कोरोना वायरस अभी की दुनिया को पूरी तरह से यूं बदल देगा

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    • Author, सिमोन मायर
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर के लिए

बीते कुछ महीनों से कोरोना की मार से जूझ रही पूरी दुनिया अगले छह महीने, एक साल या 10 साल में आज के मुक़ाबले कहां खड़ी होगी?

मैं रातों को जागता रहता हूं और सोचता रहता हूं कि मेरे अपनों का भविष्य क्या होगा. मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों का क्या होगा?

मैं सोचता हूं कि मेरी नौकरी का क्या होगा. हालांकि, मैं उन भाग्यशाली लोगों में से हूं जिन्हें अच्छी 'सिक पे' मिलती है और जो ऑफिस से बाहर रहकर भी काम कर सकते हैं. मैं यह ब्रिटेन से लिख रहा हूं जहां मेरे कई सेल्फ-एम्प्लॉयड दोस्त हैं, जिन्हें कई महीनों तक पैसे मिलने की उम्मीद नहीं है. मेरे कई दोस्तों की नौकरियां छूट गई हैं.

जिस कॉन्ट्रैक्ट के ज़रिए मुझे मेरी 80 फ़ीसदी सैलरी मिलती है वह दिसंबर में ख़त्म हो गया. कोरोना वायरस ने इकॉनमी पर तगड़ी चोट की है. ऐसे में जब मुझे नौकरी की ज़रूरत होगी, क्या उस वक़्त कोई ऐसा होगा जो भर्तियां कर रहा होगा?

भविष्य को लेकर कई अनुमान हैं. लेकिन, ये सभी इस बात पर निर्भर करते हैं कि सरकारें और समाज कोरोना वायरस को कैसे संभालते हैं और इस महामारी का अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा. उम्मीद है कि हम इस संकट के दौर से एक ज़्यादा बेहतर, ज़्यादा मानवीय अर्थव्यवस्था बनकर उभरेंगे. लेकिन, अनुमान यह भी है कि हम कहीं अधिक बुरे हालात में भी जा सकते हैं.

मुझे लगता है कि हम अपनी स्थिति को समझ सकते हैं. साथ ही दूसरे संकटों को देखकर हम यह भी अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारा भविष्य कैसा होने वाला है.

मेरी रिसर्च का फ़ोकस आधुनिक अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स पर है. इसके केंद्र में ग्लोबल सप्लाई चेन, तनख़्वाह और उत्पादकता जैसी चीज़ें हैं.

मैं इन चीज़ों पर ग़ौर कर रहा हूं कि कैसे आर्थिक क्रियाकलाप क्लाइमेट चेंज और मज़दूरों के कमज़ोर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की वजह बनते हैं.

मैं यह बात ज़ोर देकर कहता रहा हूं कि अगर हम एक सामाजिक तौर पर न्यायोचित और एक बेहतर पर्यावरण वाला भविष्य चाहते हैं तो हमें अपने अर्थशास्त्र को बदलना होगा.

कोविड-19 के इस दौर में इससे ज़्यादा मौजूं कुछ भी नहीं हो सकता है.

कोरोना वायरस महामारी के रेस्पॉन्स दूसरे सामाजिक और पर्यावरणीय संकटों को लाने वाले जरियों का विस्तार ही है. यह एक तरह की वैल्यू के ऊपर दूसरे को प्राथमिकता देने से जुड़ा हुआ है. कोविड-19 से निपटने में ग्लोबल रेस्पॉन्स को तय करने में इसी डायनेमिक की बड़ी भूमिका है.

ऐसे में जैसे-जैसे वायरस को लेकर रेस्पॉन्स का विकास हो रहा है, उसे देखते हुए यह सोचना ज़रूरी है कि हमारा आर्थिक भविष्य क्या शक्ल लेगा?

एक आर्थिक नज़रिए से चार संभावित भविष्य हैं.

पहला, बर्बरता के दौर में चले जाएं. दूसरा, एक मज़बूत सरकारी कैपिटलिज़्म आए. तीसरा, एक चरम सरकारी समाजवाद आए. और चौथा, आपसी सहयोग पर आधारित एक बड़े समाज के तौर पर परिवर्तन दिखाई दे. इन चारों भविष्य के वर्जन भी संभव हैं.

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छोटे बदलावों से नहीं बदलेगी सूरत

क्लाइमेट चेंज की तरह से ही कोरोना वायरस हमारी आर्थिक संरचना की ही एक आंशिक समस्या है. हालांकि, दोनों पर्यावरण या प्राकृतिक समस्याएं प्रतीत होती हैं, लेकिन ये सामाजिक रूप पर आधारित हैं.

हां, क्लाइमेट चेंज गर्मी को सोखने वाली कुछ खास गैसों की वजह से होता है. लेकिन, यह बेहद हलकी और सतही परिभाषा है.

क्लाइमेट चेंज की असलियत समझने के लिए हमें उन सामाजिक वजहों को ढूंढना होगा जिनके चलते हम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार कर रहे हैं.

