भारत-पाकिस्तान के 'सुधरते' रिश्तों पर कश्मीर का क्या है सोचना

इमरान खान, मोदी

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

बीते कुछ दिनों के घटनाक्रम इस बात के पुख़्ता संकेत दे रहे हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव में कमी लाने की कोशिशें जारी हैं.

जम्मू और कश्मीर के सीमावर्ती इलाक़े दोनों देशों के बीच तनाव और गोलीबारी से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं. यहां रहने वाले लोगों में हाल में युद्धविराम की घोषणा के बाद से रिश्तों में सुधार की आस बंधी है.

अब से क़रीब महीने भर पहले भारत और पाकिस्तान ने सीमा पर युद्धविराम का एलान करते हुए कहा था कि 2003 के युद्धविराम समझौते पर पूरी तरह से अमल होगा.

बीते महीने दोनों देशों के मिलिट्री ऑपरेशन के डायरेक्टर जनरल (डीजीएमओ) ने एक साझा बयान जारी करते हुए नियंत्रण रेखा पर संघर्षविराम की घोषणा की थी.

सीमा पर युद्धविराम की घोषणा के बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख क़मर जावेद बाज़वा ने एक बयान दिया और कहा "हमें गुज़रे हुए कल को भूलकर आगे बढ़ना चाहिए. "

फिर 23 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को पाकिस्तान दिवस पर ख़त लिखकर बताया कि भारत अपने पड़ोसी देश के साथ बेहतर रिश्ते चाहता है.

वहीं सिंधु नदी जल वार्ता के लिए पाकिस्तान का एक आठ सदस्यीय दल पाकिस्तान के इंडस वॉटर कमिश्नर सैयद मेहर-ए-आलम के नेतृत्व में भारत में अपने समकक्षों के साथ बातचीत के लिए नई दिल्ली आया हुआ है.

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सुधार के संकेतों से राहत

युद्धविराम की घोषणा की ख़बर ने सीमावर्ती इलाके उरी के अरशद अहमद को हैरान कर दिया है.

वो कहते हैं, "हमारे लिए तो ये घोषणा हैरान करने वाली थी. यह एक जश्न का मौक़ा भी था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को ख़त लिखा है. अब हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा होगा."

सरहद पर रहने वालों के लिए रिश्ते में सुधार के संकेत भर से ही राहत मिली है. अरशद कहते हैं कि सीमा पर गोलीबारी के दौरान उनका जीवन तहस-नहस हो जाता है.

इमरान खान

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कश्मीर के लिए इस घटना का क्या मतलब है?

भारत प्रशासित कश्मीर के एक आम नागरिक ख़ुर्शीद अहमद कहते हैं कि संकेत जैसे भी हों लेकिन दोनों देशों के बीच एक सर्द जंग तो हमेशा चलती ही रहती है.

ये पूछने पर कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख ने हाल ही में कहा था कि हमें बीते हुए कल को दफ़न करके आगे बढ़ना चाहिए. इस पर ख़ुर्शीद कहते हैं, "हम तो बीते तीस साल से हर दिन अपने इतिहास को दफ़ना रहे हैं. परवेज़ मुशर्रफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता आज मौजूद नहीं हैं. वो दोनों नेता कश्मीर के हल के लिए कुछ करना चाहते थे. मुझे नहीं लग रहा है कि अब कुछ होने वाला है. लेकिन अगर वाकई शांति की कोशिश हो रही है तो यह अच्छी बात है."

पुलवामा हमले के बाद दोनों देशों के रिश्तों में बहुत ज़्यादा कड़वाहट आ गयी थी.

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विश्लेषक क्या सोच रहे हैं?

कश्मीर यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर रहे नूर अहमद बाबा कहते हैं कि बीते एक महीने से दोनों देशों से जो संकेत मिल रहे हैं, उसे एक आम कश्मीरी उम्मीद की नज़र से देखेगा.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "दोनों देशों के रिश्तों को अगर दीर्घकालिक कूटनीतिक लिहाज़ से देखें तो उन्हें ज़्यादा देर तक क़ायम नहीं रखा जा सकता. अगर भारत और पाकिस्तान किसी चीज़ पर सहमत होते हैं, तो कश्मीर को भी किसी हद तक उसे स्वीकार करना पड़ेगा."

प्रोफ़ेसर बाबा कहते हैं कि सीमावर्ती इलाकों को हाल के युद्ध विराम से फ़ायदा हुआ है. उन्हें लगता है कि कश्मीर का हर वर्ग इन संकेतों को उम्मीद की नज़र से देख रहा है.

