कोरोना वायरस: दुनिया भर में वेंटिलेटर बनाने की होड़

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जैसे जैसे दुनिया भर में कोरोना वायरस की महामारी बढ़ रही है, वैसे वैसे एक रेस तेज़ होती जा रही है.

दुनिया भर के हार्डवेयर विशेषज्ञ और उत्साही लोग, इस नए संकट में मानवता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में जुट गए हैं.

लातिन अमरीकी देश चिली के रहने वाले मार्टिन सेरे बताते हैं, "मैंने स्पेन के बार्सिलोना में रहने वाले अपने एक दोस्त की इंस्टाग्राम पोस्ट देखी. एक रोज़ जब मैं सो कर उठा तो मुझे लगा कि हमारे देश में भी तो वही समस्या होने वाली है. क्योंकि कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले तो हमारे यहां भी बढ़ते जा रहे हैं."

मार्टिन सेरे ने अपने एक दोस्त के साथ मिल कर पोमो नाम की स्टार्ट अप कंपनी शुरू की है. जो दिल का दौरा झेलने वाले लोगों के लिए कृत्रिम अंग बनाती है.

अब मार्टिन की कंपनी ने अपने इस काम को छोड़ कर वेंटिलेटर बनाने पर ध्यान लगा दिया है.

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एक ही तरीक़ा था, लॉकडाउन

इस वक़्त कोरोना वायरस की महामारी के चलते, दुनिया को जितने वेंटिलेटर की ज़रूरत है, अस्पतालों में उतने उपलब्ध नहीं हैं. फिर चाहे विकसित देश हों, या विकासशील देश.

लंदन के इम्पीरियल कॉलेज की एक रिपोर्ट का अंदाज़ा है कि नए कोरोना वायरस से संक्रमित तीस फ़ीसद मरीज़ों को इलाज के लिए वेंटिलेटर की दरकार होगी.

आईसीयू में मरीज़ों की बाढ़ आने से रोकने का एक ही तरीक़ा था, लॉकडाउन. क्योंकि इससे सामाजिक संपर्क लगभग 75 प्रतिशत तक कम हो जाता है.

मगर, कई देशों ने लॉकडाउन में ढिलाई बरती. और कई देशों में ये सवाल उठ रहा है कि क्या वो कई महीनों तक ये सामाजिक अलगाव झेल पाएंगे?

नतीजा ये कि दुनिया के कई हिस्सों में वेंटिलेटर की मांग में बेतहाशा इज़ाफ़ा होने की आशंका है.

इसकी मिसाल, अमरीका के न्यूयॉर्क राज्य के गवर्नर की वो अपील है, जिसमें उन्होंने ट्रंप प्रशासन से 30 हज़ार वेंटिलेटर मुहैया कराने की गुज़ारिश की है.

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वेंटिलेटर की डिज़ाइन

अगर काम की बात करें, तो वेंटिलेटर कोई जटिल मशीन नहीं होते.

असल में वो एक परिष्कृत पंप होते हैं, जो सांस लेने में दिक़्क़त महसूस करने वाले इंसान के फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचाते हैं और कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर निकालते हैं. यानी वो फेफड़ों की मदद करते हैं.

तो, सवाल ये है कि वेंटिलेटर डिज़ाइन करना इतना मुश्किल क्यों है?

असल में वेंटिलेटर के काम करने का तरीक़ा भले जटिल न हो, लेकिन, उनका जो काम है वो बेहद संवेदनशील है. इसमें एक इंसान की जान दांव पर लगी होती है.

कोलंबिया के इंजीनियर मॉरिसियो टोरो कहते हैं, "अगर वेंटिलेटर फेल होते हैं, तो इंसान की जान जाने की आशंका बढ़ जाती है. इसी कारण से उन्हें बनाना बेहद मुश्किल होता है."

मॉरिसियो ने मेडेलिन नाम के एक ग्रुप के साथ मिल कर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध संसाधनों से तीन अलग अलग तरह के वेंटिलेटर तैयार किए हैं.

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सवालिया निशान

कोरोना वायरस के चलते आईसीयू में डॉक्टरों को ज़्यादा से ज़्यादा मरीज़ों की देख-भाल करनी होगी.

ऐसे में सांस लेने में मददगार वेंटिलेटर के काम पर सवालिया निशान का जोखिम नहीं लिया जा सकता.