इसी तरह से कोविड-19 भी है. भले ही सीधे तौर पर इसकी वजह एक वायरस है. लेकिन, इसके असर को रोकने के लिए हमें मानव व्यवहार और इसके वृहद रूप में आर्थिक संदर्भों को समझना होगा.

कोविड-19 और क्लाइमेट चेंज से निपटना तब कहीं ज़्यादा आसान हो जाएगा अगर आप गैर-ज़रूरी आर्थिक गतिविधियों को कम कर देंगे.

क्लाइमेट चेंज के मामले में अगर आप उत्पादन कम करेंगे तो आप कम ऊर्जा का इस्तेमाल करेंगे और इस तरह से कम ग्रीनहाउस गैसों को उत्सर्जन होगा.

कोरोना की महामारी से भले ही अभी निपटने का तरीका नहीं समझ आ रहा है, लेकिन इसका मूल लॉजिक बेहद आसान है. लोग आपस में मिलजुल रहे हैं और संक्रमण फैला रहे हैं. ऐसा घरों में भी हो रहा है, दफ़्तरों में भी और यात्राओं में भी. यह मेलजोल, भीड़भाड़ अगर कम कर दी जाए तो एक शख्स से दूसरे शख्स को वायरस का ट्रांसमिशन रुकेगा और नए मामलों में गिरावट आएगी.

लोगों के आपसी संपर्क कम होने से शायद से कई दूसरी कंट्रोल स्ट्रैटेजीज (नियंत्रण रणनीतियों) में भी मदद मिलेगी.

संक्रामक बीमारियों के लिए एक आम कंट्रोल स्ट्रैटिजी कॉन्टैक्ट ढूंढना और आइसोलेशन है. इसमें संक्रमित व्यक्ति के संपर्कों की पहचान की जाती है. इसके बाद इन्हें आइसोलेट किया जाता है ताकि संक्रमण और लोगों तक न पहुंचे. जितनी काबिलियत से आप इन कॉन्टैक्ट्स को ढूंढ लेते हैं उतने ही प्रभावी तरीके से आप संक्रमण पर काबू पाने में सफल होते हैं.

वुहान में जो हुआ उससे हमें सामाजिक दूरी और लॉकडाउन के उपाय अपनाने पड़े जो कि प्रभावी साबित हुए. राजनीतिक अर्थव्यवस्था हमें यह समझने में मदद देती है कि क्यों यूरोपीय देशों, ख़ास तौर पर यूके और यूएस में इन तरीक़ों को पहले से ही क्यों नहीं अपनाया गया.

क्षणभंगुर अर्थव्यवस्था

लॉकडाउन की वजह से ग्लोबल इकॉनमी पर प्रेशर पड़ रहा है. हमें गंभीर मंदी आती दिख रही है. आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ गई हैं और इसे देखते हुए कुछ वर्ल्ड लीडर लॉकडाउन के उपायों में ढील देने की बात कर रहे हैं.

चीज़ें ख़त्म हो जाने का अर्थशास्त्र बेहद सीधा है. कारोबार होते ही मुनाफ़ा कमाने के लिए हैं. अगर वे उत्पादन नहीं करेंगे तो वे चीज़ें बेच नहीं पाएंगे. इसका मतलब है कि उन्हें मुनाफ़ा नहीं होगा. इसका मतलब है कि उनके पास आपको नौकरी देने की कम गुंजाइश होगी.

कारोबार ऐसे वर्कर्स को अभी अपने पास बनाए रख सकते हैं और रखे भी हुए हैं जिनकी उन्हें तत्काल ज़रूरत नहीं है. आने वाले वक्त में इकॉनमी के फिर से खड़े होने की स्थिति में पैदा होने वाली डिमांड को पूरा करने में उन्हें इन वर्कर्स की ज़रूरत होगी.

लेकिन, अगर चीज़ें बिगड़ने ललेंगीं तो कारोबार इन वर्कर्स को नहीं रोकेंगे. ऐसे में बड़े पैमाने पर लोगों को या तो अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ेगा या उन्हें नौकरी जाने का डर रहेगा. ऐसे में लोग कम ख़रीदारी करेंगे. और यह पूरा चक्र फिर से शुरू हो जाएगा. हम एक आर्थिक मंदी की चपेट में आ जाएंगे.

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कोरोना के बाद इकॉनमी का क्या होगा?

जब एक सामान्य संकट आता है तो इसे सुलझाना आसान होता है. सरकारें पैसा खर्च करती हैं. सरकारें तब तक पैसा खर्च करती हैं जब तक कि लोग खपत करना और काम करना शुरू नहीं कर देते.

लेकिन, यहां सामान्य दखल से काम नहीं चलेगा क्योंकि हम कम से कम फिलहाल तो यह नहीं चाहते कि इकॉनमी रिकवर करे. लॉकडाउन का पूरा मकसद यह है कि लोग काम पर न जाएं जहां वे वायरस फैला सकते हैं.

