असम में भाजपा का 'मिशन 84' ऐसे पूरा हुआ

assam

इमेज स्रोत, Dasrath Deka

    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

पहुंचना था "मिशन 84" तक पहुँच रहे हैं 84 से भी आगे...

इस साल जनवरी तक असम विधान सभा चुनाव में भाजपा का सहयोगियों के साथ लक्ष्य 126 सीटों में से 84 सीटें हासिल करने का था जो सरकार बनाने के लिए काफ़ी है.

लेकिन अगले महीने यानी फ़रवरी में पार्टी ने एक नयी स्ट्रेटेजी बनायी और लक्ष्य रखा 90 सीटों और अब तो वो भी लगभग पूरा होता दिखाई देता है.

इतना ही नहीं, भाजपा ने केरल में एक सीट हासिल करके राज्य में अपना खाता खोल लिया है. पश्चिम बंगाल में सात सीटें हासिल करके अपनी टैली बेहतर कर ली है.

भाजपा के खेमे में इन कामयाबियों के कारण जितना जश्न मनाया जा रहा है उतना ही जश्न कांग्रेस पार्टी की हार के कारण मनाया जा रहा है.

modi

लेकिन ये संभव कैसे हुआ ?

पार्टी ने दिल्ली और बिहार में शिकस्त के बाद ही असम विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थीं. उसने अपने कार्यकर्ताओं को दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने के लिए 'मिशन 84' का नारा दिया था.

modi

इमेज स्रोत, Reuters

असम में भाजपा की जीत इसलिए भी ज़्यादा सराहनीय है क्योंकि कांग्रेस के तरुण गोगोई जैसी कद्दावर शख़्सियत इसके पास नहीं थी. गोगोई ने पार्टी को पिछले तीन चुनाव में जीत दिलाई थी. उनके ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के बड़े आरोप भी नहीं थे.

अगर असम का विधानसभा चुनाव जनवरी या फ़रवरी के माहौल में होता तो भाजपा की हार यक़ीनी थी. भाजपा ने नयी रणनीति में अपनी कमियों की एक सूची बनायी, जिसमें से ख़ास ये थीं:

assam

इमेज स्रोत, Dilip Sharma

  • तरुण गोगोई जैसी बड़ी हस्ती को घेरना आसान नहीं.
  • 50 से भी अधिक सीटों पर भाजपा का बुनियादी ढांचा नहीं.
  • तीन विधानसभा चुनाव में जीत के बावजूद कांग्रेस विरोधी लहर नहीं.
  • बदरुद्दीन अजमल का तथाकथित मुस्लिम वोट बैंक.
  • अवैध बांग्लादेशी मुद्दे पर सही रणनीति नहीं.
  • असम में चार अलग-अलग क्षेत्र हैं लेकिन भाजपा के पास हर प्रान्त के लिए अलग-अलग रणनीति नहीं.
modi-shah

इमेज स्रोत, Other

पार्टी ने अपर असम, बोडोलैंड और बराक वैली जैसे क्षेत्रों में अलग-अलग चुनावी रणनीति अपनायी. छोटी पार्टियों के साथ तालमेल किया, गठबंधन भी बनाया.

असम गण परिषद भले ही असम में अपना असर खो चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद पार्टी ने इससे हाथ मिलाया क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में इसका वोट शेयर अधिकतर सीटों पर 5 से 8 प्रतिशत था.

पार्टी ने गोगोई सरकार विरोधी लहर को विकास की कमी और राज्य के पिछड़ेपन को उजागर करके पैदा की. कथित रूप से ग़ैर क़ानूनी तौर पर रह रहे 'बांग्लादेशियों' के ख़िलाफ़ आवाज़ तो उठायी लेकिन सांप्रदायिक लाइन पर चुनावी प्रचार करने से परहेज़ किया. बदरुद्दीन अजमल के मुस्लिम वोट बैंक पर भी सेंध लगाई.

पार्टी के पक्ष में जो बातें थीं उन पर भी जोर दिया गया. पार्टी को जनता का मूड 2014 के लोकसभा चुनाव में समझ में आ गया था. इस चुनाव में भाजपा का वोट शेयर पिछले तीन आम चुनावों के मुक़ाबले काफ़ी अधिक था. इस चुनाव में 36.5 प्रतिशत वोट शेयर हासिल करके इसने कांग्रेस के 29.6 प्रतिशत वोट शेयर पर बढ़त बना ली थी.

क्षेत्रीय स्तर पर असम में पहली बार सरकार बनाकर भाजपा ने उत्तर-पूर्वी राज्यों में प्रवेश कर लिया है. सेवन सिस्टर्स या सात बहनें कहे जाने वाले इन राज्यों में कांग्रेस हावी रही है.

इनमें से कई राज्यों में रहने वाले ईसाई बहुमत में हैं. ये शिक्षा में केरल के बराबर हैं लेकिन विकास में झारखण्ड से भी पीछे. अगर असम में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर रहा और बीफ़ जैसे मुद्दे दोबारा न उठे तो मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम और नगालैंड जैसे राज्यों में भाजपा कामयाबी हासिल कर सकती है.

congress

इमेज स्रोत, Getty Images

राष्ट्रीय स्तर पर इस जीत के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहत की सांस ली होगी. असम के वोटरों ने उनकी लाज रख ली.

दिल्ली और बिहार में करारी हार के बाद प्रधानमंत्री के जादू भरे शब्द केवल 'जुमला' बन कर रह गए थे. असम में उनके भाषणों में वो दम नहीं था जो उन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव के समय दिखाया था. अमित शाह भी दबाव में थे.

अगले साल उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव सबसे बड़ी चुनौती होगी. इसके अलवा जीतने के लिए और भी चुनावी अखाड़े होंगे जब 2017 में ही गोवा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, मणिपुर और उत्तराखंड में चुनाव होंगे और 2018 में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान समेत आठ राज्यों में चुनाव होने वाले हैं.

amit shah

इमेज स्रोत, AFP

इस जीत से इस बात के भी संकेत मिलते हैं कि हिंसा, साम्प्रदायिक दंगे और समाज के ध्रुवीकरण जैसे नकारात्मक कदम उठाये बगैर भी चुनाव जीते जा सकते हैं. तोड़-जोड़ की सियासत की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी.

अगर भाजपा 'कांग्रेस-मुक्त भारत' के नारे पर अमल करने के लिए सकारात्मक कदम उठाये तो 6 राज्यों में कांग्रेस की रही-सही सरकारें भी जा सकती हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)