'मोदी का भविष्य और महंगाई जीएसटी से जुड़े हैं'

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- Author, शिवम विज
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
पूरी दुनिया में जब भी किसी क्षेत्र में समान बिक्री कर लागू किया गया वहां थोड़े समय के लिए महंगाई बढ़ी.
हर कोई इस बात से सहमत है कि भारत में भी इससे महंगाई बढ़ेगी.
हालांकि सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल, बिजली और शराब को फिलहाल वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से अलग रखकर महंगाई बढ़ने की संभावना को कम करने की कोशिश की है. इसलिए इसका सबसे अधिक असर सेवाओं पर होगा.
अभी तक जीएसटी संसद में एक तकनीकी बहस बना रहा है. लेकिन इसके पास होने के बाद, ये सड़क पर एक राजनीतिक मुद्दा बन सकता है.
पढ़ें - <link type="page"><caption> राज्यसभा में जीएसटी से संबंधित संविधान संशोधन बिल पास </caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2016/08/160803_gst_passed_ia" platform="highweb"/></link>

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कांग्रेस नेता और पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम पहले ही पहले कह चुके हैं कि अगर टैक्स की दरें 18 फीसद से अधिक रहीं तो सड़क पर विरोध किया जाएगा.
लेकिन 18 फ़ीसद की दर भी बहुत सारी चीजों को महंगा बना देगी, जैसे बाहर खाना, फ़ोन बिल, सिनेमा और इसी तरह की कई अन्य सेवाएं.
ये सारी चीजें उच्च मध्यवर्ग को सीधे चुभ सकती हैं, बल्कि समग्र महंगाई में योगदान भी करेंगी.
असल में इस पहेली की कुंजी इस बात में है कि जिसे थोड़े समय का असर बताया जा रहा है, वह थोड़ा समय कितना होगा.
विशेषज्ञ कहते हैं कि यह समय एक साल का हो सकता है, लेकिन ये तीन साल तक भी जारी रह सकता है. बिल के पास होने में इस देरी का मतलब है कि एक अप्रैल की समय सीमा में जीएसटी लागू करना मुश्किल है.
अप्रत्यक्ष कराधान के नए तरीक़ों को पूरी तरह अपनाने में सरकार और उद्योग जगत दोनों को और वक़्त की ज़रूरत है.

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मान लीजिए जीएसटी अगले साल के मध्य में पूरी तरह लागू हो और इसके कारण महंगाई बहुत बढ़ जाए, तो इसका राजनीतिक असर 2018 में दस राज्यों में होने वाले चुनावों में दिखेगा.
अच्छे मानसून, सातवें वेतन आयोग और निवेश में बढ़ोत्तरी के साथ, ऊंची महंगाई दर मोदी सरकार पर 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले असर डाल सकती है.
साल 2018 में गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड और त्रिपुरा के चुनाव होंगे.
इसके अगले साल आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, ओडिशा, तेलंगाना, सिक्किम, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में चुनाव होने हैं.
कुछ लोगों का कहना है कि यही वो गणित है जिसे कांग्रेस अपने दिमाग में रखकर राज्यसभा में जीएसटी बिल के पास होने में देर कर रही थी.

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पिछले साल संदीप दवे ने इकोनॉमिक टाइम्स में लिखा था, "पूरी दुनिया में कोई भी सरकार ऐसी नहीं है जो जीएसटी को लागू करने के बाद दोबारा सत्ता में आई हो. केवल इतना ही नहीं, जीएसटी से होने वाले फायदे को हमेशा अगली सरकार ने ही भुनाया है."
उन्होंने सही अनुमान लगाया था कि कांग्रेस 2017 तक जीएसटी को लागू करने की इजाज़त दे देगी.
साल 2015 में मलेशिया ने जीएसटी को वास्तविक रूप से लागू करने के लिए ख़ुद को डेढ़ साल का समय दिया. उसने इस दौरान दाम नियंत्रित करने का क़ानून इस्तेमाल किया और सभी ज़रूरी सामान को जीएसटी से अलग रखा, फिर भी एक साल के लिए महंगाई में तेज़ वृद्धि से बच नहीं पाया.
फ़रवरी 2016 में महंगाई सात साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई, लेकिन उसके बाद से इसमें कमी आई है.
देश में छोटे और मध्यम व्यवसाय के मालिक इसके ख़िलाफ़ सड़क पर भी उतरे थे.

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ऑस्ट्रेलिया में तो 1993 से ही जीएसटी एक तीखा राजनीतिक मुद्दा रहा है. आख़िरकार इसे 2000 में ही लागू किया जा सका.
इससे वहां महंगाई में तीन से छह फ़ीसद तक का इजाफ़ा हुआ, लेकिन केवल एक साल के लिए.
सरकार को टैक्स के असर और इससे बढ़ी महंगाई को कम करने के लिए मजबूर होना पड़ा. उसने उद्योगों को छूट देने और व्यक्तिगत इनकम टैक्स में कमी लाकर स्थिति नियंत्रित करने की कोशिश की.
साल 1994 में जब सिंगापुर ने जीएसटी लागू किया तो उसने भी इसी तरह की छूट दी.
जब महंगाई की दर स्थिर हो जाती है, उसके बाद ही जीएसटी के फ़ायदे महसूस होते हैं.
यह आर्थिक दक्षता को बढ़ाता है और असल में महंगाई को बेहतर तरीक़े से संभालने में मदद करता है.

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वित्त मंत्री अरुण जेटली की सबसे बड़ी चुनौती इस दौरान आने वाले झटकों को कम करने और इस अंतराल को सीमित करने की होगी.
दुर्भाग्य से, आर्थिक असर के मामले अक्सर अनुमान से परे होते हैं.
फिलहाल, तमिलनाडु को छोड़ सभी राज्यों ने इस बिल का समर्थन किया है. लेकिन जब जीएसटी काउंसिल बन जाएगी, फिर जीएसटी की दर पर चर्चा होगी. इसका आगे बढ़ना भी बहुत आसान नहीं होगा.
जीएसटी की दरों को 27 फ़ीसद रखने तक पर चर्चा हो चुकी है, हालांकि वित्त मंत्री ने टैक्स की इतनी ऊंची दर की संभावना से इनकार किया है.
मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने 18 फ़ीसद की टैक्स दर का सुझाव दिया है. ये ऐसी दर है जिसपर सरकार को अपने वर्तमान राजस्व में न तो घाटा होगा न मुनाफ़ा.
हालांकि उन राज्यों के घाटे की भरपाई करनी होगी, जिन्हें राजस्व में नुकसान होगा और इस तरह दर को 18 फ़ीसद से अधिक करना पड़ जाएगा.
जीएसटी जल्द ही भारत का सबसे विवादित विषय बन सकता है.
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