टिकटॉक पर ट्रंप का प्रतिबंध मोदी के बैन से कैसे अलग है?

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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

चीन के सोशल मीडिया मोबाइल ऐप टिकटॉक की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. अब राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे बैन कर दिया है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक आदेश पारित कर अमरीकी कंपनियों के चीन की वीडियो ऐप टिकटॉक के साथ व्यापार करने पर प्रतिबंध लगा दिया है. ये प्रतिबंध पैंतालीस दिन बाद लागू हो जाएगा.

राष्ट्रपति ट्रंप ने एक एक्ज़ीक्यूटिव ऑर्डर पारित कर ये प्रतिबंध लगाया है. टिकटॉक का कहना है कि वो राष्ट्रपति के आदेश से सकते में हैं और इसे अदालत में चुनौती दे सकता है.

वीडियो कैप्शन, टिकटॉक पर मोदी सरकार की पाबंदी के बाद भारत के टिकटॉक सितारे क्या बोले?

एक बयान में टिकटॉक ने कहा है कि वो अपने पास मौजूद सभी क़ानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेगी. ट्रंप ने चीन की सोशल मीडिया कंपनी वीचैट पर प्रतिबंध लगाने के लिए भी ऐसा ही ऑर्डर पारित किया है.

अपने आदेश में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि टिकटॉक से ख़तरें वास्तविक हैं. उन्होंने ऐप पर यूज़र का डाटा इकट्ठा करने और इस डाटा के चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी तक पहुंचने की आशंका भी ज़ाहिर की.

ये अंदेशा ज़ाहिर किया जाता रहा है कि टिकटॉक जो डाटा इकट्ठा करती है उसका इस्तेमाल अमरीका के संघीय कर्मचारियों के बारे में निजी जानकारियां इकट्ठा करने के लिए किया जा सकता है. इस डाटा के आधार पर उनकी जासूसी की जा सकती है और उन्हें ब्लैकमेल भी किया जा सकता है.

भारत ने भी जून में सीमा पर चीन के साथ भिड़ंत में अपने बीस सैनिकों की मौत के बाद चीन के कई दर्जन ऐप पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था. इनमें टिकटॉक भी शामिल है. भारत में अब टिकटॉक काम नहीं करती है.

चीन के ऐप्स पर प्रतिबंध लगाते हुए भारत ने इन्हें अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया था.

अमरीका के संघीय कर्मचारियों के टिकटॉक इस्तेमाल करने पर पहले से ही रोक थी. राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने इस आदेश में इस रोक का भी ज़िक्र किया है.

अपने प्रतिबंधों को सही ठहराने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत की ओर से लगाए प्रतिबंधों का भी ज़िक्र किया है. एक बयान में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि भारत ने ऐप्स पर प्रतिबंध लगाते हुए कहा था कि ये ऐप यूज़र का डाटा चुरा रहे हैं और उन्हें चुपके से चीन भेज रहे हैं.

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि इन आरोपों के बाद भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने वीचैट के इस्तेमाल को सीमित किया है या प्रतिबंधित किया है. अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए अमरीका को भी वीचैट की मालिक कंपनी पर आक्रामक कार्रवाई करनी ही होगी.

क्या है ट्रंप की रणनीति?

हालांकि एक्सपर्ट मानते हैं कि अमरीका के प्रतिबंध अलग हैं और भारत के प्रतिबंध बिल्कुल अलग हैं.

वीडियो कैप्शन, अमरीका में टिकटॉक बैन को लेकर क्या चल रहा है?

अमरीका की डेलवेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप का प्रतिबंध दरअसल टिकटॉक पर अपने बिज़नेस को अमरीकी कंपनी को बेचने के लिए दबाव बनाने की रणनीति है.

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, 'अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का फ़ैसला भारत से अलग है. भारत ने पूर्ण प्रतिबंध लगाया है जबकि ट्रंप ने कंपनी की वापसी की गुंज़ाइश छोड़ी है. ट्रंप का आदेश कहता है कि टिकटॉक अगले पैंतालिस दिनों में यदि किसी अमरीकी कंपनी के मालिकाना हक़ में नहीं आती है तो उस पर प्रतिबंध लागू हो जाएंगे. अभी ये भी बहुत स्पष्ट नहीं है कि ये मालिकाना हक़ किस स्वरूप में होगा. क्या टिकटॉक की मूल कंपनी की हिस्सेदारी शून्य हो जाएगी या उसे 49 फ़ीसदी तक शेयर रखने की अनुमति होगी. ये भी स्पष्ट नहीं है कि टिकटॉक में सिर्फ़ एक ही अमरीकी कंपनी का निवेश होगा या एक से अधिक कंपनियां निवेश कर सकेंगी.'

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, 'माइक्रोसॉफ़्ट या गूगल जैसी अमरीकी तकनीकी कंपनियां टिकटॉक को ख़रीदना चाहेंगी लेकिन यदि बैंक ऑफ़ अमरीका या कोई अन्य वित्तीय कंपनी शेयर ख़रीदती है तो क्या होगा. टिकटॉक तो चाहेगी कि उसकी हिस्सेदारी बची रहे. यदि कोई गैर-तकनीकी कंपनी निवेश करती है तो हो सकता है कि ऑपरेशन टिकटॉक के ही हाथ में रहे.'