एक हालिया स्टडी में सुझाव दिया गया है कि वुहान में लॉकडाउन को इतनी जल्दी हटाने से चीन में इस साल के आख़िर में कोरोना के मामलों का दूसरा पीक दिखाई दे सकता है.

इकनॉमिस्ट जेम्स मीडवे लिखते हैं कि कोविड-19 का सही रेस्पॉन्स युद्ध के दौरान वाली इकॉनमी नहीं है- जिसमें बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. बल्कि, हमें हमें एक एंटी-वॉरटाइम इकॉनमी की ज़रूरत है और उत्पादन में बड़े स्तर पर कटौती की.

वह लिखते हैं कि अगर हम भविष्य की महामारियों के सामने टिके रहने की ताकत चाहते हैं तो हमें एक ऐसा सिस्टम बनाना होगा जो कि उत्पादन को इस तरह से कम करने में सक्षम हो जिसमें लोगों की आजीविकाओं पर बुरा असर नहीं पड़े.

ऐसे में हमें एक अलग तरह के आर्थिक सोच की ज़रूरत है. हम अर्थव्यवस्था को बस चीज़ें ख़रीदने और बेचने के तरीके के तौर पर देखते हैं, लेकिन, अर्थव्यवस्था यह नहीं है और न ही यह ऐसी होनी चाहिए.

मूल रूप में अर्थव्यवस्था के ज़रिए हम अपने संसाधनों का उन चीज़ों को बनाने में इस्तेमाल करते हैं जिनकी ज़रूरत हमें ज़िंदा रहने के लिए है.

इस तरह से सोचने पर हमें एक अलग तरह से जीवन जीने के कई मौके दिखना शुरू हो जाएंगे. इनसे हम ज़्यादा उत्पादन करे बगैर और परेशानियों को रोककर एक अच्छा जीवन जी पाएंगे.

मैं और अन्य इकोलॉजिकल इकॉनमिस्ट इस बात को लेकर काफी पहले से चिंतित रहे हैं कि आप कैसे सामाजिक रूप से न्यायोचित रहते हुए कम उत्पादन कर सकते हैं. क्योंकि कम उत्पादन करने की चुनौती क्लाइमेट कंट्रोल से निपटने का भी एक बड़ा औजार है.

सीधी बात है जितना ज़्यादा उत्पादन उतना ज़्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन. ऐसे में आप कम उत्पादन करते हुए लोगों को नौकरी में बनाए रख सकते हैं?

इन प्रस्तावों में वर्किंग वीक को छोटा करना शामिल है. यह भी किया जा सकता है कि आप लोगों को धीरे-धीरे और कम प्रेशर में काम करने की इजाज़त दें.

इनमें से कोई भी उपाय सीधे तौर पर कोविड-19 से जुड़ा हुआ नहीं है (जिसमें मकसद उत्पादन के मुक़ाबले संपर्क कम करने का है) लेकिन, इस प्रस्ताव का मकसद भी वही है. आपको लोगों की जीवन जीने के लिए वेतन पर निर्भरता को कम करना होगा.

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इकॉनमी का क्या मक़सद है?

कोविड-19 के रेस्पॉन्स को समझने की चाबी इस चीज़ में निहित है कि इकॉनमी का क्या मतलब है.

मौजूदा वक्त में ग्लोबल इकॉनमी का मकसद पैसे के एक्सचेंज की सुविधा देना है. अर्थशास्त्री इसे एक्सचेंज वैल्यू कहता है.

मौजूदा सिस्टम का एक प्रभावी आइडिया यह है कि हम इस 'एक्सचेंज वैल्यू' में रह रहे हैं और यह 'यूज़ वैल्यू' ही है.

दरअसल, लोग उन चीज़ों पर पैसा खर्च करते हैं जिन्हें वे चाहते हैं या जिनकी उन्हें ज़रूरत है और पैसे खर्च करने की यह गतिविधि हमें बताती है कि वे इस 'यूज़' की कितनी कद्र करते हैं.

इसी वजह से मार्केट्स को समाज चलाने के सबसे बढ़िया तरीके के तौर पर देखा जाता है. वे आपको इसे अपनाने देते हैं और वे इतने लचीले हैं ताकि यूज वैल्यू के हिसाब से प्रॉडक्टिव कैपेसिटी को तैयार कर सकें.

कोविड-19 ने यह साबित कर दिया है कि हम मार्केट्स की अपनी मान्यताओं को लेकर कितने ग़लत थे. पूरी दुनिया में, सरकारें डर रही हैं कि क्रिटिकल सिस्टम्स या तो गड़बड़ा जाएंगे या ओवरलोडेड हो जाएंगे. इनमें सप्लाई चेन, सोशल केयर शामिल हैं, लेकिन सबसे ऊपर हेल्थकेयर है. इसके पीछे दो फैक्टर हैं. लेकिन, यहां हम दो फैक्टर्स की बात करेंगे.

