क्या काले लोगों को गुलामी के लिए मुआवज़ा मिलना चाहिए?

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- Author, फर्नांडो दुआर्ते
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
माया मोरेट्टा ने जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में जब दाखिला लिया था तब उन्हें अमरीका के इस प्रतिष्ठित संस्थान के गुलामी से जुड़े इतिहास के बारे में जानकारी थी.
21 साल की माया ने यूनिवर्सिटी के ब्लैक स्टडीज़ कोर्स में दाखिला लिया था. लेकिन वो इस बात के लिए तैयार नहीं थीं कि गुलामी का वो इतिहास यूनिवर्सिटी के संग्राहलय में ही उन्हें देखने को मिलेगा.
अपने कोर्स के दौरान जब वो छानबीन कर रही थी तब उन्हें कुछ ऐसा हाथ लगा जिसे देखकर वो दंग रह गई.
वो बताती हैं, "उन दस्तावेजों को देखकर मैं हैरान रह गई जिनमें गुलाम बनाए गए लोगों के साथ किसी वस्तु की तरह व्यवहार किया जाता था. मसलन छात्र को कम ट्यूशन फ़ीस देना पड़े इसलिए वो अपने साथ अपने गुलाम लाते थे, जो यूनिवर्सिटी का काम किया करते थे."
वो कहती हैं, "यह जानकारी आंखे खोल देने वाली थी. मुझे लगा कि इस अन्याय की विरासत को ठीक करने लिए कुछ करना होगा."
इसके बाद से माया सक्रिय तौर पर गुलामी से हुए नुक़सान को लेकर होने वाली चर्चाओं में हिस्सा लेने लगीं. इसके तहत अतीत में हुए अन्याय की भारपाई के लिए आर्थिक सुधारों पर बहस की जाती थी.
लेकिन यह इतना आसान नहीं था. जब माया ने यह अभियान शुरू किया तब उन्हें इसका अहसास हुआ.

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बीबीसी से बातचीत में माया ने कहा, "मेरे साथ काम करने वाले कुछ लोग किसी भी तरह के एक्शन के ख़िलाफ़ थे. भले ही वहाँ पढ़ने वाले कई छात्र उन गुलामों के वंशज थे जिन्होंने जॉर्जटाउन में दास के रूप में काम किया था. "
उस वक्त ये बहस नई थी. लेकिन अब अमरीका और दूसरे देशों में शुरू हुए 'ब्लैक लाइव्स मैटर' प्रदर्शन ने इस एक बार फिर हवा दे दी है.
ख़ासतौर पर जब गुलाम बनाने वाले लोगों की दर्जनों प्रतिमाएं और स्मारकों को इस विरोध-प्रदर्शन के दौरान गिरा दिया गया है.
बहुत से संस्थानों ने गुलामों से जुड़े अतीत के लिए माफ़ी भी माँगी है. इनमें चर्च ऑफ़ इंग्लैंड और लॉयड्स ऑफ़ लंदन भी शामिल हैं.
यह क़रीब तीन सौ साल पुरानी फ़ाइनेंस कंपनी है जो गुलामों के नुकसान और गुलामों के जहाज का बीमा मालिकों के लिए करती थी.
संयुक्त राष्ट्र ने भी इस मुहिम का समर्थन किया है. मानवाधिकार मामलों की उच्चायुक्त मिशेल बैचलेट ने पुराने औपनिवेशिक ताक़तों से अपील की है कि वे "सदियों की हिंसा और भेदभाव को आर्थिक सहायता के माध्यम से सुधारें."

