बांग्लादेश चुनाव: दो ताक़तवर महिला नेताओं की जंग

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में 30 दिसंबर को 11वें संसदीय चुनाव होने जा रहे हैं.
पिछली बार मुख्य विपक्षी दल ख़ालिदा ज़िया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनावों का बहिष्कार कर दिया था जिससे शेख हसीना की बांग्लादेश अवामी लीग आराम से लगातार दूसरी बार सत्ता में आ गई थी.
इस बार भी चुनाव से पहले काफी गतिरोध बना रहा मगर आख़िरकार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके सहयोगी दलों ने चुनाव लड़ने के लिए हामी भर दी है.
बांग्लादेश में राजनीति शेख़ हसीना और ख़ालिदा ज़िया के इर्द-गिर्द ही घूमती है और चुनावों में जंग भी इन्हीं के बीच होती रही है.
मगर इस बार के चुनाव इसलिए अलग हैं क्योंकि बीएनपी की मुख्य नेता खालिदा ज़िया भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में सज़ा काट रही हैं.
राजनीतिक खींचतान
1947 में भारत के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान कहलाया जाने वाला बांग्लाभाषी इलाक़ा साल 1971 में पश्चिमी पाकिस्तान से अलग हुआ था और बांग्लादेश नाम से नया मुल्क अस्तित्व में आया था.

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बांग्लादेश की स्थापना लोकतांत्रिक देश के रूप में हुई थी लेकिन देखा जाए तो मगर अभी तक लोकतंत्र की जड़ें गहरी नहीं हो पाई हैं.
1975 में शेख़ मुजीबुर रहमान की हत्या और तख्तापलट के बाद 15 साल तक यहां सैन्य शासन रहा और लोकतंत्र की सही मायनों में स्थापना 1990 में हुई.
लेकिन इसके बाद भी यहां ख़ूब राजनीतिक उठापटक हुई. बांग्लादेश की राजनीति के दो बड़े और प्रमुख चेहरे हैं- बांग्लादेश आवामी लीग की शेख़ हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की खालिदा ज़िया.

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मगर कभी आवामी लीग ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया तो कभी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने. दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज बताते हैं कि इसकी वजह क्या रही.
वह बताते हैं, "1990 तक बांग्लादेश में सैन्य शासन था. इसके बाद सेना हटी तो वहां केयर टेकर गवर्नमेंट की स्थापना की और शहाबुद्दीन को इसकी मुख्य सलाहकर नियुक्त किया. उनकी देखरेख में यहां चुनाव संपन्न हुआ जो पांचवां आम चुनाव था."
साल 1991 में ख़ालिदा ज़िया की पार्टी को जीत मिली और वह प्रधानमंत्री चुनी गईं. इसके बाद जब साल 1996 में चुनाव होना था, तब आवामी लीग ने मांग की कि चुनाव पिछली बार की ही तरह केयर टेकर सरकार की निगरानी में होने चाहिए.

