अमरीका में कभी तख़्तापलट क्यों नहीं हुआ?

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सवाल- ''आख़िर अमरीका में कभी तख़्तापलट क्यों नहीं हुआ?'' जवाब- ''क्योंकि वॉशिंगटन में कोई अमरीकी दूतावास नहीं है.'' यह पुरानी कहावत अमरीकी विदेश नीति के बारे में है जो इन दिनों फिर से दुहराई जा रही है.
ये हो रहा है नवंबर में हुए अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में रूस पर हस्तक्षेप के आरोप लगने के बाद से.
अमरीका पर लगातार नज़र रखने वाले कह रहे हैं कि अमरीका जिसने ख़ुद दूसरी जगहों की सरकारों के चुने या बनाये जाने के काम में बार बार टांग अड़ाई है वो अब उसकी शिकायत कर रहा है.
इतिहासकार विलियम ब्लम 'द सीआईए: अ फ़ॉरगटन हिस्ट्री' और 'पराइया स्टेट: अ गाइड टु द वर्ल्ड्स सुपरपावर' के लेखक हैं. वे कहते हैं, "मेरे आकलन के मुताबिक़ दूसरे विश्व युद्ध ख़त्म होने के बाद से वॉशिंगटन पर विदेशी चुनावों में हस्तक्षेप करने के 30 कुख्यात मामले हैं."
ब्लम को अमरीकी विदेश नीति का कटु आलोचक माना जाता है. इनका कहना है कि यह पुरानी गिनती है क्योंकि इसमें सीआईए के गुपचुप चलाए गए अभियानों को शामिल नहीं किया गया है.
इन सबको दिमाग़ में रखते हुए बीबीसी वर्ल्ड इन वाक़यों से जु़ड़े तीन उदाहरणों को पेश कर रहा है, जिनमें अमरीका ने विदेशी चुनावों में टांग अड़ाई. इनमें उसे व्यापक और आंशिक सफ़लता भी मिली. अब अमरीका का कहना है कि रूस ने नवंबर में हुए राष्ट्रपति चुनाव में ऐसा किया है.
लंबी फेहरिस्त

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लंबे समय से अमरीकी विदेशी नीति के लिए चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप अहम हथियार रहा है.
ग्वाटमाला में हकोवो अरबेंज, चिली में सल्वाडोर अलेंडे और ब्राज़ील में जुओ गुवार को उदाहरण के तौर पर देख सकते हैं. सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों से भले ही तख्तापलट के एक ही मामले में अमरीकी हाथ की पुष्टि की गई हो लेकिन यह लिस्ट बहुत लंबी है.
ज़्यादातर विदेशी चुनावों में अमरीकी खुफ़िया एजेंसी हस्तक्षेप करना चाहती है. इसमें इनका हित जुड़ा होता है और यह अमरीकियों को लिए कोई बड़ी बात नहीं है. ये एजेंसियां चुनावी कैंपेन के वक्त से काम करना शुरू कर देती हैं.

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इटली, 1948: पहली बार
अप्रैल 1948 में इटली के चुनाव के बारे में अमरीकी हस्तक्षेप को लेकर व्यापक पैमाने पर हवाला दिया जाता है. कहा जाता है कि अमरीका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी ने दूसरे देश के चुनाव में हस्तक्षेप किया था.
ब्लम के मुताबिक़ 1947 में अमरीका ने इटली की सरकार को अपना आर्थिक सहयोगी बनाने का वादा कर वहां के कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों को युद्ध के बाद पहली बार बनी कैबिनेट से बाहर करने पर मजबूर किया था.

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अगले साल और फिर दशकों के लिए वहां के कम्युनिस्टों और सोशलिस्टों के लिए राजनीति मुश्किल हो गई. उन्हें आपस में गठबंधन कर या अकेले भी राजनीति नहीं करने पर बेबस किया गया.

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ब्लम की किताब के मुलाबिक़ अमरीका समर्थित क्रिस्चन डेमोक्रेट्स के निशाने पर इटली में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट रहे.
किताब के मुताबिक़ सीआईए ने सभी तरह के गंदे खेलों को खेलना शुरू कर दिया था.
इतिहासकार अमरीका पर आरोप लगाते हैं कि अमरीका ने इटली में क्रिस्चन-डेमोक्रेटिक उम्मीवारों को आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक लड़ाई में हथियार की तरह इस्तेमाल किया.
नैशनल सिक्यूरिटी आर्काइव की तरफ़ से जारी कई गोपनीय दस्तावेजों के मुताबिक़ इसी तरह के कई और आरोप हैं.

