कश्मीर पर इमरान ख़ान के बयान के बाद तेज़ होती सियासी उठापटक

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बीते शुक्रवार कश्मीर पर बात करते हुए कहा है कि अगर भविष्य में जनमत संग्रह होता है जिसमें कश्मीर पाकिस्तान को चुनता है तो पाकिस्तान सरकार उन्हें (कश्मीरियों को) अपने भविष्य का फैसला करने का अधिकार देगी.
पाकिस्तान के विपक्षी दलों ने इमरान ख़ान के इस बयान का कड़ा विरोध किया है.
दक्षिण एशियाई भू-राजनीतिक गतिविधियों पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञों के बीच भी इस बयान को गौर से देखा जा रहा है.
सवाल उठ रहे हैं कि क्या इमरान ख़ान का ये बयान पाकिस्तान की कश्मीर को लेकर हो रहे नीति परिवर्तन का संकेत हैं?
इमरान ख़ान ने क्या कहा?
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के कोटली शहर में आयोजित हुई एकजुटता रैली को संबोधित करते हुए इमरान ख़ान ने कहा, "दुनिया ने कश्मीर के लोगों से साल 1948 में एक वादा किया था. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के मुताबिक़, कश्मीर के लोगों को अपने भविष्य का फ़ैसला करने के लिए हक़ मिलना था."
उन्होंने कहा, "दुनिया को याद दिलाना है कि कश्मीर के लोगों से जो वादा किया गया था, वो वादा पूरा नहीं हुआ, जबकि इसी सुरक्षा परिषद ने ईस्ट तिमोर को, जो मुस्लिम मुल्क इंडोनेशिया का एक जज़ीरा (द्वीप) था, वहां ईसाई ज़्यादा थे, वही हक़ ईस्ट तिमोर को दिया गया. जनमत संग्रह करवाकर उन्हें जल्द आज़ाद करवा दिया गया. मैं संयुक्त राष्ट्र को याद दिलाना चाहता हूं कि उसने पाकिस्तान से अपना वादा पूरा नहीं किया."
इसी रैली में इमरान ख़ान ने वो बयान दिया जिसकी वजह से विवाद हो रहा है.
उन्होंने कहा, "मैं कश्मीर के लोगों को ये कहना चाहता हूं कि इंशा अल्लाह जब आपको अपना ये हक़ मिलेगा और जब कश्मीर के लोग पाकिस्तान के हक़ में फ़ैसला करेंगे, उसके बाद पाकिस्तान कश्मीर के लोगों को अधिकार देगा कि आप आज़ाद रहना चाहते हैं या पाकिस्तान का हिस्सा बनना चाहते हैं. ये आपका हक़ होगा."

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राजनीतिक विरोध तेज़
पाकिस्तान के मुख्य विपक्षी दलों के साथ-साथ पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट की ओर से इस बयान का विरोध किया गया है.
पाकिस्तान की 11 विपक्षी पार्टियों के समूह पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) ने कहा है कि भारत प्रशासित कश्मीर के मामले में मोदी और इमरान एक पेज पर हैं.
पीडीएम के प्रमुख मौलाना फ़ज़लुर्रहमान ने कहा कि कश्मीरियों को पाकिस्तान से अलग करने की कोशिश करने वालों को इतिहास माफ़ नहीं करेगा.
पीडीएम की ओर से पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर की राजधानी मुज़फ़्फ़राबाद में एक रैली आयोजित करके प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश की गई.
इस रैली में मुस्लिम लीग (नवाज़) की उपाध्यक्ष मरियम नवाज़ ने कहा, "राष्ट्रीय हित, परमाणु कार्यक्रम और कश्मीर के मुद्दे पर हम सब एक हैं. जब भी कश्मीर का ज़िक्र आएगा, इमरान ख़ान मुजरिम के तौर पर खड़े होंगे."

