पाकिस्तान तालिबान की बढ़ती रफ़्तार से क्यों चिंतित है?

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- Author, कमलेश मठेनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के साथ ही वहां तालिबान का प्रभाव बढ़ता जा रहा है. पिछले कुछ हफ़्तों में अफ़ग़ानिस्तान के कई ज़िलों पर तालिबान ने कब्ज़ा कर लिया है. इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई थी.
अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की शुरुआत एक मई के बाद से हो गई है और तब से ही तालिबान ने सरकारी सेना के ख़िलाफ़ अपना अभियान तेज़ कर दिया था.
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के बढ़ते क़दम पड़ोसी देश पाकिस्तान के लिए भी चिंता का सबब बन गए हैं.
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने रविवार को कहा कि अमेरिका की वापसी के बाद अगर अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा और अराजकता का माहौल बनता है तो पाकिस्तान देश से लगी सीमा को बंद कर देगा.
कुरैशी ने कहा कि पाकिस्तान पहले ही 35 लाख लोगों को शरण दे चुका है लेकिन अब वह और शरणार्थियों को नहीं अपनाएगा. वहीं, पाकिस्तान के गृह मंत्री शेख रशीद ने अफ़ग़ान तालिबान के साथ ही पाकिस्तान तालिबान के भी मज़बूत होने पर चिंता जताई है.
शेख राशिद ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के उस बयान को दोहराया कि पाकिस्तान अमेरिका को अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी ज़मीन का इस्तेमाल नहीं करने देगा.
लेकिन, उन्होंने ये भी कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि तालिबान, तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) और अन्य तत्वों को पाकिस्तान के लोगों की ज़िंदगियों और संपत्ति को नुक़सान पहुंचाने की अनुमति नहीं देगा.

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पाकिस्तान की ये चिंताएं उस स्थिति में सामने आ रही हैं जब पाकिस्तान और तालिबान के नज़दीकी संबंध माने जाते हैं.
अफ़ग़ान सरकार और दूसरे पक्षों के साथ बातचीत शुरू करने के लिए तालिबान को राज़ी करने में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की अहम भूमिका निभाई है. अफ़ग़ान तालिबान से पाकिस्तान के अच्छे संबंध हैं.
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मौजूदा अफ़ग़ान सरकार से पाकिस्तान की दूरी भी तालिबान के सत्ता में आने पर कम हो सकती है. और ये स्थिति भारत के लिए भी चुनौती बन सकती है.
साल 1996 में जब तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सरकार बनाई थी और दुनिया के जिन तीन देशों ने उस सरकार को मान्यता दी थी उनमें से एक पाकिस्तान भी था.
इसके बावजूद अब तालिबान का बढ़ता प्रभुत्व पाकिस्तान के लिए नई चुनौतियां लेकर आया है. ये चुनौतियां, सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक स्तर पर भी पाकिस्तानी के लिए परेशानी का कारण बन सकती है.

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पाकिस्तान तालिबान
पाकिस्तान की परेशानी का एक बड़ा कारण तहरीक-ए-तालिबान है जिसे पाकिस्तान तालिबान भी कहा जाता है.
टीटीपी का मक़सद पाकिस्तान में शरिया पर आधारित एक कट्टरपंथी इस्लामी शासन कायम करना है. इस चरमपंथी संगठन की स्थापना दिसंबर 2007 में 13 चरमपंथी गुटों ने मिलकर की थी.
पाकिस्तान तालिबान का पाकिस्तान की सेना से टकराव बना रहता है. हाल ही में संगठन के प्रभाव वाले इलाक़े में पेट्रोलिंग कर रहे एक पुलिसकर्मी को बुरी तरह पीटने की ख़बर सामने आई थी.

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इसी चरमपंथी सगंठन ने साल 2014 में पेशावर में एक आर्मी स्कूल पर गोलीबारी की थी जिसमें करीब 200 बच्चों की जान चली गई.
पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर मौजूद इलाक़ों में टीटीपी का ख़ासा प्रभाव है.
पाकिस्तान की चिंता ये है कि अफ़ग़ान तालिबान के मज़बूत होने से पाकिस्तान तालिबान का भी हौसला बढ़ेगा. अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद उसके चरमपंथी पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सक्रिय हो सकते हैं.