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इस मांग के पीछे की समझ क्या है?
आर्थिक सहायता मुहैया कराना 2016 में जारी किए गए 'ब्लैक लाइव्स मैटर' मेनिफ़ेस्टो की कई मांगों मे से एक है.
दुनिया भर के एक्टिविस्ट और संगठन लंबे समय से यह माँग उठा रहे हैं. इस मांग के तहत सोच यह है कि गुलामों के वंशजों को उन्हें हुए नुकसान के लिए वित्तीय सहायता मिलनी चाहिए.
उनकी ज़िंदगियां सीधे तौर पर गुलामी की वजह से प्रभावित हुई हैं और इस कारण उनकी कई पीढ़ियां बर्बाद हुई हैं. इस अभियान को चलाने वाले लोगों ने ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार को ध्यान में रखते हुए ये मांग उठाई हैं.
इस व्यापार की वजह से 1.1 करोड़ अफ़्रीकी औरत, मर्द और बच्चे 16वीं सदी से लेकर 19वीं सदी तक गुलाम के तौर पर अमरीका में तस्करी किए गए थे.
अमरीका में यह बहस काफ़ी ज़ोर पकड़ रही है. यहां 1865 में पहली बार संसद में आर्थिक सहायता मुहैया कराने का मुद्दा उठा था.
हाल में 2019 में भी यह मुद्दा वहां की संसद में उठा था. गुलामों के वंशजों को मिलने वाले अलग-अलग मुआवज़ों का उदाहरण भी यहां मौजूद है.
लेकिन दूसरे देशों में भी गुलामी की इस विरासत को दूर करने के लिए क़दम उठाए गये हैं.
इनमें कैरेबियाई समुदाय ख़ासतौर पर शामिल हैं. 15 कैरीबियाई देशों ने साल 2013 में एक आयोग बनाया था जिसका मकसद "आर्थिक मुआवज़े के लिए नैतिक और क़ानूनी मदद प्रदान करना था."
ब्राज़ील, जहां चार शताब्दियों में क़रीब 40 लाख से अधिक अफ़्रीकी दास पहुंचाये गए, वहां की सरकार ने एक 'स्लेवरी ट्रुथ कमीशन' बनाया है ताकि ब्राज़ील में जिन लोगों ने गुलामी की वजह से यातनाएं झेली हैं, उन्हें मुआवज़ा दिया जा सके.
कुछ अफ़्रीकी देशों ने भी क्षतिपूर्ति की बात उठाई है, और एक आयोग का अनुमान है कि साल 1999 तक अफ़्रीकी महाद्वीप का अपने पूर्व यूरोपीय उपनिवेशवादियों पर 777 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर का मुआवज़ा बकाया था.
जबकि एक तरफ इंसानों के खरीदे-बेचे जाने की प्रथा 200 साल पहले ही ख़त्म कर दी गई थी, उसके दुष्परिणाम उनके सामाजिक और आर्थिक विकास पर आज भी देखे जा सकते हैं.

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अपंग करने वाली कुप्रथा
अमरीका में जब 1865 में गुलामी का उन्मूलन शुरू हुआ था तो हर आज़ाद हुए श्रमिक को 40 एकड़ ज़मीन और एक खच्चर देने का वादा किया गया था. पर असल में उन्हें नस्लवाद झेलना पड़ा जिसमें जिम क्रो क़ानून भी शामिल था जिसके अंतर्गत काले लोगों को उनके बुनियादी अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया था. ये कुख्यात क़ानून 1965 तक लागू रहा.
मुआवज़ा देने के पीछे एक तर्क ये भी दिया जाता है कि नस्लवाद की वजह से बहुत से लोग आर्थिक असमानता के शिकार हुए हैं जिसे अब संतुलित करना ज़रूरी है.
अमरीका में गोरे परिवारों की औसत आय काले परिवारों के मुक़ाबले में लगभग दस गुना ज़्यादा है. ये अंतर दोनों के जीवन की बाकी चीज़ों पर साफ़ दिखाई देता है, जैसे कि अपना घर-संपत्ति होना और उच्च-शिक्षा तक पहुंच होना.
अमरीका की पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और पुलित्ज़र पुरस्कार से सम्मानित निकोल हाना-जोन्स ने 26 जून के न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा कि "संपत्ति जोड़ना सिर्फ़ एक इंसान का काम नहीं होता, इसमें पीढ़िया लगती हैं."
निकोल उन लोगों में हैं जो इस बात पर विश्वास करती हैं कि ये मुआवज़ा इस असमानता को कम करने का एकमात्र तरीका है. वो कहती हैं, "अगर अमरीका में काले लोगों की जिंदगियों की कोई क़ीमत है तो इस देश को नारों और प्रतीकों से ऊपर उठना पड़ेगा. समय आ चुका है कि ये देश अपना कर्ज़ उतारे."