उन्हें भरोसेमंद बनाने का एक ही तरीक़ा है, लंबे समय तक उनका परीक्षण करना. ताकि उनमें कोई ख़ामी हो तो दूर की जा सके.

सामान्य हालात में इस टेस्टिंग में बहुत समय लगता है. लेकिन, अभी हालात ऐसे हैं कि वेंटिलेटर्स की ज़रूरत तुरंत है.

क्योंकि, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि कोविड-19 का टीका तैयार होने में अभी कम से कम डेढ़ साल और लग जाएंगे.

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मुक़ाबला जारी है...

तमाम देशों की सरकारों और स्वास्थ्य अधिकारियों को इस चुनौती का अंदाज़ा है. ब्रिटेन की सरार अगले दो हफ़्ते में 1200 नए वेंटिलेटर अस्पतालों को मुहैया कराएगी.

कहा जा रहा है कि जब ब्रिटेन में कोरोना वायरस का प्रकोप अपने चरम पर होगा, तो वहां तीस हज़ार वेंटिलेटर्स की ज़रूरत होगी.

इसीलिए, ब्रिटेन की सरकार ने अन्य उपकरण बनाने वाली कंपनियों से भी कहा है कि वो युद्ध स्तर पर वेंटिलेटर बनाने का काम करें.

फिलिप्स कंपनी दुनिया में मेडिकल उपकरण बनाने वाली बड़ी कंपनी है.

फिलिप्स के अधिकारियों ने बीबीसी को बताया कि कंपनी ने अन्य ग़ैर ज़रूरी काम छोड़ कर सारा ज़ोर वेंटिलेटर बनाने पर लगा दिया है.

इसके लिए कामगारों की शिफ्ट बढ़ा दी गई है. साथ ही और लोग काम पर रखे जा रहे हैं. साथ ही दूसरे कामों में लगे कर्मचारी भी वेंटिलेटर बनाने के काम में लगाए जा रहे हैं.

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चीन में काम पहले से ही बंद है...

कई अन्य बड़ी कंपनियां भी ऐसा ही कर रही हैं. क्योंकि, दुनिया को वेंटिलेटर के बड़े सप्लायर चीन में काम पहले से ही बंद है.

यहां तक कि फॉर्मूला वन रेस से जुड़ी कंपनियां भी यही काम कर रही हैं. वैक्यूम क्लीनर बनाने वाली कंपनी, डायसन को दस हज़ार वेंटिलेटर बनाने का ऑर्डर मिल चुका है.

सोने के दौरान सांस उखड़ने की शिकायत करने वाले मरीज़ों के लिए मास्क (CPAP) बनाने वाली कंपनी स्मिथ्स मेडिकल ने भी वेंटिलेटर और मास्क बनाने का काम तेज़ कर दिया है.

इसके अलावा, मेडिकल और इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ आसानी से उपलब्ध सामान की मदद से तुरंत वेंटिलेटर बनाने के काम में जुटे हैं.

साथ ही ऐसे उपकरण भी बनाए जा रहे हैं, जिनसे एक वेंटिलेटर से दो या अधिक मरीज़ों का इलाज हो सके.

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अपने से बनाए जा सकने वाले वेंटिलेटर...

पर, विकसित देशों के पास तो इतने संसाधन हैं कि वो वेंटिलेटर का उत्पादन बढ़ा कर अपनी मांग को पूरा कर लेंगे. लेकिन, विकासशील देशों के पास इतने संसाधन नहीं हैं.

और सच तो ये है कि विकसित और अमीर देशों में भी वेंटिलेटर्स की इतनी मांग है कि इनके दाम आसमान छूने लगे हैं.

न्यूयॉर्क की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की लेक्चरर एंड्रिया इप्पोलिटो कहती हैं कि, 'अगर वेंटिलेटर की मांग नहीं है तो कोई भी इसे ख़ुद से बनाने का जोखिम नहीं लेगा.

लेकिन, जब सांस न ले पाने से हज़ारों लाखों लोगों की मौत हो रही हो, तो आप क्या करेंगे. आपके पास कोई और विकल्प नहीं होगा.'

