कश्मीर पर यूएन मानवाधिकार उच्चायोग ने जताई चिंता

संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायोग के प्रवक्ता रुपर्ट कॉवेल

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायोग के प्रवक्ता रुपर्ट कॉवेल

भारत प्रशासित कश्मीर के हालिया घटनाक्रम पर संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायोग के प्रवक्ता रुपर्ट कॉवेल ने 'गहरी चिंता' जताई है और कहा है कि इससे 'मानवाधिकार की स्थिति और बिगड़ेगी.'

रुपर्ट कॉवेल ने घाटी में टेलीफ़ोन सेवाओं को प्रतिबंधित करने, मनमाना तरीक़े से नेताओं को हिरासत में लेने और राजनीतिक रूप से इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाने पर चिंता व्यक्त की है.

बीते रविवार से घाटी पूरी तरह बंद है और संचार के सारे साधन काट दिए गए हैं. भारत सकार ने जम्मू कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा ख़त्म कर दिया है, तब से ये हालात बने हुए हैं.

संविधान में अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा हासिल था. विदेश मामलों, रक्षा और संचार के अलावा ये अनुच्छेद राज्य को अपने बाकी क़ानून ख़ुद बनाने का अधिकार देता था.

इस पूरे हिमालयी क्षेत्र पर भारत और पाकिस्तान दोनों दावा करते हैं लेकिन दोनों ही इसके अलग-अलग हिस्से को नियंत्रित करते हैं.

विशेष दर्जे को रद्द करने के साथ ही दिल्ली ने इस क्षेत्र के साथ अपने रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया है.

कश्मीर

इमेज स्रोत, EPA

कश्मीर में क्या हो रहा है?

सोमवार को संसद में इसकी घोषणा से पहले बीजेपी सरकार ने दसियों हज़ार सुरक्षा बल कश्मीर में तैनात करने के आदेश दे दिए थे.

रविवार की शाम से ही घाटी में इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन नेटवर्क और लैंडलाइन फ़ोन बंद कर दिया गया और दो पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत राजनीतिक दलों के नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया. वे अब भी कथित रूप से नज़रबंद हैं.

भारत सरकार ने घाटी में प्रतिबंधों को सही ठहराया है और कहा है कि अशांति और हिंसा रोकने के लिए उसने ऐसा किया है.

घाटी में कुछ लोगों से बीबीसी ने बात की और कुछ प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों पर पत्थरबाज़ी की घटनाएं भी पता चली हैं.

कश्मीर में साल 1989 से ही भारतीय प्रशासित कश्मीर में अशांति है और सुरक्षा बलों को लगातार हिंसक प्रदर्शनों का सामना करना पड़ता है. इसमें अब तक हज़ारों लोगों की जानें जा चुकी हैं.

बहुत से लोगों का कहना है कि जिस पैमाने पर इस बार कश्मीर में प्रतिबंध लागू किए गए हैं वो अभूतपूर्व हैं.

कश्मीर

इमेज स्रोत, Getty Images

संयुक्त राष्ट्र का क्या कहना है?

ट्विटर पर एक वीडियो बयान जारी करने वाले संयुक्त राष्ट्र प्रवक्ता ने कश्मीर में मानवाधिकार के हालात पर अपनी चिंता को साझा किया है.

संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायोग के प्रवक्ता रुपर्ट कॉवेल, "एक रिपोर्ट में ये पहले से दर्ज है कि विरोध को दबाने के लिए प्रशासन लगातार संचार माध्यमों पर प्रतिबंध लगाता रहा है और राजनीतिक विरोधियों को रोकने के लिए मनमानी गिरफ़्तारियां की जाती रही हैं. प्रदर्शनों से निपटने के लिए अत्याधिक बल का इस्तेमाल किया जाता है जिसकी वजह से ग़ैरक़ानूनी हत्याएं होती हैं और लोग गंभीर रूप से घायल होते हैं."

छोड़िए X पोस्ट
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट X समाप्त

बयान के अनुसार, "संयुक्त राष्ट्र संचार माध्यमों पर पूरी तरह प्रतिबंध को अभूतपूर्व मान रहा है. शायद ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था."

उन्होंने चेतावनी दी है कि इन प्रतिबंधों से जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक बहस में लोगों की हिस्सेदारी कम होगी.

कश्मीर

इमेज स्रोत, Getty Images

कश्मीर को विवादित इलाक़ा क्यों माना जाता है?

इस इलाक़े को लेकर परमाणु शक्ति सम्पन्न दोनों पड़ोसी देशों के बीच दो बार जंग हो चुकी है.

भारत के फ़ैसले के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि ये अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन है.

पाकिस्तान ने भारत के राजदूत को निष्कासित करने के आदेश देने के साथ भारत के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते भी ख़त्म करने का फ़ैसला किया है.

इससे दोनों देशों में तनाव और गहरा गया है. भारत ने पाकिस्तान के बयान पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा है अनुच्छेद 370 उसका आंतरिक मामला है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)