श्रीलंका में सामूहिक कब्र में मिले दर्जनों नरकंकाल किसके हैं

श्रीलंका
    • Author, अनबारासन इथिराजन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मन्नार से

उत्तरी श्रीलंका के मन्नार शहर में एक सामूहिक कब्र में दर्जनों नर-कंकाल पाए गए हैं.

ये कब्र सामने आने के बाद से विशेषज्ञों की एक टीम यहां दफनाए गए लोगों से जुड़ी जानकारी हासिल करने की कोशिश में लगी है.

अगर इस कब्र में मिले नरकंकालों की संख्या की बात करें तो अब तक इस जगह पर 90 नरकंकालों का पता लगाया जा चुका है.

साल 2009 में श्रीलंका की सेना और अलगाववादी तमिल टाइगर्स के बीच 26 सालों से चल रहा गृह युद्ध ख़त्म हुआ है जिसमें 100,000 लोग मारे गए और कई लोग गायब हो गए थे.

ये संघर्ष ख़त्म होने के बाद से अब तक उत्तरी श्रीलंका में दो बड़ी सामूहिक कब्रें मिल चुकी हैं.

कैसे मिली सामूहिक कब्र?

बीते साल मन्नार शहर में स्थित बस अड्डे के पास एक पूर्व सहकारी थोक केंद्र की ज़मीन को खोदे जाते समय मजदूरों को नरकंकाल मिले थे.

इसके बाद अदालत ने बारीकी से इस जगह की खुदाई करने का आदेश दिया है.

पुरातत्वविदों की एक टीम इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आख़िर वो कौन से हालात थे जो इस सामूहिक कब्र के लिए ज़िम्मेदार रहे.

इस टीम का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर राज सोमदेव बताते हैं, "इस पूरी जगह को दो हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है. एक तरफ सामान्य कब्रिस्तान है. वहीं, दूसरी तरफ अनौपचारिक तरीके से दफनाए गए मानव कंकाल हैं."

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इमेज कैप्शन, अब तक किसी भी मृतक की पहचान नहीं हुई है.

प्रोफेसर राज सोमदेव कोलंबो के नज़दीक स्थित केलानिया विश्वविद्यालय में पुरातत्वविद् के रूप में जुड़े हुए हैं.

पुलिस की निगरानी में खुदाई जारी

सोमदेव के मुताबिक़ इस सामूहिक कब्र में अभी काफ़ी काम बाकी है और अभी कई और नरकंकाल मिल सकते हैं.

सोमदेव की टीम को अब तक मिले नरकंकालों में छह बच्चों के नरकंकाल भी मिले हैं.

लेकिन मृतकों और उन्हें मारने वालों की पहचान से जुड़ी जानकारी अब तक सामने नहीं आई है.

हालांकि, इस कस्बे में तमिल अल्पसंख्यकों की आबादी ज़्यादा मात्रा में रहती है.

स्थानीय पुलिस इस सामूहिक कब्र की सुरक्षा में लगी है ताकि इस कब्र को छेड़छाड़ से बचाया जा सके और फॉरेंसिक आर्कियोलॉजिस्ट धीरे-धीरे मिट्टी में छिपी हुई हड्डियां निकाल सकें.

इस कब्र में अब तक किसी तरह का कपड़ा दिखाई नहीं दिया है जिससे इन नरकंकालों की पहचान स्थापित की जा सके.

गृहयुद्ध के दौरान कैसे थे हालात?

संघर्ष के दिनों में मन्नार शहर पर श्रीलंकन सेना का नियंत्रण था. लेकिन इससे जुड़े क्षेत्रों में तमिल टाइगर्स विद्रोहियों ने अपना कब्जा बनाया हुआ था.

लेकिन लगभग दस साल पहले श्रीलंका की सेना ने भीषण संघर्ष के बाद विद्रोहियों के कब्जे वाले पूरे ज़िले पर अधिकार कर लिया है.

इस सामूहिक कब्र में जिस तरह से मानव शरीरों को रखा गया है उससे विशेषज्ञ काफ़ी अचरज में हैं.

प्रोफेसर सोमदेव कहते हैं, "हम इसलिए चिंतित हैं क्योंकि यहां लाशों को बुरी तरह रखा गया है. यहां पर नरकंकालों को एक दूसरे के ऊपर रखकर दफन किया गया है."

सोमदेव की टीम मानव अवशेषों को उजागर करने के बाद उन्हें मन्नार में अदालत की हिरासत में पहुंचा देती है, जो खुदाई का काम पूरा होने के बाद इस मामले में आगे की कार्रवाई लेगा.

प्रोफेसर सोमदेव और उनके सहयोगियों को फिलहाल इस कब्र में दफनाए गए लोगों की मौत का कारण सामने लाना है. इसके बाद इन नरकंकालों की उम्र का अंदाजा लगाया जाएगा.

अब तक इन नरकंकालों के लिए किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया है.

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इमेज कैप्शन, प्रोफेसर सोमदेव उम्मीद करते हैं कि उनके काम की वजह से कई सवालों के जवाब मिलेंगे.

जांच को लेकर उठ रहे हैं सवाल

श्रीलंका में गृह युद्ध ख़त्म होने के बाद अब तक संघर्ष से जुड़े क्षेत्र में कई सामूहिक कब्रें सामने आ चुकी हैं.

