कोरोना लॉकडाउन: इमरान ख़ान क्यों चाहते हैं पाकिस्तानी नौजवान ये किताब पढ़ें?

इमरान किताब के कवर पर

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    • Author, आबिद हुसैन
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, इस्लामाबाद

पाकिस्तान में कोरोना वायरस जैसी महामारी की शुरुआत और मार्च के आख़िरी हफ़्ते से देशभर में लॉकडाउन होने की वजह से सामान्य जीवन प्रभावित है और लोगों की बड़ी संख्या इस मुश्किल से परेशान है कि समय कैसे गुज़ारा जाए.

इसी सिलसिले में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और उनकी सरकार के दूसरे नेताओं की तरफ़ से तुर्की में बने ऐतिहासिक ड्रामों को देखने के लिए कहा जा रहा है कि उनकी मदद से लोगों को अपने पूर्वजों और मुसलमानों के इतिहास से परिचय कराया जाए और पाकिस्तान का सरकारी टीवी चैनल भी इस का भरपूर प्रचार कर रहा है.

शायद इसी मक़सद से और वो लोग जो टीवी देखने से उकता गए हों या टीवी के शौक़ीन ही नहीं हों तो उनके लिए कुछ दिन पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने ट्वीट किया, "लॉकडाउन के मौसम में हमारे नौजवानों के पढ़ने के लिए एक लाजवाब सेलेक्शन."

"ये किताब उन ऐतिहासिक घटनाओं का बहुत ही सुन्दर लेकिन संक्षिप्त संयोजन है जिन्होंने इस्लामी संस्कृति को अपने दौर की सबसे बड़ी सभ्यता की शक्ल दी और उन घटनाओं से पर्दा उठाती है जो उसके ख़त्म होने की वजह बनी."

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इमरान ख़ान का ये ट्वीट था सन 2014 में प्रकाशित होने वाली किताब 'लॉस्ट इस्लामिक हिस्ट्री' यानी इस्लाम का भूला हुआ इतिहास जिसे अमरीकी शोधकर्ता फ़रास अल-ख़तीब ने लिखी है.

इमरान ख़ान के ट्वीट के बाद काफ़ी बड़ी संख्या में उनके फ़ॉलोवर्स ने कहा कि वो ये किताब पढ़ने में दिलचस्पी रखते हैं.

यहां तक कि प्रधानमंत्री के लिए डिजिटल मामलों को देखने वाले डॉक्टर अरसलान ख़ालिद ने तो किताब डाउनलोड करने का लिंक ही ट्वीट कर दिया कि जो लोग पढ़ना चाहें वो लोग फ्ऱी में किताब डाउनलोड कर लें.

बीबीसी ने जब डॉक्टर अरसलान से पूछा कि उन्होंने ये किताब ख़ुद पढ़ी है, तो उन्होंने बताया कि वो इसे शुरू करेंगे.

लेकिन इस तरह से किताब को फ्ऱी में डाउनलोड करना कहीं पाइरेसी के क़ानूनों का उल्लंघन तो नहीं है? इस सवाल पर डॉक्टर अरसलान ने कहा कि वो लेखक के संपर्क में हैं.

किताब में है क्या ?

बीबीसी ने जब 200 से भी कम पेज वाली इस किताब को पढ़ा तो एक बात जो साफ़तौर पर नज़र आई वो ये थी कि संक्षिप्त होने के बावजूद ये इस्लाम के 1400 सालों के इतिहास को समेटे हुए है.

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इसमें इस्लाम की शुरुआत, इसके सुनहरे दौर, विभिन्न रियासतों और बादशाहों की बुलंदी और फिर ख़त्म होने का हाल लिखा है और साथ-साथ मशहूर इस्लामिक स्कॉलर और रिसर्चर जैसे इब्न ख़लदून और इब्न सिना का भी ज़िक्र है.

किताब को आसान भाषा में लिखा गया है और इसमें जगह-जगह पर हाशिये में कुछ ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में जानकारी भी दी गई है जो कि किताब की केंद्रीय कथा शैली से हट कर है.

लेकिन दूसरी बात जो इस किताब को पढ़ने के बाद बहुत साफ़तौर पर उभर कर सामने आती है वो ये है कि ये बहुत ही सादा,आसानी से समझ में आने वाली एक ख़ास कथा शैली पर आधारित किताब है जो सिर्फ़ ऊपरी तौर पर जानकारी देती है और घटनाओं की असल वजह, पृष्ठभूमि और उसके विवरण के बारे में ज़िक्र नहीं करती है.

