिक स्टेट ने अपने साथियों के यूरोप यात्रा पर पाबंदी लगा दी है हालांकि इस्लामिक स्टेट की एडवाइजरी में ऐसा नहीं कहा गया है.
आईएस के हमले
इस्लामिक स्टेट ने दुनिया भर में मार्च महीने में 163 हमले करने का दावा किया है. फरवरी महीने में संगठन की ओर से 165 हमलों का दावा किया गया था जबकि जनवरी महीने में यह संख्या 163 थी. ऐसे में साफ है कि तीन महीनों में इस्लामिक स्टेट की गतिविधियों में बहुत बड़े बदलाव का कोई संकेत नहीं मिलता है. अप्रैल के पहले दो सप्ताह के दौरान यानी 15 अप्रैल तक विभिन्न देशों में इस्लामिक स्टेट ने 95 हमले करने का दावा किया है.
इस्लामिक स्टेट के चरमपंथी हमलों में लोगों की मौत का सिलसिला भी बना हुआ है. जनवरी में इस्लामिक स्टेट के हमलों में कुल 372 लोगों की मौत हुई थी, जबकि मार्च महीने में 371 लोगों की मौत. हालांकि फरवरी में यह संख्या 259 थी.
इस्लामिक स्टेट के निशाने पर मुख्य तौर पर इराक और सीरिया ही रहे हैं. इसके अलावा नाइजीरिया, मिस्र, यमन और अफगानिस्तान में संगठन सक्रिय है. इसके अलावा माली के साहेल, नाइजर और बुर्किना फासो भी उन इलाकों में हैं जहां इस्लामिक स्टेट हमले करता रहा है. इस्लामिक स्टेट अपने सप्ताहिक पत्र अल नाबा में साहेल में हुए हमलों पर दावा करता रहा है लेकिन इस समाचार पत्र में किए गए दावों को इस अध्ययन में शामिल नहीं किया गया है.

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इराक में अप्रैल महीने में हमलों में वृद्धि देखने को मिली है. 15 अप्रैल तक इस्लामिक स्टेट ने इराक में 50 हमलों की जिम्मेदारी ली है. इस पहले पूरे महीने के दौरान भी लगभग इतने ही हमलों की जिम्मेदारी संगठन ले रहा था. जनवरी महीने में संगठन ने 40, फरवरी में 50 और मार्च में 59 हमलों की जिम्मेदारी संगठन ने ली थी.
कोविड-19 के चलते इराक में अमरीकी नेतृत्व वाले गठबंधन की गतिविधियों पर असर और इराक में अमरीकी अभियानों पर अंकुश पर इस्लामिक स्टेट लगातार रिपोर्टिंग कर रहा है. यह ईरान समर्थिक शिया चरमपंथियों के अमरीकी ठिकानों को निशाना बनाने के उद्देश्य को भी बढ़ावा देते हैं.
25 मार्च में, इस्लामिक स्टेट ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक गुरुद्वारे को निशाना बनाया जिसमें 35 लोगों की मौत हो गई थी. इसके अगले दिन इस्लामिक स्टेट ने शोक में डूबे सिखों और हिंदुओं पर भी हमला किया.
यहां यह ध्यान देने की बात है कि इस्लामिक स्टेट सिख समुदाय को अमूमन निशाना नहीं बनाता है. लेकिन यहां संगठन ने सिखों को अपना निशाना बनाया क्योंकि वह एक महीने पहले इस्लामिक स्टेट के खिलाफ तालिबान और अफगानिस्तानी सैनिकों के संयुक्त अभियान का जवाब देना चाहता था.