वह आगे कहते हैं, "ऐसे कुछ संकेत मिल रहे हैं कि रिश्तों को बहाल करने के लिये काम हो रहा है. पिछले महीनों में भी ऐसा हुआ है. पहले भारत के प्रधानमंत्री ने ट्वीट करके इमरान ख़ान की ख़ैरियत पूछी. अब बाक़ायदा ख़त लिखा है. पाकिस्तान से भी अच्छा संदेश मिला है. युद्ध विराम लागू किया गया. ये सब कुछ इशारे दे रहा है कि अंदर-अंदर कुछ माहौल बन रहा है."

भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद का सबसे बड़ा मसला कश्मीर ही है. अगर दोनों देशों के रिश्ते सुधरते हैं तो उसका कश्मीर पर भी असर होगा.

हमने घाटी के एक राजनीतिक विश्लेषक तारिक़ अली मीर से पूछा कि कश्मीरियों की पाकिस्तान से क्या उम्मीदें हैं? अगर दोनों देशों के रिश्ते दोस्ती में बदल जाते हैं तो क्या पाकिस्तान के कश्मीर पर जो बयान जारी होंगे, क्या वे महज़ रस्मी होंगे?

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तारिक़ अली मीर कहते हैं, "मैं महसूस करता हूँ कि पाकिस्तान ज़्यादा समय तक कश्मीर को ठंडे बस्ते में नहीं डाल सकता है. अगर कुछ समय तक पाकिस्तान कश्मीर का ज़िक्र नहीं करेगा, तो इसका मतलब ये नहीं कि कश्मीर पर पाकिस्तान हमेशा खामोश रहेगा."

कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक गौहर गिलानी कहते हैं कि भारत और पाकिस्तान जो कुछ भी कर रहे हैं, उसमें दो देश तो हैं, लेकिन कश्मीर और कश्मीरी कहीं नहीं हैं.

गिलानी 5 अगस्त, 2019 के बाद से बदले हालात की ओर इशारा करते हैं जब राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के एक हिस्से को ख़त्म कर दिया गया. साथ ही राज्य का दर्जा वापस लेते हुए, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया गया.

गौहर गिलानी कहते हैं, "पांच अगस्त के बाद यहां ज़मीन पर बहुत कुछ बदला है. चाहे अनुच्छेद 370 का हटना हो या 35-A का हटना या डोमिसाइल सर्टिफिकेट्स का मामला हो."

उनका कहना है कि जो भी संजीदा इंसान है, वो भारत-पाकिस्तान की दोस्ती चाहता है. लेकिन रिश्तों में सुधार के लिए दोनों मुल्कों के बीच विश्वास बहाली के क़दम उठाने की ज़रूरत है. इनमें नियंत्रण रेखा के दोनों ओर सीमा व्यापार, बस सेवा आदि को बहाल करना शामिल होना चाहिए."

फ़ारुक़

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राजनीतिक दलों ने क्या कहा?

पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ़्रेंस के अध्यक्ष डॉक्टर फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने बीबीसी को बताया कि दोनों देशों के बीच बीते एक महीने से जो कुछ चल रहा है, वो उम्मीद की एक किरण है. लेकिन उनका ये भी कहना था कि वो भविष्य के बारे में दोनों देशों के रिश्तों के बारे में कुछ नहीं कह सकते.

फ़ारूक़ अब्दुल्ला कहते हैं, "मैं समझता हूँ कि यह एक बेहतरीन क़दम है. लड़ाई का माहौल ख़त्म होने लगा है. दोस्ती का माहौल बन रहा है. अगर यह सब आगे भी चलता रहा तो कश्मीर सहित सभी मसलों का हल निकल जाएगा."

यह पूछने पर कि आने वाले दिनों में क्या दोनों देश बातचीत की टेबल पर बैठ सकते हैं, इस पर अब्दुल्ला बोले, "मुझे तो पूरी उम्मीद है. लेकिन पहले का जो अनुभव है, वो बड़ा कड़वा रहा है."

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के नेता और पूर्व विधायक यूसुफ़ तारिग़ामी कहते हैं कि युद्धविराम हो या फिर पाकिस्तानी सेना प्रमुख का बयान या प्रधानमंत्री का इमरान ख़ान को ख़त लिखना या सिंधु नदी जल पर बातचीत, ये सब-कुछ एक झटके में नहीं हुआ है. उनके अनुसार लंबे समय से इसके लिए कोशिशें हो रही थीं.

तारिगामी ने कहा, "अब देखने वाली बात ये होगी कि इसको कैसे बरक़रार रखा जा सकता है ताकि जम्मू-कश्मीर के लोगों को राहत मिल सके."

अलगाववादी नेता और हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस (मीरवाइज़ गुट) ने दोनों देशों के रिश्तों में आए सकारात्मक मोड़ का स्वागत करते हुए कहा कि वो भारत और पाकिस्तान की हर उस कोशिश का साथ देने के लिये तैयार है, जिससे कश्मीर समस्या का शांतिपूर्ण हल तलाशा जा सके.

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