मदरसों को अपने नियंत्रण में लेगी पाकिस्तान सरकार, पर कैसे?

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- Author, हारून रशीद
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, इस्लामाबाद
हाल ही में पाकिस्तान ने ऐलान किया है कि 30 हज़ार मदरसों को सरकारी नियंत्रण में लिया जाएगा. पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ ग़फ़ूर ने इस बात की घोषणा की.
लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर पाकिस्तान सरकार को ऐसा करने की ज़रूरत क्या पड़ी?
सवाल ये भी हैं कि ये घोषणा सरकार की जगह पाकिस्तानी फौज की ओर से क्यों किया गया और किन मदरसों को सरकारी नियंत्रण में लेना है किन्हें नहीं, इसके चयन का आधार क्या होगा?
ये सवाल पाकिस्तान के अंदर भी उठ रहे हैं. बीबीसी संवाददाता आदर्श राठौर ने बात की पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद से.
पढ़िए उनका नज़रिया

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जबसे इस क्षेत्र में चरमपंथ को बढ़ावा मिला है और अफगानिस्तान में मुजाहिदीन के दौर में सीआईए की मदद से जो फंडिंग रही, इन मदरसों में ही मुजाहिद तैयार करके वहां भेजे गए.
उस वक्त से सिविल सोसाइटी के लोग और रिसर्चर ये कहते रहे हैं कि मदरसों की पढ़ाई का तरीका अच्छा नहीं है, जिससे चरमपंथी विचारधारा बनती है. इसलिए उन्हें मुख्यधारा के स्कूलों में लाने की ज़रूरत है.
पेशावर में स्कूल हमले के बाद नेशनल एक्शन प्लेन बना था. इसके तहत चरमपंथ पर काबू पाने की बात कही गई थी. इसमें एक फेक्टर ये भी था कि स्कूलों और मदरसों में जो चरमपंथ है उसपर भी काबू पाया जाएगा.
ये सब बहुत धीमी गति से चल रहा था. लेकिन सोमवार को सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ़ गफ़ूर ने ऐलान किया कि नेशनल एक्शन प्लेन के तहत तीस हज़ार मदरसों को पाकिस्तान के शिक्षा मंत्रालय के तहत लाया जाएगा. इसे तीन चरणों में किया जाएगा.
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लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि ये तीस हज़ार मदरसे कौन से हैं, क्योंकि कई लोगों का मानना है कि पाकिस्तान में मदरसों की तादाद तीस हज़ार से कहीं ज़्यादा है. बहुत से तो रजिस्टर्ड भी नहीं है और हुकूमत के मैप में भी नहीं है कि वो मौजूद है या नहीं.
अभी बहुत से सवाल हैं. देखना ये है कि शिक्षा मंत्रालय आगे चलकर इसके बारे में और जानकारी देती है या नहीं.
घोषणा पर बंटे हैं धार्मिक दल
विपक्ष के एक बड़े धार्मिक दल जमियत उल्मा-ए-इस्लाम के नेता मोलाना फज़ल-उर-रहमान ने सरकार की इस घोषणा की कड़ी आलोचना की है.
उन्होंने कहा कि ऐसा बयान सरकार की तरफ से आना चाहिए था और फौज का इससे कोई लेना देना नहीं है.
लेकिन फौज की करीब समझी जाने वाली पाकिस्तान उलेमा काउंसिल ने इस घोषणा का समर्थन किया है.
तो धार्मिक दलों की राय इसपर बंटी हुई है कि ये घोषणा सेना की तरफ से की जानी चाहिए थी या नहीं.

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एक राय ये है कि ये मुद्दा सुरक्षा से जुड़ा है और सुरक्षा मसले सेना ही देख रही है, तो बेहतर होगा कि वही इसे देखे.
एक राय ये है कि पॉलिटिकल सरकारें हमेशा कमज़ोर रही हैं, वो वोटरों को देखती रही हैं और इस तरह के कड़े फैसले लेना उनके लिए मुमकिन नहीं है. तो इस तरह का सख्त फैसला लेने के लिए सेना ज़्यादा अच्छी स्थिति में होगी.
और क्योंकि सेना के ताल्लुक मदरसों और इनके नेताओं के साथ हैं, तो शायद ये लागू करना उनके लिए ज़्यादा आसान होगा.
अगर सरकार की तरफ से इस तरह का बयान आया तो इसपर काफी विरोध होता.
सेना की पाकिस्तान में इज़़्ज़त और रौब है और वो जो घोषणा करती है, उसकी कम ही लोग आलोचना कर पाते हैं.
बहरहाल ये सीविलयन हूकुमत का काम था और उनकी तरफ से होता तो ज़्यादा बेहतर होता.
लेकिन पाकिस्तान में कुछ लोग ये एतराज़ भी करते हैं कि दो हूकुमतें हैं, दो सरकारें हैं. एक फौज चला रही है और एक सिविलियन चला रहे हैं.
तो कुछ चीज़ें साफ नहीं हैं. ये संवेदनशील मसला है. सही तरीका तो ये था कि पॉलिटिकल जमातों को भरोसे में लिया जाता. सहमति बनती और उसके बाद कुछ होता.
लेकिन काफी अरसे से सियासी हूकुमत इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही थी. तो लगता है कि सेना ने ये फैसला किया है, क्योंकि मदरसों के अभी के स्टेटस को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, इसमें तबदीली ज़रूरी है.
तो शायद उन्होंने इसकी घोषणा कर दी है.
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ये फैसला कबतक लागू होगा
पाकिस्तान की सेना ने इसे लागू करने को लेकर कोई टाइमलाइन तो नहीं दी है. उन्होंने नहीं बताया है कि ये कितने वक्त में लागू होगा.
लेकिन उन्होंने कहा है कि इसपर संसद में बात होगी, जो अगले चार से छह हफ्तों में शुरू हो जाएगी.
ये भी बड़ा अजीब लगता है कि पाकिस्तानी सेना बता रही है कि संसद ये करने जा रही है. हालांकि संसद में इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि वहां इस बारे में बात हो रही है.
इसके अलावा खैबर पख़्तूनख्वा, जहां इमरान ख़ान की हुकूमत रही है. उन्होंने मौलाना समी उल हक के मदरसा हक्कानिया को समर्थन दिया और सरकार की तरफ से काफी पैसे दिए. कहा कि इसके ज़रिए उन्हें मुख्यधारा में लाया जाएगा.
इसपर भी बहुत कड़ी तरकीद हुई थी, लेकिन उसका अभी तक कोई नतीजा देखा नहीं गया. दो-तीन साल से पैसे उसे दिए जा रहे हैं, लेकिन उसका फायदा क्या हुआ, इस बारे में लोगों को अबतक नहीं मालूम.
तो व्यक्तिगत मदरसों के साथ तो ये हुआ है, लेकिन ओवरऑल मदरसों के लिए तो ये पहला ऐसा प्लान है, जिसके बारे में सेना ने घोषणा की है.
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