'आप' भी मूर्तियों की एक दुकान ही निकली: योगेंद्र यादव

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आम आदमी पार्टी से बाहर होने के बाद स्वराज अभियान की शुरुआत करने वाले योगेंद्र यादव अब एक नया राजनीतिक विकल्प तैयार करने की कोशिश में हैं. हालांकि नई पार्टी का नाम और इसके गठन की तारीख़ अभी तय नहीं है, लेकिन ख़ाका बन रहा है.

बीबीसी संवाददाता अजय शर्मा ने उनसे बातचीत की.

दो तीन साल पहले देश में जो उत्साह उमड़ा, जो ऊर्जा निकली और जो आशा आई उसके लिए, न्याय के लिए, औज़ार की ज़रूरत तो है. एक संगठन की ज़रूरत है. लेकिन इसपर सिर्फ़ स्वराज अभियान का - जो हम चला रहे हैं, कोई एकाधिकार नहीं है.

हम तो सभी वैकल्पिक राजनीति करने वालों का आह्वान कर रहे हैं कि वो ऐसा एक औज़ार मिलकर बनाएं. हम जल्द से जल्द ऐसा औज़ार बनाना चाहते हैं. लेकिन बीच में ये जो ख़बर आई थी कि हम पंजाब में ऐसी पार्टी बना रहे हैं वो ग़लत थी. हमने कोई नया फ़ैसला नहीं लिया है.

पिछले साल 14 अप्रैल को जब स्वराज अभियान की स्थापना हुई तभी हमने स्पष्ट मन बनाया था कि हम एक राजनीतिक आंदोलन हैं.

लेकिन हम पार्टी अभी नहीं बना रहे हैं क्योंकि अभी हम उन मानदंडों तक – आंतरिक लोकतंत्र, जवाबदेही, पारदर्शिता का; नहीं पहुंच पाए हैं जो हमने ख़ुद के लिए तय किए हैं.

जब तक हम ये नहीं कर लेते पार्टी नहीं बनाएंगे. ये भी फ़ैसला किया था कि जब तक देशभर में एक ऊर्जा का संचय नहीं कर लेते तब तक हम पार्टी नहीं बनाएंगे. फ़िलहाल हम उस प्रक्रिया में हैं.

कहने को तो देश में डेढ़ हज़ार पार्टियां हैं. दुकानें बहुत हैं लेकिन माल सबमें एक जैसा है.

सभी पार्टियों में लगभग हालात, नीति के बारे में अनभिज्ञता, देश के लिए कोई नया सपना नहीं है. चेहरे अलग हैं लेकिन चरित्र एक जैसा है. कहने को नाम अलग हैं लेकिन नीति वैसी ही है. इस देश में जब एक नई राजनीतिक वैकल्पिक शक्ति की ज़रूरत है तो इस डेढ़ हज़ार में महज़ एक और नया नाम जोड़ने की ज़रूरत नहीं है.

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ज़रूरत है ऐसी राजनीतिक शक्ति संगठन की जो देश के बारे में एक नया सपना रखता हो. 21वीं सदी की चुनौतियों का मुक़ाबला करने की योजना रखता हो. जिसके पास अपने चरित्र के कुछ मानदंड हों, जिनका जनता मूल्यांकन कर सके और जिसके पास अलग क़िस्म के कार्यकर्ताओं का संगठन हो. जिसका जनता बाहर से मूल्यांकन कर सके.

हमें दल बनाने से कोई परहेज़ नहीं है और जब दल बनाएंगे तो चुनावी राजनीति में उतरने से भी परहेज़ नहीं होगा. लेकिन जब तक हम ख़ुद को कुछ कसौटियां पर नहीं तौल लेते, जब तक हम वो चीज़ें नहीं कर लेते, तब तक हड़बड़ी में पार्टी बननाने का कोई मतलब नहीं है.