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इससे दो दिन पहले, दुनिया के दूसरे कोने यानी मोजाम्बिक के अहम शहर और उत्तरी हिस्से में स्थि मोकिमबोआ द परिया पर धावा बोला. इसके बाद इसी तरह से अप्रैल में भी उत्तरी मोजाम्बिक के शहरों में इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों ने धावा बोला और शहर में घूमते हुए अपने वीडियो बनाए. वीडियो में इस्लामिक स्टेट के चरमपंथी पुलिस फोर्स की तरह दिख रही है.
23 मार्च को नाइजीरिया के उत्तर पूर्व राज्य योबे में इस्लामिक स्टेट ने अपने हमले में कम से कम 70 सैनिकों को मार गिराया. हालांकि इस्लामिक स्टेट ने 100 लोगों को मारने का दावा किया है. वहीं छह अप्रैल को चाड की सीमा से लगे लेक चाड बेसिन में हुए हमले में भी इस्लामिक स्टेट ने मल्टीनेशनल अफ्रीकी टास्क फोर्स के 70 सैनिकों को मार गिराने का दावा किया था.
27 मार्च को इस्लामिक स्टेट ने कुछ तस्वीरें जारी की हैं जिसमें चरमपंथी लेक चाड बेसिन के स्थानीय लोगों के बीच धार्मिक कार्य करते देखे जा रहे हैं. इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों की ऐसी तस्वीरें पहली बार सामने आई हैं.
साहेल में अल कायदा का सहयोगी संगठन, जेएनआईएम
अल कायदा के सबसे सक्रिय गुट जमात नुसरत अल स्लाम वाल मुसलीमीन (जेएनआईएम) की चरमपथीं हिंसा में हताहत लोगों की संख्या 2020 के पहले दो महीने की तुलना में मार्च में बढ़ गई.
यह चरमपंथी गुट पश्चिमी अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में सक्रिय है, मुख्य तौर पर माली, बुर्किना फासो और नाइजर में इनकी सक्रियता है. और ये वो इलाके हैं जहां अभी कोविड का संक्रमण बहुत नहीं फैला है.
अप्रैल महीने तक इन तीन देशों में कोविड-19 मामले की संख्या हजार तक नहीं पहुंची थी और मरने वाले लोगों की संख्या भी बहुत कम थी. कोविड-19 संक्रमण से ना तो जेएनआईएम की गतिविधि कम हुई है और ना ही मध्य मार्च में माली में हुआ चुनाव रुका.
आंकड़ों के हिसाब से देखें तो जेनएआईएम ने जितने हमले जनवरी में किए, लगभग उतने ही मार्च में किए लेकिन फरवरी में इसकी संख्या जरूर कम रही. जेएनआईएम ने मार्च में 87 लोगों को मारने का दावा किया है. यह जनवरी से दोगुना और फरवरी में 10 लोगों की मौत से काफी ज्यादा है.
19 मार्च को, जेएनआईएम ने 2020 के पहले तीन महीनों में सबसे खतरनाक हमला करते हुए सेंट्रल माली के मिलिट्री बेस पर हमला किया और 30 सैनिकों की हत्या कर दी. स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस हमले में कम से कम 30 सैनिक मारे गए.
जेएनआईएम ने पहली बार कोविड-19 का जिक्र 10 अप्रैल को अपने बयान में किया है. इसमें कहा गया है कि कोरोना महामारी एक तरह से फ्रांस को खुदा की ओर से दी जा रही सजा है. चरमपंथी गुट ने इस बयान में यह उम्मीद भी जताई है कि वायरस की चपेट में आने के बाद फ्रांस माली से अपनी सेना को हटाएगा.
इसी दौरान यह समूह राजनीतिक तौर पर भी बेहद सक्रिय रहा. मार्च में जेएनआईएम ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए कहा है कि सालों से चली आ रही हिंसा खत्म करने के लिए माली सरकार से बातचीत की पेशकश की. इस बातचीत की केवल एक शर्त थी कि फ्रांस माली से अपनी सेना को बाहर निकाले.
हालांकि जेएनआईएम ने यह भी कहा कि बातचीत की पेशकश का यह मतलब नहीं है कि वह हमले करना बंद कर देगी. इसके बाद 25 मार्च को टिम्बकटू के उत्तरी इलाके से विपक्ष के नेता सुमाइला सिसे के अपहरण का आरोप भी इस संगठन पर लगा. हालांकि इस हाई प्रोफाइल अपहरण की आधिकारिक जिम्मेदारी जेएनआईएम ने अभी तक नहीं ली लेकिन स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक जेएनआईएण के वरिष्ठ नेता एमबाडू कोउफा ने कहा है कि इस अपहरण के पीछे उनका संगठन है.
सोमालिया का अल-शबाब
कोविड-19 का सोमालिया में बहुत असर नहीं है ऐसे में सोमालिया में अल कायदा के सहयोगी संगठन अल शबाब की गतिविधियों पर बहुत असर नहीं दिखा है.
मार्च में अल शबाब ने 101 चरमपंथी हमलों की जिम्मेदारी ली है जबकि संगठन ने फरवरी महीने में 95 और जनवरी महीने में कम से कम 83 हमले किए थे. अप्रैल के पहले दो सप्ताह के दौरान अल शबाब ने कुल 59 हमले किए थे.

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अल कायदा का समर्थन करने वाली मीडिया समूह थाबात, दुनिया भर मे अल कायदा के हमलों का राउंड अप प्रकाशित करती है. इस प्रकाशन के मुताबिक मार्च महीने में अल शबाब ने 130 हमलों को अंजाम दिया है जिसमें कथित तौर पर 487 लोगों की मौत हुई है. इनमें से केन्या में सात हमले हुए हैं.
अल शबाब के बड़े हमलों में एक हमला 29 मार्च को हुआ था जिसमें दक्षिणी शाबेले इलाके में हुए बम धमाके में अफ्रीकी यूनियन के सात शांतिदूतों की मौत हुई थी. सेंट्रल और दक्षिणी सोमालिया में अल शबाब के लड़ाकों पर सरकारी सेना के अभियान में भी कोई कमी देखने को नहीं मिल रही है.
सोमालिया में भी कोविड के ज्यादा मामले नहीं दिखे हैं. अब तक 80 मामलों की पुष्टि हुई है और जबकि पांच लोगों की मौत हुई है.
मार्च के अंतिम दिनों में अल शबाब ने महामारी के दौरान भी हमले जारी रखने का एलान किया था. सोमालियाई सरकार ने देश भर में 16 मार्च से सावर्जनिक जगहों पर भीड़ लगाने पर पाबंदी लगा दी थी. साथ ही स्कूल और मस्जिद बंद करने का ऐलान किया था.
अल शबाब ने मस्जिद बंद करने के फैसले की निंदा करते हुए 6 अप्रैल को कहा था कि कोविड-19 को अल्लाह ने काफिरों को सजा देने के लिए भेजा है.

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