क्या बाक़ी देश से अलग है कल्लूरी का क़ानून

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- Author, शुभ्रांशु चौधरी
- पदनाम, बस्तर से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आज से एक साल पहले जब हमने <link type="page"><caption> सीजीनेट स्वर</caption><url href="http://cgnetswara.org/" platform="highweb"/></link> के दफ्तर को भोपाल से रायपुर शिफ्ट किया तो मैं पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से मिला.
सीजीनेट स्वर में हम दूर-दराज़ के इलाक़ों में आदिवासियों को यह सिखाते हैं कि वे मोबाइल की मदद से अपनी बोली में अपनी बात दुनिया से कैसे साझा कर सकते हैं.
छत्तीसगढ़ पुलिस के रवैए से हमें बहुत परेशानी हुई थी इसलिए हम अपना दफ्तर छत्तीसगढ़ नहीं लाना चाहते थे. एक रिटायर्ड वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा, "कल्लूरी से आप लोगों को परेशानी होगी, बस्तर में वो आपको काम नहीं करने देंगे."
एसआरपी कल्लूरी बस्तर रेंज के आईजी (पुलिस महानिरीक्षक) हैं.
माओवादियों पर अपनी किताब पर रिसर्च करते समय कल्लूरी से तब मैं पहली बार मिला था जब वे दंतेवाड़ा में नक्सल आपरेशन के प्रमुख थे. ललाट पर बड़ा-सा टीका और भरी गर्मी में गरम टोपी पहने हुए. उनके बारे में कहा जाता है कि वे जुनूनी हैं और किसी के बारे में अपनी पसंद-नापसंद खुलकर व्यक्त करते हैं.

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उनके दंतेवाड़ा में रहने के दौरान ताडमेटला की घटना हुई जिसमें कई गाँव जला दिए गए थे और घटना की जांच करने गए स्वामी अग्निवेश पर पुलिस के कुछ लोगों ने हमला किया था. उसके बाद कल्लूरी का तबादला कर दिया गया था.
लेकिन थोड़े समय बाद ही कल्लूरी वापस बुला लिए गए.
उनके बारे में कहा जाता है कि वे अपने उच्च अधिकारियों की कम सुनते हैं और सीधे नेताओं से ही बातचीत करते हैं. बताया गया कि उनके तबादले को रद्द कराने के लिए बस्तर के भाजपा नेताओं का बड़ा दल मुख्यमंत्री से मिलने गया था.
कल्लूरी के बारे में यह भी बताया जाता है कि वे बेहद सक्रिय अधिकारी हैं. नक्सल विरोधी अभियानों में ख़ुद रात-रात भर पैदल चलकर हिस्सेदारी करते हैं और उत्तर छत्तीसगढ़ से नक्सल आन्दोलन को ख़त्म करने में उनकी मुख्य भूमिका रही है.
कल्लूरी उस समय चर्चा में आए थे जब उनके ख़िलाफ़ बलात्कार का आरोप लगा था. लेदा नाम की एक महिला ने यह आरोप लगाया था कि कल्लूरी ने उनके नक्सली पति रमेश नगेसिया को आत्मसमर्पण करने के लिए बुलाया लेकिन उसे गोली मार दी और उसके बाद उनके साथ बलात्कार किया.
हालाँकि लेदा ने बाद में वह केस वापस ले लिया.

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दंतेवाड़ा से वापस लौटकर कल्लूरी ने सलवा जुडूम के सूत्रधार महेंद्र कर्मा के बेटों के साथ सलवा जुडूम को दोबारा शुरू करने का प्रयास किया, उनके साथ कई पत्रकार वार्ताएं की, पुराने अब सक्रिय न रहे सलवा जुडूम नेताओं से मिले, पर कांग्रेस हाईकमान के ऐतराज़ के बाद वह योजना कामयाब नहीं हो सकी.
सलवा जुडूम को सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में गैर-कानूनी घोषित कर दिया था और महेंद्र कर्मा नक्सलियों के हमले में मारे गए थे.
महेंद्र कर्मा के प्रमुख सहयोगी अजय सिंह कहते हैं, "वे लोग हमारे पास आए थे पर हमने मना कर दिया. सलवा जुडूम से बहुत नुक़सान हुआ है. हम जितने लोग इसमें जुड़े थे उसमें से हमारे ज़िले में चार ही बचे हैं. इसकी पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए."

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उसके बाद कल्लूरी ने जगदलपुर के व्यापारी और ठेकेदार वर्ग को संगठित करने का काम शुरू किया है. अब वे वह सब कर रहे हैं जो कर्मा सलवा जुडूम के शुरु होने से पहले के दिनों में कर रहे थे. इस बार संगठन का नाम 'सामाजिक एकता मंच' रखा गया है.
बस्तर के कलेक्टर अमित कटारिया ने बताया, "कल्लूरी की सक्रियता के कारण बहुत से नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. अब हमें नक्सली गतिविधियों के बारे में सूचना मिलने लगी है और नक्सली बैकफुट पर हैं इसलिए श्री कल्लूरी को बेनिफिट ऑफ़ डाउट दिया जाना चाहिए."
उन्होंने यह भी बताया, "कल्लूरी चाहते हैं कि सीआरपीएफ रोड बनवाने और उसकी सुरक्षा में मदद करे. सारे ऑपरेशन अब डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व ग्रुप) ही करेगा. बस्तर में सीआरपीएफ का नया मज़ाकिया नाम सेन्ट्रल रोड प्रोटेक्शन फ़ोर्स है."

डीआरजी स्थानीय युवाओं का वह समूह है जो गोंडी बोलता है स्थानीय इलाक़े को समझता है. इनमें से कई नक्सलियों के पूर्व सहयोगी रहे हैं. पिछले दिनों बस्तर से बलात्कार की जितनी खबरें आईं, सभी शिकायतों में एक बात समान थी कि आरोपी गोंडी में बात कर रहे थे.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के स्थानीय नेता मनीष कुंजाम कहते हैं, "नक्सलियों में आंध्र के नेता धीरे-धीरे स्थानीय आदिवासी नेताओं को कमान सौंपकर पीछे हट रहे हैं, नए नेता हड़बड़ी में गलत हत्याएं कर रहे हैं, इन सब के कारण कल्लूरी की डीआरजी में काफ़ी स्थानीय युवा जुड़ रहे हैं जो प्रभावी हैं, पर सारे बलात्कार यही अर्धप्रशिक्षित लड़के कर रहे हैं."

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बस्तर के एक डरे हुए पत्रकार जो अपना नाम नहीं बताना चाहते, कहते हैं, "यहाँ लड़ाई वामपंथी उग्रवाद और दक्षिणपंथी उग्रवाद के बीच ही है. इस लड़ाई में संघ और भाजपा के सिपाही कल्लूरी हैं, बाकी तो सब दर्शक हैं."
(शुभ्रांशु चौधरी <link type="page"><caption> सीजीनेट स्वर</caption><url href="http://cgnetswara.org/" platform="highweb"/></link> के संस्थापक हैं)
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