पहला, सबसे आवश्यक सामाजिक सेवाओं में से बहुतों के ज़रिए पैसा कमाना काफी मुश्किल है. मुनाफे का एक प्रमुख कारण लेबर प्रोडक्टिविटी ग्रोथ है. कम लोगों के ज़रिए ज़्यादा काम करवाना. कई कारोबारों में लोग सबसे बड़ा लागत खर्च करते हैं. खासतौर पर ऐसे कारोबार जो कि पर्सनल इंटरैक्शन पर टिके होते हैं, जैसे कि हेल्थकेयर. ऐसे में हेल्थकेयर सेक्टर में प्रोडक्टिविटी ग्रोथ बाकी की इकॉनमी के मुक़ाबले कम रहती है. इस वजह से इसकी लागत औसत के मुक़ाबले तेज़ी से बढ़ती है.

दूसरा, कई अहम सेवाओं में नौकरियां ऐसी नहीं हैं जो कि समाज में सबसे ज़्यादा वैल्यू वाली हों. कई बढ़िया तनख़्वाह वाली नौकरियां केवल एक्सचेंज की सहूलियत देने वाली होती हैं ताकि पैसा कमाया जा सके. ये समाज में कोई बड़ा योगदान नहीं करतीं.

इसके बावजूद चूंकि ये मोटा पैसा बनाती हैं हमें तमाम कंसल्टेंट्स, एक बड़ी एड्वर्टाइज़िंग इंडस्ट्री और एक बड़ा फाइनेंशियल सेक्टर देखने को मिलता हैं.

दूसरी ओर, हम हेल्थ और सोशल सेक्टर में एक क्राइसिस देख रहे हैं जहां लोगों को अक्सर नौकरियां मजबूरी में छोड़नी पड़ती हैं. ये लोग इन नौकरियों में खुश होते हैं, लेकिन उन्हें केवल इसलिए इन्हें छोड़ना पड़ता है क्योंकि इनमें उन्हें इतना पैसा नहीं मिलता जिससे उनका घर चल सके.

बेमतलब की नौकरियां

बहुत सारे लोग बेमतलब की नौकरियां कर रहे हैं और आंशिक रूप से यह भी उन वजहों में से एक है जिनके चलते हम कोविड-19 से लड़ने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे.

यह महामारी बता रही है कि कई नौकरियां आवश्यक नहीं हैं. इसके बावजूद हमारे पास उस वक्त लड़ने के लिए लोग नहीं होंगे जब चीज़ें हाथ से निकल रही होंगी.

लोग बेमतलब की नौकरियां करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि एक ऐसे समाज में जहां इकॉनमी के गाइडिंग प्रिंसिपल एक्सचेंज वैल्यू में निहित हैं, जीवन के लिए ज़रूरी मूल चीज़ें मुख्यतौर पर मार्केट्स के ज़रिए मिलती हैं. इसका मतलब है कि आपको उन्हें ख़रीदना पड़ता है और उन्हें ख़रीदने के लिए आपको तनख़्वाह चाहिए होती है, जो कि एक नौकरी से आती है.

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि हम जिन चरम (और प्रभावी) रेस्पॉन्स कोविड-19 से निपटने के लिए देख रहे हैं वे मार्केट्स और एक्सचेंज वैल्यू के दबदबे को चुनौती देते हैं.

पूरी दुनिया में सरकारें ऐसे कदम उठा रही हैं जो तीन महीने पहले तक नामुमकिन जान पड़ते थे.

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स्पेन में निजी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया है. यूके में ट्रांसपोर्ट के तमाम जरियों के राष्ट्रीयकरण की प्रबल संभावना दिखाई दे रही है. फ़्रांस ने कहा है कि उसने बड़े कारोबारों के राष्ट्रीयकरण की तैयारी शुरू कर दी है.

इसी तरह से, हमें लेबर मार्केट्स में खलबली दिख रही है. डेनमार्क और यूके लोगों को इस चीज़ के पैसे दे रहे हैं कि वे घर पर रहें और काम पर न जाएं. एक सफल लॉकडाउन के लिए यह ज़रूरी है.

ये उपाय परफेक्ट नहीं हैं. लेकिन, यह उस सिद्धांत से शिफ़्ट है जिसका मूल यह है कि कमाई करने के लिए लोगों को काम करना पड़ता है. साथ ही यह उस दिशा की ओर उठाया गया कदम है जिसके हिसाब से अगर कोई काम नहीं भी करता है तब भी उसे जीवन जीने का अधिकार है.

इसने बीते 40 साल के प्रभावी ट्रेंड को पलट दिया है. इस दौरान मार्केट्स और एक्सचेंज वैल्यू को अर्थव्यवस्था चलाने का सबसे बढ़िया ज़रिया माना जाता रहा.

