'किसान, जवान और मजदूर तीनों की आंखों में आंसू'

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- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
राजस्थान की झीलों की नगरी उदयपुर में इन दिनों जैन संतों का चौमासा चल रहा है, जहां श्रद्धालुओं की बहुत गहमागहमी है.
ये संत दूर-दूर से आए हुए हैं, लेकिन यहां एक जगह ऐसी भी है, जहां एक युवा आंदोलनकारी का छहमासा चल रहा है.
यह आंदोलनकारी कोई और नहीं, गुजरात का युवा पाटीदार नेता हार्दिक पटेल है. हार्दिक हाईकोर्ट के आदेश से गुजरात से छह महीनों और मेहसाणा से नौ महीनों के लिए निर्वासित है.
यही दंड जब किसी छुटभैया अपराधी को मिलता है तो उसे पुलिसिया भाषा में तड़ीपार करना भी कहते हैं. चाहे कुछ भी हो, लेकिन हार्दिक पटेल से उदयपुर में राजस्थान और गुजरात के 25-25 हज़ार लोग मिल चुके हैं.
हार्दिक ने जेल से होकर निर्वासन तक पहुंचने के बाद अपनी भाषा और मुहावरे में भी नए बदलाव किए हैं.
वे कहते हैं, हमारा आंदोलन जातिगत आरक्षण का आंदोलन नहीं, गुजरात के नवनिर्माण का आंदोलन है.

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गुजरात में पाटीदारों और पटेलों को जातिगत चेतना के आधार पर एक करके राजनीतिक हल्कों में सनसनी फैला देने वाले हार्दिक इन दिनों राजस्थान के अख़बारों की सुर्खियों में हैं.
हार्दिक इन दिनों उदयपुर एयरपोर्ट के निकट प्रतापनगर में धाऊजी की ढाणी के एक नए बने बंगले में रुके हुए हैं.
यह बंगला कांग्रेस के नेता और पूर्व विधायक पुष्कर डांगी का है. मेवाड़ के डांगी भी पाटीदार, पटेल और गुर्जर समाज के करीबी हैं.
डांगियों, पटेलों और पाटीदारों के बीच अभी दूरियां हैं. इनका रोटी का व्यवहार तो होता है, लेकिन आपस में शादियों की मिसालें बहुत कम हैं.
एक कांग्रेसी नेता के घर रुकने का राजनीतिक हलकों में यह मतलब भी निकाला जा रहा है कि वे भविष्य में कांग्रेस की मदद कर सकते हैं.
हार्दिक इससे साफ़ इनकार करते हैं. किसी भी राजनीतिक दल से संबंध नहीं होने और किसी भी तरह की संभावना से इनकार करते हुए जरा अलग तरह से कहते हैं, "अभी शादी का सवाल ही नहीं है, क्योंकि अभी न तो मंगनी हुई है और न ही देखा दिखाई."

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हार्दिक पटेल जिस जगह रुके हुए हैं, वह सोशल मीडिया में बहस और टिप्पणियों का विषय बना हुआ है. पुष्कर डांगी के जिस घर में वह रुके हुए हैं, उसके बारे में कहा जा रहा है कि यह उनका निर्वासन शिविर है और उनके चारों तरफ़ सुरक्षा एजेंसियों के तंबू तने हुए हैं.
हार्दिक पटेल का यह निर्वासन शिविर अंदर से किसी किले की तरह नज़र आता है. जैसे वहां कोई बहुत बड़ा विद्रोही लंगर लगाकर बैठो हो!
हार्दिक पटेल मीडिया ही नहीं, राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लोगों के बीच बहुत कौतूहल का विषय हैं. राज्य में इन दिनों छात्र संघों के चुनाव हैं और बहुत से युवा उनसे मिलने जा रहे हैं.
हार्दिक कहते हैं, "कुछ लोगों ने गुजरात में सोच-समझकर दंगे कराए. भाई के ख़िलाफ़ भाई को भड़काया. भोले-भाले लोग भड़क गए. भाइयों ने भाइयों को मार डाला."

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हार्दिक पटेल बताते हैं कि 2002 के दंगों में एक समुदाय विशेष के लोगों की हत्या के अभियोग में 100 से ज्यादा पटेल आजीवन कारावास काट रहे हैं.
वो कहते हैं, "एक तरफ लोग सज़ा भुगत रहे हैं और दंगे करवाने वाले सरकार में मज़े कर रहे हैं.
यह पूछने पर कि आख़िर उनके पास इस बात का आधार क्या है, हार्दिक पटेल जानेमाने पत्रकार आकार पटेल के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे लेख को आगे कर देते हैं.
आकार पटेल के लेख की वे अपनी तरह से एक अलग व्याख्या करके गुजरात के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य को समझाने की कोशिश करते हैं. आकार पटेल के इस लेख का सारांश यह है कि गुजरात के पटेल-पाटीदार समुदाय के मतदाता एक बंद गली में फंस गए हैं. उनके पास भाजपा को छोड़कर जाने के बाद कोई विकल्प ही नहीं है.

