अमरीका में हिंसा: राष्ट्रपति ट्रंप हिंसा रोकने के लिए क्या सेना भेज सकते हैं?

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- Author, जेक हॉर्टन
- पदनाम, बीबीसी रियलिटी चेक
अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि देश के कई हिस्सों में बीते एक सप्ताह से जारी हिंसक प्रदर्शनों को रोकने के लिए वो सेना भेजेंगे.
अमरीका के मिनेसोटा के मिनेपोलिस में एक काले नागरिक जॉर्ज फ़्लायड की मौत के बाद देश के कई हिस्सों में हिसंक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए थे.
प्रदर्शनकारी वॉशिंगटन डीसी में व्हॉइट हाउस के सामने भी पहुंच गए थे.
हालात देखते हुए ट्रंप ने कहा कि हिंसा पर क़ाबू पाने में अगर राज्य और शहर प्रशासन नाकाम रहते हैं तो वो सेना भेजेंगे.
लेकिन कुछ राज्यों के गवर्नरों ने कहा है कि सरकार के पास बिना राज्य प्रशासन की अनुमति के फेडरल सेना भेजने की शक्ति नहीं है.
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तो क्या राष्ट्रपति भेज सकते हैंसेना?
सीधे तौर पर कहा जाए तो कुछ स्थिति में राष्ट्रपति ऐसा कर सकते हैं. देश में फिलहाल कई जगहों पर अमरीकी सेना की रिज़र्व फोर्स नेशनल गार्ड के सैनिक तैनात हैं.
हिंसा पर काबू पाने की कोशिश कर रहे अमरीका के 20 से अधिक राज्यों में नेशनल गार्ड के सैनिक तैनात हैं और इनके लिए राज्य सरकार और शहर प्रशासन ने ही फेडरल सरकार से गुज़ारिश की थी.
19वीं सदी में अमरीका में एक क़ानून पास किया गया था जिसके अनुसार केंद्र सरकार किन मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए सरकार को राज्यों से अनुमति चाहिए होगी, इसके बारे में विस्तार से लिखा है.
इनसरेक्शन ऐक्ट कहे जाने वाले इस क़ानून के अनुसार अगर राष्ट्रपति ये फ़ैसला लेते हैं कि राज्य की मौजूदा स्थिति देश के क़ानून को लागू करने में बाधक है या फिर नागरिकों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है तो ऐसे मामलों में उन्हें राज्यों के गवर्नरों की अनुमति की ज़रूरत नहीं है.

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साल 1807 में बने इस क़ानून के अनुसार "इंडियन्स की हिंसक घुसपैठ" से अपने नागरिकों को बचाने के लिए सरकार सेना को बुला सकती है. (उस दौरान मूल अमरीकियों के साथ जारी हंसा को देखते हुए ये क़ानून लाया गया था. इन मूल अमरीकियों को इंडियन कहा जाता था.)
बाद में देश के भीतर जारी हिंसा को रोकने और नागरिक अधिकारों को बचाने के लिए इस क़ानून के इस्तेमाल को स्वीकृति दे दी गई.
इसके बाद साल 1878 में एक और क़ानून लाया गया था जिसके अनुसार देश के भीतर सेना के इस्तेमाल के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी लेनी आवश्यक है. लेकिन क़ानूनी मामलों के एक जानकार ने बीबीसी को बताया कि किसी जगह पर राष्ट्रपति सेना भेज सकें इसके लिए इनसरेक्शन ऐक्ट उन्हें उचित ताकत देता है.
आम तौर पर ये माना जा रपहा है मौजूदा स्थिति में सेना तैनात करने के लिए राष्ट्रपति के पास सही क़ानूनी कारण हैं और इसके लिए राज्यपाल की अनुमति की उन्हें ज़रूरत नहीं.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस में लॉ प्रोफ़ेसर रॉबर्ट चेस्नी कहते हैं कि "मूल मुद्दा ये है कि राष्ट्रपति क्या करना चाहते हैं, राज्य सरकारों को उनसे मदद की गुज़ारिश करने की ज़रूरत नहीं है."
क्या इस क़ानून का पहले इस्तेमाल हुआ है?
कांग्रेस रीसर्च सर्विस के अनुसार इतिहास में कम से कम एक दर्जन बार इनसरेक्शन ऐक्ट का इस्तेमाल किया गया है. लेकिन बीते क़रीब तीन दशकों से इसका इस्तेमाल नहीं किया गया है. आख़िरी बार साल 1992 में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश ने लॉस एजेंसिल में दंगों के दौरान इस क़ानून का इस्तेमाल किया था.
1950 से 60 के दशक में जारी गृहयुद्ध के दौरान अलग-अलग राष्ट्रपतियों ने इस क़ानून का इस्तेमाल कई बार किया. इस दौरान राज्य सरकार की असहमति के बावजूद इस राष्ट्रपति ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया.
1957 में जब राष्ट्रपति ड्वाइट आइज़नहावर ने आर्कनसास में एक स्कूल में जारी विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए सेना भेजने की बात की थी तब उनके फ़ैसले का विरोध किया गया था. यहां स्कूल में एक साथ काले और गोरे छात्रों को पढ़ाने को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया था.
1960 के दशक के ख़त्म होने के बाद से इस क़ानून के इस्तेमाल में भी कमी दर्ज की जाने लगी.
साल 2006 में आए तूफ़ान कटरीना के दौरान राहत और बचाव कार्य में सेना के इस्तेमाल के लिए कांग्रेस ने इस क़ानून में संशोधन किए थे, लेकिन राज्य के गवर्नरों के विरोध के बाद ये संशोधन निरस्त कर दिए गए थे.



















