अमरीका के ख़िलाफ़ क्या चीन डॉलर को बना सकता है हथियार?

चीन की मुद्रा युआन

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    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवादाता

साल 2018 में व्यापार युद्ध के बाद से चीन और अमरीका के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. कोरोना वायरस महामारी को लेकर चीन पर अमरीकी हमले ने इस तनाव को और गहरा कर दिया है.

चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने अमरीका को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता है तो चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार की यूएस ट्रेज़री को घटा कर अमरीका के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है.

अख़बार लिखता है कि चीन अपने एक ट्रिलयन डॉलर से ज़्यादा के यूएस बॉन्ड्स को सामान्य परिस्थितियों में 800 बिलियन डॉलर तक कम कर सकता है. लेकिन स्थितियों के चरम तक पहुंचने पर चीन सभी अमरीकी बॉन्ड्स को बेच सकता है जैसे सैन्य टकराव की स्थिति में.

चीन और अमरीका के बीच जुलाई 2018 में व्यापार युद्ध शुरुआत हुई थी. उस दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे पर जमकर टैरिफ लगाया और कई चेतावनियां दीं. इसके बाद धीरे-धीरे स्थितियां सामान्य हुईं और बातचीत का दौर शुरू हुआ.

लेकिन, कोरोना वायरस के फैलने के बाद से अमरीका लगातार चीन पर हमलावर रहा है. वो चीन पर कोरोना को लेकर पहले से आगाह ना करने का आरोप लगाता है और महामारी के लिए चीन को ज़िम्मेदार ठहराता है. अमरीका में चुनाव आने वाले हैं और राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप चीन को लेकर कोई ना कोई बयान देते रहते हैं.

साथ ही अमरीका चीन पर जैविक हथियार बनाने का आरोप भी लगा चुका है जिससे चीन इनकार करता रहा है. इसके अलावा हॉन्ग-कॉन्ग में चीन द्वारा लाए जा रहे नए सुरक्षा क़ानून का भी अमरीका ने विरोध किया है. वह हॉन्ग-कॉन्ग में चीन के ख़िलाफ़ हो रहे विरोध प्रदर्शनों का समर्थक रहा है.

इस तरह दोनों देश लंबे समय से एक-दूसरे को आंखें दिखा रहे हैं. ऐसे में चीन का यूएस ट्रेज़री को लेकर अमरीका को चेतावनी देना मायने रखता है.

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

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सबसे ज़्यादा विदेशी मुद्रा भंडार

चीन के पास इस समय दुनिया में सबसे ज़्यादा 3.15 ट्रिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है. यूएस बॉन्ड्स रखने के मामले में चीन दुनिया का दूसरा बड़ा देश है. लेकिन, हाल के सालों में चीन ने अपने यूएस बॉन्ड्स को घटाना शुरू कर दिया है.

वार्षिक आधार पर चीन के पास मौजूद यूएस बॉन्ड्स में जून के अंत तक 3.4 प्रतिशत की कमी हुई है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक मई में चीन के पास 1.083 ट्रिलियन डॉलर यूएस ट्रेज़री थी जो जून में घटकर 1.074 ट्रिलियन हो गई है. वहीं, अगस्त में चीनी मुद्रा युआन के मूल्य में 1.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी जबकि डॉलर का मूल्य 1.3 प्रतिशत कम हुआ था.

चीन ने जिस यूएस ट्रेज़री या यूएस बॉन्ड्स को निकालने की चेतावनी दी है उसका अमरीका की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है. इसे कई बार ‘न्यूक्लियर विकल्प’ की संज्ञा भी दी जाती है.

लेकिन, सवाल ये भी है कि चीन की ये धमकी क्या सिर्फ़ अमरीका के लिए ख़तरनाक है. क्योंकि इसे लेकर विशेषज्ञ मानते हैं कि यूएस ट्रेज़री को एकसाथ बाज़ार में बेचना अमरीका को तो नुक़सान पहुंचा सकता है लेकिन चीन भी इसके प्रभाव से नहीं बच सकता.

इस पूरे मामले को समझने से पहले जानते हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार क्या होता है और इसकी क्या अहमियत है.

विदेशी मुद्रा भंडार

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क्या होता है विदेश मुद्रा भंडार?

विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश के केंद्रीय बैंक द्वारा रखी गई धनराशि या अन्य परिसंपत्तियां हैं ताकि जरूरत पड़ने पर वह अपनी देनदारियों का भुगतान कर सकें.

इससे व्यापार संतुलन बना रहता है. यह भंडार एक या एक से अधिक मुद्राओं में रखे जाते हैं. विदेशी मुद्रा भंडार में ज्यादातर डॉलर और कुछ हद तक यूरो भी रखा जाता है.