इसके चलते पब्लिक सिस्टम पर बाज़ारीकरण का भारी प्रेशर आ गया. इन पर दबाव था कि ये ऐसे चलें जैसे कि कारोबार हों जिन्हें पैसे कमाने हों, इस वजह से वर्कर्स मार्केट के ज़्यादा से ज़्यादा जोखिम में आते गए. ज़ीरो-आवर्स कॉन्ट्रैक्ट और गिग इकॉनमी ने बाज़ार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा की परत हटा दी जो कि लॉन्ग-टर्म, स्टेबल एंप्लॉमेंट ऑफर करती थी.

कोविड-19 से ये ट्रेंड उलटते दिख रहे हैं. हेल्थकेयर और लेबर हित मार्केट के हाथ से फिसल रहे हैं और ये राज्य के हाथ में जा रहे हैं. राज्य कई वजहों से उत्पादन करता है. कुछ अच्छे होते हैं और कुछ बुरे होते हैं. लेकिन, मार्केट्स के उलट राज्य केवल एक्सचेंज वैल्यू के लिए उत्पादन नहीं करता.

ये बदलाव मुझे उम्मीद देते हैं. ये हमें कई ज़िंदगियां बचाने का मौका देते हैं. इनसे यह भी इशारा मिलता है कि इनमें लंबे वक्त के बदलाव की संभावनाएं हैं जो कि हमें ज़्यादा खुश रख सकते हैं और हमें क्लाइमेट चेंज से लड़ने की ताक़त दे सकते हैं.

लेकिन, हमें यहां तक आने में इतना वक्त क्यों लगा? कई देश क्यों उत्पादन को कम करने के लिए तैयार नहीं थे? इसका जवाब वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) की हालिया रिपोर्ट में मिलता हैः उनकी सही सोच नहीं थी.

हमारी आर्थिक कल्पनाएं

गुजरे 40 साल से एक वृहद आर्थिक सहमति रही है. इससे राजनेताओं और उनके सलाहकारों के पास सिस्टम में मौजूद खामियों को देख पाने की क्षमता बेहद कम रह गई थी. वे इसके विकल्पों पर सोच नहीं पा रहे थे. यह सोच दो लिंक्ड मान्यताओं पर आधारित थीः

मार्केट वह है जो कि अच्छी क्वालिटी का जीवन देता है, ऐसे में इसे सुरक्षा मिलनी चाहिए.

मार्केट हमेशा अल्प समय के लिए आने वाले संकटों के बाद सामान्य स्थिति में लौट आता है. कई पश्चिमी देशों में यह एक आम राय है. और यूके और यूएस में यह सबसे मजबूत माना जाता है. लेकिन ये दोनों ही देश कोविड-19 के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं दिखे.

यूके में एक निजी कार्यक्रम में मौजूद लोग बताते हैं कि प्रधानमंत्री के सबसे वरिष्ठ सहयोगी की कोविड-19 को लेकर एप्रोच 'हर्ड इम्युनिटी, प्रोटेक्ट इकॉनमी' वाली थी. यानी वायरस को फ़ैलने दो ताकि लोगों में नैचुरल तरीके से इम्युनिटी पैदा हो जाए, और ज़्यादा ज़रूरी इकॉनमी को बचाना है.

हालांकि, सरकार ने इससे इनकार किया लेकिन अगर यह सही भी हो तो इसमें चौंकने जैसा कुछ नहीं है.

एक महामारी को लेकर इस तरह की राय उच्च दर्जे के लोगों के लिए नई नहीं है. मिसाल के तौर पर, टेक्सास के एक अधिकारी ने तर्क दिया कि अमरीका को आर्थिक मंदी में जाते देखने की बजाय कई बूढ़े लोग खुशी-खुशी मर जाना पसंद करेंगे.

कोविड-19 संकट से एक चीज़ हो सकती है. यह है आर्थिक कल्पनाओं का विस्तार. सरकार और नागरिक ऐसे फैसले ले रहे हैं जिनके बारे में तीन महीने पहले तक सोच पाना भी नामुमकिन था, ऐसे में दुनिया के कामकाज के तौर-तरीकों में बड़े बदलाव तेज़ रफ़्तार से आ सकते हैं.

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आइए देखते हैं कि नई कल्पनाएं हमें कहां ले जा सकती हैः

चार भविष्य

भविष्य की सैर में मदद के लिए मैं फ़्यूचर स्टडीज की एक पुरानी तकनीक का इस्तेमाल कर रहा हूं. आप वे दो फैक्टर लीजिए जिनके बारे में आपको लगता है कि वे भविष्य में ले जाने में महत्वपूर्ण होंगे. साथ ही कल्पना कीजिए कि इन फैक्टर्स के अलग-अलग कॉम्बिनेशन से क्या होगा.

मैं जिन फैक्टर्स को ले रहा हूं वे हैं वैल्यू और सेंट्रलाइजेशन. वैल्यू से मेरा मतलब हमारी इकॉनमी के गाइडिंग प्रिंसिपल से है. क्या हम अपने संसाधनों का इस्तेमाल एक्सचेंजेज़ और पैसे को अधिकतम बढ़ाने में करते हैं. या हम इनका इस्तेमाल जीवन को आगे बढ़ाने में करते हैं.