वहीं तकनीकी मामलों के जानकार और वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता टिकटॉक को चीन के डिजीटल साम्राज्यवाद का प्रतीक मानते हैं.

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विराग गुप्ता कहते हैं, 'टिकटॉक डिजीटल साम्राज्यवाद का एक प्रतीक है. इस समय दुनिया में डिजीटल साम्राज्यवाद के दो ही बड़े प्लेयर हैं, चीन और अमरीका. जिस तरह औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटेन, हॉलैंड और फ्रांस जैसे देशों में प्रतिद्वंदिता थी, वैसी ही प्रतिद्वंदिता अब डिजीटल क्षेत्र में अमरीका और चीन के बीच है. अमरीका और चीन के बीच डिजीटल साम्राज्यवाद के विस्तार के लिए एक तरह का युद्ध सा चल रहा है, अमरीका ने उसी के तहत टिकटॉक पर प्रतिबंध का ये क़दम उठाया है.'

टिकटॉक का अगर मालिकाना हक़ बदलता है तो इसमें भारत के लिए क्या है और क्या कंपनी के फिर से भारतीय बाज़ार में आने की गुंज़ाइश है?

भारत डिजिटल साम्राज्यवाद का शिकार

इस सवाल पर विराग गुप्ता कहते हैं, 'भारत इन दोनों ही देशों की कंपनियों के डिजिटल साम्राज्यवाद का शिकार है. अगर टिकटॉक के परिपेक्ष्य में देखें तो कुछ साल पहले जब मद्रास हाई कोर्ट ने टिकटॉक को बैन करने का आदेश दिया था तब भी वही सब कारण थे जो आज हैं. तब भी यह समाज के लिए घातक था, आज भी है. आज भी इसकी भारत में कोई जवाबदेही नहीं है, तब भी नहीं थी. लेकिन सरकार ने समुचित क़दम नहीं उठाए जिसकी वजह से टिकटॉक दोबारा शुरू हो गया.'

विराग गुप्ता तो भारत के प्रतिबंधों पर ही सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं, 'अब चीन के साथ संघर्ष के बाद जिस तरह से टिकटॉक और अन्य कंपनियों को बैन किया गया है उसके कई सवाल उठे हैं. क्या ये बैन प्रभावी है, क्या इन कंपनियों के मौजूदा यूज़र्स की गतिविधियां भी रुक गई हैं. टिकटॉक की जगह अगर अमरीका या किसी और देश की कोई दूसरी कंपनी ले लेती है तो उससे भारत को क्या लाभ होगा. एक साम्राज्यवाद की जगह दूसरा साम्राज्यवाद चालू हो जाएगा. टिकटॉक जैसी कंपनियां राष्ट्रीय आमदनी का भी ज़रिया हो सकती हैं, इनसे टैक्स वसूला जा सकता है. बावजूद इसके भारत इनके लिए कोई क़ानून नहीं बना रहा है और न ही नियम बना रहा है.'

टिकटॉक पर ट्रंप का प्रतिबंध मोदी के बैन से कैसे अलग है?

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भारत में प्रतिबंध के बाद जब अमरीका में प्रतिबंध की बात उठ रही थी तो टिकटॉक के सीईओ केविन मेयर ने एक बयान में कहा था कि टिकटॉक पूरी पारदर्शिता लागू करने के लिए तैयार है और बाहरी विशेषज्ञों को अपने डाटा की जांच करने की अनुमति देने के लिए भी तैयार है.

टिकटॉक के इन वादों में कितना दम है? इस सवाल पर विराग गुप्ता कहते हैं, 'टिकटॉक ने जो दावे किए हैं उनमें कई तरह के अंतरविरोध हैं. चीन के भीतर सभी तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं लेकिन जब चीन की कंपनियां चीन के बाहर व्यापार करती हैं तो वो पारदर्शिता की बात करती हैं. ये एक मायाजाल है, टिकटॉक जैसी कंपनिया नया वेश धारण कर बाज़ार में उतर जाती है. इस छद्म भेष के एक रूप को तो अमरीका भी मान्यता देने की तैयारी कर रहा है. टिकटॉक को अगर कोई अमरीकी कंपनी ख़रीदती है और फिर यह भारतीय बाज़ार में आती है तो यह भारत के लिए तो बाहरी कंपनी ही रहेगी.'

विराग गुप्ता ये भी कहते हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाकर अमरीकी हितों की रक्षा करने की कोशिश की है. इसमें भारत के लिए बहुत कुछ नहीं है.

वो कहते हैं, 'अमरीका ने इससे पहले एप्पल से भी बड़े पैमाने पर टेक्स की वसूली की थी. अमरीका की बड़ी कंपनियों के सीईओ को संसदीय समिति के सामने पेश होना पड़ा था. अमरीका ये पूरी कोशिश कर रहा है कि अमरीका में कारोबार करने वाली कंपनियां अमरीका के प्रति जवाबदेह हों. लेकिन अगर बात भारत की करें तो टिकटॉक यदि बाज़ार में सीधे वापसी करता है या माइक्रोसॉफ्ट का रूप धारण करके करता है, उससे भारत के लिए बहुत कुछ बदलने वाला नहीं है.