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किसको, कितना मुआवज़ा?
अमरीकी संसद की सबसे युवा महिला एलेक्ज़ांड्रा ओकासियो-कोर्तेज़ भी ये मुआवज़ा दिये जाने के हक़ में हैं.
लेकिन मुआवज़ा कितना मिलना चाहिए, किसे मिलना चाहिए और मुआवज़ा किससे मिलना चाहिए, इस पर कई बार चर्चा हो चुकी है.
कई बार यह बात उठी है कि जिन घरानों और व्यापारिक परिवारों ने गुलामों की ख़रीद-फ़रोख़्त की थी और उन पर मालिकाना हक़ जमाया था, उन्हीं से मुआवज़ा लिया जाए. पर यह बात सरकारी स्तर पर आकर रुक जाती है.
वेस्ड इंडीज़ महाविद्यालय की प्रोफ़ेसर और कैरीकॉम्स रेपरेशन्स कमिशन की उपाध्यक्ष वेरेना शेपर्ड के मुताबिक़, "हमारा देश भी इन मुआवज़ों के लिए जिम्मेदार है क्योंकि इसने ऐसा माहौल बनाया जिसमें लोगों, संस्थानों और व्यापारों को गुलामों की ख़रीद-फ़रोख़्त करने का बल मिला. इस वजह से सबसे पहले उपनिवेशवादी देशों से समझौता करना पड़ेगा कि वो विकास राशि के रूप में मुआवज़ा दें. यह एक ऐसा अधिकार है जो इन लोगों से छीन लिया गया था."
लेकिन गुलामी के असर की क़ीमत आज क्या हो सकती है?

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ड्यूक यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर विलियम डेरेटी अंदाज़ा लगाते हैं कि लगभग तीन करोड़ काले लोगों के पूर्वज गुलाम रहे हैं और ऐसे हर व्यक्ति को ढाई लाख अमरीकी डॉलर का मुआवज़ा मिलना चाहिए. पर अगर इस क़ीमत को जोड़ लिया जाये तो ये राशि अमरीकी सरकार के कुल बजट से दो गुना बैठेगी.
प्रोफ़ेसर डेरेटी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि "मुआवज़ा देने का मक़सद गोरे और काले परिवारों में आर्थिक असमानता को कम करना है."
उन्होंने कहा, "गुलामी ख़त्म होने के बाद, जब कुछ काले समुदायों ने थोड़ी बहुत समृद्धि हासिल कर भी ली थी, तो गोरों ने उन्हें निशाना बनाते हुए नष्ट कर दिया."
कुछ अन्य लोगों ने इस मुआवज़े की क़ीमत 16,200 अमरीकी डॉलर लगाई है जो प्रोफ़ेसर डेरेटी के अनुमान से काफ़ी कम है.

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मुआवज़े का एजेंडा
गुलामों के लिए मुआवज़े के समर्थकों का मानना है कि हाल ही में अमरीका में हुई नस्लभेद की घटनाओं और जॉर्ज फ़्लॉयड की मृत्यु से इस मांग को बल मिलेगा.
गैलप इंस्टीट्यूट द्वारा प्रकाशित सर्वे रिपोर्ट से ये बात सामने आयी है कि मुआवज़े के लिए आम जनता का समर्थन बढ़ा है.
अभी भी 67 प्रतिशत अमरीकी मानते हैं कि सरकार को गुलामी से पीड़ित रहे परिवारों को कैश भुगतान नहीं करना चाहिए. पर साल 2002 की तुलना में यह प्रतिशत काफ़ी कम है. साल 2002 में 81 प्रतिशत लोग ऐसा मानते थे.
काले लोगों में भी 25 प्रतिशत लोग मानते हैं कि कैश भुगतान नहीं किया जाना चाहिए.
लेखक दिमित्री लेजर लिखते हैं कि "गुलामी एक आर्थिक अपराध भी था क्योंकि गुलामों से मुफ़्त में काम करवाकर लोगों ने संपत्तियां बनाई हैं. पर मुझे नहीं लगता कि इससे पीड़ित रहे परिवारों को अब कैश दे देना इसका हल होगा."

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इतिहास पर नज़र डालें तो हम देख पाएंगे कि दुनिया में ऐसे मुआवज़े पहले भी दिये गए हैं.
जर्मनी ने 1952 से नाज़ीवाद के शिकार यहूदियों को 80 करोड़ अमरीकी डॉलर मुआवज़े के रूप में दिये थे. जर्मन कंपनियों जैसे वॉक्सवेगन और सीमेंस ने भी होलोकास्ट पीड़ितों के परिवारों को मुआवज़ा दिया है.
1988 में अमरीकी सरकार ने 82 हज़ार जापानी अमरीकियों को आर्थिक मुआवज़ा दिया था जिन्हें दूसरे विश्व युद्ध में बंदी बना लिया गया था.
अमरीका और ब्रिटेन के कुछ संस्थानों ने गुलामी की प्रथा के पीड़ितों को मुआवज़ा देना शुरू भी कर दिया है.
उदाहरण के लिए, जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय ने चार लाख अमरीकी डॉलर का सालाना फंड इक्ट्ठा करने का निर्णय लिया है.