सेंट्रलाइजेशन से मतलब उन तरीकों से है जिनके ज़रिए से चीज़ें आयोजित की जाती हैं. चाहे ऐसा कई सारी छोटी यूनिट्स के ज़रिए हो या एक बड़ी कमांडिंग ताक़त के ज़रिए हो. हम इन फैक्टर्स को ग्रिड में लगा सकते हैं, इससे कई परिदृश्य पैदा किए जा सकते हैं.

ऐसे में हम यह सोच सकते हैं कि नीचे दिए चार कॉम्बिनेशंस का इस्तेमाल अगर हम कोरोना से लड़ने में करते तो क्या हो सकता था.

राज्य पूंजीवादः सेंट्रलाइज्ड रेस्पॉन्स, एक्सचेंज वैल्यू को प्राथमिकता

बर्बरताः विकेंद्रीकृत रेस्पॉन्स, एक्सचेंज वैल्यू को अहमियत

राज्य समाजवादः केंद्रीयकृत रेस्पॉन्स, जीवन की सुरक्षा को प्राथमिकता

आपसी मददः विकेंद्रीकृत रेस्पॉन्स, जीवन की सुरक्षा को अहमियत, राज्य पूंजीवाद

राज्य पूंजीवाद

राज्य पूंजीवाद एक प्रभावी रेस्पॉन्स है जो कि हमें फिलहाल पूरी दुनिया में दिख रहा है. मिसाल के तौर पर, यूके, स्पेन और डेनमार्क.

राज्य पूंजीवादी समाज एक्सचेंज वैल्यू को अर्थव्यवस्था का मूल आधार मानता रहेगा. लेकिन, यह मानता है कि संकट के वक्त मार्केट्स को राज्य की मदद की ज़रूरत होती है. यह देखते हुए कि बहुत सारे वर्कर्स बीमार होने, या अपनी ज़िंदगी को लेकर डरे हुए होने के चलते काम नहीं कर सकते हैं, राज्य और अधिक कल्याणकारी उपायों के साथ इसमें हस्तक्षेप करता है. राज्य कारोबारों को कर्ज और प्रत्यक्ष पेमेंट जैसे राहत पैकेज देता है.

यहां उम्मीद यह है कि यह सब कम वक्त के लिए होगा. उठाए गए कदमों का मुख्य फ़ोकस ज़्यादा से ज़्यादा कारोबारों को ट्रेडिंग में बनाए रखने का होगा.

मिसाल के तौर पर, यूके में फूड अभी भी मार्केट्स के ज़रिए वितरित किया जाता है. इनके ज़रिए वर्कर्स को सीधे सपोर्ट दिया जाता है. यह इस तरह से किया जाता है ताकि सामान्य लेबर मार्केट को इससे न के बराबर नुकसान हो. ऐसे में मिसाल के तौर पर, वर्कर्स को पेमेंट के लिए आवेदन और इसका वितरण एंप्लॉयर द्वारा होगा.

साथ ही पेमेंट का साइज भी वर्क के मार्केट के लिए तैयार की जा रही एक्सचेंज वैल्यू के बराबर होगा. यह उनके काम की उपयोगिता पर निर्भर नहीं होगा.

क्या यह एक सफल परिदृश्य हो सकता है? शायद यह मुमकिन है. लेकिन, केवल तब जबकि कोविड-19 एक कम समय में कंट्रोल हो जाए. अगर मार्केट को चलने देने के लिए लॉकडाउन नहीं किया जाता है तो संक्रमण के फ़ैलने का ख़तरा जारी रहेगा.

मिसाल के तौर पर, यूके में गैर-ज़रूरी कंस्ट्रक्शन अभी भी जारी है, इसके चलते वर्कर्स बिल्डिंग साइट्स पर आ रहे हैं और दूसरे लोगों से मिल रहे हैं. लेकिन, अगर मौतों में इजाफा जारी रहता है तो राज्य का सीमित दखल कायम रहना मुश्किल हो जाएगा.

बीमारों और मरने वालों की तादाद में इजाफा लोगों में नाराज़गी पैदा करेगा और इसके गहरे आर्थिक दुष्परिणाम होंगे. इसके चलते राज्य को और ज़्यादा कड़े कदम उठाने होंगे ताकि मार्केट का कामकाज चलता रहे.

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बर्बरता

इसके होने की सबसे कम संभावना है. बर्बरता तभी भविष्य हो सकती है जबकि हम एक्सचेंज वैल्यू को अपना गाइडिंग प्रिंसिपल मानते रहें और बीमारी या बेरोज़गारी की वजह से फंसे हुए लोगों को अपना सपोर्ट देने से इनकार कर दें. यह एक ऐसी स्थिति होगी जिसे हमने अभी तक नहीं देखा है.

कारोबार फेल हो जाएंगे और वर्कर्स भूखे होंगे क्योंकि ऐसा कोई मैकेनिज्म नहीं होगा जो कि मार्केट की सख्त स्थिति से उन्हें बचा पाए. असाधारण कदमों के ज़रिए हॉस्पिटलों का सपोर्ट नहीं किया जाएगा और ऐसे में लोग मरेंगे.