चाहे टिकटॉक चीन की कंपनी रहे या अमरीका की हो जाए, भारत के लिए तो उसका वही स्वरूप बना रहेगा.' वहीं प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान का मानना है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाकर आपने राजनीतिक हित साधने की कोशिश की है.

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, 'अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप के टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने के राजनीतिक मायने भी हैं. ट्रंप हमेशा से कहते रहे हैं कि वो चीन के प्रति सख़्त हैं. टिकटॉक पर बैन लगाकर वो अपने समर्थकों को यही संदेश देना चाहते हैं कि देखो, मैं चीन की कंपनी पर प्रतिबंध लगा रहा हूं. अमरीका में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं, ट्रंप इस समय जो भी फ़ैसले ले रहे हैं उनका मक़सद कहीं न कहीं अपनी उम्मीदवारी को ही मज़बूत करना है.'

चीन की क्या होगी तैयारी?

प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान ये भी कहते हैं कि जो प्रतिबंध भारत ने या अमरीका ने लगाए हैं उनके मुक़ाबले अगर हार्डवेयर पर प्रतिबंध लगाया जाता तो असर ज़्यादा होता. प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, 'भारत ने भी जिन चीनी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं वो सभी सॉफ़्टवेयर कंपनियां हैं. यदि वास्तव में प्रतिबंध लगाने हैं तो मैन्यूफेक्चरिंग कंपनियों पर प्रतिबंध लगाएं. उदाहरण के तौर पर अगर ट्रंप आईफ़ोन के चीन में उत्पादन पर रोक लगाते हैं तो इससे आईफ़ोन की क़ीमतें इतनी बढ़ जाएंगी कि ये आम आदमी की आर्थिक पहुंच से बाहर हो जाएगा. या मोदी चीन निर्मित उत्पादों पर रोक लगाते हैं तो भारतीय बाज़ार में भी कई उत्पादों की क़ीमते बढ़ जाएंगी. सॉफ्टवेयर पर रोक लगाना आसान है, लेकिन हार्डवेयर पर रोक लगाना मुश्किल है.'

एक सवाल ये भी उठता है कि अमरीका के टिकटॉक पर प्रतिबंध लागने के बाद चीन क्या कर सकता है. चीन में अमरीका की गूगल, फ़ेसबुक और यूट्यूब जैसी कंपनियां पहले से ही प्रतिबंधित हैं.

प्रोफ़ेसर ख़ान कहते हैं, 'चीन भी किसी न किसी जवाबी कार्रवाई की तैयारी कर रहा होगा. लेकिन उसने अमरीका की बड़ी टेक कंपनियों पर तो पहले से ही प्रतिबंध लगाए हुए हैं.

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चीन ने बाहरी कंपनियों पर रोक लगाकर अपनी देसी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाज़ार विकसित किया है. पहले इस बाज़ार में प्रॉडक्ट उतारे जाते हैं और फिर उनकी कामयाबी के बाद उन्हें दुनिया के दूसरे बाज़ारों में उतार दिया जाता है जहां उनके कामयाब होने की संभावना और भी बढ़ जाती है.

टिकटॉक के साथ भी यही हुआ है. पहले इसने चीन के बाज़ार में जगह बनाई. फिर धीरे-धीरे ये दूसरे देशों में गई और सिर्फ़ दो साल के भीतर ही दुनिया की सबसे अधिक वेल्यू वाली कंपनियों में शामिल हो गई. लेकिन अब चीन की आक्रामक नीतियों का नतीजा इस कंपनी को उठाना पड़ रहा है.

वहीं विराग गुप्ता का कहना है कि भारत को प्रतिबंधों से ज़्यादा नियमन की ज़रूरत है. वो कहते हैं, टिकटॉक जैसी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने के बजाए कोशिश ये होनी चाहिए कि ऐसी कंपनियां भारतीय क़ानून के दायरे में आए. प्रश्न भी यही है और कोशिश भी यही होनी चाहिए कि भारत में कारोबार करने वाली कंपनियां भारतीय क़ानून के दायरे में ही काम करें.'

विराग सवाल करते हैं, 'टिकटॉक जैसी कंपनियां इतने बड़े पैमाने पर आमदनी कहां से करती हैं, इनका बाज़ार मूल्य कैसे बढ़ता है. ये कंपनियां यूज़र से भी फीस नहीं ले रही हैं. विज्ञापन से बहुत ज़्यादा पैसा आता नहीं है तो फिर कंपनी का वेल्युएशन इतना ज़्यादा कैसा है. ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या ये कंपनियां चीन के लिए डाटा चुराकर जासूसी करती हैं. क्या ये कंपनिया चीन के लिए डाटा चोरी का माध्यम हैं या जासूसी का एक ज़रिया हैं इस पर गंभीर विमर्श की ज़रूरत है.'

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