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वहीं, पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो ने भी कहा, "किसी कठपुतली को कश्मीर की आज़ादी का सौदा करने की इजाज़त नहीं देंगे. मोदी को जवाब देना है तो पाकिस्तान में लोकतंत्र क़ायम करना होगा. सरकार (इमरान ख़ान की सरकार) मुशर्रफ़ (पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़) के फ़ॉर्मूले पर चल रही है. कश्मीर का राजदूत बनने का दावा करने वाला कुलभूषण जाधव का वकील बनने की कोशिश कर रहा है. हमारी बहादुर वायुसेना ने भारत का जहाज़ गिराया और जंगी क़ैदी पकड़ लिया. सिलेक्टेड प्रधानमंत्री ने अभिनंदन (पाकिस्तान में पकड़े गए भारतीय वायुसेना के कमांडर अभिनंदन) को चाय पिलाकर वापस भेज दिया. कश्मीर पर सौदा मंज़ूर नहीं."
सियासी स्तर के साथ साथ सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर विवाद देखा गया.
लोगों ने सवाल उठाए हैं कि क्या ये बयान बिना सोचे समझे दिया गया है या कश्मीर को लेकर हुए नीति परिवर्तन की वजह से?
सोशल मीडिया पर उठे सवाल
बीबीसी संवाददाता शुमाइला ज़ाफरी बताती हैं कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के इस बयान के बाद से ही सोशल मीडिया पर सवाल उठना शुरू हो गए थे.
वो कहती हैं, “प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की ओर से बयान आने के बाद लोगों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया था कि क्या कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की नीति बदल रही है. लोगों ने पूछा कि क्या ख़ान ने संसद से विचार विमर्श करने के बाद कश्मीर पर नई नीति बनाने का फ़ैसला किया है. क्या इमरान ख़ान ने इस भाषण के माध्यम से नीति में बदलाव के संकेत देने शुरू कर दिए हैं.
लेकिन जब तक ये विचार विमर्श थोड़ा व्यापक हो पाता, उससे पहले ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से ये बयान जारी कर दिया गया कि "नीति में परिवर्तन नहीं हुआ है और प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने यही कहा है कि पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर का मसला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव के माध्यम से ही हल होना चाहिए, और यही प्रस्ताव कश्मीरियों को ये हक़ देता है कि वे अपने मुस्तकबिल (भविष्य) का फ़ैसला स्वयं करें. यही बात इमरान ख़ान ने भी कही है.’"
विदेश मंत्रालय ने दिया स्पष्टीकरण
इस मामले पर विवाद बढ़ता देख पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की ओर से एक बयान जारी किया गया जिसमें ये कहा गया कि कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की नीति में कोई परिवर्तन नहीं आया है.
विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी करके कहा कि जम्मू – कश्मीर विवाद को लेकर पाकिस्तान की नीति में किसी तरह का परिवर्तन नहीं आया है.
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विदेश मंत्रालय की ओर से जारी विस्तृत बयान में कहा गया है, “मीडिया की ओर से किए सवालों पर प्रवक्ता की ओर से कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर विवाद को लेकर पाकिस्तान की नीति में किसी तरह का परिवर्तन नहीं है और यह नीति संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव से जुड़ी हुई है. आज़ाद जम्मू–कश्मीर के कोटली में कश्मीर एकजुटता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने पाकिस्तान के पुराने रुख़ और पाकिस्तान द्वारा कश्मीरियों के अपने भाग्य का निर्धारण करने के अधिकार का समर्थन किए जाने की बात को दोहराया है.”
लेकिन कई पक्षों ने विदेश मंत्रालय की ओर से आये बयान पर आपत्ति जताई है. कहा गया है कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कश्मीर के मुद्दे पर कुछ भी ग़लत नहीं कहा है.