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29 मार्च, 1948 को विदेश मंत्री जॉर्ज मार्शल को संबोधित करते हुए एक दस्तावेज के अनुसार, ''इन चुनावों में एक चीज़ दांव पर लगी है कि इटली आज़ाद देश बना रहेगा या फिर मॉस्को के नियंत्रण में काम करेगा. हमलोग वो सबकुछ करेंगे जिससे आधुनिक डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को इटली में बढ़त मिले. इस मामले में ऐसा कोई संदेश नहीं जाना चाहिेए कि हमने इटली के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप किया है.''
एक मेमोरेंडम से भी पता चलता है कि अमरीका ने इटली को दो टूक कह दिया था कि कम्युनिस्टों का पक्ष लेकर वह मार्शल प्लान का लाभ खो देगा. उसे लोकतंत्र और तानाशाही के बीच किसी एक को चुनना होगा.
लेकिन सीआईए इटली में 1948 में अपने गुप्त अभियान से जु़ड़े दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का विरोध करता है. इस मामले में सीआईए राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देता है.
हालांकि 2014 में सीआईए के रोम ऑफिस के पूर्व चीफ़ ने कहा था कि इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने में कोई समस्या नहीं है.
जैक डिवाइन ने अपनी जीवनी में लिखा है कि सीआईए नहीं होती तो 1948 में इटैलियन कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव संभवतः जीत सकती थी.

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चिली, 1964 और 1970: एक लैटिन अमरीकी क्लासिक
11 सितंबर 1973 में चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंडे के तख़्तापलट करने में अमरीकी भूमिका काफी चर्चित है. लेकिन 1964 के चुनाव से ही चिली में सोशलिस्ट उम्मीदवार के ख़िलाफ़ सीआईए काम कर रही थी. उस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था और 1970 के चुनाव में जीत मिली थी.
हालांकि सीआईए के दस्तावेज़ों के मुताबिक़ अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी ने 1964 के चुनाव में अलेंडे के मुख्य प्रतिद्वंद्वी के समर्थन में कुल 2.6 मिलियन डॉलर ख़र्च किया था.
इस दस्तावेज़ को नैशनल सिक्यूरिटी अर्काइव ने 2004 में सार्वजनिक किया था. इसी वजह से एडवर्डो फ्रेइ भविष्य के विजेता रहे.
इसके अलावा तीन मिलियन डॉलर अलेंडे के ख़िलाफ़ प्रचार करने वाले कार्यकर्ताओं पर ख़र्च किया गया था. इसमें वोटर्स और सहयोगियों को दूर रखना था.

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एक अप्रैल, 1964 के एक मेमो के मुताबिक़ सीईआइए ने साफ़ कहा था कि यदि ज़रूरत पड़े तो वोटरों को ख़रीदा जाए. 1969 के एक मेमो के मुताबिक़ सीआईए ने लाखों डॉलर 1965 और 1969 के संसदीय चुनाव को प्रभावित करने के लिए ख़र्च किया था.
वर्षों बाद हेनरी किसिंजर की अध्यक्षता वाली 'कमिटी 40' ने 1970 के चुनाव में गुप्त अभियान चलाने की सिफ़ारिश की थी.
रूस, 1996: बोरिस येल्तसिन का आना
अमरीका ने 1996 के रूसी चुनाव में बोरिस येल्तसिन की जीत में अहम भूमिका अदा की थी. तीन अमरीकी परामर्शदाता - जॉर्ज गोर्टन, जोसेफ शुमते और रिचर्ड ड्रेसनर ने रूसी राष्ट्रपति को फिर से चुनाव सलाह दी थी.
टाइम मैगज़ीन को दिए इंटरव्यू में, जो कि चुनाव के बाद प्रकाशित हुआ था, तीनों विशेषज्ञों ने कहा था कि उन्होंने ऑपरेशन को आगे बढ़ाया था.

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इन सब के ऊपर टीम ने येल्तसिन को समझाया कि वह कम्युनिस्ट उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ नकारात्मक कैंपेन चलाएं. राष्ट्रपति क्लिंटन ने येल्तसिन से कहा था कि वह रूसी चुनाव में अमरीका के सकारात्मक प्रभाव को सुनिश्चित करें.
ब्लम ने अपनी किताब में कहा है कि मॉस्को में अमरीकी कन्सल्टेंट्स अप्रैल में क्लिंटन-येल्तसिन की मुलाकात पर काम कर रहे थे. इसमें इस बात की कोशिश की जा रही थी कि रूस को पश्चिम के साथ खड़ा दिखाया जा सके.
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