अफ़ज़ल की फांसी बन गई जेएनयू की फांस

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जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर लोगों का ज़बरदस्त ग़ुस्सा भड़का हुआ है और #ShutDownJNU ट्रेंड कर रहा है.
नौ फ़रवरी को जेएनयू के कुछ छात्रों ने अफ़ज़ल गुरु की फांसी की बरसी पर विरोध मार्च निकाला था.
संसद हमले के दोषी करार दिए गए अफ़ज़ल गुरु को नौ फ़रवरी 2013 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था.

यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस विरोध मार्च को मंज़ूरी नहीं दी थी लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों ने दावा किया कि उन्होंने विरोध मार्च निकाला और अफ़ज़ल गुरु की फांसी को न्यायिक हत्या करार दिया.
उसी के बाद से सोशल मीडिया पर जेएनयू के ख़िलाफ़ कमेंट्स की बाढ़ आ गई. #ShutDownJNU पर 96 हज़ार से भी ज़्यादा ट्वीट्स आ चुके हैं.
@iNirajVerma लिखते हैं, "ये विडम्बना है दिल्ली का ये शिक्षा संस्थान जेएनयू कुछ राजनीतिक पार्टियों की शह पर देश द्रोही और नक्सल समर्थकों का अड्डा बन चुका है."
@AnilkumarGhss ने लिखा, "भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे महान लोगों का अपमान और अफ़ज़ल गुरु का सम्मान. ये काम सिर्फ़ जेएनयू ही कर सकता हैै."

फ़ेसबुक पर समीरन नंदी लिखते हैं, "आज मुझे बहुत ख़ुशी है कि मेरे नंबर कम आने की वजह से मेरा दाखिला जेएनयू में नहीं हो पाया. मुझे गर्व है कि मैं इस संस्थान का छात्र नहीं बना."
फ़ेसबुक पर ही रबींद्र नाथ लिखते हैं, "बहुत अच्छे जेएनयू. आज अफ़ज़ल गुरु की फांसी का विरोध तो कल कसाब की फांसी का भी विरोध करोेगे. और कुछ नासमझ इस हरकत को फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन करार देंगे."
ट्विटर पर @DrGPradhan ने लिखा, "देश का दुर्भाग्य देखिए, देश हनमनथप्पा के लिए प्रार्थना कर रहा है और JNU अफज़ल गुरु के लिए."
लेकिन प्रतीक अली फ़ेसबुक पर लिखते हैं, "मुझे गर्व है कि मैं जेएनयू का हिस्सा रहा. जब भी मैं न्यूज़ चैनलों में झूठे राष्ट्रवाद को डिफ़ेंड करते हुए गंदी भाषा में चीखते चिल्लाते पत्रकारों और विशेषज्ञों को देखता हूं तो मुझे जेएनयू पर गर्व होता है. अफ़ज़ल गुरु जैसों को फांसी पर लटकाना विशुद्ध रूप से न्यायिक हत्या है और कुछ नहीं. ख़ुद कोर्ट ने माना था कि अफ़ज़ल गुरु के ख़िलाफ़ सिर्फ़ परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं और कुछ नहीं. गुरु जैसों को उनके अपराधों के लिए नहीं बल्कि राजनेताओं की चमड़ी बचाने के लिए फांसी पर लटकाया गया."
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