अमरीकी ग़ुलामों के इतिहास में ब्रितानियों की क्या भूमिका थी?

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    • Author, अलीम मक़बूल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, वर्जीनिया (अमरीका) से

अमरीका में जॉर्ज फ्लायड की हत्या हुए क़रीब दो महीने हो चुके हैं. उसके बाद से इतिहास खंगालने की जो कोशिश शुरू हुई है वो इस मुक़ाम तक पहुँच चुकी है कि कई शहरों में प्रतिमाएँ गिराई जा रही हैं, साथ ही ग़ुलामी और भेदभाव के इतिहास को ज़्यादा ईमानदारी के साथ देखने की बहस छिड़ी हुई है.

लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह महसूस करते हैं कि उस इतिहास के निर्माण में उनके देश की क्या भूमिका रही, यह भी देखा जाना चाहिए.

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वर्जीनिया में नॉरफ़ॉक यूनिवर्सिटी की इतिहासकार प्रोफ़ेसर कैसाड्रा न्यूबाई एलेक्जेंडर बताती हैं कि "ब्रिटेन ने शुरू से ही अमरीका पर अपनी छाप छोड़ी हुई है. ब्रिटेन ने ही सबसे पहले ग़ुलाम अफ़्रीकियों को अमरीका ले जाकर उनसे ग़ुलामी करवानी शुरू की थी."

ओल्ड पॉइंट कम्फ़र्ट में जहाँ अब लोग मछलियाँ पकड़ने जाते हैं, वहाँ के बारे में वो बताती हैं कि "माना जाता कि वहीं पहली बार ग़ुलामों को लेकर जहाज़ पहुँचा था. यह जगह पहले वर्जीनिया की कॉलोनी हुआ करती थी."

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वे बताती हैं, "1619 के अगस्त के आख़िरी दिनों में 'व्हाइट लायन' नामक जलपोत से माना जाता है कि अंगोला से 20 मर्द और औरत लाये गए थे." और तब से जो विरासत शुरू हुई उसकी प्रतिध्वनि आज भी सुनाई दे रही है.

प्रोफ़ेसर न्यूबाई एलेक्जेंडर मानती हैं कि इस विरासत को आगे बढ़ाने में अमरीकियों का दोष रहा लेकिन ब्रितानी लोगों के हाथ में नियंत्रण स्थापित होने के साथ ही समाज में ग़ुलामी की प्रथा अपनी जड़े जमा चुकी थी.

वे बताती हैं, "अमरीका आधिकारिक रूप से 1783 तक अमरीका नहीं बना था, जब तक कि पेरिस संधि पर हस्ताक्षर नहीं हो गया था. तब तक जो कुछ भी अमरीकियों ने किया, वो सब इंग्लिश लोगों की ही देन थी, फिर चाहे ग़ुलामी की प्रथा की बात हो या फिर उन क़ानूनों की जिसके आधार पर ग़ुलामी और असमानता खड़ी हुई थी. यह इग्लैंड और अंग्रेज़ी सिस्टम की ही देन थी."

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"अगर आप यह दावा करते हैं कि अमरीका का बुनियादी सांस्कृतिक आधार इंग्लैंड से जुड़ा हुआ है तो फिर आपको उसकी सभी चीज़ों को अपनाना होगा. इसमें हमारे क़ानून, व्यवहार और संस्कृति में मौजूद नस्लवाद की व्यवस्था भी शामिल है."

अमरीका के दक्षिणी हिस्से में जो पुलिस व्यवस्था है, उसकी शुरुआत 1700 के शुरू में ब्रितानी ग़ुलाम दस्तों के रूप में ही हुई थी.

काले लोगों के लिए स्थानीय स्तर पर ऐसे क़ानून बनाये गए थे जो उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बनाता था.

आज अमरीका में नस्लवाद को लेकर जो समस्याएँ पैदा हुई हैं, प्रोफ़ेसर न्यूबाई एलेक्जेंडर सीधे तौर पर उसे इसी से जोड़ती हैं.

वे कहती हैं, "जो पुलिसिंग की स्थिति है, उसमें काले लोग को सीधे एक अपराधी के दौर पर देखा जाता है. उसे दोषी मानकर चला जाता है. यह हमारे देश की बुनियाद के साथ जुड़ा हुआ है कि हम अफ़्रीकियों को अलग नज़रिए से देखते हैं."

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बेशक कई सदियाँ गुज़र गईं और अमरीकियों को अपने ऊपर मौजूदा हालात की ज़िम्मेदारी अब लेनी चाहिए. ब्रिटेन से आज़ादी हासिल की गई लेकिन तब देश के दक्षिणी हिस्से में ग़ुलामी जारी करने को लेकर गृह-युद्ध भी चल रहा था.

ब्रिटेन के कई सारे उच्च वर्ग के लोगों ने फिर इतिहास के गलत पक्ष का साथ दिया और जो लोग ग़ुलामी की व्यवस्था बरकरार रखना चाहते थे, उन्हें हथियार देकर मदद पहुँचाई. कई लोग अपने व्यावसायिक हितों की ख़ातिर ग़ुलामी बरक़रार रखना चाहते थे. हालांकि उनकी हार हुई.

लेकिन उसके कई सालों के बाद वर्जीनिया की राजधानी रिचमॉड में जब ग़ुलामी की इस प्रथा को बरक़रार रखने वाले नेताओं की मुर्तियाँ लगाई जा रही थीं तब उसका विरोध नहीं हुआ और उन्हें नहीं रोका गया.