पाकिस्तानी पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता मार्वी सिरमद ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा है, “तो, कश्मीर पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बयान में ग़लत क्या है? कश्मीरियों की आज़ादी का विकल्प, अगर वे चाहते हैं, तो ये विकल्प मौजूद है और होना भी चाहिए. ये पाकिस्तान के संविधान के आर्टिकल 257 के अनुसार ही है. विदेश मंत्रालय को प्रधानमंत्री को शर्मसार करने से पहले दो बार सोचना चाहिए था.”
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सिरमद ने अपने ट्वीट के साथ एक तस्वीर भी चस्पा की है जिसमें आर्टिकल 257 का ज़िक्र है जिसमें कहा गया है कि –
“जब जम्मू – कश्मीर प्रांत के लोग पाकिस्तान के साथ आते हैं तो पाकिस्तान और कश्मीर के बीच जो रिश्ता होगा वह कश्मीरियों की इच्छा के अनुसार होना चाहिए.”
ऐसे में सवाल उठता है कि इस बयान के पीछे पाकिस्तान सरकार का कोई नीतिगत फ़ैसला है या ये बयान जल्दबाज़ी में दिया गया है.
पाकिस्तान सेना ने क्या प्रतिक्रिया दी?
कई टिप्पणीकार मानते हैं कि इस विवाद को समझने के लिए इमरान ख़ान के राजनीतिक अंदाज़ पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है.
बीबीसी उर्दू सेवा के साथ लंबे समय तक काम कर चुके पाकिस्तानी पत्रकार हारून रशीद कहते हैं, “ये प्रधानमंत्री की ओर से आया एक अजीब बयान था. ये अजीब इसलिए था क्योंकि अब तक किसी ने भी इसे इस तरह नहीं रखा है. कई लोग मानते हैं कि जनमत संग्रह के बाद क्या होगा, उस स्थिति को समय आने पर देखने के लिए छोड़ देना चाहिए, और इसका फ़ैसला उस समय की स्थितियों के मुताबिक़ किया जा सकता है."
"लेकिन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के लिखे हुए भाषण नहीं देने की आदत स्थितियां साफ़ करने की जगह भ्रम पैदा करती हैं. भाषण के तुरंत बाद पाकिस्तान के विदेश कार्यालय को यह स्पष्ट करने के लिए कदम उठाना पड़ा कि पाकिस्तान कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के लिए प्रतिबद्ध है. इसी बात की उम्मीद थी और यही हुआ. इससे आगे कुछ नहीं कहा गया."
इस बयान पर राजनीतिक विरोध पर रशीद कहते हैं, "राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों ने इमरान ख़ान पर आरोप लगाया है कि वह कश्मीर को लेकर नरम पड़ रहे हैं. उन पर ये आरोप भी लग रहा है कि उन्होंने कश्मीर को मोदी को बेच दिया है क्योंकि उन्होंने भारत पर पांच अगस्त का फ़ैसला पलटने के लिए पर्याप्त दबाव नहीं बनाया."
पाकिस्तान के विपक्षी दल इमरान ख़ान को एक सेलेक्टेड प्रधानमंत्री यानी पाकिस्तानी सेना का चहेता कहकर पुकारते हैं, इस मुद्दे पर भी विपक्षी दलों की ओर से इमरान ख़ान के साथ साथ बार बार पाकिस्तानी सेना का ज़िक्र किया जा रहा है.
ऐसे में पाकिस्तानी सेना की ओर से इस विवाद पर किस तरह की प्रतिक्रिया आ रही है.
हारून रशीद बताते हैं, “पाकिस्तान की सेना इस बार इस मुद्दे पर चुप रही है. लेकिन सेना प्रमुख ने इमरान ख़ान के भाषण से पहले भारत पर एक नरम बयान देते हुए कहा कि वह चाहते हैं कि कश्मीर का मुद्दा गरिमापूर्ण ढंग से सुलझ जाए. कुछ लोगों का मानना है कि ये प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के रुख़ से अलग है जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत के साथ तब तक कोई बातचीत नहीं हो सकती जब तक कि भारत जम्मू – कश्मीर का स्वायत्त दर्जा वापस न लौटा दे.”
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