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प्रोफ़ेसर भारद्वाज बताते हैं, "ज़िया ने यह मांग नहीं मानी और छठा चुनाव हो गया. इसमें आवामी लीग ने हिस्सा नहीं लिया. जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव बना तो 13वां संविधान संशोधन किया. 58 बी में पांच नए प्रावधान करके तय किया गया कि सरकार का कार्यकाल पूरा होने पर केयर टेकर सरकार बनेगी जो तीन महीने में चुनाव होगी."
इस तरह से बांग्लादेश में सातवें आम चुनाव 1996 में हुए और आवामी लीग सत्ता में आ गई. शेख़ हसीना प्रधानमंत्री बन गईं. फिर 2001 का चुनाव (आठवां) भी केयर टेकर सरकार की निगरानी में हुआ और ख़ालिदा ज़िया प्रधानमंत्री बनीं. प्रोफ़ेसर भारद्वाज बताते हैं कि जब नौवें चुनाव की बारी आई तो विवाद हो गया.
प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज बताते हैं, "2006 में मुद्दा उठा कि केयर टेकर सरकार का मुख्य सलाहकार कौन होगा. खालिदा जिया ने बदलाव करके जजों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ा दी. आरोप लगा कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि उनकी पसंद के चीफ जस्टिस उस समय रिटायर हों, जब वह केयर टेकर सरकार के मुख्य सलाहकर बनें. आवामी लीग ने इसका विरोध किया और कहा कि हम चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे."
"इसके बाद सेना ने अप्रत्यक्ष तौर से दखल दिया. सेना की देखरेख में फख़रुद्दीन की केयर टेकर सरकार बनाई गई जिसे तीन महीने में चुनाव करवाने थे. मगर ये सरकार दो साल तक बनी रही और विदेश नीति तक से जुड़े अहम फैसले लेती रही. उन्होंने चुनाव सुधार तक के फैसले किए. हालांकि किस संवैधानिक व्यवस्था के तहत यह सरकार दो साल तक बनी रही, इसका जवाब किसी के पास नहीं था."
प्रोफ़ेसर भारद्वाज बताते हैं कि इसके बाद दिसंबर 2008 में नौवें संसदीय चुनाव हुए जिनमें शेख़ हसीना को बहुमत मिला. उन्होंने 15 वां संविधान संशोधन किया और 13वें संशोधन में की गई केयर टेकर सरकार की व्यवस्था को खत्म किया और यह कहा कि बांग्लादेश की चुनी हुई सरकार या नैशनल गवर्नमेंट के तहत चुनाव होंगे."

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लेकिन 2014 में चुनाव हुए तो खालिदा ज़िया की पार्टी ने सवाल उठाया कि अगर चुनी हुई सरकार के तहत चुनाव होंगे तो इनके निष्पक्ष होने की गारंटी नहीं है. ऐसे में उसने चुनाव का बहिष्कार कर दिया. नतीजा यह रहा कि अधिकतर सीटों पर आवामी लीग निर्विरोध जीत गई और लगातार दूसरी बार उसकी सरकार बन गई.
इस बार फिर वही सवाल
इस बार भी वही सवाल उठ रहे थे, जो 2014 में उठे थे. मगर काफ़ी आनाकानी के बाद विपक्षी दल चुनाव में हिस्सा लेने को तैयार तो हुए हैं, मगर उन्होंने डेट्स आगे बढ़ाने की मांग की थी.
चुनाव आयोग ने विपक्षी गठबंधन की मांग को मानते हुए 23 दिसंबर के बजाय 30 दिसंबर को चुनाव करवाने के लिए हामी भर दी है. प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज बताते हैं कि विपक्ष इस बार भी केयर टेकर या नैशनल गवर्नमेंट के तहत चुनाव करवाने की मांग कर रहा है.
हालांकि, इस बार चुनाव बहिष्कार न होने के संकेत मिलने को जानकार अच्छी बात बता रहे हैं. बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त रह चुके देव मुखर्जी कहते हैं, "चुनाव में हिस्सा लेना अच्छी बात है क्योंकि लोकतंत्र में भागीदारी जरूरी है. सरकार और प्रधानमंत्री के साथ विपक्षी दल के नेताओं की बात हुई है, वह सकारात्मक है. मैं उम्मीद करूंगा कि इससे कोई नतीजा निकलेगा और शांतिपूर्ण चुनाव में जनता के मन का सम्मान होगा."

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बीएनपी की समस्या
इस बार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी थोड़ी मुश्किल में है क्योंकि उनकी नेता ख़ालिदा ज़िया भ्रष्टाचार के मामले में सज़ा काट रही हैं. उनकी पार्टी का कहना है कि उनके ख़िलाफ़ राजनीतिक दुर्भावना से मुक़दमे चलाए गए थे, ऐसे में उन्हें रिहा किया जाना चाहिए. क्या उनका चुनाव लड़ पाना संभव है?
प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज कहते हैं. "करप्शन के केस को लेकर उनकी मांग है कि सारे आरोपों से मुक्त किया जाना चाहिए. लेकिन यह मामला कोर्ट का है, इसलिए ऐसा होने की संभावना कम है. वह चुनाव नहीं लड़ पाएंगी. साथ ही उनके बेटे पर भी मामला है जो लंदन में हैं. वह यहां आएंगे तो गिरफ़्तार कर लिए जाएंगे क्योंकि भगौड़ा घोषित किए जा चुके हैं. अभी पार्टी के एक्टिंग जनरल सेक्रेटरी मिर्ज़ा फ़ख़रुल इस्लाम आलमगीर ही चुनाव संभाल रहे हैं और ख़ालिदा ज़िया जेल के अंदर से निर्देश दे रही हैं."