लेकिन हार्दिक पटेल इससे सहमत नहीं हैं और वे कहते हैं कि गुजरात एक बड़े बदलाव के मुहाने पर है. कैसा बदलाव? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए वे सामाजिक बदलाव के साथ राजनीतिक बदलाव की बात भी करते हैं.
कब तक? प्रश्न करने पर वे कहते हैं, बहुत जल्द. साल दो साल में. वे कहते हैं, "गुजरात की जनता सब जान चुकी है. उनका यह भी तर्क है कि राज्य की 80 सीटों पर पटेल ही पूरी तरह फ़ैसला करते हैं, जबकि 20 सीटें ऐसी हैं, जहां पटेलों का वोट निर्णायक है.
वे कहते हैं कि गुजरात की सौ सीटें पर पटेल फ़ैसला करते हैं कि कौन जीतता है और कौन हारता है.
हार्दिक पटेल टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार हाथ में लेकर रेखांकित करते हुए बताते हैं, "दंगों के मामलों में चार दिन पहले जिन 11 लोगों को उम्रकैद हुई है, वे सभी पटेल हैं. बीते 9 अप्रैल को हाईकोर्ट ने जिन 21 लोगों को 23 मुस्लिमों की हत्या के आरोप में जेलों में भेजा है, वे सभी पटेल हैं. चार मई को ऐसे ही आरोपों में 30 पटेलों को आजीवन कारावास हुआ है. ये सभी 1992 के दंगों में हुए नरसंहार के जिम्मेदार ठहराए गए हैं और इन सभी को उम्रकैद हुई है. ये सभी भोले-भाले पटेल हैं और उनका कभी कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा. लेकिन उन्हें रातोंरात धर्मांध लोगों ने वैचारिक रूप से विषाक्त कर दिया और नतीजा सामने है."

हार्दिक पटेल ने दोहराया, "भोलेभाले लोग आज जेलों में उम्रकैद काट रहे हैं और चालाक लोग मामला भड़का कर सत्ता का सुख भोग रहे हैं. अब यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा."
हार्दिक पटेल गुजरात मॉडल और गुजरात के विकास पर भी प्रश्न उठा रहे हैं. उनका कहना है कि अगर गुजरात का मॉडल ही विकास का मॉडल है तो इससे बढ़िया विकास तो कोई किसान भी कर देगा.
सरकार ने भारी भरकम कर्ज ले लिए हैं. किसानों की ज़मीनें बिक रही हैं. ज़मीनें बेचकर लोग आलीशान बंगले और गाड़ियां खरीद रहे हैं. ये कोई विकास है क्या? यह तो साफ़-साफ़ विनाश है.
तो फिर विकास क्या है? प्रश्न पर वे जवाब देते हैं, किसान की ज़मीन में उत्पादन बढ़ जाए, फसलों के पूरे भाव मिलने लगें, शिक्षा पूरी होते ही रोजगार मिल जाए, प्यासे लोगों को पीने का साफ़ पानी मिले, स्कूलों में पूरे शिक्षक हो जाएं और शिक्षा का स्तर सुधर जाए तो विकास होता है.

हार्दिक कहते हैं, "गुजरात किसान, जवान और मजदूर पर टिका है और आज इन तीनों की आंखों में आंसू हैं. यह कैसा गुजरात मॉडल है!"
हार्दिक पटेल उदयपुर में ज़रूर है, लेकिन उन पर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का बहुत कड़ा पहरा है. वो 17 जुलाई को उदयपुर आए थे और एक दिन बाद ही राजसमंद ज़िले के नाथद्वारा मंदिर में गए तो पुलिस के अफसरों ने उन्हें चेताया कि वे सिर्फ अपने शिविर में ही रहें.
वे प्रदेश में कहीं भी बाहर नहीं आ-जा सकते. हार्दिक पटेल इस पर विरोध जताते हैं और कहते हैं कि यह सब पुलिस के अधिकारी नाहक उन्हें परेशान कर रहे हैं. कोर्ट का ऐसा कोई आदेश नहीं है. हार्दिक को उदयपुर में हर सोमवार को पुलिस थाने में अपनी हाजिरी भी देनी होती है. यह उनके लिए एक ज़रूरी प्रतिबंध है.
हार्दिक पटेल ने 20 जुलाई को उदयपुर में ही अपना जन्मदिन मनाया और परिजनों से मिले. उनके पिता अभी दो दिन पहले ही उनसे मिलकर वापस घर गए हैं. उनके एक चाचा उनके साथ हर समय रहते हैं. अब उन्हें रक्षा बंधन पर अपनी बहन के आने का इंतज़ार है, ताकि वे राखी बंधवा सकें.