इस किताब की एक और बड़ी कमज़ोरी ये नज़र आई कि इसमें सन्दर्भ ग्रन्थ के बारे में ज़्यादा विवरण नहीं है और दो से तीन पेज में सूची है जो कि अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए काफ़ी नहीं है.

इस्लामी इतिहास के विभिन्न दौर और 'सुनहरा युग'

ये किताब ऐतिहासिक क्रम के हिसाब से लिखी गई है जिसकी शुरुआत टापू की तरह दिखने वाले अरब में इस्लाम के आने से होती है और इसके बाद इस्लाम के पैग़म्बर, उनके बाद चारों ख़लीफ़ाओं के ज़माने के बारे में ज़िक्र किया जाता है.

किताब का अधिकतर यानी तीन चौथाई भाग मुसलमानों की तीन बड़ी सल्तनतों पर आधारित है जिनमें उमय्यद सल्तनत,अब्बासी सल्तनत और उस्मानिया सल्तनत शामिल हैं.

इन तीन सल्तनतों के बारे में लिखते हुए फ़रास अल-ख़तीब ने बताया है कि उनकी कामयाबी की वजह इस्लामी शरीयत पर सख़्ती से अमल करना और पैग़म्बर की शिक्षा पर अमल करना था और उससे दूरी ही उनके ख़त्म होने की वजह बनी है.

जर्मनी में मुसलमान

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चारों ख़लीफ़ाओं के दौर के बाद मुआविया सल्तनत और इसके बाद उमय्यद सल्तनत की स्थापना और अन्य अध्याय पढ़ने से एक पॉइंट साफ़तौर पर नज़र आता है कि इस किताब में सुन्नी विचार को प्राथमिकता देते हुए इतिहास लिखा गया है.

कुछ एक जगहों, जैसे नौवें अध्याय के शुरू में, शिया मुसलमानों की रियासतों और उनके फ़ौजी दौर के बारे में नकारात्मक धारणा के साथ लिखा गया है और उन्हें मंगोलो और ईसाई लड़ाइयों के साथ शामिल किया गया है जैसे उनकी वजह से (सुन्नी) मुसलमानों की सल्तनत का ख़ात्मा हुआ है.

फ़रास अल-ख़तीब जो कि अमरीका में हाई स्कूल में अध्यापक हैं कह चुके हैं कि उनकी किताब का मक़सद ग़ैर-मुस्लिमों,और कम उम्र के मुसलमानों को एक मुस्लिम पृष्ठभूमि के साथ इतिहास से परिचय कराना है और अगर इस तरह से देखा जाये तो ये किताब काफ़ी फ़ायदेमंद है क्योंकि पूर्वी संस्कृति के लिए किया गया पश्चिमी शोध (जिसे 'ओरिएन्टलिज़्म' भी कहा जाता है) के प्रकाश में इस्लाम के बारे में निष्पक्ष चर्चा कम नज़र आती है.

इतिहास के प्रोफ़ेसर स्टीव तिमारी फ़रास अल-ख़तीब की किताब पर चर्चा करते हुए लिखते हैं कि मौजूदा स्थिति इतिहास का एक ऐसा दौर है जिसमें इस्लामोफ़ोबिया यूरोप में बड़े पैमाने पर मौजूद है, तो ऐसे में अगर एक मुसलमान लेखक की तरफ़ से लिखी गई किताब जो इस्लाम का इतिहास बयान करे वो शायद समय की ज़रूरत है, ख़ासतौर से अंग्रज़ी भाषा बोलने और समझने वाले ग़ैर-मुस्लिमों के लिए.

इसी सन्दर्भ में शोधकर्ता और लेखक तमीम अंसारी ने अपनी किताब, 'ए हिस्ट्री ऑफ़ दि वर्ल्ड थ्रू इस्लामिक आईज़', में विश्लेषण करते हुए कहा है कि इस्लामी इतिहास को पश्चिमी नज़र से देखना ग़लत है और इसे अंतिम शब्द नहीं समझना चाहिए.

लेकिन फ़रास अल-ख़तीब की इस किताब में ये नज़र आता है कि वो एक मशहूर (सुन्नी) विचार के बिना आलोचनात्मक समीक्षा का प्रचार करती है जो शायद ग़ैर मुस्लिमों में भी स्वीकार किया जा सकता है लेकिन क्या ये पाकिस्तान के पाठकों के लिए सही है?

'पतन और विकास का पैमाना क्या है और इनका निर्धारण कौन करेगा ?'

