इतिहास लिख रहा मिस्र का सिनाई ट्रेल जहां हज़रत मूसा को ईश्वर के दर्शन हुए

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इमेज कैप्शन, सिनाई ट्रेल की चढ़ाई का सफ़र ट्रोडेन माउंट सिनाई पर जाकर ख़त्म होता है
    • Author, क्लोदघ किन्सेला
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

मिस्र के दक्षिणी सिनाई की पहाड़ी पगडंडियां, पहाड़ों पर चढ़ाई करने के शौक़ीनों के लिए बेहतरीन बताई जाती हैं. हालांकि यहां चढ़ाई करना आसान नहीं है, फिर भी पहाड़ों पर सफ़र करने वालों के लिए ये ट्रेल अहम है.

इसे सिनाई ट्रेल कहते हैं. ये मिस्र की सबसे लंबी दूरी वाली ट्रेल है. यहां दूर-दूर से लोग चढ़ाई का आनंद लेने आते हैं और सफ़र में उनकी मदद करते हैं यहां के बद्दू क़बीले के लोग.

इसी ट्रेल पर है सेंट कैथरीन मोनेस्ट्री जिसे यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट की फ़ेहरिस्त में शामिल किया है.

वांडरलस्ट मैगज़ीन ने सिनाई ट्रेल को दुनिया की बेहतरीन पहाड़ी चढ़ाई क़रार दिया है. 2016 में ब्रिटिश गिल्ड ऑफ़ ट्रैवेल राइटर ने इसे बेस्ट न्यू टूरिज़्म इनिशिएटिव के अवॉर्ड वाइडर वर्ल्ड से नवाज़ा.

हालांकि यहां चढ़ाई करना आसान नहीं है और ना ही इसका इतना शानदार इतिहास रहा है. फिर भी श़ौक़ीनों की ये पहली पसंद है.

बद्दू जनजाति के लोग सदियों से इस रास्ते के ज़रिए मुसलमान श्रद्धालुओं को मक्का, ईसाई श्रद्धालुओं को सेंट कैथरीन या येरूसलम तक पहुंचाने का काम करते रहे हैं.

वीडियो कैप्शन, चलिए ख़तरनाक रास्ते की सैर पर

ये लोग श्रद्धालुओं को ऊंटों पर बैठा कर ले जाते थे. लेकिन जैसे-जैसे तरक्की हुई, ऊंटों की जगह कार और हवाई जहाज़ ने ले ली. लोगों ने इस रास्ते से जाना छोड़ दिया.

यातायात के बदलते साधनों के साथ बद्दू जनजाति का रोज़गार ख़त्म हो गया. नौजवान पीढ़ी शहरों में आकर नौकरियां करने लगी.

ग्रेनाइट की चोटी सिनाई पहाड़ का प्रतिष्ठित मील का पत्थर है. बुक ऑफ एक्ज़ोडस के मुताबिक़ यही वो जगह है जहां हज़रत मूसा को दस आज्ञापत्र मिले थे. और इसी जगह पर बद्दू जनजाति के गाइड मोहम्मद और रिसर्चर हेन हॉफ़्नर की मुलाक़ात हुई थी.

हॉफ़्नर ने ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी से भूगोल विषय में डिग्री ली थी और वो इस इलाक़े को गहराई से जानना चाहते थे. इस काम में मोहम्मद ने हॉफ़्नर की मदद की थी.

सिनाई- द ट्रेकिंग गाइड

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इमेज कैप्शन, मोहम्मद ने अपने अनुभवों को एक किताब 'सिनाई- द ट्रेकिंग गाइड' की शक्ल दी है

सिनाई- द ट्रेकिंग गाइड

इस जगह को मोहम्मद से बेहतर कोई नहीं जानता था. इस इलाक़े और बद्दू जनजाति ने हॉफ़्नर को इतना आकर्षित किया कि वो यहां क़रीब एक दशक तक रहे.

उन्होंने क़रीब दस हज़ार किलोमीटर की ट्रेकिंग की. ट्रेकिंग के दौरान अपने अनुभव उन्होंने एक किताब की शक्ल में दुनिया के सामने रखे. इस किताब का नाम है सिनाई- द ट्रेकिंग गाइड.

हॉफ़्नर का कहना है कि अगर मोहम्मद साथ ना होता तो शायद वो इस इलाक़े को इतनी अच्छी तरह समझ नहीं पाते. उन दोनों के बीच एक अजीब अपनेपन का रिश्ता बन गया था.

साल 2011 के बाद लगभग सभी अरब देशों में बड़े पैमाने पर सियासी उथल-पुथल हुई. इसकी वजह से सिनाई में पर्यटन लगभग ख़त्म हो गया. कुछ गाइड थे जो अलग-अलग टुकड़ों में बंटकर काम कर रहे थे.

ऐसे में मोहम्मद ने सोचा कि क़बीले के पारंपरिक काम गाइडिंग को बचाने के लिए सभी गाइड का एकजुट होकर काम करना ज़रूरी है. इस काम के लिए मोहम्मद ने सिनाई ट्रेल के दो अन्य पुरानी जनजाति के प्रतिनिधियों को अपने साथ शामिल किया.

मोहम्मद जेबेलिया जनजाति का लीडर था और पूरे प्रायद्वीप में उसकी इज़्ज़त थी. उसके कहने पर दूसरे लोग भी साथ देने को तैयार हो गए. हॉफ़नर जो सिनाई ट्रेल वेबसाइट के सह-संस्थापक भी हैं, मोहम्मद को सिनाई ट्रेल का ख़ामोश हीरो कहते हैं.