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किसको कितना समर्थन
बांग्लादेश में चुनावों में मुख्य मुक़ाबला शेख़ हसीना की पार्टी अवामी लीग और खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी के बीच है. देव मुखर्जी बताते हैं कि दोनों की विचारधारा में बहुत फर्क है और दोनों का जनाधार भी अलग है.
देव मुखर्जी कहते हैं, "बीएनपी सरकार के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथियों को मदद मिल रही थी. जब से आवामी लीग की सरकार आई है, वह उन्हें दबाने की कोशिश कर रही है और इसमें कुछ क़ामयाबी भी मिली है. बीएनपी की जमात और इस्लामिक कट्टरपंथियों से पुरानी क़रीबी है."
वह बताते हैं, "अगर बांग्लादेश की सत्ताधारी आवामी लीग की बात करें तो उसे लेफ्ट विंग तो नहीं कह सकते, लेकिन दूसरी पार्टी ज्यादा राइट विंग हैं."

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किसे ज़्यादा समर्थन मिल रहा है? इस सवाल पर मुखर्जी कहते हैं, "कई फ़ेक्टर यहां काम कर रहे हैं. एक तरफ़ कट्टरपंथियों से क़रीबी की बात है तो दूसरी तरफ़ आलामी लीग ने पिछले दस सालों में कानून व्यवस्था, सोशल सर्विस और इकॉनमी के मामले में अच्छा काम किया. बांग्लादेश की आर्थिक तरक्की की रफ़्तार भी अच्छी रही है. इस हिसाब से तार्किक रूप से तो इन्हें ही आना चाहिए लेकिन मतदाता क्या करते हैं, देखना होगा."
चूंकि शेख़ हसीना 2009 से ही प्रधानमंत्री पद पर बनी हुई हैं, ऐसे में क्या ऐंटी इनकमबेंसी का उनकी पार्टी को नुकसान होगा? जेएनयू के प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज बताते हैं कि ऐसा हो तो सकता है मगर मुख्य विपक्षी पार्टी बीएनपी भी टक्कर देने के लिए बहुत ज्यादा मज़बूत स्थिति में नहीं है.
प्रोफ़ेसर भारद्वाज कहते हैं, "आवामी लीग और शेख हसीन सत्ता में हैं तो नाराज़गी तो हो सकती है. इस बार लॉ एंड ऑर्डर, ट्रैफ़िक, करप्शन और रिज़र्वेशन हटाने जैसे फैसलों की चर्चा हो रही है. स्वतंत्रता सेनानियों को लेकर भी ध्रुवीकरण हुआ है. मगर एक बात चल रही है- डिवेलपमेंट एंड डेमोक्रेसी फर्स्ट. कहा जा रहा है कि आर्थिक विकास में बांग्लादेश का विकासशील देशों की श्रेणी में आना और मध्यम आय वाले देश में शामिल होना शेख़ हसीना के कारण संभव हुआ है. साथ ही अंतरराष्ट्रीय छवि बेहतर होने का श्रेय भी शेख़ हसीना को दिया जा रहा है. बावजूद इसके इनकमबेंसी है और लोग बदलाव चाहते हैं."

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लेकिन प्रोफ़ेसर भारद्वाज यह भी बताते हैं कि ख़ालिदा ज़िया की पार्टी बीएनपी कमज़ोर हो चुकी है.
वह कहते हैं, "इनका मास बेस ख़त्म होता चला जा रहा है क्योंकि वे ड्रॉइंग रूम से पॉलिटिक्स कर रहे हैं. संगठन की क्षमता और नेताओं का अभाव है. आवामी लीग का जनाधार बड़ा है और वह कैडर बेस्ड पार्टी नहीं है. जबकि बीएनपी में सवाल ये भी उठ रहा है कि नेतृत्व कौन करेगा, जीतने पर पीएम कौन बनेगा. पार्टी के अंदर कई धड़े भी हैं. एक तीसरे विकल्प के रूप में भी कुछ संगठित होने की कोशिश कर रहे हैं मगर वे कितने क़ामयाब हो पाएंगे, देखना होगा."
बदलाव की लहर
बांग्लादेश में अब तक हुई राजनीतिक उठापटक का नतीजा यह रहा है कि देश असली मुद्दों से भटकता हुआ नजर आया. यहां कट्टरपंथ का उभार देखने को मिला. नतीजा यह रहा कि 2014 से 2018 तक ब्लॉगर्स, नास्तिकों और सेक्युलर बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया गया, कईयों की हत्या हुई. बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त रह चुके देव मुखर्जी बताते हैं कि ऐसे तत्वों को राजनीतिक शह भी मिली थी, मगर अब यह सिलसिला बदला है.