पाकिस्तान की मस्जिद

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दूसरी तरफ़ इस मुस्लिम सल्तनतों के बुलंदी पर पहुंचने और ख़त्म होने के बारे में जो लिखा गया है वो ख़ुद 'ओरिएंटलिस्ट' शैली में लिखा गया है जिसमें पहले के दौर को हमेशा सकारात्मक अंदाज़ में पेश किया जाता है.

इस हवाले से जब बीबीसी ने अमरीका के फ्ऱेंकलिन एंड मार्शल कॉलेज में धार्मिक शिक्षा के एसोसिएट प्रोफ़ेसर और हाल ही में पैग़ंबर-ए-इस्लाम पर लिखी गई किताब के लेखक शेर अली तरीन से बात की तो उन्होंने सवाल उठाया कि विकास और पतन का पैमाना क्या है और इनका निर्धारण कौन करेगा.

'राजनीतिक सल्तनत और शासन की कमी को समाजिक पतन कहना सही नहीं है'

'उपमहाद्वीप के इतिहास में 18वीं ओर 19वीं सदी में एक तरफ़ आधुनिक उपनिवेशवाद था तो दूसरी तरफ़ हमारी वैज्ञानिक परम्परा में एक ज़बरदस्त विकास था. तो इस पर सवाल बनता है कि पतन की क्या परिभाषा अपनाएंगे और क्या सिर्फ़ राजनैतिक ताक़त को ही विकास का पैमाने बनाएंगे?'

यरूशलम

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तो क्या इस किताब को पढ़ना चाहिए कि नहीं. इस सवाल के दो अलग-अलग जवाब हो सकते हैं.

अगर प्रोफ़ेसर स्टीव तिमारी की चर्चा देखें तो वो कहते हैं कि इस्लामॉफ़ोबिया के इस दौर में ये किताब इस्लाम के बारे में समझने के लिए बहुत अच्छी है और इसे इस्तेमाल करना चाहिए.

मगर इसके साथ-साथ ये बात भी ध्यान में रखनी होगी कि ये किताब इस्लाम के इतिहास को बहुत संक्षिप्त और एक ख़ास नज़रिये से पेश करती है जो शायद पाकिस्तानी पाठकों के लिए इस्लाम के 1400 सालों के पेचीदा इतिहास को गहराई से समझने के लिए काफ़ी नहीं होगी.

सवाल और जवाब

कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस क्या है?लीड्स के कैटलिन सेसबसे ज्यादा पूछे जाने वाले

    कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है

    सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं

    कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.

    ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.

    कोरोना वायरस के अहम लक्षणः ज्यादा तेज बुखार, कफ़, सांस लेने में तकलीफ़

    लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.

  • एक बार आप कोरोना से उबर गए तो क्या आपको फिर से यह नहीं हो सकता?बाइसेस्टर से डेनिस मिशेलसबसे ज्यादा पूछे गए सवाल

    जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.

    यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.

    ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.

    यह नया वायरस उन सात कोरोना वायरस में से एक है जो मनुष्यों को संक्रमित करते हैं.
  • कोरोना वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड क्या है?जिलियन गिब्स

    वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.

    कोविड-19 के कुछ लक्षणों में तेज बुख़ार, कफ़ और सांस लेने में दिक्कत होना शामिल है.

    वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.

    इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.

  • क्या कोरोना वायरस फ़्लू से ज्यादा संक्रमणकारी है?सिडनी से मेरी फिट्ज़पैट्रिक

    दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.

    ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.

    फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.

    • बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
    • जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
    • खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
  • आप कितने दिनों से बीमार हैं?मेडस्टोन से नीता

    हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.

    इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.

    अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.

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मेरी स्वास्थ्य स्थितियां

आपके सवाल

  • अस्थमा वाले मरीजों के लिए कोरोना वायरस कितना ख़तरनाक है?फ़ल्किर्क से लेस्ले-एन

    अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.

    अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.

  • क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड

    ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.

    ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

  • जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे

    कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.

    लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.

    कोरोना वायरस की वजह से वायरल निमोनिया हो सकता है जिसके लिए अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अपने आप को और दूसरों को बचाना

आपके सवाल

  • कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ

    शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.

    क्वारंटीन उपायों को लागू कराते पुलिस अफ़सर

    फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.

  • क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन

    पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

    मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.

    फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.

    यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.

  • अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट

    अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.

    सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.

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मैं और मेरा परिवार

आपके सवाल

  • मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल

    गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.

    यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.

    गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.

  • मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक

    अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.

    अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.

    ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.

  • बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस

    चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.

    ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.

    हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.

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