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लेकिन गुजरात के विरम गांव के इस लड़के को लेकर सबसे ज्यादा उत्कंठा अगर किसी में है तो वे पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लोग हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि आख़िर इस लड़के में ऐसा क्या है कि इसने अहमदाबाद की सड़कों पर 18 लाख से ज़्यादा लोग उतार दिए.
एक औसत सा दिखने वाला यह लड़का कोई ज़्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं है. यह न तो जेएनयू का कन्हैया है और न ही यह राजस्थान के गुर्जर आंदोलन के नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला जैसा कोई फौजी प्रशिक्षण पाया और अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ने वाला कोई गहरी थाह वाला नेता है.
एक सुरक्षा प्रहरी बताते हैं कि गुजरात में सबमर्सिबल पंप बेचने वाले औसत किसान का यह बेटा ग्रेस नंबरों से पास हुआ और दो राज्यों की सरकारों का सिरदर्द बना हुआ है.
ख़ुद हार्दिक भी बताते हैं कि वे बीकॉम तक ही पढ़े हैं. हार्दिक का कहना है कि वह बीकॉम करते हुए दिल्ली, झारखंड, उड़ीसा, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों का दौरा कर चुके थे और सामाजिक आंदोलनों को जान चुके थे.

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हार्दिक ने आपातकाल से पहले के जेपी आंदोलन को भी समझा है. इसके बाद ही उन्होंने कुर्मी, गुर्जर, पटेल और पाटीदारों को एक छाते के नीचे लाने की कोशिश की.
हार्दिक का कहना है कि गुजरात में पहले पटेलों को इस्तेमाल किया गया फिर उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया गया. ऐसा ही अब दलितों के साथ हो रहा है.
कॉलेज में उन्होंने कभी सरदार पटेल ग्रुप बनाया तो कभी पाटीदार अनामत आंदोलन समिति गठित की. लेकिन पटेल नवनिर्माण सेना के बैनर तले उन्होंने बड़े प्रदर्शन किए.
हार्दिक से मिलना किसी के लिए भी रोचक हो सकता है. हार्दिक भले साफ़-साफ़ न कहें, लेकिन उनके कहने का एक मतलब यह भी है कि विश्व हिन्दू परिषद के नेता प्रवीण भाई तोगड़िया भी पटेल हैं और उनके साथ भी धोखा हुआ है, जैसे गुजरात में बाकी पटेलों के साथ हुआ है.

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गुजरात के ताज़ा राजनीतिक बदलावों को लेकर वे कहते हैं कि वह सब लोकशाही का अपमान है. पहले आनंदी बेन पटेल को नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री बनवाया, क्योंकि वे उनकी कठपुतली थीं.
नए मुख्यमंत्री विजय रूपानी को उन्होंने भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह की कठपुतली बताया.
हार्दिक अपने समर्थकों से घिरे रहते हैं और बीच-बीच में कोई ऐसी टिप्पणी करते हैं, जो चौंकाती भी है और हंसाती भी है.
किसी ने मोदी पर कुछ कहा तो हार्दिक बोले, "मनमोहन सिंह चुप ही रहते थे और करते कुछ नहीं थे. अब मोदी प्रधानमंत्री हैं और ये बोलते ही जाते हैं, बोलते ही जाते है, लेकिन करते कुछ नहीं है. बताओ दोनों में क्या फ़र्क?"
एक सवाल पर हार्दिक ने कहा, "गुजरात की राजनीति में बहुत गंदगी हो गई है."

तभी किसी ने कहा, "नेताओं को ठीक करने की ज़रूरत है."
हार्दिक ने कहा, "नहीं, नहीं. जिस दिन जनता सुधर जाएगी, उस दिन नेता भी सुधर जाएंगे!"
हार्दिक पटेल से मिलने वाले गुजराती मूल के कई लोग बहुत डरे हुए हैं.
कई बार अख़बारों में जब यह छपता है कि हार्दिक पटेल से कुछ गुजराती समाज के लोग मिले हैं तो अगले दिन अख़बारों में यह खंडन पढ़ने को मिलता है कि गुजराती समाज के लोग हार्दिक से नहीं मिले.
ऐसे समाजों को डर है कि कहीं सरकार उनके सामाजिक कार्यक्रमों को मिलने वाली आर्थिक मदद बंद नहीं कर दे. ऐसे लोगों का कहना है कि अब कौन पचड़े में पड़े. पता नहीं सरकार के लोग इसका क्या मतलब निकालें. लेकिन इन सबके अलावा यह सच है कि हार्दिक पटेल अब राजस्थान के इस थमे हुए से शहर की ठहरी हुई राजनीति में एक गति ले आए हैं.
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