बर्बरता दरअसल एक अस्थिर राज्य की निशानी होगी. यह राज्य अंत में बर्बाद हो जाएगा या एक राजनीतिक और सामाजिक पतन के बाद दूसरे ग्रिड सेक्शन में चला जाएगा.

क्या ऐसा हो सकता है? चिंता यह है कि या तो ऐसा महामारी के दौरान ग़लती से हो सकता है या महामारी के चरम पर पहुंचने के दौरान जानबूझकर किया जा सकता है.

ग़लती से ऐसे हो सकता है अगर सरकार महामारी के सबसे बुरे दौर में बड़े स्तर पर दखल न दे पाए. कारोबारों और परिवारों को सपोर्ट दिया जा सकता है, लेकिन अगर बीमारों की बड़ी तादाद के चलते यह मार्केट को धराशायी होने से नहीं रोक पाया तो अफरातफरी का माहौल बन जाएगा.

हॉस्पिटल ज़्यादा पैसा और लोग लगा सकते हैं, लेकिन अगर यह चीज़ों को संभालने में नाकाफी हुआ तो बड़ी तादाद में बीमार लोगों को इलाज देने से इनकार किया जा सकता है.

महामारी के अपने चरम पर पहुंचने के बाद सरकारें सादगी (जब सरकारें बड़े पैमाने पर अपने खर्च रोक देती हैं) पर चलने का रास्ता अख्तियार कर सकती हैं. जर्मनी में इस बात का ख़तरा जताया जा चुका है. यह बेहद बुरा होगा. सादगी वाले दौर में बेहद ज़रूरी सेवाओं पर सरकारी खर्च बंद हो जाएगा और इससे महामारी से निपटने की क्षमता बुरी तरह से प्रभावित होगी.

बाद में अर्थव्यवस्था और समाज के फेल होने से एक बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हो जाएगी. इससे राज्य नाकाम हो जाएगा और सरकारी और कम्युनिटी वेल्फेयर सिस्टम्स धराशायी हो जाएंगे.

राज्य समाजवाद

यह बताता है कि भविष्य की शुरुआत में हम कल्चरल शिफ़्ट होता देख सकते हैं जो कि इकॉनमी के मूल में एक तरह की वैल्यू पैदा कर देगा. यूके, स्पेन और डेनमार्क में जिस तरह के उपाय अभी लागू किए जा रहे हैं, यह भविष्य उन्हीं का एक विस्तारित रूप होगा.

हॉस्पिटलों के राष्ट्रीयकरण और वर्कर्स के पेमेंट्स जैसे उपाय मार्केट को बचाने के टूल पर नहीं देखे जाएंगे, बल्कि यह खुद को बचाने का ज़रिया होंगे.

इस तरह के हालात में राज्य अर्थव्यवस्था के जीवन के लिए आवश्यक हिस्सों को बचाने के लिए कदम उठाएगा. इनमें खाने-पीने की चीज़ों का उत्पादन, ऊर्जा और रहने की जगह आती हैं. ऐसे में जीवन जीने के लिए कई ज़रूरी चीज़ें मार्केट के ऊपर टिकी नहीं होंगी.

सरकारें हॉस्पिटल्स का राष्ट्रीयकरण कर देंगी और घर मुफ़्त में उपलब्ध होंगे. आखिर में सभी लोगों को तमाम चीज़ों तक पहुंच मुहैया कराई जाएगी. इनमें बेसिक और कंज्यूमर गुड्स की चीज़ें भी होंगी जिन्हें कम वर्कफोर्स के ज़रिए उत्पादित किया जा सकता है.

नागरिकों को नियोक्ताओं (एंप्लॉयर्स) के सहारे की ज़रूरत नहीं होगी. हर किसी को सीधे भुगतान किया जाएगा और यह चीज़ उनके द्वारा पैदा की गई वैल्यू से जुड़ी नहीं होगी. पेमेंट्स सबके लिए एक जैसी होगी या यह काम की उपयोगिता के आधार पर तय होगी. सुपरमार्केट्स वर्कर्स, डिलीवरी ड्राइवर्स, वेयरहाउस स्टैकर्स, नर्सें, शिक्षक और डॉक्टर्स नए सीईओ होंगे.

यह मुमकिन है कि राज्य समाजवाद लंबी चलने वाली महामारी और राज्य पूंजीवाद की कोशिशों के परिणाम स्वरूप पैदा हो. अगर भयंकर मंदी आती है और सप्लाई चेन में गड़बड़ियां पैदा होती हैं तो सरकार उत्पादन पर अपना कंट्रोल ले सकती है.

इस अप्रोच के जोखिम भी हैं. हमें तानाशाही को रोकने के लिए सचेत होना होगा. लेकिन, अगर अच्छे से किया जाए तो विनाशकारी कोविड-19 के ख़िलाफ़ हमारी यह सबसे बढ़िया उम्मीद होगी.