ट्रैकर्स के लिए ये ट्रेल साल 2015 में लॉन्च की गई थी. इसके कुछ ही दिन बाद आतंकियों ने यहां रशियन एयरलाइनर को मार गिराया था. लेकिन साल 2016 में मिले अवॉर्ड ने इस ट्रेल को फिर से ज़िंदा कर दिया.

मोहम्मद की तरह मंसूर भी यहां बरसों से सैलानियों को ट्रेल की सैर करा रहे हैं. उनके पूर्वज छठी शताब्दी में मठ की हिफ़ाज़त के लिए यहां आए थे. और उसके बाद यहीं बस गए. गाइडिंग ही इनका पेशा है.

मंसूर कहते हैं कि अभी कई जनजातियां अलग-अलग टुकड़ों में गाइडिंग का काम करती हैं. लेकिन अगर इलाक़े में गाइडिंग को मज़बूत करना है तो इसे एक संगठित कारोबार बनाना होगा और इसके लिए सभी को एकजुट होना ज़रूरी है.

सेंट कैथरीन मोनेस्ट्री, यूनेस्को, वर्ल्ड हेरिटेज साइट

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इमेज कैप्शन, सेंट कैथरीन मोनेस्ट्री जिसे यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज साइट की फ़ेहरिस्त में शामिल किया है

बर्निंग बुश

सिनाई ट्रेल की चढ़ाई का सफ़र ट्रोडेन माउंट सिनाई पर जाकर ख़त्म होता है. यहां तक पहुंचने के लिए प्राचीन बाइज़ेंटाइन के रास्ते पहुंचा जाता है. इस जगह के बारे में कहा जाता है कि यहीं हज़रत मूसा को ईश्वर ने साक्षात दर्शन दिए थे. इसे बर्निंग बुश कहा जाता है.

इस साल यानी मई 2018 में सिनाई ट्रेल का फैलाव 220 किलोमीटर से बढ़कर 550 किलोमीटर हो गया है.

गाइड की क़तार में भी पांच अन्य बद्दू जनजाति के लोग जुड़ गए हैं. अब लोग इसे आर्थिक रूप से फ़ायदे का सौदा तो जान ही रहे हैं साथ ही उन्हें लगता है वो ऐसा करके सिनाई की क़ुदरती ख़ूबसूरती के साथ इंसाफ़ कर रहे हैं.

बढ़ती कारोबारी संभावनाओं ने वर्षों पुरानी यूनियन त्वाराह अलाएंस को फिर से ज़िंदा कर दिया है. इस अलाएंस के साथ दक्षिण सिनाई के सात जनजातीय क़बीले जुड़े थे.

बाद में इसके साथ ताराबिन क़बीले को भी शामिल कर लिया गया जोकि मूल समझौते का हिस्सा नहीं थे. इस अलाएंस ने अब हाइकिंग के लिए क़रीब एक सदी से बंद ट्रेल को खोल दिया है.

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अब अकेले भी कर सकेंगे हाइकिंग

पूरे सिनाई प्रायद्वीप को 42 दिन में मूल रास्ते के ज़रिए गल्फ़ ऑफ़ अक़ाबा से लेकर स्वेज़ तक कवर किया जा सकता है.

अभी तक हाइकिंग के लिए ग्रुप में लोगों को ले जाया जाता है. लेकिन 26 अक्तूबर 2018 से अकेले भी हाइकिंग की जा सकेगी. हालांकि इसका रास्ता छोटा होगा और 24 दिन में सफ़र पूरा कर लिया जाएगा. लेकिन गाइड का साथ होना हर हाल में लाज़मी है.

फ़राओ का सबसे पुराना मंदिर

पूरे सिनाई ट्रेल में तीन हाइक ऐसी हैं जहां क़ुदरत का दिलकश नज़ारा देखने को मिलता है.

पहली हाइक है जेबल सरबल. इसकी लंबाई 25 किलोमीटर है और इसका सफ़र तीन से चार दिन में पूरा किया जा सकता है. जेबल सरबल को सिनाई ट्रेल का सबसे ख़ूबसूरत पहाड़ माना जाता है.

सराबित अल-ख़ादिम और अल-रमला इस इलाक़े का सबसे बड़ा रेगिस्तानी हिस्सा है. इसकी लंबाई 65 किलोमीटर है और इसका सफ़र भी चार से पांच दिन में पूरा किया जा सकता है. इसका रास्ता बहुत ऊबड़ खाबड़ है. इसे फ़िरोज़ा पत्थर की खानों का इलाक़ा कहा जाता है. यहीं पर फ़राओ का सबसे पुराना मंदिर भी है.

वीडियो कैप्शन, और क्या भविष्य में ऐसे होगा सफ़र, घंटों की दूरी होगी मिनटों में पूरी

हज़रत मूसा से जुड़ी कहानी

जेबेल अल- गुन्ना और जेबेल हज़ीम की लंबाई 75 किलोमीटर है और इसका सफ़र भी चार से पांच दिन का है.

इस पहाड़ के बारे में कहा जाता है कि हज़रत मूसा और उनके साथी रास्ता भटक कर चालीस वर्ष तक यहीं रहे थे. ये तेज़ हवा वाला पठार है, जहां से आसमान का नज़ारा लुभावना होता है.

सिनाई ट्रेल के बारे में कहा जाता है कि यहां आकर लोगों की हर दुख तकलीफ़ दूर हो जाती है.

रेगिस्तान में 42 दिन गुज़ारना आसान नहीं है. लेकिन, जो लोग इस ट्रेल पर हाइकिंग कर चुके हैं उन्हें ये 42 दिन भी कम लगते हैं.

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(नोटः ये बीबीसी ट्रैवल की मूल कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है.)

(मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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