डॉलर इसलिए रखा जाता है क्योंकि ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य मुद्रा है. विदेशी मुद्रा भंडार को फॉरेक्स रिजर्व या एफएक्स रिजर्व भी कहा जाता है. इसमें चार चीजें शामिल होती हैं.

विदेशी परिसंपत्तियां जैसे विदेशी कंपनियों के शेयर, डिबेंचर, बॉन्ड आदि विदेशी मुद्रा के रूप में रखे जाते हैं. इसके अलावा सोना, आईएमएफ के पास रिज़र्व ट्रेंच और विशेष आहरण अधिकार (स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स).

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार डॉलर में होता है. इसके लिए देश में विदेशी मुद्रा का भंडार होना ज़रूरी है. चीन जिस यूएस बॉन्ड की बात कर रहा है वो भी विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा हैं.

बॉन्ड्स एक तरह की सिक्योरिटी होती हैं. जैसे हम बैंक से नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट लेते हैं और मैच्योर होने पर बैंक उनके बदले ब्याज सहिता मूलधन लौटाता है. इसी तरह जिस देश के बॉन्ड्स होते हैं वो देश बॉन्ड्स बेचे जाने पर उनका भुगतान करता है.

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चीनी और अमरीकी मुद्रा

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चीन का विदेशी मुद्रा भंडार घटाना

चीन की चेतावनी है कि अगर वो एकसाथ यूएस बॉन्ड बेच देगा तो उससे अमरीका के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी.

दिल्ली में फोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीनी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं कि चीन के ऐसा करने की आशंका पहले से बनी रही है. वह यूएस बॉन्ड बेच सकता है या यूएस डॉलर को अपने विदेशी मुद्रा भंडार से कम कर सकता है. लेकिन, इसका असर अमरीका और चीन दोनों पर होगा.

डॉक्टर फ़ैसल कहते हैं, “यूएस बॉन्ड एकसाथ बेचने पर अमरीका में चीन का निवेश कम हो जाएगा और इसका सीधा असर अमरीका में निवेश के माहौल पर पड़ेगा. जिन सेक्टर्स में चीन का निवेश होगा उन पर नकारात्मक प्रभाव होगा. अमरीका में निवेशकर्ताओं का भरोसा कम हो जाएगा. उन्हें माहौल अस्थिर और तनावपूर्ण लगने लगेगा.”

अमरीका के लिए ये बॉन्ड्स एक तरह की देनदारी हैं. अगर चीन इन्हें एक साथ बेचता है तो अमरीका को बड़े स्तर पर इसका भुगतान करना होगा.

साथ ही अगर चीन बाज़ार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ा देता है तो उससे डॉलर का मूल्य कम हो जाएगा. ये सीधा मांग और आपूर्ति का नियम है. मांग से ज़्यादा आपूर्ति होगी तो डॉलर कमज़ोर हो जाएगा.

इसका परोक्ष असर भारत पर भी पड़ सकता है.

डॉक्टर फ़ैसल बताते हैं, “भारत को इसका फायदा और नुक़सान दोनों हो सकते हैं. अमरीका पर निवेशकों का भरोसा कम होने पर कंपनियां दूसरा विकल्प खोजेंगी. ये कंपनियां भारत की तरफ़ भी रुख कर सकती हैं. वहीं, नुक़सान की बात करें तो अगर अमरीका में उत्पादन प्रभावित हुआ तो भारत अमरीका से जो उत्पाद खरीदता या बेचता है उस पर असर पड़ेगा.”

लेकिन, अमरीका भी इन स्थितियों से अनजान नहीं हैं. ऐसे में विशेषज्ञ कहते हैं कि अमरीका के पास भी उपाय मौजूद हैं. वो बॉन्ड फ्रीज़ कर सकता है जिससे चीन उन्हें बेच नहीं पाएगा. साथ ही उसे निवेशकों को विश्वास दिलाना होगा कि सरकारी प्रतिभूतियां बिल्कुल सुरक्षित है.

विशेषज्ञ मानते हैं चीन अगर ऐसा करता है तो उसके हाथ भी इस आग में झुलस जाएंगे. ये एक अंतिम कदम है जो कोई भी देश नहीं उठाएगा.

अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप

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चीन पर असर

ईफोरेक्स इंडिया के सीईओ सौम्या दत्ता कहते हैं, “चीन ऐसा कर ही नहीं सकता. चीन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार रखकर युआन के मूल्य को नियंत्रित करता है. अगर बाज़ार में डॉलर का मूल्य गिरेगा तो युआन का मूल्य बढ़ जाएगा. इससे चीन का निर्यात महंगा हो जाएगा जबकि उसकी अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है.”

