सच हो रहा है कांग्रेस मुक्त भारत का 'सपना'?

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने वाली भाजपा अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है? आखिर क्या मतलब है कांग्रेस मुक्त भारत के जुमले का और क्या ताज़ा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय चरित्र पर सवाल उठाना सही है?
वेबसाइट ‘फ़र्स्ट पोस्ट’ पर वरिष्ठ पत्रकार आर जगन्नाथ <link type="page"><caption> लिखते</caption><url href="http://www.firstpost.com/politics/mamata-banerjee-trinamool-congress-assam-assembly-election-2016-west-bengal-assembly-election-2016-tamil-nadu-assembly-election-2016-puducherry-assembly-election-2016-kerala-assembly-election-2-2788862.html" platform="highweb"/></link> हैं, “कांग्रेस-मुक्त भारत की बात करने वाली भाजपा ने अपने लक्ष्य का आधा रास्ता पूरा कर लिया है लेकिन इसका कारण भाजपा के अलावा क्षेत्रीय दल भी हैं. जैसे जैसे कांग्रेस सिकुड़ रही है, भाजपा फैल रही है.”
चार राज्यों और केंद्र शासित पुड्डुचेरी से आ रहे चुनाव नतीजों पर नज़र डालते हैं तो भारत में कांग्रेस की छाप और घटी है और भाजपा की शक्ति बढ़ी है.

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असम में 29.6 प्रतिशत वोट हासिल करने के बाद पूर्वी भारत में भाजपा पहली बार सरकार बनाने जा रही है.
केरल जैसे राज्य में जहां भाजपा नदारद थी, वहां पार्टी को 10.6 प्रतिशत वोट हासिल हुए और तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है. केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ़ सत्ता से बाहर हो गई. केरल में यूडीएफ़ की हार के लिए भाजपा गठबंधन को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 10.2 प्रतिशत वोट हासिल किए और कांग्रेस और वाम दलों के वोटों को काटा.

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आज की तारीख़ में भाजपा की अपने दम पर नौ राज्यों में सरकारे हैं जबकि कांग्रेस सरकारें घटकर छह छोटे राज्यों में ही रह गई हैं. तो इसे कांग्रेस-मुक्त भारत की शुरुआत न माना जाए?
सीएसडीएस के अभय कुमार दुबे ने बीबीसी ये कहा कि कांग्रेस-मुक्त भारत के नारे का मतलब ये नहीं है कि भारत से कांग्रेस का सफ़ाया हो जाए.
वो कहते हैं, “इसका मतलब ये है कि अगर भाजपा को लोकप्रियता हासिल हो, उसी अनुपात में कांग्रेस लोकप्रिय न हो. मतलय यह कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस सत्ता की दौड़ से बाहर हो जाए और भाजपा के सामने निपटने के लिए सिर्फ़ क्षेत्रीय शक्तियां रह जाएं, जिनसे भाजपा समय समय पर गठजोड़ और संघर्ष, दोनो में से किसी एक की भूमिका में जा सकती है.”

गुरुवार के नतीजों के बाद एक बार फिर कांग्रेस आलोचकों के निशाने पर है.
तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हार के लिए पार्टी नेतृत्व के गठबंधन के फ़ैसले पर सवाल खड़े हो रहे हैं. पश्चिम बंगाल में जहां वाम दल और कांग्रेस साथ साथ थे, केरल में वो एक दूसरे के विरोधी थे.
कुछ समय पूर्व तक डीएमके और कांग्रेस के संबंधों को शायद ही लोग भूले हों लेकिन इन चुनाव में वो साथ-साथ लड़ रहे थे. असम में तीन टर्म्स के बाद गोगोई सरकार का बिना किसी गठबंधन के चुनाव में अकेले जाना, आलोचक इसे पचा नहीं पा रहे हैं.
जगन्नाथन लिखते हैं कि भाजपा को अगली चुनौती कांग्रेस की ओर से नहीं बल्कि क्षेत्रीय और वाम दलों से आएगी.

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वो लिखते हैं, “नीतीश कुमार ने 2019 में मोदी विरोध पर ध्यान देते हुए अपने साथियों को चुना है लेकिन क्या वोटर इतने विशाल गठबंधन को चुनेंगे या फिर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को, ये वक्त बताएगा.”
कांग्रेस की लगातार हार के बाद कई आलोचक कांग्रेस के राष्ट्रीय चरित्र पर सवाल खड़े कर रहे हैं लेकिन अभय दुबे इसे गलत मानते हैं.
वो कहते हैं, “गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हमेशा कांग्रेस विरोधी दल होती है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, पूरे उत्तर पूर्व में कांग्रेस या सत्ता में होती है या मुख्य विरोधी दल होती है. जो पार्टी या तो मुख्य विरोधी दल है या सत्ता की दावेदार है, वो राष्ट्रीय पार्टी कैसे नहीं कहलाएगी. भाजपा की दावेदारियों को हमें सही परिपेक्ष्य में रखना चाहिए.”
जगन्नाथन के अनुसार अगले तीन सालों में अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर मोदी सरकार के कामों पर बहुत कुछ निर्भर करेगा.

वो लिखते हैं, “राजनीतिक तौर पर भाजपा सही काम कर रही है. दिल्ली और बिहार में भारी हार के बाद पार्टी ने असम और केरल में स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने और गठबंधनों को बनाने के लिए काम किया. पार्टी अब मोदी से ही उसे दिक्कतों से निकालने की उम्मीद नहीं कर रही है.”
उधर कांग्रस के खराब प्रदर्शन के बाद मीडिया के सवालों पर पार्टी प्रवक्ताओं के लिए जवाब देना आसान नहीं हो रहा है. अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्विटर पर लिखा, “हमें देखना पड़ेगा कि हमसे कहां-कहां गलतियां हुईं.”
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा कि वो “जनादेश को नम्रता” के साथ स्वीकार करते हैं.

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कांग्रेस नेतृत्व के रवैये पर अभय दुबे टिप्पणी करते हुए कहते हैं, “उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़ दें तो दलित, मुसलमान, आदिवासी और ऊंची जातियां भी हर जगह कांग्रेस की ओर झुके रहते हैं. तो ये मानना गलत है कि कांग्रेस वापसी नहीं कर पाएगी. कांग्रेस अगर नेतृत्व के स्तर पर खुद को सुधार ले... तो कांग्रेस अपने प्रदर्शन को नाटकीय तौर पर सुधार सकती है.”
देश भर में सिकुड़ने की बात पर कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने टीवी चैनल एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि लोग बहुत जल्दी निष्कर्श पर पहुंच रहे हैं.
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