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यूके में भी ग्लास्गो विश्वविद्यालय ने 2019 में घोषणा की कि लगभग 25 लाख अमरीकी डॉलर उन परिवारों को मुआवज़े देने के लिए रखे जाएंगे जिनके पूर्वजों ने 18वीं और 19वीं सदी में गुलामी झेली थी.
हालांकि ब्रिटेन में 1833 के गुलामी उन्मूलन एक्ट के बाद कई बड़े व्यापारों को मुआवज़ा इसलिए भी दिया गया क्योंकि उनके पास गुलाम थे और उन गुलामों के छिनने से हुए नुक़सान की भरपाई के लिए सरकार ने उन्हें ये मुआवज़े दिये. ग्रीन किंग ब्रिटेन की ऐसी ही एक व्यापारिक कंपनी थी.
साल 1848 में गुलामी उन्मूलन के बाद फ़्रांस में भी ऐसी ही नीति लागू की गई.
ब्राज़ील में, गुलाम रखने वालों ने भी सरकार पर दबाव बनाया था कि गुलामी समाप्त होने के बाद उन्हें भी मुआवज़ा मिलना चाहिए, जिसके जवाब में सरकार ने गुलामों की ख़रीद-फ़रोख़्त से जुड़े सारे काग़ज़ात जला दिये थे.
एक देश के तौर पर ब्राज़ील का गुलाम-प्रथा को बढ़ावा देने में बड़ा हाथ था, जिसके बावजूद अभी तक गुलामी से पीड़ित रहे परिवारों को मदद देने के नाम पर आज तक सिर्फ़ एक ही क़ानून बनाया गया है जिसके अंतर्गत देश के विश्वविद्यालयों में काले छात्रों के लिए साल 2012 से कुछ कोटा तय किया गया है.

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क्या गुलामी-प्रथा के इतिहास के लिए किसी देश ने माफ़ी मांगी?
गुलामी-प्रथा के पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देना, उनसे माफ़ी मांगना या उसकी ज़िम्मेदारी किसकी है? ये तय करना आसान नहीं है क्योंकि वो लोग जिन्हें गुलाम बनाया गया, अब इस दुनिया में नहीं है.
जिन भी देशों को गुलामी की प्रथा से फ़ायदा पहुंचा, उन्होंने आज तक इसके लिए आधिकारिक रूप से माफ़ी नहीं मांगी.
वेरेन शेफ़र्ड कहती हैं, "पीड़ितों और परिवारों के लिए गुलामी की वजह से हुई तकलीफ़ों से उबर पाना, इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि उनसे यूरोप की किसी भी सरकार ने कभी तहे-दिल से माफ़ी नहीं मांगी. कुछ सरकारों ने खेद ज़रूर जताया है. पर ये पीड़ितों के ज़ख़्मों पर नमक छिड़ने जैसा है क्योंकि यह बताता है कि वो पीड़ितों को माफ़ी मांगने लायक नहीं समझते."
इस संदर्भ में देखा जाये तो अमरीका एक अपवाद रहा है क्योंकि अमरीकी सरकार ने 2009 में आधिकारिक रूप से माफ़ी मांगी थी.
हालांकि, अमरीकी सरकार ने यह भी साफ़ कर दिया था कि उनके माफ़ी मांगने के बाद लोग सरकार पर किसी तरीक़े का क़ानूनी दावा नहीं कर सकते.
अमरीका में डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के हर उम्मीद की तरह, जो बाइडन ने भी गुलामी के पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा देने का मुद्दा अपने मेनिफ़ेस्टो में शामिल किया है.
कुछ दिन पहले ही यूरोपीय संघ के सदस्यों ने पूर्ण रूप से इस प्रस्ताव का समर्थन किया कि गुलामों के व्यापार को मानवता के ख़िलाफ़ अपराध की श्रेणी में रखा जाये और दो दिसंबर को गुलामी के उन्मूलन के प्रतीक के तौर पर मनाया जाये.
इन सब विवादों से इतर, इस बहस को एक नई गति मिली है जिसका अगले कुछ समय तक धीमा होना मुश्किल लगता है.
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