बांग्लादेश चुनाव से भारत की ये दूरी क्यों?

पीएम नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना

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इमेज कैप्शन, साल 2017 में नई दिल्ली में हुई मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शेख हसीना
    • Author, शुभज्योति घोष
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बांग्लादेश में हुए साल 2014 के विवादास्पद चुनाव का जब दुनिया के कई विरोध कर रहे थे तो भारत ने इसका पुरजोर समर्थन किया था.

उस चुनाव को सफल बनाने के लिए मतदान के ठीक पहले तत्कालीन भारतीय विदेश सचिव सुजाता सिंह ढाका गई थीं.

लेकिन इस बात को पांच साल बीत चुके हैं और बांग्लादेश एक बार फिर से चुनावों की तैयारी कर रहा है.

पर भारत इन चुनावों को लेकर कोई बहुत ज़्यादा उत्साह नहीं दिखा रहा है.

पांच साल पहले बांग्लादेश के राजनीतिक दलों के साथ भारत ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई थी, इस बार उसका रत्ती भर भी दखल नहीं है.

सवाल ये उठता है कि बांग्लादेश चुनाव को लेकर भारत ने ऐसा स्टैंड क्यों लिया है और इन चुनावों को लेकर नई दिल्ली का फिलहाल क्या रुख है?

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भारत का दखल

इसी साल नेपाल और मालदीव में भी चुनाव हुए हैं और इन दोनों मुल्कों में भी भारत की तरफ़ से किसी किस्म की सक्रिय भागीदारी नहीं दिखाई गई.

डॉक्टर स्मृति पटनायक नई दिल्ली स्थित थिंकटैंक 'इंस्टीट्यूट फ़ॉर डिंफेंस स्टडीज़ एंड एनलसिस' की सीनियर फ़ेलो हैं.

भारत की तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता

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इमेज कैप्शन, भारत की तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह ढाका दौरे पर (तस्वीर दिसंबर, 2013 की है)

उनका मानना है कि भारत बड़ी सावधानी के साथ इस बार बांग्लादेश चुनाव से दूरी बरत रहा है.

"साल 2014 में भारत ने जिस तरह से अपना विदेश सचिव ढाका भेजा था, वो अनुभव कोई बहुत अच्छा नहीं रहा था."

"बांग्लादेश में एक तबके ने भारत की इस पहल को एक दखलंदाज़ी के तौर पर देखा था. हालांकि भारत का इरादा बांग्लादेश को संविधानिक संकट की तरफ़ बढ़ने से रोकना था."

"लेकिन बांग्लादेश की राजनीति जिस तरह के बदलाव से गुजर रही है, उससे भारत को वाकिफ़ रहना चाहिए और भारत वही कर रहा है."

"हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि दोनों देशों के रिश्ते इस दरमियां परिपक्व हुए हैं और अब ये एक ठोस बुनियादी धरातल पर आधारित है."

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बांग्लादेश चुनाव

बांग्लादेश में पिछले चुनाव को लेकर इतने सारे सवाल इसलिए उठे थे कि प्रमुख विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था.

लेकिन इस बार हालात पहले जैसे नहीं हैं. माना जा रहा है कि इस बार के चुनाव में बांग्लादेश की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां इसमें हिस्सा लेंगी.

बांग्लादेश चुनाव

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इमेज कैप्शन, साल 2014 के विवादास्पद चुनावों के दौरान की एक तस्वीर

शायद यही वजह है कि भारत इस बार के बांग्लादेश चुनाव में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी दिखाने की ज़रूरत नहीं है.

इस बात से ढाका में भारत के उच्चायुक्त रह चुके पिनाक रंजन चक्रवर्ती भी इत्तेफाक़ रखते हैं.

वे कहते हैं, "बांग्लादेश में इस बार जो सबसे बड़ा बदलाव दिख रहा है, वो ये है कि वहां भी भारत की तरह विपक्ष का एक महागठबंधन मैदान में खड़ा है."

पिनाक रंजन चक्रवर्ती का कहना है, "इस गठबंधन का नाम है 'जातीय ओइक्को फ़्रंट', अभी एक दूसरा 'जुक्त फ़्रंट' भी सामने आया है."

"ऐसा लगता है कि चुनाव पटरी पर है और चीज़ें ऐसी ही चलती रहीं तो हालात साल 2014 की तुलना में पूरी तरह से अलग होंगे."

"ये कहा जा सकता है कि बांग्लादेश में लोकतंत्र अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया से चल रहा है. सभी राजनीतिक दल चुनाव में हिस्सा लेने को लेकर उत्साहित हैं."

"और किसी चुनावी प्रक्रिया के लिए ये एक सामान्य बात है. इस चुनाव को लेकर कोई विवाद होगा या फिर इसकी किसी किस्म की आलोचना होगी, ऐसा मुझे नहीं लगता."

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बीएनपी की भागीदारी

ढाका में भारत की पूर्व हाई कमिश्नर बीना सिकरी का भी मानना है, "भले ही ये बांग्लादेश का अंदरूनी मामला है. फिर भी चुनाव में बीएनपी का हिस्सा लेना, भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत है."

"बीएनपी जिस तरह से अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ सीटों की साझेदारी को लेकर बात कर रही है, जैसा किसी भी सामान्य चुनावों में होता है, इस बार ये बातें जबर्दस्त लग रही हैं."

"भारत इन हालात में क्या कर रहा है, क्या नहीं कर रहा है... इन बातों की तह में जाने की कोई ज़रूरत नहीं है."

ढाका में भारत की पूर्व उच्चायुक्त बीना सिकरी

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इमेज कैप्शन, ढाका में भारत की पूर्व उच्चायुक्त बीना सिकरी

इस बार के बांग्लादेश चुनाव में भारत विरोध के मुद्दे का भी कोई असर नहीं दिख रहा है. भारत के लिहाज से ये एक सकारात्मक बदलाव है.

ऐसी सूरत में ज़्यादा सक्रियता दिखाकर हालात बिगाड़ने का जोखिम भारत नहीं उठाना चाहेगा.

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भारत-बांग्लादेश के रिश्ते

पिनाक रंजन चक्रवर्ती का कहना है, "मुझे लगता है कि दो देशों के रिश्तों की ये परिपक्वता ही कही जाएगी कि घरेलू राजनीति में किसी देश के विरोध को मुद्दा बनाने की ज़रूरत न पड़े."

"भले ही दोनों देशों के बीच कई लंबित मुद्दे हैं जिनसे दोनों देशों की सरकारों को निपटना पड़ेगा. उसमें कुछ नहीं हुआ है लेकिन बहुत कुछ हुआ भी है."

"जैसे थल सीमा समझौता, समुद्री सीमा समझौता, निवेश की बहुत सारी परियोजनाएं, भारत बांग्लादेश में बुनियादी ढांचा विकास की परियोजनाओं में शामिल है. इन बातों को फायदा ज़रूर मिलेगा."

बांग्लादेश चुनाव

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इमेज कैप्शन, ढाका में बीएनपी मुख्यालय के बाहर का एक नज़ारा (तस्वीर इस बार के चुनाव की है)

भारत-बांग्लादेश के रिश्तों में ये जो परिपक्वता आई है और बीएनपी के चुनावों में हिस्सा लेने की वजह से भारत ने पिछले चुनाव के बनिस्बत अपना रुख बदला है.

इसलिए विदेश सचिव को ढाका भेजने की बात तो दूर भारत ने इस बार बांग्लादेश चुनाव को लेकर एक बयान जारी करने की ज़रूरत नहीं महसूस की.

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