पाकिस्तानः 'आदमख़ोर भाई' रिहा होते ही भेजे गए जेल

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- Author, अजीज़ुल्ला खान
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
पाकिस्तान में मरे हुए लोगों का मांस खाने के आरोपों में जेल गए भाइयों को सज़ा पूरी होने पर रिहा कर दिया गया था.
लेकिन, सुरक्षा के मद्देनज़र दोनों भाइयों को फिर से जेल में डाल दिया गया है. ये दोनों भाई पंजाब प्रांत के भक्कर ज़िले से आते हैं.
भक्कर ज़िले के डिप्टी कमिश्नर आसिफ़ अली ने बीबीसी को बताया कि इन दोनों भाइयों के रिहा करने से इस इलाक़े की शांति को ख़तरा पैदा हो सकता था. ऐसे में मौजूदा माहौल को देखते हुए इन्हें एक महीने के लिए जेल भेज दिया गया है.
उन्होंने कहा, "कोरोना वायरस और सोशल मीडिया पर इन दोनों की रिहाई को लेकर हो रहे विरोध के चलते प्रशासन चिंतित था. इस वजह से अधिकारियों ने दोनों को फिर से हिरासत में लेने का फैसला लिया."
इस तरह की ख़बरें आई थीं कि ये दोनों भाई कई कब्रों से शवों को निकाल चुके थे. इस वजह से इनकी रिहाई से स्थानीय लोगों में ख़ासी नाराज़गी थी.
इन दोनों भाइयों को मियांवाली की केंद्रीय जेल से रिहा किया जना था और रिहा होने से एक दिन पहले ही अधिकारियों ने इन्हें भक्कर पुलिस को सौंप दिया गया था ताकि इन्हें लोगों के गुस्से का सामना न करना पड़े.

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कौन हैं ये मृत लोगों को खाने वाले?
मोहम्मद आरिफ़ अली और मोहम्मद फ़रमान अली, दरया ख़ान तहसील के गांव कहावर के रहने वाले हैं. यह इलाका सिंधु नदी के पास भक्कर जिले में आता है.
स्थानीय पत्रकार नावेद यूनुस ने बताया कि इनके परिवार का मूल पेशा खेती है. इनके पास सिंधु नदी से लगे हुए काछा इलाके में अच्छी-खासी खेती की जमीन है.
यूनुस के मुताबिक़, इन दोनों भाइयों के पिता और दूसरे परिवारीजनों का इलाके में काफ़ी सम्मान है.
पुलिस का कहना है कि दोनों भाई अपने घर में अकेले ही रहते थे. इनके पिता, पत्नियां और बच्चे पहले ही इन्हें छोड़ चुके थे. दोनों भाई पिता के दिए गए अनाज से गुज़ारा करते थे. आजीविका के लिए दोनों ही भाई कोई काम नहीं करते थे.
जब इन्हें गिरफ़्तार किया गया था उस वक्त इनकी उम्र 35 से 40 साल के बीच थी. लेकिन, जब इन्हें अभी रिहा किया गया तो उनके चेहरों पर झुर्रियां पड़ चुकी थीं, इनकी कमर झुक गई थी और इनको चलने और खड़े होने में मुश्किल हो रही थी.

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इंसानी मांस के पकने की गंध से पकड़े गए दोनों?
यह अप्रैल 2011 की बात है. स्थानीय लोगों की शिकायत पर दरया ख़ान तहसील की पुलिस ने आरिफ़ और फ़रमान के घर पर छापा मारा. इनके घर से मानव मांस बरामद किया गया.
एक ख़बर में यह भी कहा गया था कि इन भाइयों ने एक लड़की के शव को कब्र से निकाल लिया था और उसे घर ले आए थे.
पुलिस ने दोनों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया और इन्हें कब्रों की बेअदबी के ख़िलाफ़ बने क़ानून के तहत एक साल की कैद और दो लाख रुपये का जुर्माना भरने की सज़ा दी गई. कानून के मुताबिक़, अगर जुर्माना अदा नहीं किया जाता है तो छह महीने की सज़ा बढ़ा दी जाती है.
इन दोनों भाइयों की हरकत पर स्थानीय स्तर पर कड़ी नाराज़गी सामने आई थी. वकीलों के मुताबिक़, इन्हें मई 2013 को रिहा कर दिया गया.
इसके बाद अप्रैल 2014 में, इलाके के लोगों ने फिर शिकायत की कि उन्होंने मांस पकने की गंध सूंघी है. लोगों ने पुलिस को बुला लिया. पुलिस ने एक बार फिर दोनों भाइयों के घर से मानव मांस को बरामद किया. पुलिस को घर से एक बच्चे का सिर भी मिला. पुलिस ने दोनों भाइयों को फिर से गिरफ़्तार कर लिया.

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मृत लोगों का मांस खाने के ख़िलाफ क्या है क़ानून?
दोबारा गिरफ़्तार होने के बाद दोनों भाइयों पर चरमपंथ निरोधी कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है.
सरगोधा की एंटी-टेररिज़्म कोर्ट में इन भाइयों को जून 2014 में 12 साल की जेल और जुर्माने की सज़ा दी गई थी.
वकीलों के मुताबिक़, इन्हें वास्तव में केवल छह साल जेल में बिताने थे. पाकिस्तान में मानव मांस खाने के ख़िलाफ़ कोई कानून नहीं है.
ऐसे में जब दोनों भाइयों को पहली बार पकड़ा गया था तब इन्हें कब्रों की बेअदबी के जुर्म में सज़ा दी गई थी. इस कानून के तहत, तीन साल की जेल और जुर्माने का प्रावधान है.
जब यह मामला उछला तो क़ानून बनाने की मांग उठी. उस वक्त एक बिल पेश किया गया. इस बिल को बाद में स्टैंडिंग कमेटी (स्थायी समिति) के पास भेजा गया.
इसके बाद बिल कहां गया किसी को पता नहीं.

क्या ये मनोरोगी हैं?
जेल सूत्रों के मुताबिक, जेल में रहने के दौरान इन भाइयों का व्यवहार काफ़ी अच्छा था और इनके क्रियाकलापों से कभी ऐसा नहीं लगा कि ये मनोरोगी हैं.
कुछ शारीरिक बीमारियों के इलाज के लिए इन्हें हॉस्पिटल भी भेजा गया.
माना जा रहा है कि इनका मानसिक बीमारी का इलाज चला है, लेकिन जेल के सूत्रों ने इसकी पुष्टि नहीं की है.
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