इससे पहले थीरुकेथीसवरम में एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर के पास साल 2014 में एक सामूहिक कब्र मिली थी जिसमें 94 नरकंकाल बरामद हुए थे.

लेकिन ये कब्र मिलने के चार साल बाद भी ये साफ नहीं हो सका है कि इस कब्र में कौन दफ़न था और किसने इन लोगों को मारा था.

मानवाधिकार समूहों के मुताबिक़, सेना और तमिल टाइगर्स ने अपने आपसी संघर्ष में आम लोगों को शिकार बनाया. इस संघर्ष के दौरान कम से कम बीस हज़ार लोग गायब हो गए थे.

लेकिन सरकार ने कहा है कि उसके सुरक्षा बलों का आम लोगों की मौत और उनकी गुमशुदगी से कोई लेना-देना नहीं है.

कई सालों तक अंतर्राष्ट्रीय दबाव झेलने के बाद श्रीलंका की सरकार ने आखिरकार एक साल पहले 'ऑफ़िस ऑफ़ मिसिंग पर्संस' नाम की एक स्वतंत्र संस्था का गठन करके गुमशुदा लोगों का पता लगाने का अभियान शुरू किया है.

इस संस्था ने ही मन्नार में खुदाई के लिए आर्थिक मदद दी है.

इस संस्था के चेयरमैन सालिया पियरिस इस बात पर जोर देकर कहते हैं हाल में जो कब्र मिली है उसकी बारीक जांच होनी जरूरी है.

मानवाधिकार समूह

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तमिलों के मन में शक की स्थिति

वह कहते हैं, "हमारी संस्था का पहला काम गुमशुदा लोगों की तलाश करना और ऐसे लोगों को परिजनों को उनके गायब होने से जुड़े हालातों से अवगत कराना है."

"इस काम का एक पहलू ये भी है कि सबसे पहले तो ये पता लगाया जाए कि सामूहिक कब्रें कहां कहां हैं और उन कब्रों में कौन दफ़न है."

लेकिन इससे पहले जिन सामूहिक कब्रों में से नरकंकालों को निकाला गया था उनकी हत्याओं के मामलों में जांच एजेंसियां अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी हैं.

ऐसे में तमिलों के बीच इस बात को लेकर शक की स्थिति है कि जब पुराने मामलों में कुछ नहीं हुआ तो ये नई जांच एजेंसी क्या कर लेगी.

मन्नार के कैथॉलिक डायकेस के वाइसर जनरल विक्टर सोसाइ कहते हैं, "संघर्ष के दिनों ने अनियंत्रित क्षेत्रों से नियंत्रित क्षेत्रों की ओर जाते हुए सैकड़ों लोगों ने अपनी जान दी थी. कुछ आरोप ऐसे भी हैं कि संघर्ष से बचने के लिए नाव पर सवार होकर भारत आते कई तमिल लोगों को इंटरसेप्ट कर लिया गया. इसके बाद से उनका कोई पता नहीं है."

कब्र की खुदाई के शुरुआती चरणों में सोसाइ मन्नार के बिशप, इमैनुअल फर्नांडो के साथ सामूहिक कब्र की साइट का दौरा कर चुके हैं.

रेव सोसाई कहते है, "हम समझते हैं कि उन्हें बच्चों और वयस्कों के कंकाल मिल गए हैं लेकिन हमें दरअसल यह जानने की जरूरत है कि ये लोग कौन हैं और वे कैसे मर गए और कौन जिम्मेदार था."

तमिल टाइगर्स पर प्रतिद्वंद्वी तमिल चरमपंथी समूहों के सेनानियों और समर्थकों को निर्दयतापूर्वक समाप्त करने का आरोप था. उन पर युद्ध में पकड़े गए श्रीलंकाई सैनिकों को मारने का भी अपराध है.

मानवाधिकार समूह

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संघर्ष के अंत के तुरंत बाद, कुछ तमिलों ने युद्ध के अंतिम दिनों के दौरान उत्तर-पूर्वी मुल्लातीवु जिले के समुद्र तटों पर विद्रोहियों पर नागरिकों पर गोली चलाने का आरोप लगाया था. इसके साथ ही सेना पर भी बर्बरता के आरोप लगे हैं.

लेकिन सेना ने ऐसे किसी भी आरोप को खारिज कर दिया कि इन नरकंकालों के लिए श्रीलंकन सैनिक ज़िम्मेदार हैं.

सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर सुमित अटापट्टू कहते हैं, "निश्चित रूप से इस कब्र और सेना के बीच कोई संबंध नहीं है. किसी ने अब तक सेना पर आरोप नहीं लगाया है."

लेकिन अल्पसंख्यक तमिल समुदाय में कई लोग कहते हैं कि यदि श्रीलंका वास्तव में अपने अतीत का सामना करना चाहता है, तो उसे सामूहिक कब्रों की जांच करके गायब होने के मुद्दे को ईमानदारी से संबोधित करना होगा.

ऐसा होने के बाद ही पीड़ित परिवार अपने खोए हुए परिजनों के जाने का शोक मना पाएंगे और अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ पाएंगे.

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