सबसे बड़े माओवादी हमले के 4 अनसुलझे सवाल

हमले के बाद शव ले जाते सुरक्षाकर्मी.

इमेज स्रोत, AP

    • Author, विनोद वर्मा
    • पदनाम, जगदलपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

25 मई को जगदलपुर के कांग्रेस भवन में पार्टी के केंद्रीय और प्रदेश के नेता एकत्रित होकर झीरम हत्याकांड के तीन साल पर श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं.

तीन साल पहले यानी 25 मई, 2013 को कांग्रेस की एक राजनीतिक रैली पर माओवादी हमला हुआ था. इस हमले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला, प्रदेश के पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और पूर्व विधायक उदय मुदलियार सहित कुल 29 लोग मारे गए थे.

आज़ाद भारत के इतिहास में यह सबसे बड़ा माओवादी हमला था. और राजनेताओं की हत्या की दृष्टि से भी यह सबसे बड़ा था.

लेकिन इस बड़े हमले के बाद जो कुछ भी हुआ, उसने कई बड़े सवाल खड़े किए हैं. ये सवाल न केवल कांग्रेस के लिए आवश्यक हैं, मारे गए लोगों के परिजनों के लिए आवश्यक हैं बल्कि ये लोकतंत्र के लिए भी आवश्यक हैं.

वैसे तो सवाल बहुत से हैं लेकिन इन्हें चार बिंदुओं में बांटा जा सकता है.

हमले के बाद घटनास्थल पर बना गड्ढा.

इमेज स्रोत, BBC World Service

पहला सवाल सुरक्षा व्यवस्था को लेकर है. हमले के बाद सबसे बड़ा सवाल उठा कि क्या यह सुरक्षा व्यवस्था में चूक थी? झीरम कांड की जांच कर रहे आयोग की सुनवाई में जो तथ्य सामने आए हैं वे तो इसकी चुग़ली ही करते हैं.

बस्तर इस समय देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित इलाक़ों में से एक है. झीरम घाटी को माओवादियों गतिविधियों का गढ़ माना जाता है.

तथ्य बताते हैं कि हमले के कुछ दिन पहले इसी झीरम इलाक़े में मुख्यमंत्री रमन सिंह की विकास यात्रा हुई थी, तब वहां उनकी सुरक्षा के लिए 1786 सुरक्षाकर्मी तैनात थे. लेकिन कुछ ही दिन बाद कांग्रेस की विकास यात्रा के लिए इसी झीरम घाटी में सुरक्षा के लिए 218 कर्मियों की तैनाती थी. इसमें उन सुरक्षाकर्मियों की संख्या शामिल नहीं है, जो नेताओं की व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए तैनात होते हैं.

इस हमले में मारे गए कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा.

इमेज स्रोत, AP

राज्य के अधिकारियों के सामने यह बड़ा सवाल है कि क्यों उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमज़ोर रखी. वह भी तब जबकि महेंद्र कर्मा पर ज़ाहिर तौर पर नक्सली हमले का ख़तरा था. उन्हें ज़ेड श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई थी. नंदकुमार पटेल पर एकाधित बार नक्सली हमला हो चुका था.

क्यों कांग्रेस के पहले से घोषित कार्यक्रम के लिए राज्य सरकार ने सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं रखी.

दूसरा सवाल राजनीति को लेकर है. जिस समय हमला हुआ राज्य में भाजपा की सरकार थी और छह महीने बाद नई सरकार के गठन के लिए चुनाव होने वाले थे. दोनों दलों के बीच पिछले चुनावों में वोटों का अंतर सिर्फ़ एक फ़ीसद था.

इस अंतर को पाटने के लिए कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल अच्छी रणनीति के साथ पार्टी को खड़ा कर रहे थे और भाजपा ज़ाहिर तौर पर डरी हुई थी.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और कांग्रेस नेता अजीत जोगी.