यह मुहिम एक आंदोलन का हिस्सा थी जिसे बाद में 'द लॉस्ट कॉज' के नाम से जाना गया.

ग़ुलामी को बरक़रार रखने की लड़ाई को अलग ढंग से पेश किया गया. इसे ऐसे पेश किया गया जैसे किसी ने अच्छे आधार पर इसके लिए लड़ाई लड़ी हो.

पूरे दक्षिणी अमरीका में इस तरह की मुर्तियों की एक और व्याख्या रही है.

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रिचमॉड की सामाजिक कार्यकर्ता चेल्सिया हिग्स वाइज़ कहती हैं, "हमें हमेशा यह बताया गया कि यह हमें डराने के लिए बनाई गई हैं."

"हमें कहा जाता था कि उस तरफ मत देखो. सीधे चलते रहो. तुम्हे उस गोरे इंसान को नहीं देखना है. इसका इतना हौव्वा बना दिया गया था कि उस तरफ देखने के लिए हमें कहीं अपनी गर्दन तुड़वानी पड़ जाएगी. लेकिन इसके बावजूद हम उस तरफ देखते रहते थे."

चेल्सिया हिग्स वाइज़ उन लोगों में से हैं जो इन प्रतिमाओं को गिराने में शामिल रही हैं. वे कहती हैं 'काले लोगों की कई पीढ़ियाँ इनसे डरती रही है.'

वे बताती हैं, "हम सालों से इन प्रतिमाओं को हटाने की बात करते रहे हैं. हमारे पास रिपोर्ट्स थीं. हमारे पास कमीशन था. हमारे पास बजट थे लेकिन नौजवान लोगों ने रस्सी हाथ में लेकर आगे बढ़कर फैसला लिया कि हम आज की रात इसे गिरा देंगे और उन्हें गिरा दिया."

"अगर क़ानून और नीतियाँ बदलना हमारे हाथ में हैं और हम इसे रस्सी के सहारे कर सकते हैं तो फिर हम इसे करेंगे."

वे कहती हैं कि "ग़ुलामी की विरासत कैसे काले अमरीकियों को चुभती है, ये वही समझ सकते हैं. दूसरों के लिए इसे समझना बड़ा मुश्किल है."

वे चाहती हैं कि जहाँ से प्रतिमाएं हटाई गई है वहाँ 'ब्लैक लाइव्स मैटर' के नारे वैसे ही लिखे रहें.

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आप अब वहाँ कई काले लोगों के परिवारों को तस्वीरें लेते देख सकते हैं.

बार्थम हेस डेविस कहते हैं, "मुझे लगता है कि प्रतिमाओं के साथ यह सब करना अनुचित है, फिर चाहे वो जेफ़र्सन डेविस की प्रतिमा हो या फिर किसी और की."

चेल्सिया ने अपने फ़ोन पर जिन प्रतिमाओं के गिराने की वीडियो रिकॉर्ड की हुई है उसमें एक बार्थम हेस डेविस के परदादा जेफ़र्सन डेविस की भी प्रतिमा है.

उन्हें वीडियो में यह कहते सुना जा सकता है कि "ये उनकी ज़िंदगी का एक शानदार लम्हा है."

जेफ़र्सन डेविस वर्जीनिया में उस संघ के अध्यक्ष थे जो ग़ुलामी को बरकरार रखने के लिए लड़ाई लड़ रहा था. लड़ाई के बाद उनकी अमरीकी नागरिकता छीन ली गई थी और इसके बाद उनकी मृत्यु हो गई थी.

उनके वंशज अब यह कह रहे हैं कि ग़ुलामी को बरकरार रखने की लड़ाई में उनके पूर्वजों की भूमिका और जो अब उनकी प्रतिमाएँ तोड़ रहे हैं, उन्हें व्यापक संदर्भ में देखे जाने की ज़रूरत है.

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बार्थम हेस डेविस कहते हैं, "आज जिन लोगों की प्रतिमा पर हमला किया जा रहा है, उनमें से कोई भी अकेला ग़ुलामी की प्रथा के लिए ज़िम्मेदार नहीं था. उनके साथ एक इतिहास जुड़ा हुआ था जिसमें ग़ुलामी की प्रथा के लिए ज़मीन तैयार हुई थी."

"हमारा देश परफ़ेक्ट नहीं है. हमारे लोग परफ़ेक्ट नहीं हैं. लेकिन इसके साथ ही हमें इतिहास में गुज़रे वक़्त को उस समय के संदर्भ में समझने की ज़रूरत है, जिसमें वो रह रहे थे."

वॉशिंगटन डीसी की यूएस कैपिटल बिल्डिंग में जो 11 कंफ़ेडेरेट मूर्तियाँ लगी हैं उसमें से एक जेफ़र्सन डेविस की भी है.

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1970 के दशक में जेफ़र्सन डेविस की नागरिकता फिर से बहाल की गई थी. इस महीने संसद में इन सभी 11 प्रतिमाओं को हटाने के लिए वोटिंग हुई है.

बगल में ही अफ़्रीकी अमरीकी इतिहास को दर्शाता म्यूज़ियम है जो ग़ुलामी के उस दौर की भयावहता को बयां करता है.

अमरीका के दक्षिणी हिस्सों के स्कूलों में भी इस पर अनमने ढंग से ही प्रतिक्रिया दी जाती है. लेकिन शुरू से अब तक असहज करने वाले अमरीकी इतिहास के पाठों को लेकर लोगों का धैर्य अब जवाब दे रहा है.

(इवा एर्टेसोना की अतिरिक्त रिपोर्टिंग के साथ)

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