कोरोना वायरस: ईरान भारत के पारसियों की तारीफ़ क्यों कर रहा?

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कोविड-19 की महामारी से जूझ रहे ईरानियों के दिल में इन दिनों हिंदुस्तान के पारसियों के लिए मोहब्बत उमड़ रही है.
ईरान के विदेश मंत्री ने इस बात का ज़िक्र भी किया है कि पारसी लोग सदियों पहले हिंदुस्तान जाकर बस गए थे.
शुक्रवार को विदेश मंत्री जव्वाद ज़रीफ़ ने ट्विटर पर कोविड-19 से जारी लड़ाई में मेडिकल हेल्प भेजने के लिए भारत के पारसियों का शुक्रिया अदा किया.
उन्होंने कहा, "भारत के पारसियों के दिल में ईरान के लिए आज भी मोहब्बत कायम है. उनकी तरफ़ से ईरानियों के लिए भेजे गए कोविड-19 हेल्थ पैकेज के बदले तहे दिल से शुक्रिया."
हालांकि जावेद जरीफ़ ने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये पैकेज कब भेजे गए थे. 10वीं सदी में ईरान से पारसी शरणार्थी के तौर पर अपना घर-बार छोड़ निकल गए थे. उन्हें उस जगह की तलाश थी जहां वो अपने धर्म का स्वतंत्रता पूर्वक पालन कर सकें. उनकी तलाश गुजरात में ख़त्म हुई थी. यहां ये पर्सियन से पारसी हो गए.
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भारतीय मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार नई दिल्ली पारसी एसोसिएशन और ज़ोरोस्ट्रीयन अंजुमन ऑफ़ मुंबई के कोरोना वायरस का मुक़ाबला कर रहे ईरानियों की मदद के लिए मार्च में मेडिकल सप्लाई भेजी थी.
ईरानी समाचार एजेंसी फार्स के अनुसार भारत से ऐसे दो कार्गो शिपमेंट ईरान भेजे गए थे.
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ईरान में पारसी धर्म
दुनिया के सबसे पुराने धर्मों में से एक पारसी धर्म, इस्लाम और ईसाइयत के आने से पहले से अस्तित्व में है.
यहां तक कि इस्लाम के जन्म से पहले ईरान में पारसी हुक़ूमत में थे. लेकिन आज के ईरान में पारसी धर्म के लोग किसी सरकारी पद की ज़िम्मेदारी नहीं संभाल सकते.
ईरान के संविधान के अनुसार केवल अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित पदों पर ही पारसी नियुक्त किए जा सकते हैं.

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