एक मज़बूत राज्य इकॉनमी और समाज दोनों के कोर फंक्शंस को सुरक्षित रखने में संसाधनों का इस्तेमाल करने में सक्षम होगा.

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आपसी मदद

आपसी मदद को हम जीवन की सुरक्षा के लिए इकॉनमी के गाइडिंग प्रिंसिपल के तौर पर अपना सकते हैं. यह हमारा दूसरा भविष्य है. हालांकि, इस स्थिति में राज्य अहम भूमिका नहीं अपनाएगा. बल्कि, इंडीविजुअल्स और छोटे समूह अपने समुदायों में सपोर्ट और केयर करेंगे.

इस भविष्य के साथ जोखिम यह है कि छोटे समूह हेल्थकेयर की कैपेसिटी को बढ़ाने के लिए जिन संसाधनों की ज़रूरत होगी उन्हें तेज़ी से इकट्ठा नहीं कर पाएंगे.

लेकिन, आपसी मदद संक्रमण को प्रभावी तौर पर रोकने में कारगर साबित होंगे. ये समूह कम्युनिटी सपोर्ट नेटवर्क बनाएंगे जो कि जोखिम भरे लोगों को सुरक्षा देंगे और पुलिस आइसोलेशन रूल्स का पालन कराएंगे.

इस भविष्य के सबसे महत्वाकांक्षी रूप में नई लोकतांत्रिक संचरनाएं उभरती दिखाई देंगी. लोग खुद क्षेत्रीय रेस्पॉन्स प्लान करेंगे ताकि बीमारी को रोका जा सके और मरीज़ों का इलाज हो सके.

यह स्थिति बाकी किसी भी स्थिति से उभर सकती है. यह बर्बरता या राज्य पूंजीवाद का उपाय हो सकती है और यह राज्य समाजवाद को सपोर्ट कर सकती है.

हमें पता है कि पश्चिम अफ्रीका में शुरू हुए इबोला से निपटने में कम्युनिटी रेस्पॉन्स का कितना बड़ा रोल था. हम इसे राज्य के रेस्पॉन्स की नाकामी के तौर पर भी देख सकते हैं.

उम्मीद और डर

ये विजन चरम परिदृश्य हैं जो कि एक-दूसरे को काटकर आगे बढ़ सकते हैं. मेरा डर है कि हम राज्य पूंजीवाद से बर्बरता में जा सकते हैं.

मेरी उम्मीद राज्य समाजवाद और आपसी मदद के घालमेल की है. एक ऐसा मजबूत और लोकतांत्रिक राज्य जो कि कहीं ज़्यादा मजबूत हेल्थ सिस्टम को खड़ा करने के लिए संसाधनों को इकट्ठा करेगा. एक ऐसा राज्य जो जोखिम भरे तबके में आने वालों को मार्केट के चक्र से बाहर निकालेगा और नागरिकों को आपसी मदद समूह स्थापित करने लायक बनाएगा. एक ऐसा राज्य जो लोगों को उन्हें बेमतलब की नौकरियां करने के दौर से बाहर निकालेगा.

एक चीज़ तय है कि ये सभी परिदृश्य कुछ डराते भी हैं, लेकिन कुछ उम्मीद भी पैदा करते हैं.

कोविड-19 ने हमारे मौजूदा सिस्टम की खामियों को उजागर कर दिया है. इसके लिए एक तीव्र सामाजिक बदलाव की ज़रूरत होगी.

मैंने तर्क दिया है कि इसके लिए मार्केट्स और मुनाफे को अर्थव्यवस्था चलाने के मूल साधन से निकालने की ज़रूरत पड़ेगी.

इसकी अच्छाई में यह संभावना होगी कि हम कहीं ज़्यादा मानवीय तंत्र का निर्माण करेंगे जो कि हमें भविष्य की महामारियों और क्लाइमेट चेंज जैसे दूसरे आसन्न ख़तरों से लड़ने के लिए ज़्यादा दृढ़ और टिकाऊ बनाएगा.

सामाजिक बदलाव कई जगहों से और कई प्रभावों से आ सकता है.

हमारे लिए एक अहम काम यह है कि हम यह मांग करें कि उभरते हुए सामाजिक रूप, देखभाल, जीवन और लोकतंत्र जैसी चीज़ों को अहमियत देने वाली नैतिक सिद्धातों से पैदा हों.

संकट के इस वक्त में राजनीति का मुख्य काम इन वैल्यूज के इर्दगिर्द चीज़ों को खड़ा करने का है.

*सिमोन मायर यूनिवर्सिटी ऑफ सरे में इकोलॉजिकल इकनॉमिक्स में रिसर्च फेलो हैं.

*यह आर्टिकल द कनवर्सेशन में मूलरूप में प्रस्तुत हुए एक पीस पर आधारित है. इसे क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के तहत दोबारा प्रकाशित किया गया है.

कोरोना वायरस
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इमेज स्रोत, MOHFW_INDIA

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