इमेज स्रोत, Alok Putul

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद माओवादियों के ख़िलाफ़ चल रहा कथित जनांदोलन सलवा जुड़ुम बंद हो चुका था और जैसा कि लोग कहते हैं महेंद्र कर्मा की उपयोगिता सरकार के लिए ख़त्म हो चुकी थी.

फिर ये सवाल लगातार उठ रहे थे कि क्या सत्तारूढ़ पार्टी और माओवादियों के बीच कोई तालमेल है?

वरिष्ठ वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुदीप श्रीवास्तव कहते हैं, “आंकड़े बताते हैं कि जब भी माओवादी चुनाव बहिष्कार की बात करते हैं तो माओवादी प्रभावित इलाक़े में भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलता है.”

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नान घोटाले में लीक हुई डायरी में भी माओवादियों को भाजपा के नेताओं के नाम से बड़ी धनराशि देने का ज़िक्र आता है.

तो क्या यह हमला राजनीतिक कारणों से भी हुआ था जिसमें सरकार की कोई भूमिका थी?

एनआईए के अधिकारी.

इमेज स्रोत, NIA

तीसरा सवाल इस घटना की जांच पर उठता है. इतने बड़े हमले के बाद राज्य सरकार को जिस तरह की कार्रवाई करनी थी, वह तो नहीं हुई. लेकिन इसके बाद एनआईए ने अपनी जांच के बाद जो चार्जशीट फ़ाइल की है उसमें भी कई बड़ी खामियां नज़र आती हैं.

एक तो यह कि एनआईए ने अपनी जांच में बस्तर के तीन बड़े पुलिस अधिकारियों बस्तर के एसपी, सुकमा के एसपी और बस्तर के आईजी को पूछताछ के लिए ही नहीं बुलाया. दूसरा यह कि एनआईए जैसी एजेंसी ने भी इस हमले में किसी षड्यंत्र के कोण से जांच ही नहीं की.

जांच आयोग की सुनवाई जारी है. इसमें कई आंख खोलने वाले तथ्य सामने आए हैं. लेकिन उससे क्या निकलेगा यह तो आयोग की रिपोर्ट ही बताएगी.

विधानसभा में चौतरफ़ा घिरने के बाद रमन सिंह सरकार ने इस घटना की सीबीआई जांच की घोषणा की है. लेकिन इतने वक़्त बाद सीबीआई की जांच क्या बताएगी कहना मुश्किल है.

चौथा सवाल कांग्रेस की चूक को लेकर है. भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े हादसे के बाद राज्य सरकार के कई मंत्री भी मान बैठे थे कि किसी भी क्षण राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जा सकती है.

राहुल गांधी, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह.

इमेज स्रोत, AP

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस के दोनों बड़े नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने तत्परता से राज्य का दौरा किया. लेकिन वे राष्ट्रपति शासन लगाने का फ़ैसला लेने से चूक गए. शायद 356 के दुरुपयोग के पूर्व में लगे आरोपों की आंच वे तब तक महसूस कर रहे थे.

इसके बाद भाजपा यह झूठा प्रचार करने में भी सफल रही कि यह हमला कांग्रेस की अंदरूनी कलह का नतीजा था. दूसरा यह कि ऐन वक़्त पर परिवर्तन यात्रा का मार्ग बदलने की वजह से सुरक्षा पर्याप्त नहीं थी.

अगर यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला था. जिसे कि कई कांग्रेस के कई नेता सही मानते हैं और अपनी ही पार्टी के एक बड़े नेता का नाम लेते हैं. तो क्या यह सरकार के सहयोग के बिना संभव था?

दूसरा इस हमले के बाद स्तब्ध कांग्रेस का संगठन अपने ही नेताओं की मौत से उपजी सहानुभूति को चुनाव तक क़ायम न रख सका. कांग्रेस के कार्यकर्ता भी इसके लिए एकजुट नहीं हो सके.

क्या कांग्रेस तीन साल बाद यह पड़ताल करने की स्थिति में है कि किन परिस्थितियों में उनसे इतनी बड़ी राजनीतिक चूक हुई?

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> क्लिक करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)