इसीलिए आज दुनिया भर में हज़ारों विशेषज्ञ, उद्ममी और स्वयंसेवी लोग अलग तरह से इस समस्या का समाधान तलाश रहे हैं.

इसके लिए, सहज तौर पर उपलब्ध संसाधनों से वेंटिलेटर बनाने का प्रयास किया जा रहा है. और इन नए डिज़ाइन को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जा रहा है.

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प्रोटोटाइप वेंटिलेटर

ताकि, अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमरीका के विकासशील देशों के लोग इन डिज़ाइन की मदद से अपने लिए वेंटिलेटर बना सकें.

और इससे कॉपीराइट का कोई मसला न उठे.

ये डिज़ाइन बनाने वाले बिजली की रफ़्तार से काम कर रहे हैं. अकेले मार्च महीने में दर्जन भर प्रोटोटाइप वेंटिलेटर, इंटरनेट पर उपलब्ध कराए गए हैं.

और अलग अलग सोशल मीडिया के ज़रिए भी इनके बारे में दूर-दराज़ तक जानकारी पहुंचाई जा रही है.

आयरलैंड की राजधानी डब्लिन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में पढ़ाने वाले कॉलिन क्यो 3D प्रिंटिंग के एक्सपर्ट हैं.

वो सामुदायिक तौर पर उपलब्ध संसाधनों से वेंटिलेटर का पहला प्रोटोटाइप तैयार कर चुके हैं. जो एंबुलेंस में काम आने वाले 'एम्बु बैग' की तरह काम करता है.

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आसानी से उपलब्ध

कॉलिन कहते हैं, "हम ऐसे इमरजेंसी वेंटिलेटर बना रहे हैं, जो तुरंत काम आ सकें. ताकि कहीं वेंटिलेटर की कमी हो तो उनका भी इस्तेमाल हो सके."

पोमो के संस्थापक मार्टिन सेरे का भी यही मक़सद है. हालांकि, वो 3D प्रिंटिंग से तैयार संसाधनों के बजाय और आसानी से उपलब्ध कल पुर्ज़ों से वेंटिलेटर तैयार कर रहे हैं.

जैसे कि एक तार, बैग टांगने का एक ऐसा स्टैंड जिसे बड़ी आसानी से एल्यूमिनियम से बना सकते हैं और एक इलेक्ट्रिक मोटर जो किसी भी हार्डवेयर की दुकान में मिल जाए.

इसी तरह, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और लंदन के किंग्स कॉलेज ने ऑक्सवेंट (OxVent) नाम का प्रोजेक्ट शुरू किया है. जो प्रोटोटाइप वेंटिलेटर विकसित कर रहा है.

किंग्स कॉलेज लंदन के वरिष्ठ लेक्चर फेडरिको फोर्मेंटी कहते हैं, "ये उतना जटिल उपकरण नहीं है, जैसा आज अस्पतालों में इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन, सुरक्षा और काम के लिहाज़ से वैसा ही है."

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राह में आ रही बाधाएं...

ऐसी मशीनों की मदद से पुराने वेंटिलेटर जैसा काम लिया जा सकता है, ताकि इमरजेंसी में लोगों की मदद की जा सके.

फोर्मेंटी की टीम इस वेंटिलेटर को आसानी से उपलब्ध कल पुर्ज़ों से ही बना रही है.

जो बाज़ार में सहजता से मिल जाएं. ताकि, अन्य देशों के लोग भी इन्हें ख़ुद से तैयार कर सकें.

इन प्रोटोटाइप वेंटिलेटर्स सबसे बड़ी दिक़्क़त ये है कि इन्हें अमरीका की एफडीए (FDA) या ब्रिटेन की एमएचआरए (MHRA) जैसी मानक तय करने वाली संस्थाओं से मंज़ूरी मिलने में समय लगेगा. और कोरोना महामारी के इस दौर में समय ही तो नहीं है.

इसीलिए, अप्रूवल लेने में समय गंवाने के बजाय कई लोग, दूसरे तरीक़े अपना रहे हैं. जैसे कि एंड कोरोना वायरस नाम का ग्रुप, 'आयरन लंग' नाम के बनावटी फेफड़ों में अपने वेंटिलेटर को टेस्ट करता है. उन्हें लगता है कि ये टेस्ट पास करने के बाद डॉक्टर उनके वेंटिलेटर इस्तेमाल करने में हिचकिचाएंगे नहीं.