देव मुखर्जी कहते हैं, "पिछले सालों से दिखाई दे रहा है कि बांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथ का मुक़ाबला करना मुख्य चुनौती है. क्योंकि इन्हें अंदर और बाहर दोनों जगह से समर्थन मिलता है. इसका मुक़ाबला वर्तमान सरकार ने अच्छी तरह किया है. अर्थव्यवस्था भी बेहतर हुई है. इसके अलावा बड़ी बात यह कि पहले यहां लगता था कि हम कुछ अपराध करेंगे तो बच जाएंगे, ख़ासकर अगर राजनीति में हैं तो. इस 40 साल से सिलसिले तो तोड़ा है. वॉर क्राइम्स ट्राइब्यूनल ने उन लोगों को सज़ा दी है, जिन्होंने 1971 में अत्याचार किए थे. यही नहीं, बीएनपी की सरकार में जमात के जो मंत्री थे, उन्हें तक फांसी हुई है. यह संदेश है कि अपराध करके आप बच नहीं सकते. उन्हें समझ आ गया कि ऐसे अपराधों के लिए सज़ा मिलने में समय की कोई सीमा नहीं होता."
जनता का मूड क्या है
ऐसे में सवाल उठता है कि बांग्लादेश की जनता का मूड क्या है? क्या शेख हसीना अपनी उपलब्धियां गिनाकर चुनाव जीत जीतेंगी या जेल में बंद खालिदा जिया के प्रति सहानुभूति से उनकी पार्टी को फायदा मिलेगा? प्रोफेसर संजय भारद्वाज कहते हैं कि दोनों पार्टियों के पास अपने-अपने प्लस पॉइंट हैं.
वह कहते है, "ख़ालिदा ज़िया की सरकार में 2001-2006 के बीच जो कट्टरपंथी और इस्लामिक चरमपंथ उभर रहा था, मौजूदा सरकार ने उन्हें दबाने में अहम भूमिका निभाई है. साथ ही यह भी है कि विदेश नीति के रूप में देखा जाए तो खालिदा के बजाय हसीना ने भारत और चीन आदि के साथ समान रिश्ता रखा है. भारत से भी अच्छे रिश्ते हैं और चीन से भी निवेश लाने में क़ामयाबी पाई है. कहने का अर्थ यह है कि आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ज्यादा नंबर मौजूदा सरकार के पास हैं, जबकि विपक्ष के पास रिज़र्वेशन, वॉर क्राइम ट्रायल जैसे घरेलू मसले है.

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वहीं बांग्लादेश में भारत के उच्चायुक्त रह चुके देव मुखर्जी कहते हैं कि प्रदर्शन के आधार पर देखें तो शेख़ हसीना का काम अच्छा रहा है, मगर मतदाताओं के रुख को लेकर कुछ भी नहीं कहा जा सकता.
बांग्लादेश की गिनती दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले देशों में होती है. बांग्लादेश में ग़रीबी बहुत है मगर उसने कई मामलों में भी सुधार किया है. पिछले कुछ सालों में उसने जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार कम की है और साथ ही स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा काम किया है.
मगर इस देश के सामने बड़ी चुनौती है- राजनीतिक अस्थिरता और इसके बीच बढ़ते धार्मिक कट्टरपंथ से निपटना. ऐसे में ये चुनाव बांग्लादेश के लिए ही अहमियत नहीं रखते बल्कि विश्व समुदाय की नज़र पर इनपर टिकी हुई है.
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