उनके मुताबिक़, “अमरीका चीन का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है तो इससे चीन के व्यापार पर भी असर पड़ेगा. अगर वो अमरीका को अस्थिर करने की कोशिश करेगा तो अमरीका भी पलटवार करेगा और प्रतिबंध लगाएगा. अमरीका समर्थक देश भी चीन से दूरी बनाने लगेंगे. आर्थिक और राजनीतिक दोनों हालात बिल्कुल बदल जाएंगे.”

वहीं, यूएस बॉन्ड्स को एक साथ घटाने के लिए चीन को इन्हें डिस्काउंट पर बेचना होगा. चीन इतना नुक़सान क्यों उठाना चाहेगा.

लेकिन, चीन के स्वभाव और उसकी अंतरराष्ट्रीय राजनीति को देखते हुए त्रिभुवन यूनिवर्सिटी, नेपाल में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर पुष्पाधिकारी कहते हैं कि चीन के पास मौजूद ये विकल्प किसी से छुपा नहीं है.

अगर वो ऐसा कदम उठाता है तो ज़रूर कोई प्लान बी भी बनाकर ज़रूर रखेगा. जैसे अगर वो एक ट्रिलियन डॉलर बाज़ार में निकाल भी देगा तो व्यापार संतुलन बनाए रखने के लिए उसके पास 2 ट्रिलियन डॉलर का भंडार बचा रहेगा.

चीन

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डॉलर के वर्चस्व को चुनौती

चीन की धमकियों भले ही जो हों लेकिन जानकार मानते हैं कि चीन का कहना और करना दोनों अलग-अलग हैं. वो विदेशी मुद्रा भंडार से यूएस ट्रेज़री कम तो करना चाहता है लेकिन धीरे-धीरे, एकसाथ नहीं.

चीन असल में अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विवधता लाना चाहता है. उसकी पूरी कवायद अमरीका पर निर्भरता कम करना है. इसके लिए वो विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर कम कर उसमें दूसरे देशों की मुद्रा को बढ़ाना चाहता है. जैसे वो यूरो में अपना निवेश बढ़ा रहा है.

इसमें रूस और चीन भी एकसाथ आ रहे हैं. रूस और चीन के लिए साल 2014 से ही डॉलर के इस्तेमाल को कम करने की प्राथमिकता रही है.

रूस के केंद्रीय बैंक और फ़ेडरल कस्टम सेवा के ज़रिए जारी किए गए हाल के आँकड़ों के अनुसार इस साल की पहली तिमाही में रूस और चीन के बीच व्यापार में डॉलर की हिस्सेदारी पहली बार 50 फ़ीसद के नीचे हो गई.

रूस और चीन के बीच सिर्फ़ 46 फ़ीसद व्यापार में डॉलर का इस्तेमाल किया गया. इसी दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार में यूरो की हिस्सेदारी बढ़कर अब तक की सबसे ज़्यादा 30 फ़ीसद हो गई.

डॉक्टर फ़ैसल अहमद बताते हैं, “चीन पहले से ये करता आ रहा है. 2018 में उसने 88 बिलियन डॉलर घटाए थे.

चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाना चाहता है. कल चीन डॉलर की हिस्सेदारी 50 से घटाकर 30 प्रतिशत कर दे और यूरो को बढ़ा दे तो इससे निवेशकर्ताओं का भरोसा यूरोपीय देशों पर बढ़ने लगेगा.”

चीन की मुद्रा युआन

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डिजिटल युआन

इसी तरह चीन डिजटल युआन पर भी तेज़ी से काम कर रहा है. डिजिटल युआन जिससे ई-आरएमभी भी बोला जाता है. ये डिजिटल करेंसी है जिसे नोट की तरह हाथ में नहीं लिया जा सकता. चीन की इसी नीति का संबंध बैंकों में लेन-देने के लिए इस्तेमाल होने वाले स्विफ्ट कोड से है.

डॉक्टर फ़ैसल अहमद बताते हैं, “स्विफ्ट कोड के ज़रिए लेन-देन अमरीका से रूट होता है. इसमें अमरीका के पास ये शक्ति रहती है कि वो किसी भी लेन-देन को कभी भी फ्रीज़ (रोक) कर सकता है. उस पर नज़र रख सकता है. लेकिन, डिजिटल युआन लाने का मतलब इस स्विफ्ट रूट से बचना है.”

उन्होंने कहा, “अगर चीन किसी देश को डिजिटल युआन में भुगतान करेगा तो इसमें बैंक, स्विफ्ट रूट और अमरीका का दखल नहीं होगा. ये भुगतान डिजिटल करंसी में किया जाएगा और अमरीका इस पर नज़र नहीं रख पाएगा. इस तरह चीन एकसाथ बड़ी चोट पहुंचाने की बजाए धीरे-धीरे अमरीका का वर्चस्व कम करना चाहता है.”

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