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इस्लामाबाद में वरिष्ठ पत्रकार हारून रशीद मानते हैं कि इस मामले में पाकिस्तान की चिंता जायज़ है क्योंकि ऐसे आसार बहुत कम हैं कि अफ़ग़ान तालिबान पाकिस्तान के लिए टीटीपी के पूरी तरह ख़िलाफ़ हो जाएगा.
हारून रशीद बताते हैं, “जब तालिबान पहले अफ़ग़ानिस्तान में सरकार में था तब पाकिस्तान तालिबान का वजूद नहीं था. ऐसे में अभी ये कहना मुश्किल होगा कि तालिबान के फिर से सरकार में आने पर पाकिस्तान तालिबान की तरफ़ उनका रवैया क्या होगा.”
“लेकिन, ऐसा कोई ऑपरेशन नहीं दिखता कि अफ़ग़ान तालिबान पाकिस्तान तालिबान के ख़िलाफ़ लड़कर उनको ज़बरदस्ती रोकने की कोशिश करेंगे. दोनों की विचारधारा एक ही है और उनमें समानता भी है तो पाकिस्तान पर इसका दुष्प्रभाव पड़ना लाज़िमी है.”

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गुड तालिबान, बैड तालिबान का नुक़सान
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफेसर संजय के भारद्वाज कहते हैं कि गुड तालिबान और बैड तालिबान की सोच ने पाकिस्तान का नुक़सान किया है.
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वो कहते हैं, "आप अफ़ग़ान तालिबान को मजबूत करके पाकिस्तान तालिबान से पीछा नहीं छुड़ा सकते. टीटीपी अपने मक़सद को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ेगा जो पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक सुरक्षा को ख़तरे का कारण बन सकता है."
पाकिस्तान तालिबान इस्लामिक शासन की बात करता है जिससे पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को ख़तरा है. उसे अस्थिर करने के लिए वो चरमपंथी गतिविधियां बढ़ा सकता है.
अन्य चरमपंथी संगठन
हाल ही में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की बैठक में पाकिस्तान को फिर से ग्रे लिस्ट में बनाए रखा गया है.
पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में रखने की वजह कथित तौर पर चरमपंथी संगठनों को फंडिंग देना बताया जाता है. हालांकि, एफएटीएफ ने इस बार चरमपंथ पर अंकुश लगाने की पाकिस्तान की कोशिशों की तारीफ़ भी की है.
लेकिन, अफ़ग़ान तालिबान के मजबूत होने से पाकिस्तान में मौजूदा चरमपंथी संगठनों को भी बल मिलने की आशंका है. इससे पाकिस्तान की ग्रे लिस्ट से निकलने की कोशिशों को भी झटका लग सकता है.
जानकार मानते हैं कि पाकिस्तान और अफ़ग़ान तालिबान के संबंध तो अच्छे हैं लेकिन पाकिस्तान, अफ़ग़ान सरकार में तालिबान का पूर्ण नियंत्रण नहीं चाहता.
हारून रशीद बताते हैं, “पाकिस्तान यही चाहेगा कि तालिबान में केवल एक पार्टी की सरकार ना हो. छोटे-मोटे सभी समूहों को प्रतिनिधित्व मिले. सभी को सरकार में हिस्सा मिलना चाहिए चाहे अशरफ गनी हों, अब्दुल्ला अब्दुल्ला हों या दोस्तम हों. इससे विरोध पनपने का ख़तरा कम हो जाता है.”
“मौजूदा तालिबान अब 1990 वाला तालिबान नहीं है. वो अब काफी परिपक्व और राजनीतिक तौर पर मजबूत हो गए हैं. पाकिस्तान का उन पर प्रभाव पहले से कम हुआ है. कुछ हद तक वो पाकिस्तान की बात सुनेंगे लेकिन अंतिम फ़ैसला अपने अनुसार ही लेंगे. इसलिए पाकिस्तान तालिबान को अनियंत्रित नहीं करना चाहेगा.”