आम आदमी पार्टी जिस सपने के साथ शुरू हुई थी. आज वो जहां भी है सफल है या असफल है, वो मूल्यांकन तो जनता करेगी लेकिन वो आम पार्टी हो गई है बाक़ी पार्टियों जैसी. लोग आप की ओर आए थे ये सोचकर नहीं कि ये एक और दुकान है, बल्कि ये सोचकर कि यह मंदिर है. दिक़्क़त ये है कि जिसे लोगों ने मंदिर समझा था वो भी मूर्तियों की एक दुकान ही निकली. इसलिए अब अगर वैकल्पिक राजनीति का कोई नया प्रयोग करना है, तो उसके लिए ज़रूरी है कि एक उसका अपने पास एक सिद्धांत नीति का वक्तव्य हो.

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दूसरे पार्टी में आमदनी और ख़र्च की पारदर्शिता हो ताकि लोग तय कर सकें कि काम ईमानदारी से हो रहा है या नहीं. तीसरे, पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र हो, किसी एक व्यक्ति समूह या दिल्ली में क़ाबिज़ नेताओं की डिक्टेटरशिप न हो. बल्कि आम कार्यकर्ता फ़ैसले लेने की स्थिति में हों. पार्टी में जो लोग शामिल हों उनके चरित्र की जांच हो सके. अगर कल किसी को मेरे बारे में शक है तो वो संस्था में मौजूद आंतरिक लोकपाल के पास जा सके, जो उसकी निष्पक्ष जांच करे. पार्टी नेता सर्वोपरि न हो उसका कार्यकर्ता और जनता के प्रति जवाबदेही सर्वोपरि हो.

ये फ़ैसला करने वाला मैं आधिकारिक व्यक्ति नहीं हूं. हमने तय किया है कि जब हमारे संगठन में पूरी तरह आंतरिक लोकतंत्र स्थापित हो जाएगा तभी इसका निर्णय हो पाएगा.

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मैं इतना ही कह सकता हूं कि स्वराज अभियान के साथियों के लिए राजनीति का मतलब सिर्फ़ राजनीतिक दल नहीं. राजनीतिक दल का मतलब सिर्फ़ चुनाव लड़ना नहीं है. और चुनाव लड़ने का उद्देश्य किसी भी तरह जीतकर सत्ता पर क़ाबिज़ होना नहीं है. राजनीति समाज में बदलाव का नाम है. हम पूरे समाज में बदलाव के लिए उतरे हैं. हम उसी उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ रहे हैं जिसे लेकर रामलीला मैदान से चले थे.

अभी ऐसा कुछ नहीं है. ये फ़ैसले अभी किए जाने हैं जो सभी की सहमति से होगा.

क्या जिन चीज़ों को आप अपनी पार्टी में लाना चाहते हैं, वही चीज़ें आम आदमी पार्टी में नहीं हुईं जिनकी वजह से लोगों का मोहभंग हुआ है?

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आम आदमी पार्टी बहुत सपनों से बनी पार्टी थी. देश के हज़ारों कार्यकर्ताओं ने उसे जीवन दिया था. लाखों लोग सड़कों पर उतरे और करोड़ों ने राजनीति से आशाएं बांधी. ये सोचकर नहीं कि राजनीति की जो दुकानें हैं उनसे यहां माल सस्ता है. बल्कि ये सोचकर कि ये मंदिर है. मगर वो भी दुकान ही निकली और उससे लोगों को ठेस पहुँची. लोगों की आस्था टूटी.

अगर कोई राजनीति और ईमानदारी की बात करे तो लोगों को हंसी आती है. आम आदमी पार्टी चुनावी तौर पर सफल रही है उन्हें मेरी शुभकामनाएं हैं. मगर एक नुक़सान भी हुआ, देश में वैकल्पिक राजनीति का नाम बदनाम हो गया है और देश में ऐसा प्रयास करने वालों के लिए काम और मुश्किल हो गया है.

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