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तकनीक का इस्तेमाल

वेंटिलेटर बनाने के लिए ज़रूरी कल पुर्ज़ों का अच्छा होना भी एक चुनौती है. क्योंकि वेंटिलेटर से होकर ऑक्सीजन गुज़रती है और इससे कल पुर्ज़े घिसते जल्दी हैं.

तो ऐसे कल पुर्ज़े इस्तेमाल किए जाने चाहिए जो आग न पकड़ें.

ये एक बड़ी मुश्किल है: चूंकि 3D प्रिंटिंग से तो उपकरण कीटाणु रहित हो जाते हैं.

लेकिन, इसमें जो प्लास्टिक इस्तेमाल होता है, वो छेददार होता है और उसे साफ़ रखना मुश्किल होता है. तो ऐसी तकनीक का इस्तेमाल होना भी ज़रूरी है, जिससे कोई हिस्सा इस्तेमाल होने के बाद फेंका जा सके. और इस्तेमाल से पूरी मशीन ही न बेकार हो जाए.

और डिज़ाइन की ये सारी कमियां इंजीनियर दूर भी कर लें, तो ये डॉक्टरों को इस्तेमाल करने में आसानी वाली होनी चाहिए.

तभी इस संकट में ये वेंटिलेटर उपयोगी साबित हो सकेंगे. और उन्हें इस्तेमाल करने के लिए अस्पताल के कर्मचारियों को ज़्यादा ट्रेनिंग देने की ज़रूरत नहीं होगी. और वेंटिलेटर की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सकेगा.

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समय और श्रम की बर्बादी न हो...

फोर्मेंटी और ऑक्सवेंट (OxVent) की टीम की कोशिश ये है कि वो अभी अस्पतालों में उपलब्ध वेंटिलेटर का आसानी से बनाया जा सकने वाला विकल्प तैयार कर सकें.

ताकि, वो बनें भी जल्दी और आसानी से. साथ ही साथ उनका इस्तेमाल करना भी आसान हो. ऐसे 20 प्रोटोटाइप के अध्ययन से पता ये चला कि इनमें से केवल एक ही आसानी से इस्तेमाल होने लायक़ था.

इस काम में एक और चुनौती ये है कि सभी स्वयंसेवियों और उत्साही लोगों को इस काम में एक साथ जोड़ा जा सके. ताकि समय और श्रम की बर्बादी न हो.

अमरीका की सॉफ्टवेयर डेवेलपर डायना रोडरिग्ज़ कहती हैं कि, 'लोगों के प्रयासों को एकजुट करना बहुत बड़ी चुनौती है. कुछ लोग बहुत मेहनत कर रहे हैं.

उनके पास बहुत जानकारी भी है. लेकिन, ये जटिल ममला है. इसलिए, लक्ष्य साफ़ होना चाहिए और काम का बंटवारा हो जाना चाहिए. ताकि कम समय में अधिक काम हो सके.

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चुनौती से पार पा लिया जाएगा...

क्योंकि सबके पास एक जैसा हुनर नहीं होता, तो उन लोगों का फ़ायदा उठाने की ज़रूरत है, जो अपने काम में माहिर हैं.'

ख़ुशक़िस्मती से सार्वजनिक रूप से सॉफ्टवेयर और तकनीक उपलब्ध कराने वाले आंदोलनों के पास पहले से ये अनुभव है कि वो अलग-अलग देशों में काम कर रही टीमों को कैसे एकजुट और संगठित करें. तो इस चुनौती से पार पा लिया जाएगा.

और ज़्यादातर डिज़ाइनर्स और वेंटिलेटर बनाने वालों के लिए ये समस्या दोयम दर्जे की है.

उनका मक़सद ज़्यादा अहम है. और वो है-लोगों की ज़िंदगियां बचाने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा वेंटिलेटर बनाना.

कॉलिन क्यो कहते हैं, "इस काम का किया जाना ज़रूरी है. इसीलिए हम बहुत कम सो कर हज़ारों घंटे इस मक़सद में लगा रहे हैं. अपनी ज़िंदगी की और ज़रूरतों को दरकिनार कर रहे हैं. क्योंकि सवाल ज़िंदगी को मौत के आगोश में जाने से बचाने का है."

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