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डूरंड लाइन
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच इस सीमा विवाद की जड़ 19वीं सदी से है.
ब्रिटिश सरकार ने भारत के उत्तरी हिस्सों पर नियंत्रण मज़बूत करने के लिए 1893 में अफ़ग़ानिस्तान के साथ 2640 किलोमीटर की सीमा रेखा खींची थी. ये समझौता ब्रिटिश इंडिया के तत्कालीन विदेश सचिव सर मॉरिटमर डूरंड और अमिर अब्दुर रहमान ख़ान के बीच काबुल में हुआ था. इसी लाइन को डूरंड लाइन कहा जाता है. यह पश्तून इलाक़े से गुज़रती है.
लेकिन अफ़ग़ानिस्तान ने डूरंड लाइन को अंतरराष्ट्रीय सीमा के तौर पर मान्यता नहीं दी है. अफ़ग़ानिस्तान पाकिस्तान से लगी सीमा और सिंधु नदी तक के कुछ इलाक़ों पर अपना दावा करता रहा है.
सवाल ये भी है कि पाकिस्तान की तरफ़ झुकाव रखने वाला तालिबानी शासन क्या पाकिस्तान को इस मसले पर कुछ राहत देगा.
जानकारों को इसे लेकर बहुत कम आसार दिखते हैं. हारून राशीद कहते हैं कि तालिबान ने पहले सरकार में रहते हुए इस मामले को उठाया तो नहीं था लेकिन हल भी नहीं किया था. उस दौरान भी पाकिस्तान ने काफी दबाव डाला था लेकिन कुछ नहीं हुआ. अब भी इसमें ज़्यादा कुछ होने की संभावना नहीं है.

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शरणार्थी संकट
अफ़ग़ानिस्तान से आए शरणार्थियों का संकट पाकिस्तान के लिए आर्थिक तौर पर और सुरक्षा के लिहाज से बहुत बड़ा है.
अफ़ग़ानिस्तान से सीमा लगने के कारण वहां पनपी अस्थिरता का असर पाकिस्तान पर पड़ता है. भौगोलिक और धार्मिक नज़दीकी के कारण पाकिस्तान अफ़ग़ानों के लिए सबसे बेहतर ठिकाना बनता है.
बीते चार दशकों से पाकिस्तान लाखों की संख्या में अफ़ग़ानिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को पनाह देता रहा है.
ये शराणार्थी, किसी शरणार्थी शिविर में नहीं रहते बल्कि देश के अलग-अलग इलाक़ों में आम नागरिकों के साथ घुलमिल कर रहते हैं. ये पाकिस्तान में शिक्षा प्राप्त करते हैं और वहां के व्यापार में भी बड़ी भूमिका अदा करते हैं.
ज़्यादातर शरणार्थी खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में आते हैं. हालांकि, कराची में भी उनकी बड़ी तादाद मौजूद है.
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हारून रशीद कहते हैं कि तालिबान के बढ़ते कब्ज़े और लड़ाइयों के कारण अगर अफ़ग़ानिस्तान में हिंसा और तनाव बढ़ता है तो लोगों का पलायन भी बढ़ेगा. पाकिस्तान पहले ही शरणार्थियों का आर्थिक बोझ उठा रहा है. अब उसे डर है कि अगर शांति वार्ता किसी स्थाई नतीजे पर नहीं पहुंचती तो पाकिस्तान को एक बार फिर शरणार्थी समस्या से जूझना पड़ सकता है.
प्रोफेसर संजय कहते हैं, “सेना के दखल के साथ ही सही लेकिन पाकिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार है. वहां भी प्रगतिशील वर्ग है जो लोकतंत्र की पैरवी करता है. चरमपंथियों की बढ़ती ताकत पाकिस्तान के इस वर्ग के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है.”
“ये उस समय भी हुआ था जब सोवियत संघ के अफ़ग़ानिस्तान से जाने से पहले पाकिस्तान तालिबान को समर्थन देता था. लेकिन, सोवियत संघ जो मुजाहिदीन शरणार्थी के तौर पर पाकिस्तान आए तो वो पाकिस्तान के प्रगतिशील विचारों के लिए ख़तरा बन गए.”
ऐसे में पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में एक ऐसा हल चाहता है जिसमें देश में स्थिरता भी बनी रहे और अफ़ग़ान सरकार में उसकी पहुंच भी बढ़ सके.
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